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माधव निदान (मधुकोश व्याख्या व हिन्दी अनुवाद सहित)

Madhava Nidana with Madhukosha & Hindi Translation

by माधवकर

Source: खेमराज श्रीकृष्णदास · खेमराज श्रीकृष्णदास (origin)

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DevanagariSanskritpublished404 pages

About this granth

The Madhava Nidana (माधव निदान), also called the Rugvinishchaya, is Madhavakara's treatise on the diagnosis of disease in Ayurveda. He gathered the diagnostic material scattered through the works of Charaka, Sushruta and Vagbhata into one ordered text, which became the standard Ayurvedic work on identifying illness. Each disease is examined through the five aspects of diagnosis: cause, early signs, symptoms, response to trial treatment and pathogenesis.

This scan is the July 2007 (Samvat 2064) edition of Khemraj Shrikrishnadas, Bombay, giving the Sanskrit verses with the Hindi commentary of Dattaram, son of Shrikrishnalal. The preface discusses the place of diagnosis, the patient, the physician and medicine in Ayurveda.

The detailed contents show the range of the work: fevers and their forms in the tissues, sannipata, diarrhoea, grahani, the varieties of breathing disorders, the effects of alcohol, epilepsy, defects of semen and impotence, among many others, with passages cited from Sushruta and others.

( ३२२ ) माधवनिदान ।

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( ३२२ ) माधवनिदान ।
तीसरे पटलमें दोष जानेसे ऊपरकी वस्तु दीखे, नीचेकी वस्तु नहीं दीखे, जो
वस्तु बडी और भव्य होवे, वह वस्त्रसे ढकीसी दीखे, कान नाक और नेत्र इन करके
रहित पुरुषोंको देखें, टेढे बांके दीखे और जिस वातादि दोषका रुधिर मांस मेदादिकोंके
सहाय होनेसे उनमें जो दोष बलवान् होय उसका जैसा रूप ( रंग ) होवे उसी
प्रकारका दीखे अर्थात् जिस जिस दोषका जैसा वर्ण होय वैसा दीखे, दोष नीचे
स्थित होयें सो समीपस्थ वस्तु नहीं दीखे और ऊपर दोष स्थित होयें तो दूरकी
वस्तु न दीखे और दोष पार्श्व ( पसवाडे ) में स्थित होनेसे पसवाडेकी वस्तु नहीं
दीखे और दोष दृष्टिमें सर्वत्र स्थित होवें तो उस पुरुषको सब चीज मिलीसी दीखे,
दृष्टिके मध्यमें दोष जानेसे बडी वस्तु छोटी दीखे, दो ठिकाने दोष रहनेसे एक
वस्तुकी दो दीखे और दोष अव्यवस्थित अर्थात् एकही स्थानमें स्थित न होनेसे
एक वस्तुके दो टुकडेसे दिखलाई देवें, दृष्टिगत दोष तिरछे स्थित होनेसे एक
वस्तुके दो टुकडे दिखाई देवे यह स्वरूपोंका दीखना तीसरे ( पटल ) से प्रारम्भ
होता है सो विदेहने लिखा भी है ॥
चतुर्थपटलगत तिमिरलक्षण ।
तिमिराख्यः स वै रोगश्चतुर्थपटलं गतः ॥ ४१ ॥
रुणद्धि सर्वतो दृष्टिं लिङ्गनाशमतः परम् ।
अस्मिन्नपि तमोभूते नातिरूढे महागदे ॥ ४२ ॥
चन्द्रादित्यौ सनक्षत्रावन्तरिक्षे च विद्युतः ।
निर्मलानि च तेजांसि भ्राजिष्णूनि च पश्यति ॥ ४३ ॥
वह तिमिररोग चौथे पटल ( परदे ) में पहुँचनेसे दृष्टिको चारों ओरसे रोकदे
इसको कोई आचार्य लिंगनाश कहते हैं और कोई तिमिर कहते हैं । यह अन्धकार-
मय रोग अति बढजाय तब उस मनुष्यको आकाशमें चन्द्र, सूर्य, नक्षत्र, बिजली
और निर्मल तेज भी यथार्थ नहीं दीखे, तेजके पुंजसे दीखे, लिंगनाशकी निरुक्ति-
“ लिंग्यते ज्ञायते अनेनेति लिंगमिन्द्रियशक्तिस्तस्य नाशो यस्मिन्निति लिंगनाशः ”
अर्थात् जिसकरके जाने सो कहिये लिंग ( इन्द्रिय ) उसका नाश जिसमें होय
उसको लिंगनाश कहते हैं और इसीरोगको लौकिकमें मोतियाबिंदु भी कहते हैं ॥
तृतीयपटलाश्रित काचदोषकी दूसरी संज्ञा ।
स एव लिंगनाशस्तु नीलिकाकाचसंज्ञितः ।
१ यथास्वं रज्यते दृष्टिर्दोषैस्त्रिपटलस्थितैः । चतुर्थं पटलं प्राप्य मण्डलं रज्यते तु तैः ॥ इति ॥

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भाषाटीकासमेत । ( ३२३ )
तीसरे पटलगत काच ( मोतियाबिन्दु की ) उपेक्षा करनेसे वही फिर चौथे पटलमें
पहुँचता है, तब उसे लिंगनाश और नीलिका कहते हैं, यह रोग असाध्य है, सो
निमि'आचार्य लिखते हैं, परन्तु गदाधर आचार्य कहते हैं कि, विशेष काचको
नीलिकाकाच कहते हैं ॥
दोषविशेषकरके रूपका दीखना कैसा होता है ?
तत्र वातेन रूपाणि भ्रमन्तीव हि पश्यति ।
आविलान्यरुणाभानि व्याविद्धानीव मानवः ॥ ४४ ॥
पित्तेनादित्यखद्योतशक्रचापत्तडिद्रुणान् ।
नृत्यतश्चैव शिखिनः सर्वं नीलं च पश्यति ॥ ४५ ॥
कफेन पश्येद्रूपाणि स्निग्धानि च सितानि च ।
सलिलप्लावितानीव परिजाड्यानि मानवः ॥ ४६ ॥
पश्येद्रक्तेन रक्तानि तमांसि विविधानि च ।
ससितान्यथ कृष्णानि पीतान्यपि च मानवः ॥ ४७ ॥
सन्निपातेन चित्राणि विप्लुतानि च पश्यति ।
बहुधा च द्विधा वापि सर्वाण्येव समंततः ॥
हीनांगान्यधिकांगानि ज्योतींष्यपि च पश्यति ॥ ४८ ॥
बादीसे रोगीको मलीन, कुछ लाल, तिरछी और भ्रमती ऐसी वस्तु दीखे । पित्तसे
सूर्य, खद्योत ( पटबीजना ) इन्द्रधनुष, बिजली इनको और नाचनेवाले मोर तथा सर्व
वस्तु नीली दीखे। कफसे चिकना और सफेद तथा पानीमें डुबोया हुआ निकालनेके
समान और भारी ऐसा रूप दीखे । रुधिरसे लाल और अनेकप्रकारका अन्धकार
तथा किंचित् सफेद काली और पीली ऐसी वस्तु दीखे । सन्निपातसे अनेक प्रकारके
विपरीत अर्थात एककी अनेक तथा दो अथवा अनेक प्रकारके रूप दीखें, हीन
अंगके अथवा अधिक अंगके रूप रोगी देखे और ज्योतिस्वरूपसे सब पदार्थ दीखे॥
पित्तसे दूसरा परिम्लायिसंज्ञक तिमिर होय है ।
पित्तं कुर्यात्परम्लायि मूर्च्छितं रक्ततेजसा ।
पीता दिशस्तथोद्द्योतान्नवीनपि स पश्यति ।
विकीर्यमाणान्खद्योतैवॄक्षांस्तेजोभिरेव च ॥ ४९ ॥
१ काच इत्येष किजयो याप्यस्त्रिपटलस्यितैः । चतुर्थपटलं प्राप्तो लिङ्गनाशः सः उच्यते ॥
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( ३२४ ) माधवनिदान ।

