महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
by महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास
अध्याय (पृष्ठ 2412)
खाण्डवे युध्यमानस्य कस्तदाऽऽसीत् सखा मम ॥ ३७ ॥
यह सुनकर अर्जुन खिलखिलाकर हँस पड़े और बोले—'वीर! डरो मत! कौरवोंकी घोषयात्राके समय जब मैंने महाबली गन्धर्वोंके साथ युद्ध किया था, उस समय मेरा सखा या सहायक कौन था? जब देवताओं और दानवोंसे भरे हुए उस अत्यन्त भयंकर खाण्डववनमें मैं युद्ध कर रहा था, उस समय मेरा साथी कौन था? ॥ ३५—३७ ॥
निवातकवचैः सार्धं पौलोमैश्च महाबलैः ।
युध्यतो देवराजार्थे कः सहायस्तदाभवत् ॥ ३८ ॥
देवराज इन्द्रके लिये महाबली निवातकवच और पौलोम दैत्योंके साथ युद्ध करते समय मेरा कौन सहायक था? ॥ ३८ ॥
स्वयंवरे तु पाञ्चाल्या राजभिः सह संयुगे ।
युध्यतो बहुभिस्तात कः सहायस्तदाभवत् ॥ ३९ ॥
तात! द्रौपदीके स्वयंवरमें जब मुझे अनेक राजाओंके साथ युद्ध करना पड़ा था, उस समय किसने मेरी सहायता की थी? ॥ ३९ ॥
उपजीव्य गुरुं द्रोणं शक्रं वैश्रवणं यमम् ।
वरुणं पावकं चैव कृपं कृष्णं च माधवम् ॥ ४० ॥
पिनाकपाणिनं चैव कथमेतान् न योधये ।
रथं वाहय मे शीघ्रं व्येतु ते मानसो ज्वरः ॥ ४१ ॥
मैं गुरुवर द्रोणाचार्य, इन्द्र, कुबेर, यमराज, वरुण, अग्निदेव, कृपाचार्य, लक्ष्मीपति श्रीकृष्ण तथा पिनाकपाणि भगवान् शंकर—इन सबका आश्रय पा चुका हूँ; फिर भला, इन महारथियोंसे युद्ध क्यों नहीं कर सकूँगा? शीघ्र मेरा रथ हाँको; तुम्हारी मानसिक चिन्ता दूर हो जानी चाहिये ॥
इति श्रीमहाभारते विराटपर्वणि गोहरणपर्वणि उत्तरगोग्रहे उत्तरार्जुनयोर्वाक्यं नाम पञ्चचत्वारिंशोऽध्यायः ॥ ४५ ॥
इस प्रकार श्रीमद्महाभारत विराटपर्वके अन्तर्गत गोहरणपर्वमें उत्तरगोग्रहके अवसरपर विराटकुमार उत्तर और अर्जुनकी बातचीतविषयक पैंतालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ४५ ॥
(दाक्षिणात्य अधिक पाठके ६ श्लोक मिलाकर कुल ४७ श्लोक हैं।)