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माधव निदान (मधुकोश व्याख्या व हिन्दी अनुवाद सहित)

Madhava Nidana with Madhukosha & Hindi Translation

by माधवकर

Source: खेमराज श्रीकृष्णदास · खेमराज श्रीकृष्णदास (origin)

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DevanagariSanskritpublished404 pages

About this granth

The Madhava Nidana (माधव निदान), also called the Rugvinishchaya, is Madhavakara's treatise on the diagnosis of disease in Ayurveda. He gathered the diagnostic material scattered through the works of Charaka, Sushruta and Vagbhata into one ordered text, which became the standard Ayurvedic work on identifying illness. Each disease is examined through the five aspects of diagnosis: cause, early signs, symptoms, response to trial treatment and pathogenesis.

This scan is the July 2007 (Samvat 2064) edition of Khemraj Shrikrishnadas, Bombay, giving the Sanskrit verses with the Hindi commentary of Dattaram, son of Shrikrishnalal. The preface discusses the place of diagnosis, the patient, the physician and medicine in Ayurveda.

The detailed contents show the range of the work: fevers and their forms in the tissues, sannipata, diarrhoea, grahani, the varieties of breathing disorders, the effects of alcohol, epilepsy, defects of semen and impotence, among many others, with passages cited from Sushruta and others.

विकल्परूप संप्राप्तिके लक्षण ।

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भाषाटीकासमेत । (९)
संख्यारूप सम्प्राप्तिके लक्षण ।
सा भिद्यते यथात्रैव वक्ष्यन्तेऽष्टौ ज्वरा इति ॥ ११ ॥
जैसे इसी ग्रन्थमें आगे आठ प्रकारका ज्वर पांच प्रकारकी खांसी अर्थात् रोगोंकी
गणनाको ही संख्यारूप सम्प्राप्ति कहते हैं ॥
विकल्परूप संप्राप्तिके लक्षण ।
दोषाणां समवेतानां विकल्पोऽंशांशकल्पना ।
मिले हुए दोष कहिये वात पित्त कफ इनके अंशांशका अनुमान करना उसका
विकल्परूपसम्प्राप्ति कहते हैं, जैसे-धुआँके निकलनेसे यह पर्वत अग्निवाला है ऐसेही
यह रोगीके देहमें वातका अंश विशेष है, काहेसे कि, वातके अंश विशेष मिलनेसे
इसी अनुमानको विकल्पसंप्राप्ति कहते हैं । उदाहरण-जैसे रूखी शीतल हलकी
और फैलानेवाली इत्यादि गुणयुक्त जो पवन उसका रूक्ष आदि गुणयुक्त कसैला
रस वातको सर्वांश करके बढानेवाला है, ऐसेही कटुरस सर्व भाव करके पित्तको बढा-
नेवाला है अर्थात् कटु, उष्ण, तीक्ष्णत्व करके हींग पित्तको बढानेवाली है ऐसेही
मधुररस, जैसे भैंसका दूध यह सर्व भावकरके कफ बढानेवाली है इत्यादि । इसमें
“दोषाणां” जो बहुवचन है सो दोषोंके पृथक् पृथक् ग्रहणके वास्ते है और “सम-
वेतानाम्” यह पद जो है सो द्वंदूज और सन्निपातके ग्रहणनिमित्त धरा है ॥
प्राधान्यरूपसंप्राप्तिके लक्षण ।
स्वातंत्र्यपारतंत्र्याभ्यां व्याधेः प्राधान्यमादिशेत् ॥ १२ ॥
व्याधेः स्वातंत्र्येण च पुनः पारतंत्र्येण प्राधान्यम् आदिशेत् अप्राधान्यं चेति
शेष इत्यन्वयः ॥
व्याधिके स्वतन्त्रता और परतन्त्रता करके प्रधानता और अप्रधानता कही है जैसे
स्वतन्त्र ज्वरको प्रधानता है और ज्वराधीन श्वास आदि रोगोंको अप्रधानता है
अर्थात् व्याधिकी स्वतंत्रतासे प्रधानता और परतंत्रतासे अप्रधानता जाननी चाहिये ॥
बलरूपसंप्राप्तिके लक्षण ।
हेत्वादिकात्स्न्र्यावयवैर्बलाबलविशेषणम् ।
अत्रापि व्याधेरित्यनुवर्तते । हेत्वादीनां हेतुपूर्वरूपरूपाणां कात्स्न्र्येन साकल्येन
अवयवैरेकदेशैर्बलाबलयोर्विशेषणं विशेषावबोधः इत्यन्वयः ।
हेतु आदिशब्दोंसे हेतु, पूर्वरूप और रूप इनके सर्व अवयव ( लक्षण ) मिल-
नेसे व्याधिको बलवान् जानना और थोडे लक्षण मिलनेसे निर्बल जानना; जैसे
रोगके प्रति जो निदान कहा है वह निदान सम्पूर्ण रोगोंको उत्पन्न करनेवाला है
कि एकदेश, ऐसे ही पूर्वरूप भी समस्त अवयवों करिके व्याधिका प्रकाशित है यह
एकदेशसे इत्यादि ॥
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( १० ) माधवनिदान ।

