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माधव निदान (मधुकोश व्याख्या व हिन्दी अनुवाद सहित)

माधव निदान (मधुकोश व्याख्या व हिन्दी अनुवाद सहित)

Madhava Nidana with Madhukosha & Hindi Translation

by माधवकर

Source: खेमराज श्रीकृष्णदास · खेमराज श्रीकृष्णदास (origin)

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DevanagariSanskritpublished404 pages

Page 348 of 404

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Page 348

( ३१० ) माधवनिदान ।
पर्वणी व अलजीके लक्षण ।
ताम्रा तन्वी दाहपाकोपपन्ना ज्ञेया वैद्यैः पर्वणी वृत्तशोथा ।
जाता सन्धौ शुक्लकृष्णेऽलजी स्यात्तस्मिन्नेव ख्यापिता पूर्वलिंगैः७७
नेत्रकी सफेद काली सन्धियोंमें तांबेके समान छोटी गोल जो फुन्सी होवे
और वह फुन्सी दाह होकर पके उसको पर्वणी कहते हैं और उसी ठिकाने पूर्वरूप
संयुक्त बडी फुन्सी उठे उसको अलजी कहते हैं । पर्वणी और अलजीमें
इतनाही अन्तर है कि, अलजी बडी फुन्सी होती है और पर्वणी छोटी फुन्सी
होती है यह विदेहका मत है ॥
कृमिग्रन्थिके लक्षण ।
कृमिग्रंथिवर्त्मनः पक्ष्मणश्च कण्डूं कुर्युः कृमयः संधिजाताः ।
नानारूपा वर्त्मशुक्लांतसंधौ चरंत्यंतर्नयनं दूषयंतः ॥ ७८ ॥
जिसके नेत्रके शुक्लभागकी संधिमें और पलकोंकी संधिमें उत्पन्न हुई अनेक प्रका-
रकी कृमि खुजली और गांठ उत्पन्न करे और नेत्रके पलक और सफेदी भागकी
संधिमें प्राप्त होकर नेत्रके भीतरके भागको दूषित करे, भीतर फिरे, उसको कृमि-
ग्रन्थि कहते हैं; यह सन्निपातात्मक कहते हैं, सो विदेहका भी मत है ॥
वर्त्म ( मर्मस्थान ) के रोग ।
उत्संगपिडिकाके लक्षण ।
अभ्यन्तरमुखी ताम्रा बाह्यतो वर्त्मतश्च या ।
सोत्संगोत्संगपिडिका सर्वजा स्थूलकण्डुरा ॥ ७९ ॥
नेत्रके ढकनेवाली बाफणी अर्थात् कोयमें फुन्सी होय और उसका मुख भीतर होय
वह बडी तथा लाल खुजली संयुक्त होय उसको उत्संगपिडिका कहते हैं यह सन्नि-
पातसे होती है । गदाधर और विदेहके मतसे पलकोंके कोयके बाहर भी यह रोग
होता है । इस श्लोकमें ‘ च ’ लिखा है उसका यह प्रयोजन है कि, इस जगह भी
मुर्गीके अंडेकासा रस स्राव जानना ॥
१ पर्वणीपिडिका तत्र जायते त्वंकुरोपमा । शुक्लकृष्णांतसंधौ च जनयेद्रोस्तनाकृतिम् ।
पिडिकामलर्जी तां तु विद्धि तोदाश्रुसंकुलाम् ॥ २ ततः पूयममृक्कृष्णाः पतंति कृमयस्तथा ।
लक्षणैर्विविधैर्युक्ताः सन्निपातसमुत्थिताः ॥ कृमिग्रंथिं तु तं विद्याद्देहिनां नेत्रदूषणम् ॥ इति ॥
३ वर्त्मोत्संगादधो जन्तोः सन्निपातात्प्रजायते । अभ्यन्तरमुखी स्थूला बाह्यतश्चापि दृश्यते ॥
पिडिका पिडिकाभिश्च चिताम्याभिः समन्ततः। उत्संगपिडिका नाम कठिना मन्दवेदना॥इति॥