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( ३२४ ) माधवनिदान ।
रक्तके तेजसे मिश्रित हुए परिम्लायीरोग होय, इसके योगसे रोगीको दिशा
आकाश और सूर्य ये पीले दीखें और सर्वत्र सूर्य उगेसे दीखे तथा वृक्ष भी तेज-
स्वरूपसे दीखे, परिम्लायी पित्तको नील कहते हैं सो सात्यकिने लिखा है, इस
रोगको कोई आचार्य रक्तपित्तसे होता है ऐसे कहते हैं सो भी लिखा है ॥
रागभेदसे लिंगनाशको षड्विधत्व कहते हैं-
वक्ष्यामि षड्विधं रागैर्लिङ्गनाशमतः परम् ॥ ५० ॥
रागोऽरुणो मारुतजः प्रदिष्टो म्लायी च नीलश्च तथैव पित्तात् ।
कफात्सितः शोणितजः सरक्तः समस्तदोषप्रभवो विचित्रः ॥ ५१ ॥
इसके अनन्तर रागभेदसे छः प्रकारका लिंगनाश होता है, सो इस प्रकार है-वात-
जन्य रंग लाल होय है, पित्तसे म्लायी पीला, नीला अथवा नीलाही रंग होय, कफसे
सफेद और रुधिरसे लाल तथा सब दोषोंसे अनेक प्रकारका रंग होता है ॥
वातिकरोगके विशेष लक्षण ।
अरुणं मण्डलं दृष्ट्यां स्थूलकाचारुणप्रभम् ।
परिम्लायिनि रोगे स्यान्म्लायि नीलं च मण्डलम् ॥
दोषक्षयात्कदाचित्स्यात्स्वयं तत्र प्रदर्शनम् ॥ ५२ ॥
परिम्लायि रोगमें दृष्टिके ऊपर मोटा कांचके समान लाल मण्डल होता है, वह
म्लान लाल पीला अथवा नील होता है, उसमें दोष घटनेसे कदाचित् देखनेकी
शक्ति होय । इस जगह दोषशब्दकरके कोई कर्मका ग्रहण करते हैं ॥
दृष्टिमण्डलगत रोगके लक्षण ।
अरुणं मण्डलं वाताच्चंचलं परुषं तथा ।
पित्तान्मण्डलमानीलं कांस्याभं पीतमेव च ॥ ५३ ॥
श्लेष्मणा बहलं स्निग्धं शंखकुन्देन्दुपाण्डुरम् ।
चलत्पद्मपलाशस्थः शुक्लो बिन्दुरिवांभसः ॥ ५४ ॥
मर्द्यमाने च नयने मण्डलं तद्विसर्पति ।
प्रवालपद्मपत्राभं मण्डलं शोणितात्मकम् ॥ ५५ ॥
१ एवमेव तु विज्ञेया नीलाः पित्तसमुद्भवाः । रक्तपित्तोत्थिताः पीताः ॥ इति ॥
२ विदधाति परिम्लायि पित्तं रक्तेन संगतम् । तेन पीता दिशः पश्येद्युद्यन्तमिव भास्करम् ॥ इति ॥

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भाषाटीकासमेत । ( ३२६ )
दृष्टिरागो भवेच्चित्रो लिंगनाशे त्रिदोषजे ।
यथास्वं दोषलिङ्गानि सर्वेष्वेव भवंति हि ॥ ५६ ॥
वादीसे दृष्टिमण्डल लाल, चञ्चल और खरदरा होता है । पित्तसे दृष्टिमण्डल
किञ्चित् नीला तथा काँसेके समान पीला होवे । कफसे भारी चिकना शंख कुन्द-
फूल और चन्द्र इनके समान सफेद होय और उसके नेत्रमें हलनेवाली कमलपत्रके
ऊपर पानीकी बूँदके समान टेढी तिरछी सफेद बून्द फैलीसी दिखलाई दे । रुधिरसे
दृष्टिमण्डल मूंगाके समान अथवा लाल कमलके समान लाल होवे और त्रिदोषज
लिंगनाशमें तरह तरहके मण्डल होयँ तथा सर्व दोषोंके लिंगमण्डलमें वातादि दोषोंके
न्यारे २ लक्षण होयँ ॥
आगे कहेगये और पीछे कहे ऐसे दृष्टिरोगोंकी संख्या ।
षड्लिङ्गनाशाः षडिमे च रोगा दृष्ट्याश्रयाः षट् च षडेव च स्युः ५७
पूर्व कहे लिंगनाश रोग छः और आगे विदग्धदृष्ट्यादि कहे गये वे छः ऐसे मिल-
कर बारह दृष्टिरोग होते हैं ॥
पित्तविदग्धके लक्षण ।
पित्तेन दुष्टेन गतेन वृद्धिं पीता भवेद्यस्य नरस्य दृष्टिः ।
पीतानि रूपाणि च तेन पश्येत्स वै नरः पित्तविदग्धदृष्टिः ॥ ५८ ॥
पित्त दुष्ट होकर बढनेसे जिस मनुष्यकी दृष्टि पीली होय तथा उसके योगसे उस
मनुष्यको सब पदार्थ पीले रंगके दीखें, उस दृष्टिको पित्तविदग्ध कहते हैं ॥
दिवांध्यके लक्षण ।
प्राप्ते तृतीयं पटलं च दोषे दिवा न पश्येन्निशि वीक्षते सः ।
रात्रौ स शीतानुगृहीतदृष्टिः पित्ताल्पभावादपि तानि पश्येत् ॥ ५९ ॥
तीसरे पटलमें दोष ( पित्त ) जानेसे दिनमें रोगीको नहीं दीखे, रात्रिमें शीतल-
ताके कारण पित्त कम होनेसे दीखे ॥
कफविदग्धदृष्टिके लक्षण ।
तथा नरः श्लेष्मविदग्धदृष्टिस्तान्येव शुक्लानि हि मन्यते तु ।
इसी प्रकार कफविदग्ध पुरुषको सफेद रूप दीखे ॥
नक्तांध्य ( रतौंध ) के लक्षण ।
त्रिषु स्थितो यः पटलेषु दोषो नक्तांध्यमापादयति प्रसय ।
दिवा स सूर्यानुगृहीतदृष्टिः पश्येत्तु रूपाणि कफाल्पभावात् ॥ ६० ॥
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( ३२६ ) माधवनिदान ।