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( १० ) माधवनिदान ।
कालरूपसंप्राप्तिके लक्षण ।
नक्तंदिनर्तुभुक्तांशैर्व्याधिकालो यथामलम् ॥ १३ ॥
नक्त ( रात्री ) दिन ( दिवस ) ऋतु ( वसन्तादि ) भुक्त ( आहार ) इनका
अंश कहिये एकदेश उसको यथादोष ( वात, पित्त, कफ ) के अनुसार व्याधिका
काल अर्थात् रोगके घटने बढनेके हेतुका समय जाने । उदाहरण-दिखाते हैं जैसे-
रात्रिके तीन भाग करे प्रथम, मध्य और अन्त्य; ता रात्रिका प्रथमभाग कफका है,
मध्यभाग पित्तका, अन्त्यभाग वातका है। ऐसेही दिनके भी तीन भाग करे तो
पूर्वाह्न कफका, मध्याह्न पित्तका, अपराह्न वातका है। ऐसे ही ऋतु जैसे वसंत-
ऋतुमें कफ, शरदऋतुमें पित्त और वर्षामें वात कुपित होता है । ऐसे ही भोजनका
जैसे भोजन करनेके समय कफका काल और अन्नके पचनेके समय पित्तका काल
और जब भले प्रकार परिपक्व होगया तब वातका काल. इसके जाननेसे यह
प्रयोजन है कि जिसे दोष ( वात, पित्त, कफ ) का जो काल कहा है उसका उसी
उसी कालमें जान लेना कठिन मालूम नहीं होता ॥
निदानपंचकका उपसंहार ।
इति प्रोक्तो निदानार्थः स व्यासेनोपदेक्ष्यते ॥ १४ ॥
इति कहिये यह संक्षेप प्रकारसे जो निदानार्थ कहा उसे विस्तारपूर्वक प्रतिरोगके
निदान पूर्वरूपादि करके कहेंगे ॥
सर्वेषामेव रोगाणां निदानं कुपिता मलाः ।
तत्प्रकोपस्य तु प्रोक्तं विविधाहितसेवनम् ॥ १५ ॥
अब पूर्व चतुर्थ श्लोककी व्याख्यामें कहे निदानके दो भेद कौन संनिकृष्ट और
विप्रकृष्ट, तिसमें संनिकृष्ट कौन वातादिक समीपके कारण करके सर्व रोगोंका कारण
हैं सो कहते हैं- “सर्वेषामिति” कुपित भये जो मल ( वात, पित्त, कफ )
ये सम्पूर्ण रोगोंके कारण होते हैं और उन वात, पित्त, कफ दोषोंके कोपका कारण
अनेक प्रकारका जो अपथ्यसेवन करना ही है ॥
निदानार्थकरो रोगो रोगस्याप्युपजायते ।
तद्यथा ज्वरसन्तापाद्रक्तपित्तमुदीर्यते ॥ १६ ॥
१ केचन ऋत्वंशाः कतिपयाहोरात्राणि कथयंति । यदुक्तं वाग्भटे-“ऋतवोरित्यादि सप्ताहा-
वृतुसन्धिरिति स्मृतः । ” २ यदाह चरकः-“ नास्ति रोगो विना दोषैर्यस्मात्तस्माद्विचक्षणः ।
अनुक्तमपि दोषाणां लिंगैर्व्याधिमुपाचरेत् ॥” मलिनीकरणान्मला वातपित्तकफाः ॥

