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महाभारत (खंड २) - वन पर्व

महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

by महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास

DevanagariSanskritpublished2,580 pages

Page 1747 of 2580

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Page 1747

न म्लायन्ति स्रजस्तेषां दिव्यगन्धा मनोरमाः ।
संयुज्यन्ते विमानैश्च ब्रह्मन्नेवंविधैश्च ते ॥ १५ ॥
स्वर्गवासियोंकी जो (दिव्य कुसुमोंकी) मालाएँ होती हैं, वे कभी कुम्हलाती नहीं हैं। उनसे निरन्तर दिव्य सुगन्ध फैलती रहती है तथा वे देखनेमें भी बड़ी मनोरम होती हैं। ब्रह्मन्! स्वर्गके सभी निवासी ऐसे ही विमानोंसे सम्पन्न होते हैं ॥ १५ ॥
ईर्ष्याशोकक्लमापेता मोहमात्सर्यवर्जिताः ।
सुखं स्वर्गजितस्तत्र वर्तयन्ते महामुने ॥ १६ ॥
महामुने! जो अपने सत्कर्मोंद्वारा स्वर्गलोकपर विजय पा चुके हैं, वे वहाँ बड़े सुखसे जीवन बिताते हैं। उनमें किसीके प्रति ईर्ष्या नहीं होती, वे कभी शोक तथा थकावटका अनुभव नहीं करते एवं मोह तथा मात्सर्य (द्वेषभाव)-से सदा दूर रहते हैं ॥ १६ ॥
तेषां तथाविधानां तु लोकानां मुनिपुङ्गव ।
उपर्युपरि लोकस्य लोका दिव्या गुणान्विताः ॥ १७ ॥
मुनिश्रेष्ठ! देवताओंके जो पूर्वोक्त प्रकारके लोक हैं, उन सबसे ऊपर अन्य कितने ही विविध गुणसम्पन्न दिव्य लोक हैं ॥ १७ ॥
पुरस्ताद् ब्राह्मणास्तत्र लोकास्तेजोमयाः शुभाः ।
यत्र यान्त्यृषयो ब्रह्मन् पूताः स्वैः कर्मभिः शुभैः ॥ १८ ॥
उन सबसे ऊपर ब्रह्माजीके लोक हैं, जो अत्यन्त तेजस्वी एवं मंगलकारी हैं। ब्रह्मन्! वहाँ अपने शुभ कर्मोंसे पवित्र ऋषि, मुनि जाते हैं ॥ १८ ॥
ऋभवो नाम तत्रान्ये देवानामपि देवताः ।
तेषां लोकात् परतरे यान् यजन्तीह देवताः ॥ १९ ॥
वहीं ऋभु नामक दूसरे देवता रहते हैं, जो देवगणोंके भी आराध्यदेव हैं। देवताओंके लोकोंसे उनका स्थान उत्कृष्ट है। देवतालोग भी यज्ञोंद्वारा उनका यजन करते हैं ॥ १९ ॥
स्वयंप्रभास्ते भास्वन्तो लोकाः कामदुघाः परे ।
न तेषां स्त्रीकृतस्तापो न लोकैश्वर्यमत्सरः ॥ २० ॥
उनके उत्तम लोक स्वयंप्रकाश, तेजस्वी और सम्पूर्ण कामनाओंकी पूर्ति करनेवाले हैं। उन्हें स्त्रियोंके लिये संताप नहीं होता। लोकोंके ऐश्वर्यके लिये उनके मनमें कभी ईर्ष्या नहीं होती ॥ २० ॥
न वर्तयन्त्याहुतिभिस्ते नाप्यमृतभोजनाः ।
तथा दिव्यशरीरास्ते न च विग्रहमूर्तयः ॥ २१ ॥
वे देवताओंकी तरह आहुतियोंसे जीविका नहीं चलाते। उन्हें अमृत पीनेकी आवश्यकता नहीं होती। उनके शरीर दिव्य ज्योतिर्मय हैं। उनकी कोई विशेष आकृति नहीं होती ॥ २१ ॥
न सुखे सुखकामास्ते देवदेवाः सनातनाः ।