महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
by महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास
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Read in contextमहाबली भीमसेन उसे निर्बल एवं अचेत होते देख उसकी छातीपर चढ़ बैठे और बड़े वेगसे उसे रौंदने लगे ॥ ७१ ॥
क्रोधाविष्टो विनिःश्वस्य पुनश्चैनं वृकोदरः ।
जग्राह जयतां श्रेष्ठः केशेष्वेव तदा भृशम् ॥ ७२ ॥
विजयी वीरोंमें श्रेष्ठ भीमसेनका क्रोधावेश अभी उतरा नहीं था। उन्होंने पुनः बारंबार उच्छ्वास लेकर कीचकके केश पकड़ लिये ॥ ७२ ॥
गृहीत्वा कीचकं भीमो विरराज महाबलः ।
शार्दूलः पिशिताकाङ्क्षी गृहीत्वेव महामृगम् ॥ ७३ ॥
जैसे कच्चे मांसकी अभिलाषा रखनेवाला सिंह महान् मृगको पकड़ ले, उसी प्रकार महाबली भीम कीचकको पकड़कर बड़ी शोभा पा रहे थे ॥ ७३ ॥
तत एनं परिश्रान्तमुपलभ्य वृकोदरः ।
योक्त्रयामास बाहुभ्यां पशुं रशनया यथा ॥ ७४ ॥
तदनन्तर उसे अत्यन्त थका जानकर भीमने अपनी भुजाओंमें इस प्रकार कस लिया, जैसे पशुको रस्सीसे बाँध दिया गया हो ॥ ७४ ॥
नदन्तं च महानादं भिन्नभेरीसमस्वनम् ।
भ्रामयामास सुचिरं विस्फुरन्तमचेतसम् ॥ ७५ ॥
अब वह फूटे नगारेके समान विकृत स्वरमें जोर-जोरसे सिंहनाद करने तथा बन्धनसे छूटनेके लिये छटपटाने लगा। उसकी चेतना लुप्त हो रही थी। उसी दशामें भीमसेनने बहुत देरतक उसे घुमाया ॥ ७५ ॥
प्रगृह्य तरसा दोर्भ्यां कण्ठं तस्य वृकोदरः ।
अपीडयत् कृष्णायास्तदा कोपोपशान्तये ॥ ७६ ॥
फिर द्रौपदीका क्रोध शान्त करनेके लिये उन्होंने दोनों हाथोंसे उसका गला पकड़कर बड़े वेगसे दबाया ॥
अथ तं भग्नसर्वाङ्गं व्याविद्धनयनाम्बरम् ।
आक्रम्य च कटीदेशे जानुना कीचकाधमम् ।
अपीडयत् बाहुभ्यां पशुमारममारयत् ॥ ७७ ॥
इस प्रकार जब उसके सब अंग भग्न हो गये, आँखकी पुतलियाँ बाहर निकल आयीं और वस्त्र फट गये, तब उन्होंने उस कीचकाधमकी कमरको अपने घुटनोंसे दबाकर दोनों भुजाओंद्वारा उसका गला घोंट दिया और उसे पशुकी तरह मारने लगे ॥ ७७ ॥
तं विषीदन्तमाज्ञाय कीचकं पाण्डुनन्दनः ।
भूतले भ्रामयामास वाक्यं चेदमुवाच ह ॥ ७८ ॥
मृत्युके समय कीचकको विषाद करते देख पाण्डुनन्दन भीमने उसे धरतीपर घसीटा और इस प्रकार कहा— ॥ ७८ ॥