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माधव निदान (मधुकोश व्याख्या व हिन्दी अनुवाद सहित)

माधव निदान (मधुकोश व्याख्या व हिन्दी अनुवाद सहित)

Madhava Nidana with Madhukosha & Hindi Translation

by माधवकर

Source: खेमराज श्रीकृष्णदास · खेमराज श्रीकृष्णदास (origin)

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DevanagariSanskritpublished404 pages

Page 356 of 404

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Page 356

( ३३८ ) माधवनिदान ।
कुर्वति साक्षिभ्रुवि शंखदेशे स्थितिं करोत्याशु विशेषतस्तु ॥ ११ ॥
गण्डस्य पार्श्वे च करोति कम्पं हनुग्रहं लोचनजांश्च रोगान् ।
अनन्तवातं तमुदाहरंति दोषत्रयोत्थं शिरसो विकारम् ॥ १२ ॥
तीनों दोष ( वात पित्त कफ ) दुष्ट होकर मन्यानाडीको पीडित कर नेत्र भौंह
कनपटी इनमें घोर पीडा करें तथा गंडस्थलके समीपमें कंप होय, ठोडी जकडजाय,
नेत्ररोग होयँ, इस त्रिदोषजन्य मस्तकरोगको अनंतवात कहते हैं, सुश्रुतने अनंत-
वातरोगको छोडकर मस्तकरोग १० ही कहे हैं ॥
अर्धावभेदक ( आधासीसी ) के लक्षण ।
रूक्षाशनात्यध्यशनप्राग्वातावश्यायमैथुनैः ।
वेगसंधारणायासव्यायामैः कुपितोऽनिलः ॥ १३ ॥
केवलः सकफो वाऽर्द्धं गृहीत्वा शिरसो बली ।
मन्याभ्रूशंखकर्णाक्षिललाटेऽर्धेऽतिवेदनाम् ॥ १४ ॥
शस्त्रारणिनिभां कुर्यात्तीव्रां सोऽर्धावभेदकः ।
नयनं वाऽथवा श्रोत्रमतिवृद्धो विनाशयेत् ॥ १५ ॥
रूखे अन्नसे, अत्यन्त भोजन, अध्यशन (भोजनके ऊपर भोजन), पूर्वदिशाकी
पवन सेवन करनेसे, बर्फसे, मैथुनसे, मलमूत्रादिका वेग धारण करनेसे, परिश्रम
और दंडकसरत करनेसे इन कारणोंसे कुपित भई जो केवल वायु अथवा कफयुक्त
वायु सो आधे मस्तकको ग्रहण कर मन्यानाडी, भृकुटी, कनपटी, कान, नेत्र, ललाट
ये सब एक ओरसे आधे दूखें, कुल्हाडीसे घाव करनेकीसी अथवा अरणी (आंच
निकालनेके) काष्ठके मथनेकीसी पीडा होय, उसको अर्धावभेदक (आधासीसी)
कहते हैं। यह रोग जब बहुत बढजाता है तब एक ओरके कानसे बहरापन होजाता
है अथवा एक ओरकी आंख मारी जाती है। जिस ओरको पीडा होय उधर ये
उपद्रव होते हैं। सुश्रुतने इस रोगको त्रिदोषज कहा है ॥
शंखकके लक्षण ।
पित्तरक्तानिला दुष्टाः शङ्खदेशे विमूर्च्छिताः ।
तीव्ररुग्दाहरागं हि शोथं कुर्वन्ति दारुणम् ॥ १६ ॥
स शिरो विषवद्वेगी निरुद्ध्याशु गलं तथा ।
१-स्यादुत्तमांगं रुजतेऽर्द्धमात्रं सतोदभेदभ्रममोहशूलैः ।
पक्षाद्दशाहादथवाप्यकस्मात्स्यादर्द्धभेदे त्रितयाद्व्यवस्येत् ॥
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