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( ३२६ ) माधवनिदान ।
जो दोष ( कफ ) तीनों पटलोंमें रहे वह नक्तांध्य ( रतौंध ) उत्पन्न करे वह
कफ दिवस ( दिन ) में सूर्यके तेजसे कम होनेसे दीखे ॥
धूमदर्शीके लक्षण ।
शोकज्वरायासशिरोऽभितापैरभ्याहता यस्य नरस्य दृष्टिः ।
धूम्रांस्तथा पश्यति सर्वभावान्स धूमदर्शीति नरः प्रदिष्टः ॥ ६१ ॥
शोक, ज्वर, परिश्रम और मस्तकताप इन कारणोंसे पित्त कुपित होकर जिसकी
दृष्टिमें विकार होवे उससे उस मनुष्यको सर्व पदार्थ धूएँके रंगके दीखें, इस रोगको
धूमदर्शी वा शोकविदग्धदृष्टि कहते हैं, इसमें दिनको धूएँके रंगके पदार्थ दीखें, इसका
कारण यह है कि, रात्रिमें पित्तका तेज घटनेसे निर्मल दीखे ॥
ह्रस्वदृष्टिके लक्षण ।
यो ह्रस्वजाड्यो दिवसेषु कृच्छ्राद्
ह्रस्वानि रूपाणि च तेन पश्येत् ॥ ६२ ॥
जो ह्रस्वजाड्य पुरुष होता है उसको दिनमें बडे पदार्थ छोटे दीखें इसका कारण
यह है कि उस समय दृष्टिके मध्यगत दोष होता है, यह रोग भी पित्तजन्य है॥
नकुलांध्यके लक्षण ।
विद्योतते यस्य नरस्य दृष्टिर्दोषामिपन्ना नकुलस्य यद्वत् ।
चित्राणि रूपाणि दिवा स पश्येतस वै विकारो नकुलांध्यसंज्ञः॥६३॥
जिस पुरुषकी दृष्टि दोषोंसे व्याप्त होकर नैलेकी दृष्टिके समान चमके वह पुरुष
दिनमें अनेक प्रकारके रूप देखे, इस विकारको नकुलांध्य कहते हैं ॥
गम्भीरदृष्टिके लक्षण ।
दृष्टिर्विरूपा श्वसनोपसृष्टा संकोचमभ्यंतरतश्च याति ।
रुजावगाढं च तमक्षिरोगं गम्भीरिकेति प्रवदंति तज्ज्ञाः ॥ ६४ ॥
जो दृष्टि वायुसे विकृत होंकर भीतरको संकुचित होवे तथा उसमें पीडा होवे,
उसको गम्भीरदृष्टि कहते हैं ॥
आगन्तुज लिंगनाशके लक्षण ।
बाह्यो पुनर्द्विविह संप्रदिष्टौ निमित्ततश्चाप्यनिमित्ततश्च ।
निमित्ततस्तत्र शिरोऽभितापाज्ज्ञेयस्त्वभिष्यंदनिदर्शनः सः ॥६५॥
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भाषाटीकासमेत । ( ३२७ )
अभिघातज लिंगनाश दो प्रकारका है-एक निमित्तजन्य, दूसरा अनिमित्तजन्य,
तिनमें शिरोभितापकरके ( विषवृक्षके फलसे मिले पवनका मस्तकमें स्पर्श होनेसे )
होय उसको निमित्तजन्य कहते हैं, इसमें रक्ताभिष्यंदके लक्षण होते हैं ॥
अनिमित्तके लक्षण ।
सुरर्षिगंधर्वमहोरगाणां सन्दर्शनेनापि च भास्करस्य ।
हन्येत दृष्टिर्मनुजस्य यस्य स लिंगनाशस्त्वनिमित्तसंज्ञः ॥
तत्राक्षि विस्पष्टमिवावभाति वैदूर्यवर्णा विमला च दृष्टिः ॥ ६६ ॥
देव, ऋषि, गंधर्व, महासर्प और सूर्य इनके संमुख दृष्टिको लगाकर ( टकटकी
लगाकर ) देखनेसे जिस मनुष्यकी दृष्टि नष्ट होय, उसको अनिमित्तलिंगनाश कहते
हैं, इस रोगमें नेत्र स्वच्छ दीखते हैं और दृष्टि वैदूर्यमणिके समान स्वच्छ कहिये
श्यामवर्ण होय । अब कहते हैं कि, देवादिक भौतिक इन्द्रियोंको नहीं बिगाड़ें, परन्तु
उनकी शक्तिका नाश करते हैं, सो चरकमें लिखा है ॥
अर्मरोग ५ प्रकारका है ।
प्रस्तार्यर्म तनु स्तीर्णं श्यावं रक्तनिभं सिते ।
सश्वेतं मृदु शुक्रार्म शुक्रे तद्वर्द्धते चिरात् ॥ ६७ ॥
पद्माभं मृदु रक्तार्म यन्मांसं चीयते सिते ।
पृथु मृद्धधिमांसार्म बहलं च यकृन्निभम् ।
स्थिरं प्रस्तारि मांसाढ्यं शुष्कं स्नाव्यर्म पंचमम् ॥ ६८ ॥
नेत्रोंके सफेद भागमें पतला विस्तीर्ण श्यामवर्ण तथा लाल ऐसा जो मांस बढ़े
उसको प्रस्तारि अर्मरोग कहते हैं । शुक्लभागमें सफेद मृदुमांस बहुत दिनमें बढ़े
उसको शुक्रार्म कहते हैं । कमलके समान लाल तथा मृदु मांस जो बढ़े उसको रक्तार्म
कहते हैं । जो मांस विस्तीर्ण स्थूल कलेजाके समान ( कुछ काला लाल ) दीखे
उसको अधिमांसार्म कहते हैं । जो कठिन तथा फैलनेवाले स्त्रावरहित मांस बढ़े,
उसको स्नाव्यर्म कहते हैं । विदेहने कहा भी है ॥
१ देवादयोऽष्टौ हि महाप्रभावा न दूषयेयुः पुरुषस्य देहम् । विशंत्यदृश्यास्तरसा यथैव
च्छाया तयोर्द्पणसूर्यकांतौ ॥ २ प्रस्तारिणोऽर्मणः स्रावं निरुणद्धि यथाऽनिलः । विना स्रावं
विशुष्यं यत्स्नाव्यर्मेतीति तद्विदः ॥

( ३२८ ) माधवनिदान ।

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( ३२८ ) माधवनिदान ।
शुक्तिरोगके लक्षण ।
श्यावाः स्युः पिशितनिभास्तु बिंदवो ये
शुक्त्याभाः सितनियताः स शुक्तिसंज्ञः ॥
नेत्रके सफेद भागमें श्यामवर्ण मांसतुल्य सीपीके समान जो बिन्दु होय उसको
शुक्ति कहते हैं ॥
अर्जुनके लक्षण ।
एको यः शशरुधिरोपमश्च बिन्दुः
शुक्लस्थो भवति तदर्जुनं वदंति ॥ ६९ ॥
शुक्लभागमें शश (खरगोश) के रुधिरके समान जो बिन्दु (बून्द) नेत्रमें
उत्पन्न होय उसको अर्जुन कहते हैं ॥
पिष्टकके लक्षण ।
श्लेष्ममारुतकोपेन शुक्ले मांसं समुन्नतम् ।
पिष्टवत्पिष्टकं विद्धि मलाक्तादर्शसन्निभम् ॥ ७० ॥
कफ वायुके कोपसे शुक्लभागमें पिष्ट (पिसासा) जो मांस बढे उसको पिष्टक
कहते हैं, वह मलसे मिले आदर्श (ऐनक) के समान होता है ॥
जालके लक्षण ।
जालाभः कठिनशिरो महान् सरक्तः
संतानः स्मृत इह जालसंज्ञितस्तु ॥
नेत्रके सफेद भागमें शिरा (नस) का समूह जालीके समान होय और वह कठिन
तथा रुधिरके समान लाल होवे उसको जाल कहते हैं ॥
शिराजपिडिकाके लक्षण ।
शुक्लस्थाः सितपिडिकाः शिरावृता या-
स्ता ब्रूयादसितसमीपजाः शिराजाः ॥ ७१ ॥
नेत्रके शुक्लभागमें शिरा (नसों) से व्याप्त ऐसी सफेद फुन्सी होय, उसको
शिराजपिडिका कहते हैं वह कृष्णभागके समीप होती है ॥
बलासके लक्षण ।
कांस्याभोऽमृदुरथ वारिबिन्दुकल्पो
विज्ञेयो नयनसिते बलाससंज्ञः ॥ ७२ ॥
१ मारुता पीडितः श्लेष्मा शुक्लभागे व्यवस्थितः । जलबिन्दुरिवोच्छूनोऽमृदुः स कफसम्भवः ।१
वलासग्रथितं नाम त शाफ दृष्टमादिशेत् ॥

