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माधव निदान (मधुकोश व्याख्या व हिन्दी अनुवाद सहित)

माधव निदान (मधुकोश व्याख्या व हिन्दी अनुवाद सहित)

Madhava Nidana with Madhukosha & Hindi Translation

by माधवकर

Source: खेमराज श्रीकृष्णदास · खेमराज श्रीकृष्णदास (origin)

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DevanagariSanskritpublished404 pages

Page 357 of 404

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Page 357

भाषाटीकासमेत । ( ३३९ )
त्रिरात्राज्जीवितं हन्ति शङ्खको नाम नामतः ।
त्र्यहाज्जीवति भैषज्यं प्रत्याख्यायास्य कारयेत् ॥ १७ ॥
दुष्टभये जो पित्त रक्त और वायु ( इस जगह कफको भी दुष्ट हुआ जानना
यह सुश्रुतने कहा है ) सो विशेष बढकर नेत्रोंमें भयंकर सूजन उत्पन्न करे और
इसमें घोर पीडा होय, घोर दाह होय तथा नेत्र लाल बहुत हों और यह विषके
वेगके समान बढकर गलेमें जाकर गलेको रोक दे, इस शंखरोगसे रोगीके तीन
दिनमें प्राणोंका नाश होय, इन तीन दिनमें कुशलवैद्यकी औषधि पहुँचनेसे रोगी
बचे, परन्तु बचे या न बचे ऐसा निश्चय करके चिकित्सा करना ॥
इति श्रीपण्डितदत्ताराममाथुरप्रणीतमाधवार्थबोधिनोमाधुरीभाषाटीकायां
शिरोरोगनिदानं समाप्तम् ॥
अथ प्रदररोगनिदानम् ।
विरुद्धमद्याध्यशनादजीर्णाद्गर्भप्रपातादतिमैथुनाच्च ।
यानाध्वशोकादतिकर्शनाच्च भाराभिघाताच्छयनाद्दिवा च ॥
तं श्लेष्मपित्तानिलसन्निपातैश्चतुष्प्रकारं प्रदरं वदंति ॥ १ ॥
विरुद्ध ( क्षीरमत्स्यादि ), मद्य, अध्यशन ( भोजनके ऊपर भोजन ), अजीर्ण,
गर्भपात, अतिमैथुन, अति गमन ( बहुत चलना ), अतिशोक, उपवासादि करके
कर्शन अर्थात् व्रतके करनेसे सूखजाना, भारके बहनेसे अर्थात् भारीवस्तु उठाकर
चलनेसे, चोटके लगनेसे, दिनमें सोनेसे इन कारणोंसे कफ पित्त वायु और
सन्निपात इन भेदोंसे चार प्रकारका प्रदररोग होता है ॥
प्रदररोगके सामान्यरूप ।
असृग्दरं भवेत्सर्वं सांगमर्दं सवेदनम् ॥ २ ॥
सब प्रदरोंमें अंगोंका टूटना तथा हाथ पैरोंमें पीडा होती है ॥
उपद्रवके लक्षण ।
तस्यातिवृद्धौ दौर्बल्यं श्रमो मूर्च्छा मदस्तृषा ।
दाहः प्रलापः पाण्डुत्वं तंद्रा रोगाश्च वातजाः ॥ ३ ॥
जब यह प्रदर बहुत बढ जाता है तब दुर्बलता होय, थकजाय, मूर्च्छा आवे,
मस्तपन, प्यास, दाह, प्रलाप ( बकना ), देह पीला होजाय, तन्द्रा और वातजरोग
( आक्षेप अपतान कम्पादिक ) होते हैं ॥
CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA