Skip to content
SarvaKosh
महाभारत (खंड २) - वन पर्व

महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

by महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास

DevanagariSanskritpublished2,580 pages

Page 683 of 2580

Read in context
Page 683

महीपाल! मैंने दैत्यों और दानवोंको अधर्मके द्वारा बढ़ते और पुनः नष्ट होते भी देखा है॥ ५॥

पुरा देवयुगे चैव दृष्टं सर्वं मया विभो।
अरोचयन् सुरा धर्मं धर्मं तत्यजिरेऽसुराः ॥ ६॥
प्रभो! पहले देवयुगमें ही मैंने यह सब अपनी आँखों देखा है। देवताओंने धर्मके प्रति अनुराग किया और असुरोंने उसका परित्याग कर दिया॥ ६॥

तीर्थानि देवा विविशुर्नाविशन् भारतासुराः।
तानधर्मकृतो दर्पः पूर्वमेव समाविशत्॥ ७॥
भरतनन्दन! देवताओंने स्नानके लिये तीर्थोंमें प्रवेश किया, परंतु असुर उनमें नहीं गये। अधर्मजनित दर्प असुरोंमें पहलेसे ही समा गया था॥ ७॥

दर्पान्मानः समभवन्मानात् क्रोधो व्यजायत।
क्रोधाद्ध्रीस्ततोऽलज्जा वृत्तं तेषां ततोऽनशत्॥ ८॥
दर्पसे मान हुआ और मानसे क्रोध उत्पन्न हुआ। क्रोधसे निर्लज्जता आयी और निर्लज्जताने उनके सदाचारको नष्ट कर दिया॥ ८॥

तानलज्जान् गतह्रीकान् हीनवृत्तान् वृथाव्रतान्।
क्षमा लक्ष्मीः स्वधर्मश्च न चिरात् प्रजहुस्ततः ॥ ९॥
लक्ष्मीस्तु देवानगमदलक्ष्मीरसुरान् नृप।
तानलक्ष्मीसमाविष्टान् दर्पोपहतचेतसः ॥ १०॥
दैतेयान् दानवांश्चैव कलिरप्याविशत् ततः।
तानलक्ष्मीसमाविष्टान् दानवान् कलिना हतान् ॥ ११॥
दर्पाभिभूतान् कौन्तेय क्रियाहीनानचेतसः।
मानाभिभूतानचिराद् विनाशः समपद्यत॥ १२॥
इस प्रकार लज्जा, संकोच और सदाचारसे हीन एवं निष्फल व्रतका आचरण करनेवाले उन असुरोंको क्षमा, लक्ष्मी और स्वधर्मने शीघ्र त्याग दिया। राजन्! लक्ष्मी देवताओंके पास चली गयी और अलक्ष्मी असुरोंके यहाँ। अलक्ष्मीके आवेशसे युक्त होनेपर उनका चित्त दर्प और अभिमानसे दूषित हो गया। उस दशामें उन दैत्यों और दानवोंमें कलिका भी प्रवेश हो गया। जब वे दानव अलक्ष्मीसे संयुक्त, कलिसे तिरस्कृत और अभिमानसे अभिभूत हो सत्कर्मोंसे शून्य, विवेकरहित और मानसे उन्मत्त हो गये, तब शीघ्र ही उनका विनाश हो गया॥ ९—१२॥

निर्यशस्कास्तथा दैत्याः कृत्स्नशो विलयं गताः।
देवास्तु सागरांश्चैव सरितश्च सरांसि च॥ १३॥
अभ्यगच्छन् धर्मशीलाः पुण्यान्यायतनानि च।
तपोभिः क्रतुभिर्दानैराशीर्वादैश्च पाण्डव॥ १४॥