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भाषाटीकासमेत । ( ३२९ )
नेत्रके शुक्लभागमें कांसेके समान कठिन अथवा पानीकी बूँदके समान ऊंची
जो गांठ होय उसको बलास कहते हैं ॥ इति शुक्लरोग ॥
नेत्रकी सन्धिके रोग ।
पूयालसके लक्षण ।
पक्वः शोथः संधिजो यः सतोदः स्रवेत्पूयं पूति पूयालसाख्यः ।
नेत्रकी सन्धिमें सूजन होवे और पककर फूट जाय, उसमेंसे दुर्गन्धि राध बहे तथा
तोद ( सुई छेदनेकीसी पीडा ) होय, उसको पूयालस कहते हैं ॥
उपनाहके लक्षण ।
ग्रन्थिर्नाल्पो दृष्टिसंधावपाकी कंडूप्रायो नीरुजस्तूपनाहः ॥ ७३ ॥
नेत्रकी संधिमें बडी गांठ होवे, वह थोडी पके, उसमें खुजली बहुत हो, दूखे
नहीं उसको उपनाह कहते हैं ॥
स्राव अथवा नेत्रनाडीके लक्षण ।
गत्वा संधीनश्रुमार्गेण दोषाः कुर्युः स्रावाँल्लक्षणैः स्वैरुपैतान् ।
तं हि स्रावं नेत्रनाडीति चैके तस्या लिङ्गं कीर्तयिष्ये चतुर्धा ॥७४॥
वातादि दोष अश्रुमार्गसे सन्धियोंमें प्राप्त होकर स्वकीयलक्षणयुक्त स्राव उत्पन्न
करे उस स्रावको कोई नेत्रनाडी कहते हैं । यह रोग चार प्रकारका है, उसके
लक्षण कहते हैं । शंका-क्योंजी ! वातका स्राव क्यों नहीं कहा ? उत्तर-वातमें
स्राव नहीं होता है इसीसे विदेहने चारही प्रकारके स्राव कहे हैं ॥
पाकः संधौ संस्रवेद्यस्तु पूयं पूयास्रावोऽसौ गदः सर्वजस्तु ।
श्वेतं सान्द्रं पिच्छिलं संस्रवेद्धि श्लेष्मस्रावोऽसौ विकारो मतस्तु॥७५॥
रक्तस्रावः शोणिताद्यो विकारः स्रवेदुष्णं तत्र रक्तं प्रभूतम् ।
हारिद्राभं पीतमुष्णं जलं वा पित्तास्रावः संस्रवेत्संधिमध्यात् ॥ ७६ ॥
पूयास्राव नेत्रकी संधिमें सूजन होकर पके तथा उसमेंसे राध बहे, यह रोग
सन्निपातात्मक है । श्लेष्मस्राव जिसमें सफेद, गाढी और चिकनी राध बहे । रक्त-
स्राव-जिस विकारमें विशेष गरम रुधिर बहे उसको रक्तस्राव कहते हैं । पित्तास्राव-
जिसकी सन्धिमें हल्दीके समान पीला गरम जल बहे उसको पित्तास्राव कहते हैं ॥
१ सन्निपातात्कफाद्रक्तात्पित्तात्स्रावोऽक्षिसंधिषु ॥ इति ।
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( ३१० ) माधवनिदान ।
पर्वणी व अलजीके लक्षण ।
ताम्रा तन्वी दाहपाकोपपन्ना ज्ञेया वैद्यैः पर्वणी वृत्तशोथा ।
जाता सन्धौ शुक्लकृष्णेऽलजी स्यात्तस्मिन्नेव ख्यापिता पूर्वलिंगैः७७
नेत्रकी सफेद काली सन्धियोंमें तांबेके समान छोटी गोल जो फुन्सी होवे
और वह फुन्सी दाह होकर पके उसको पर्वणी कहते हैं और उसी ठिकाने पूर्वरूप
संयुक्त बडी फुन्सी उठे उसको अलजी कहते हैं । पर्वणी और अलजीमें
इतनाही अन्तर है कि, अलजी बडी फुन्सी होती है और पर्वणी छोटी फुन्सी
होती है यह विदेहका मत है ॥
कृमिग्रन्थिके लक्षण ।
कृमिग्रंथिवर्त्मनः पक्ष्मणश्च कण्डूं कुर्युः कृमयः संधिजाताः ।
नानारूपा वर्त्मशुक्लांतसंधौ चरंत्यंतर्नयनं दूषयंतः ॥ ७८ ॥
जिसके नेत्रके शुक्लभागकी संधिमें और पलकोंकी संधिमें उत्पन्न हुई अनेक प्रका-
रकी कृमि खुजली और गांठ उत्पन्न करे और नेत्रके पलक और सफेदी भागकी
संधिमें प्राप्त होकर नेत्रके भीतरके भागको दूषित करे, भीतर फिरे, उसको कृमि-
ग्रन्थि कहते हैं; यह सन्निपातात्मक कहते हैं, सो विदेहका भी मत है ॥
वर्त्म ( मर्मस्थान ) के रोग ।
उत्संगपिडिकाके लक्षण ।
अभ्यन्तरमुखी ताम्रा बाह्यतो वर्त्मतश्च या ।
सोत्संगोत्संगपिडिका सर्वजा स्थूलकण्डुरा ॥ ७९ ॥
नेत्रके ढकनेवाली बाफणी अर्थात् कोयमें फुन्सी होय और उसका मुख भीतर होय
वह बडी तथा लाल खुजली संयुक्त होय उसको उत्संगपिडिका कहते हैं यह सन्नि-
पातसे होती है । गदाधर और विदेहके मतसे पलकोंके कोयके बाहर भी यह रोग
होता है । इस श्लोकमें ‘ च ’ लिखा है उसका यह प्रयोजन है कि, इस जगह भी
मुर्गीके अंडेकासा रस स्राव जानना ॥
१ पर्वणीपिडिका तत्र जायते त्वंकुरोपमा । शुक्लकृष्णांतसंधौ च जनयेद्रोस्तनाकृतिम् ।
पिडिकामलर्जी तां तु विद्धि तोदाश्रुसंकुलाम् ॥ २ ततः पूयममृक्कृष्णाः पतंति कृमयस्तथा ।
लक्षणैर्विविधैर्युक्ताः सन्निपातसमुत्थिताः ॥ कृमिग्रंथिं तु तं विद्याद्देहिनां नेत्रदूषणम् ॥ इति ॥
३ वर्त्मोत्संगादधो जन्तोः सन्निपातात्प्रजायते । अभ्यन्तरमुखी स्थूला बाह्यतश्चापि दृश्यते ॥
पिडिका पिडिकाभिश्च चिताम्याभिः समन्ततः। उत्संगपिडिका नाम कठिना मन्दवेदना॥इति॥

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भाषाटीकासमेत । ( ३३१ )
कुंभिकाके लक्षण।
वर्त्मान्ते पिडिका ध्माता भिद्यन्ते च स्रवंति च ।
कुंभीकबीजसदृशाः कुंभीकाः सन्निपातजाः ॥ ८० ॥
पलकोंके समीप कुंभिकाके बीजके समान अर्थात् जमालगोटेके समान फुन्सी
होय वह पककर फूटकर बहे उसको कुंभिका कहते हैं। कोई आचार्य कहते हैं
कि, कच्छदेशमेंके दाडिम ( अनार ) के बीजके आकार कुंभिका होती है ॥
पोथकीके लक्षण ।
स्राविण्यः कण्डुरा गुर्व्यो रक्तसर्षपसन्निभाः ।
रुजावन्त्यश्च पिडिकाः पोथक्य इति कीर्तिताः ॥ ८१ ॥
जिसके कोएमें लाल सरसोंके समान रुधिरस्राव हो, खुजलीसंयुक्त भारी तथा
पीडासंयुक्त फुन्सी होय, उसको पोथकी कहते हैं ॥
वर्त्मशर्कराके लक्षण ।
पिडिका या खरा स्थूला सूक्ष्माभिरभिसंवृता ।
वर्त्मस्था शर्करा नाम स रोगो वर्त्मदूषकः ॥ ८२ ॥
जिसके कोएमें जो पिडिका कठिन और बडी होकर सर्वत्र छोटी २ फुन्सियोंसे
व्याप्त होय, उसको वर्त्मशर्करा कहते हैं, इससे कोए बिगड जाते हैं ॥
अर्शोवर्त्मके लक्षण ।
उर्वारुबीजप्रतिमाः पिडिका मंदवेदनाः ।
श्लक्ष्णाः खराश्च वर्त्मस्थास्तदर्शोवर्त्म कीर्त्यते ॥ ८३ ॥
ककडीके बीजके बराबर, मन्द पीडा पृथकू २ कठिन ऐसी फुन्सी कोएमें उठें
उनको अर्शोवर्त्म कहते हैं । निमि (विदेहँ) के मतसे यह सन्निपातात्मक है ॥
शुष्कार्शके लक्षण ।
दीर्घाङ्कुरः खरः स्तब्धो दारुणोऽभ्यन्तरोद्भवः ।
व्याधिरेषोऽतिविख्यातः शुष्कार्शो नाम नामतः ॥ ८४ ॥
नेत्रके कोएमें लंबे खरदरे कठिन दुःखदायक ऐसे जो मांसांकुर होयँ उस
व्याधिको शुष्कार्श कहते हैं, यह भी सन्निपातज है ॥
अंजनाके लक्षण ।
दाहतोदवती ताम्रा पिडिका वर्त्मसंभवा ।
मृद्वी मंदरुजा सूक्ष्मा ज्ञेया साऽञ्जनामिका ॥ ८५ ॥
१नीरुजा कठिना वर्त्मपक्ष्मान्तर्बाह्यतोऽपि वा। पिडिका सन्निपातेन तदर्शोवर्त्म कीर्त्यते॥ इति॥

( ३३२ ) माधवनिदान ।

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( ३३२ ) माधवनिदान ।
दाह तोद ( चोटनी ) संयुक्त, लाल, नरम, छोटी, मन्द पीडा करनेवाली ऐसी
फुन्सी नेत्रके कोएमें होय, उसको अंजना कहते हैं, यह भी सन्निपातज है ॥
बहलवर्त्मके लक्षण ।
वर्त्मोपचीयते यस्य पिडिकाभिः समंततः ।
सवर्णामिः स्थिराभिश्च विद्याद्वहलवर्त्म तत् ॥ ८६ ॥
जिसके नेत्रका कोया त्वचाके समान वर्ण तथा कठिन फुन्सियोंसे व्याप्त होय
उसको बहलवर्त्म रोग कहते हैं, यह भी सन्निपातज है ॥
वर्त्मबन्धके लक्षण ।
कण्डूमताऽल्पतोदेन वर्त्मशोथेन यो नरः ।
न संप्रच्छादयेदक्षि यत्रासौ वर्त्मबंधकः ॥ ८७ ॥
जिसके नेत्रके कोयोंमें सूजनसे नेत्रके बराबर सूजन आय जावे, उससे उस
मनुष्यको कुछ नहीं दीखे, इस रोगको वर्त्मबन्ध कहते हैं। इस सूजनमें खुजली
चले तथा तोद ( चोटनी ) होय, यह रोग त्रिदोषज है ॥
क्लिष्टवर्त्मके लक्षण ।
मृद्वल्पवेदनं ताम्रं यद्वर्त्म सममेव च ।
अकस्माच्च भवेद्रक्तं क्लिष्टवर्त्मेति तद्विदुः ॥ ८८ ॥
नेत्रके नीचे ऊपरके दोनों कोए नरम अल्प पीडा तांबेके वर्ण होकर अक-
स्मात् लाल हो जायँ तो इस रोगको क्लिष्टवर्त्मरोग कहते हैं, यह रोग कफरक्तज है
यही मत विदेहका है ॥
वर्त्मकर्दमके लक्षण ।
क्लिष्टं पुनः पित्तयुतं शोणितं विदहेद्यदा ।
ततः क्लिन्नत्वमापन्नमुच्यते वर्त्मकर्दमः ॥ ८९ ॥
क्लिष्टवर्त्म फिर पित्तयुक्त रुधिरको दहन करे, तब वह दही दूध माखनके समान
गीला होजाय, अतएव इस व्याधिको वर्त्मकर्दम कहते हैं, यह पित्ताधिक सन्नि-
पातात्मक है ॥
श्याववर्त्मके लक्षण ।
वर्त्म यद्बाह्यतोऽन्तश्च श्यावं शूनं सवेदनम् ।
तदाहुः श्याववर्त्मेति वर्त्मरोगविशारदाः ॥ ९० ॥
१ श्लेष्मा दुष्टेन रक्तेन क्लिष्टमांसमतः समम् । बंधुजीवनिभं वर्त्म क्लिष्टमांसं तदुच्यते ॥

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भाषाटीकासमेत । ( ३३१ )
जिसके नेत्रके कोएके बाहर अथवा भीतर काली सूजन होय तथा पीडा होय
उसको वर्त्मरोगके जाननेवाले श्याववर्त्म कहते हैं, वह वाताधिक त्रिदोषजन्य है
विदेहने लिखा भी है ॥
प्रक्लिन्नवर्त्मके लक्षण ।
अरुजं बाह्यतः शूनं वर्त्म यस्य नरस्य हि ।
प्रक्लिन्नवर्त्म तद्विद्यात् क्लिन्नमत्यर्थमंततः ॥ ९१ ॥
जो कोया अल्पपीडा तथा बाहरसे सूजा हुआ अत्यन्त कीचडसे व्याप्त हो उसको
प्रक्लिन्नवर्त्म कहते हैं, यह कफज विकार है ॥
अक्लिन्नवर्त्मके लक्षण ।
यस्य धौतान्यधौतानि संबध्यंते पुनः पुनः ।
वर्त्मान्यपरिपक्वानि विद्यादक्लिन्नवर्त्म तत् ॥ ९२ ॥
जिसके नेत्रके पलक धोनेसे अथवा नहीं धोनेसे बारंबार चिपक जावें कोएँ पक-
कर राधसे नहीं चिकटें तो इस रोगको अक्लिन्नवर्त्म कहते हैं, इस रोगको विदेह
पिल्लारूया कहते हैं ॥
वातहतवर्त्मके लक्षण ।
विमुक्तसंधि निश्चेष्टं वर्त्म यस्य न मील्यते ।
एतद्वातहतं वर्त्म जानीयादक्षिचिन्तकः ॥ ९३ ॥
जिसके नेत्रके पलक पृथक् पृथक् होयँ तथा जिसके पलक मिचें और खुले नहीं
ऐसे नेत्रके कोए मिले नहीं उसको वातहतवर्त्म शालाक्यसिद्धान्तवाला कहता है ॥
अर्बुदके लक्षण ।
वर्त्मान्तरस्थं विषमं ग्रन्थिभूतमवेदनम् ।
आचक्षतेऽर्बुदमिति सरक्तमविलंबितम् ॥ ९४ ॥
नेत्रके कोएके भीतर गोल मन्दवेदनायुक्त कुछ लाल जल्दी बढनेवाली ऐसी
जो गांठ होय उसको अर्बुद कहते हैं, यह भी सन्निपातज है ॥
निमेषके लक्षण ।
निमेषिणीः शिरा वायुः प्रविष्टो वर्त्मसंश्रयः ।
प्रचालयति वर्त्मानि निमेषं नाम तं विदुः ॥ ९५ ॥
━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━
१-दुष्टं श्लेष्मानिलात्पित्तं वर्त्मनोऽश्रीयते यदा ।
अभिदग्धनिभं श्यावं श्याववर्त्मेति तद्विदुः ॥ इति ॥

( ३३४ ) माधवनिदान ।

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( ३३४ ) माधवनिदान ।
वर्त्माश्रित ( कोएमॆं स्थित ) जो वायु, सो निमेष ( पलकके उघाडने मूंदनेवाली
नस ) में प्रवेश होकर बारंबार पलकोंको चलायमान करे, उसको निमेष ( नेत्रका
मिचकाना ) कहते हैं, विदेहेने भी लिखा है। यह रोग भी सन्निपातज है ॥
शोणितार्शके लक्षण ।
वर्त्मस्थो यो विवर्द्धेत लोहितो मृदुरंकुरः ।
तद्रक्तजं शोणितार्शश्छिन्नं छिन्नं प्रवर्द्धते ॥ ९६ ॥
रुधिरके सम्बन्धसे नेत्रके कोएके भीतर भागमें लाल तथा नरम अंकुर बढे
उसको शोणितार्श कहते हैं, उसको जैसे जैसे काटे तैसे २ बढता है इस रक्तज
व्याधिको विदेह आचार्य असाध्य कहते हैं ।
लगणके लक्षण
अपाकी कठिनः स्थूलो ग्रन्थिर्वर्त्मभवोऽरुजः ।
सकण्डूः पिच्छिलः कोलसंस्थानो लगणस्तु सः ॥ ९७ ॥
नेत्रके कोएमॆं बेरके समान बडी कठिन खुजलीसंयुक्त चिकनी गांठ होय उसको
लगण कहते हैं । यह रोग कफजन्य है, इसमें पीडा और पकना नहीं होय ॥
बिसवर्त्मके लक्षण ।
त्रयो दोषा बहिः शोथं कुर्युश्छिद्राणि वर्त्मनोः ।
प्रस्रवत्यंतरुदकं बिसवद्विसवर्त्म तत् ॥ ९८ ॥
तीनों दोष कुपित होकर नेत्रके कोएको सुजाय देवें तथा उनमें छिद्र होजाय, उन
कोयौमेंसे कमलतन्तुके समान भीतरसे पानी झरे, इस रोगको बिसवर्त्म कहते हैं ॥
कुञ्चनके लक्षण ।
वाताद्या वर्त्मसंकोचं जनयंति यदा मलाः ।
तदा द्रष्टुं न शक्नोति कुंचनं नाम तद्विदुः ॥ ९९ ॥
वातादिदोष जब कोएके मार्गको संकुचित करें तब मनुष्य नेत्रको उघाड कर
नहीं देखसके, इस रोगको कुञ्चन कृच्छ्रोन्मीलन कहते हैं, यह रोग सुश्रुताचार्यने
नहीं लिखा, माधवाचार्यने ही लिखा है ॥
१ निमेषिणीः शिरा वायुः प्रविश्य व्यवतिष्ठते । अत्यर्थं चलते वर्त्म निमेषः स न सिध्यति ॥
२ वायुः शोणितमादाय शिराणां प्रमुखे स्थितः । जनयत्यंकुरं ताम्रं वर्त्मनि च्छिन्नरोहणम् ॥
तच्छोणितार्शोऽसाध्यं स्याद्रक्तास्राव्यथ रक्तजम् ॥

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भाषाटीकासमेत । (३३५)
पक्ष्मकोपके लक्षण ।
प्रचालितानि वातेन पक्ष्माण्यक्षि विशंति हि ।
घृष्यन्त्यक्षि मुहुस्तानि संरम्भं जनयन्ति च ॥ १०० ॥
असिते सितभागे च मूलकोशात्पतन्त्यपि ।
पक्ष्मकोपः स विज्ञेयो व्याधिः परमदारुणः ॥ १०१ ॥
वादीसे चलायमान कोएके बाल नेत्रमें प्रवेश करे और वह वारंवार नेत्रसे
रगडे जायँ, इसीसे नेत्रके काले वा सफेद भागमें सूजन होय, यह केश (बाल)
जडसे टूट जावें, अतएव इस व्याधिको पक्ष्मकोप अथवा उपपक्ष्म कहते हैं। यह
बडा दुःखदायक है ॥
पक्ष्मशातके लक्षण ।
वर्त्म पक्ष्माशयगतं पित्तं रोमाणि शातयेत् ।
कण्डूं दाहं च कुरुते पक्ष्मशातं तमादिशेत् ॥ १०२ ॥
पलकोंकी जडमें रहनेवाला पित्त कुपित होकर नेत्रोंके बाल जिनको वरुनी
अथवा बाफणी कहते हैं उनका नाश करे तथा नेत्रोंमें खुजली चले, दाह होय
उसको पक्ष्मशात कहते हैं। इस रोगको भी सुश्रुतने संख्या बढनेके भयसे नहीं
लिखा, माधवाचार्यने अन्य ग्रन्थोंके मतसे लिखा है ॥ इति वर्त्मजनिदानम् ॥
नेत्ररोगोंकी संख्या ।
नव संध्‍याश्रयास्तेषु वर्त्मजास्त्वेकाविंशतिः ।
शुक्लभागे दशैकश्च चत्वारः कृष्णभागजाः ॥ १ ॥
सर्वाश्रयाः सप्तदश दृष्टिजा द्वादशैव तु ।
बाह्यजौ द्वौ समाख्यातौ रोगौ परमदारुणौ ॥
भूय एतान्प्रवक्ष्यामि संख्यारूपचिकित्सितैः ॥ २ ॥
सन्धिमें होनेवाले नेत्ररोग ९ प्रकारके हैं और कोएमें होनेवाले रोग २१ हैं
और नेत्रके सफेद भागमें होनेवाले रोग ११ हैं और काले भागके ४ हैं और सर्व-
सर अर्थात् सर्व नेत्रमें होनेवाले रोग १७ हैं और दृष्टिके रोग १२ हैं और नेत्रके
बाहरके रोग २ हैं (ये हमने संगृहीत श्लोकमें लिखे हैं) ॥
इति श्रीपण्डितदत्तराममाथुरनिर्मितमाधवार्थबोधिनीमाथुरीभाषाटीकायां
नेत्ररोगनिदानं समाप्तम् ॥

( ३३६ ) माधवनिदान ।

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( ३३६ ) माधवनिदान ।
अथ शिरोरोगनिदानम् ।
—oOo——oOo—
शिरोरोगाश्च जायन्ते वातपित्तकफैस्त्रिभिः ।
सन्निपातेन रक्तेन क्षयेण कृमिभिस्तथा ॥ १ ॥
सूर्यावर्त्तानंतवातार्द्धावभेदकशंखकैः ।
एकादशप्रकारस्य लक्षणं संप्रवक्ष्यते ॥ २ ॥
वात पित्त कफ इनसे ३, सन्निपातसे १, रुधिरसे १, क्षयसे १, कृमिसे १,
सूर्यावर्त १, अनंतवात १, अर्धावभेदक १ और शंखक १ सब मिलकर ११ प्रका-
रके शिरोरोग ( मस्तक शूल ) होते हैं । उनके लक्षण आग कहेंगे ॥
वातजके लक्षण ।
यस्यानिमित्तं शिरसो रुजश्च भवन्ति तीव्रा निशि चातिमात्रम् ।
बन्धोपतापैः प्रशमश्च यत्र शिरोभितापः स समीरणेन ॥ ३ ॥
जिसका मस्तक अकस्मात् दुखे और रात्रिमें विशेष दुखे, बांधनेसे अथवा सेक-
नेसे शांति हो, उसका वातज शिरोरोग जानना चाहिये ॥
पैत्तिक लक्षण ।
यस्योष्णमङ्गारचितं तथैव भवेच्छिरो दह्यति वाऽक्षिनासम् ।
शीतेन रात्रौ प्रशमं च याति शिरोभितापः स तु पित्तकोपात् ॥ ४ ॥
जिसका मस्तक अंगारसे तपायेके समान गरम होवे और नेत्रमें तथा नाकमें दाह
होय शीतल पदार्थसे रात्रिमें शांति होय, उस मस्तक शूलको पित्तकोपका जानना ॥
श्लैष्मिकके लक्षण ।
शिरो भवेद्यस्य कफोपदिग्धं गुरु प्रतिस्तब्धमतो हिमं च ।
शूनाक्षिकूटं वदनं च यस्य शिरोभितापः स कफप्रकोपात् ॥ ५ ॥
जिसका मस्तक भीतरसे कफकरके लिप्त ( लिहसासा ) होवे, भारी बँधासा शीतल
होवे तथा नेत्रके कोये सुजाकर मुखको सुजाय देवे, इस मस्तक रोगको कफके
कोपका जानना चाहिये ॥
सान्निपातिकके लक्षण ।
शिरोभितापे त्रितयप्रवृत्ते सर्वाणि लिंगानि समुद्भवंति ।
त्रिदोषसे उत्पन्न मस्तक रोगमें तीनों दोषोंके सब लक्षण होते हैं ॥
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भाषाटीकासमेत । ( ३३७ )
रक्तजके लक्षण ।
रक्तात्मकः पित्तसमानलिंगः स्पर्शासहत्वं शिरसो भवेच्च ।
रक्तजन्य मस्तकरोगमें पित्तकृत मस्तकरोगके सब लक्षण होते हैं तथा मस्तकके
स्पर्श सहा नहीं जाय, यह विशेष होता है ॥
क्षयजके लक्षण ।
असृग्वसाश्लेष्मसमीरणानां शिरोगतानामिह संक्षयेण ॥ ६ ॥
क्षवप्रवृत्तिः शिरसोऽभितापः कष्टो भवेदुग्ररुजोऽतिमात्रम् ।
संस्वेदनच्छर्द्दनधूम्रनस्यैरसृग्विमोक्षैश्च विवृद्धिमेति ॥ ७ ॥
मस्तकके रुधिर वसा कफ और वायु इनके क्षय होनेसे अत्यन्त भयंकर मस्तक-
शूल होता है, छींक बहुत आवें, मस्तक गरम होवे, कष्ट होय, अत्यन्त कठिन
( असह्य ) पीडा होय, उसमें स्वेदन, वमन, धूम्रपान, नस्य, रुधिर निकालना ये उप-
द्रव करनेसे मस्तक शूल वृद्धिको प्राप्त होता है, इसको क्षयज मस्तक शूल कहते हैं ॥
कृमिजके लक्षण ।
निस्तुद्यते यस्य शिरोऽतिमात्रं संभक्ष्यमाणं स्फुरतीव चान्तः ।
घ्राणाच्च गच्छेद्रुधिरं सपूयं शिरोभितापः कृमिभिः स घोरः ॥ ८ ॥
जिसके मस्तकमें सुईके चुभनेके समान पीडा होवे, तथा कृमि मस्तकको खा
रही हो तथा मस्तकके भीतरमें फडकत्ता हुआ मालूम हो तथा नाकमें रुधिर राध
और कीडे पडें यह कृमिरोग बडा भयंकर है ॥
सूर्यावर्तके लक्षण ।
सूर्योदयं या प्रति मन्दमन्दमाक्षिध्रुवं रुक्समुपैति गाढा ।
विवर्द्धते चांशुमता सहैव सूर्यापवृत्तौ विनिवर्तते च ॥ ९ ॥
शीतेन शांतिं लभते कदाचिदुष्णेन जंतुः सुखमाप्नुयाद्वा ।
सर्वात्मकं कष्टतमं विकारं सूर्यापवर्तं तमुदाहरंति ॥ १० ॥
सूर्यके उदय होनेसे धीरे धीरे मस्तक दुखनेका आरंभ होय और जैसे जैसे सूर्य
बढे तैसे तैसे वह शूल नेत्र और भृकुटी ( भौंह ) इत्तमें दो प्रहर दिन चढे तक
बढता जाय और सूर्यके साथ बढकर फिर जैसे २ सूर्य अस्त होय तैसे २ पीडा
मन्द होती जाय, शीतल और गरम उपचार करनेसे मनुष्यको सुख होय, इस सान्नि-
पातिक विकारको सूर्यावर्त्त कहते हैं ॥
अनंतवातके लक्षण ।
दोषास्तु दुष्टास्त्रय एव मन्यां संपीड्य गाढं सरुजां सुतीव्राम् ।
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( ३३८ ) माधवनिदान ।

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( ३३८ ) माधवनिदान ।
कुर्वति साक्षिभ्रुवि शंखदेशे स्थितिं करोत्याशु विशेषतस्तु ॥ ११ ॥
गण्डस्य पार्श्वे च करोति कम्पं हनुग्रहं लोचनजांश्च रोगान् ।
अनन्तवातं तमुदाहरंति दोषत्रयोत्थं शिरसो विकारम् ॥ १२ ॥
तीनों दोष ( वात पित्त कफ ) दुष्ट होकर मन्यानाडीको पीडित कर नेत्र भौंह
कनपटी इनमें घोर पीडा करें तथा गंडस्थलके समीपमें कंप होय, ठोडी जकडजाय,
नेत्ररोग होयँ, इस त्रिदोषजन्य मस्तकरोगको अनंतवात कहते हैं, सुश्रुतने अनंत-
वातरोगको छोडकर मस्तकरोग १० ही कहे हैं ॥
अर्धावभेदक ( आधासीसी ) के लक्षण ।
रूक्षाशनात्यध्यशनप्राग्वातावश्यायमैथुनैः ।
वेगसंधारणायासव्यायामैः कुपितोऽनिलः ॥ १३ ॥
केवलः सकफो वाऽर्द्धं गृहीत्वा शिरसो बली ।
मन्याभ्रूशंखकर्णाक्षिललाटेऽर्धेऽतिवेदनाम् ॥ १४ ॥
शस्त्रारणिनिभां कुर्यात्तीव्रां सोऽर्धावभेदकः ।
नयनं वाऽथवा श्रोत्रमतिवृद्धो विनाशयेत् ॥ १५ ॥
रूखे अन्नसे, अत्यन्त भोजन, अध्यशन (भोजनके ऊपर भोजन), पूर्वदिशाकी
पवन सेवन करनेसे, बर्फसे, मैथुनसे, मलमूत्रादिका वेग धारण करनेसे, परिश्रम
और दंडकसरत करनेसे इन कारणोंसे कुपित भई जो केवल वायु अथवा कफयुक्त
वायु सो आधे मस्तकको ग्रहण कर मन्यानाडी, भृकुटी, कनपटी, कान, नेत्र, ललाट
ये सब एक ओरसे आधे दूखें, कुल्हाडीसे घाव करनेकीसी अथवा अरणी (आंच
निकालनेके) काष्ठके मथनेकीसी पीडा होय, उसको अर्धावभेदक (आधासीसी)
कहते हैं। यह रोग जब बहुत बढजाता है तब एक ओरके कानसे बहरापन होजाता
है अथवा एक ओरकी आंख मारी जाती है। जिस ओरको पीडा होय उधर ये
उपद्रव होते हैं। सुश्रुतने इस रोगको त्रिदोषज कहा है ॥
शंखकके लक्षण ।
पित्तरक्तानिला दुष्टाः शङ्खदेशे विमूर्च्छिताः ।
तीव्ररुग्दाहरागं हि शोथं कुर्वन्ति दारुणम् ॥ १६ ॥
स शिरो विषवद्वेगी निरुद्ध्याशु गलं तथा ।
१-स्यादुत्तमांगं रुजतेऽर्द्धमात्रं सतोदभेदभ्रममोहशूलैः ।
पक्षाद्दशाहादथवाप्यकस्मात्स्यादर्द्धभेदे त्रितयाद्व्यवस्येत् ॥
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भाषाटीकासमेत । ( ३३९ )
त्रिरात्राज्जीवितं हन्ति शङ्खको नाम नामतः ।
त्र्यहाज्जीवति भैषज्यं प्रत्याख्यायास्य कारयेत् ॥ १७ ॥
दुष्टभये जो पित्त रक्त और वायु ( इस जगह कफको भी दुष्ट हुआ जानना
यह सुश्रुतने कहा है ) सो विशेष बढकर नेत्रोंमें भयंकर सूजन उत्पन्न करे और
इसमें घोर पीडा होय, घोर दाह होय तथा नेत्र लाल बहुत हों और यह विषके
वेगके समान बढकर गलेमें जाकर गलेको रोक दे, इस शंखरोगसे रोगीके तीन
दिनमें प्राणोंका नाश होय, इन तीन दिनमें कुशलवैद्यकी औषधि पहुँचनेसे रोगी
बचे, परन्तु बचे या न बचे ऐसा निश्चय करके चिकित्सा करना ॥
इति श्रीपण्डितदत्ताराममाथुरप्रणीतमाधवार्थबोधिनोमाधुरीभाषाटीकायां
शिरोरोगनिदानं समाप्तम् ॥
अथ प्रदररोगनिदानम् ।
विरुद्धमद्याध्यशनादजीर्णाद्गर्भप्रपातादतिमैथुनाच्च ।
यानाध्वशोकादतिकर्शनाच्च भाराभिघाताच्छयनाद्दिवा च ॥
तं श्लेष्मपित्तानिलसन्निपातैश्चतुष्प्रकारं प्रदरं वदंति ॥ १ ॥
विरुद्ध ( क्षीरमत्स्यादि ), मद्य, अध्यशन ( भोजनके ऊपर भोजन ), अजीर्ण,
गर्भपात, अतिमैथुन, अति गमन ( बहुत चलना ), अतिशोक, उपवासादि करके
कर्शन अर्थात् व्रतके करनेसे सूखजाना, भारके बहनेसे अर्थात् भारीवस्तु उठाकर
चलनेसे, चोटके लगनेसे, दिनमें सोनेसे इन कारणोंसे कफ पित्त वायु और
सन्निपात इन भेदोंसे चार प्रकारका प्रदररोग होता है ॥
प्रदररोगके सामान्यरूप ।
असृग्दरं भवेत्सर्वं सांगमर्दं सवेदनम् ॥ २ ॥
सब प्रदरोंमें अंगोंका टूटना तथा हाथ पैरोंमें पीडा होती है ॥
उपद्रवके लक्षण ।
तस्यातिवृद्धौ दौर्बल्यं श्रमो मूर्च्छा मदस्तृषा ।
दाहः प्रलापः पाण्डुत्वं तंद्रा रोगाश्च वातजाः ॥ ३ ॥
जब यह प्रदर बहुत बढ जाता है तब दुर्बलता होय, थकजाय, मूर्च्छा आवे,
मस्तपन, प्यास, दाह, प्रलाप ( बकना ), देह पीला होजाय, तन्द्रा और वातजरोग
( आक्षेप अपतान कम्पादिक ) होते हैं ॥
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( ३४० ) माधवनिदान ।

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( ३४० ) माधवनिदान ।
श्लैष्मिकके लक्षण ।
आमं सपिच्छप्रतिमं सपांडु पुलाकतोयप्रतिमं कफात् ।
कफसे आमरस ( कच्चा रस ) संयुक्त, चिकना, किंचित् पीला, मांसके धुले
जलके समान स्राव होय, इसको श्वेत प्रदर अथवा सोमरोग कहते हैं ॥
पैत्तिकके लक्षण ।
सपीतनीलासितरक्तमुष्णं पित्तार्त्तियुक्तं भृशवेगि पित्तात् ॥ ४ ॥
किंचित् पीला, नीला, काला, लाल, गरम ऐसा प्रदर बहै, उसमें पित्तसे दाह
चिमचिमादि पीडा होय तथा उसका वेग अत्यन्त होय ॥
वातिकके लक्षण ।
रूक्षारुणं फेनिलमल्पमल्पं वातार्त्ति वातात्पिशितोदकाभम् ।
वातसे रूक्ष, लाल, झागसे युक्त मांसके और सफेद पानीके समान थोडा थोडा
प्रदर बहै उसमें बादी ( आक्षेपादि ) की पीडा होय है ॥
त्रिदोषजके लक्षण ।
सक्षौद्रसर्पिर्हरितालवर्णं मज्जाप्रकाशं कुणपं त्रिदोषम् ।
तच्चाप्यसाध्यं प्रवदन्ति तज्ज्ञा न तत्र कुर्वीत भिषक् चिकित्साम्॥५॥
जो प्रदर शहद, घृत, हरिताल इनके रंगके समान, चर्बीके समान तथा मुर्दे-
कीसी दुर्गंध युक्त होय उसको त्रिदोषप्रदर जानना, यह असाध्य है अर्थात् इसकी
वैद्य चिकित्सा न करे ॥
विशुद्धार्त्तवके लक्षण ।
मासान्निपिच्छदाहार्त्ति पञ्चरात्रानुबन्धि च ।
नैवातिबहुलं नाल्पमार्त्तवं शुद्धमादिशेत् ॥ ६ ॥
शशासृक्प्रतिमं यच्च यद्वा लाक्षारसोपमम् ।
तदार्त्तवं प्रशंसन्ति यच्चाप्सु न विरज्यते ॥ ७ ॥
जो आर्त्तव ( रजोधर्शनका रुधिर ) चिकना नहीं होवे तथा जिसमें दाह झूला-
दिक न हों, तथा जिसका अनुबन्ध महीनेमें पांच दिवसपर्यन्त होय तथा बहुत न
निकले और थोडा भी न होय ( मध्यम प्रमाणका होय ) उसको शुद्ध आर्त्तव
जानना चाहिये और जो आर्त्तव खरगोशके रुधिरके समान होवे अथवा लाखके
रंगकासा लाल होवे और जिससे रंगे कपडेको जलमें डालनेसे वर्ण नहीं पलटे,
उसको शुद्ध आर्त्तव कहते हैं ॥
इति श्रीपण्डितदत्तराममाथुरनिर्मितमाधवार्थबोधिनीमाथुरीभाषाटीकायां
प्रदररोगनिदानं समाप्तम् ॥
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अथ योनिव्यापत्तिनिदानम् ।

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भाषाटीकासमेत । ( ३४१ )
अथ योनिव्यापत्तिनिदानम् ।
विंशतिर्व्यापदो योनेर्निर्दिष्टा रोगसंग्रहे ।
मिथ्याचारेण ताः स्त्रीणां प्रदुष्टेनार्त्तवेन च ॥ १ ॥
जायन्ते बीजदोषाच्च दैवाच्च शृणु ताः पृथक् ।
रोगसंग्रहमें योनिके बीस रोग हैं वह मिथ्या आहार और मिथ्या विहार करके
तथा दुष्ट आर्त्तवसे, बीजदोषसे और दैवकी इच्छासे स्त्रियोंके होते हैं, उनके लक्षण
पृथक् पृथक् कहताहूं सुनो ॥
सा फेनिलमुदावर्त्ता रजः कृच्छ्रेण मुञ्चति ॥ २ ॥
वन्ध्यां नष्टार्तवां विद्याद्विप्लुतां नित्यवेदनाम् ।
परिप्लुतायां भवति ग्राम्यधर्मेण रुग्भृशम् ॥ ३ ॥
वातला कर्कशा स्तब्धा शूलनिस्तोदपीडिता ।
चतसृष्वपि चाद्यासु भवन्त्यनिलवेदनाः ॥ ४ ॥
जिस योनिसे झाग मिला रुधिर बडे कष्टसे बहे उसको उदावर्त्ता योनि कहते हैं
और जिसका आर्त्तव नष्ट हो उसको वंध्या कहते हैं, जिसके निरंतर पीडा हो उसको
विप्लुता कहते हैं, जिसके मैथुन करनेमें अत्यन्त पीडा हो उसको परिप्लुता कहते हैं,
जो योनि कठोर स्तब्ध होकर शूलतोदयुक्त होवे उसको वातला कहते हैं । स्वस्व-
लक्षणसंयुक्ता पित्तला श्लेष्मला योनि भी जाननी चाहिये और पहले जो चार योनि
(उदावर्त्ता, वंध्या, विप्लुता, परिप्लुता) कही हैं इनमें वातकी पीडा होती है और
वातलामें वातकी पीडा विशेष होती है ॥
सदाहं क्षीयते रक्तं यस्याः सा लोहितक्षया ।
सवातमुद्विरेद्बीजं वामिनी रजसान्वितम् ॥ ५ ॥
प्रस्रंसिनी भ्रंशते तु क्षोभिता दुष्प्रजायिनी ।
स्थितं स्थितं हन्ति गर्भं पुत्रघ्नी रक्तसंक्षयात् ॥ ६ ॥
अत्यर्थं पित्तला योनिर्दाहपाकज्वरान्विता ।
चतसृष्वपि चाद्यासु पित्तलिङ्गोच्छ्रयो भवेत् ॥ ७ ॥