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भाषाटीकासमेत । ( ११ )
रक्तपित्ताज्ज्वरस्ताभ्यां श्वासश्चाप्युपजायते ।
प्लीहाभिवृद्ध्या जठरं जठराच्छोफ एव च ॥ १७ ॥
अर्शोभ्यो जाठरं दुःखं गुल्मश्चाप्युपजायते ।
( दिवास्वापादिदोषैश्च प्रतिश्यायश्च जायते । )
प्रतिश्यायादथो कासः कासात्संजायते क्षयः ॥ १८ ॥
क्षयो रोगस्य हेतुत्वे शोषस्याप्युपजायते ।
कोई प्रश्न करे कि, जो पूर्व कह आये हैं यह ही निदान है अथवा इसके व्यति-
रिक्त और, इसलिये कहते हैं रोगका रोग भी निदान होता है अर्थात् जो निदानसे
कार्य होता है वह ही रोगसे भी होता है. इसवास्ते दृष्टांत देकर कहते हैं-“तद्यथेति”
जैसे ज्वरसन्तापसे रक्तपित्त प्रगट होता है और रक्तपित्तसे ज्वर और रक्तपित्त-
ज्वरसे श्वास प्रगट होता है और प्लीहाके बढनेसे जैसे उदररोग और उदररोगसे
सूजन और बवासीरसे जैसे उदररोग और गुल्म ( गोला ) रोग, दिनमें सोने आदि-
कोंसे जुकाम होता है और जुकामसे खांसी तथा खांसीसे ओजप्रभृति धातुओंका क्षय
होता है, यह क्षयरोग ( राजयक्ष्मा ) सम्पूर्ण रोगोंमें राजा है इसको प्रगट करते हैं ॥
ते पूर्वं केवला रोगाः पश्चाद्धेत्वर्थकारिणः ॥ १९ ॥
वे रोग प्रथम स्वतन्त्र होते हैं और पीछे जब बल मिलगया तो वेही हेत्वर्थकारी
अर्थात् रोगके उत्पन्न करनेवाले होते हैं जैसे ज्वरसे रक्तपित्त होता है ॥
कश्चिद्धि रोगो रोगस्य हेतुर्भूत्वा प्रशाम्यति ।
न प्रशाम्यति चाप्यन्यो हेत्वर्थं कुरुतेऽपि च ॥
एवं कृच्छ्रतमा नृणां दृश्यन्ते व्याधिसङ्कराः ॥ २० ॥
अब उसी रोग उत्पन्न करनेवाली व्याधिकी विचित्रता दिखाते हैं, जैसे कोई
एक रोग दूसरेका कारण हो अर्थात् दूसरे रोगको प्रगट कर आप शांत हो जाता
है जैसे ज्वरके सन्तापसे रक्तपित्त होता है उस समय ज्वर दूर होजाय और रक्त-
पित्त रह जावे और कोई रोग दूसरे रोगको प्रगट कर आप जैसाका तैसा बना
रहता है जैसे बवासीर नहीं जाय और गुल्म तथा उदररोग पैदा होते हैं । इस प्रकार
मनुष्योंके घोर क्लेशदायक मिलेहुए रोग देखनेमें आते हैं । विशेष करके चिकित्सा
विरुद्ध होनेसे ये रोग कृच्छ्रतम होते हैं ॥

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( १२ ) माधवनिदान ।

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( १२ ) माधवनिदान ।
अब कहे हुए निदानादिपंचकद्वारा रोगनिवृत्तिरूप सिद्धिको इच्छा करके
अवश्य जानने योग्य कहते हैं-
तस्माद्यत्नेन सद्द्वैद्यैरिच्छद्भिः सिद्धिमूत्तमाम् ।
ज्ञातव्यो वक्ष्यते योऽयं ज्वरादीनां विनिश्चयः ॥ २१ ॥
“तस्मात्” इति । इसी कारण उत्तम सिद्धि हमको प्राप्त हो ऐसी जिन सद्द्वैद्योंकी
इच्छा है उनको ज्वरादिरोगोंका निदान जो आगे कहते हैं वह यत्नसे जानना चाहिये॥
इति श्रीमाधवभावार्थदीपिकायां माधुरीटीकायां सर्वरोगनिदानादि-
पंचककथनं समाप्तम् ॥ १ ॥
ज्वरनिदानम् ।
अब सर्व देहके रोगोंमें प्रथम प्रगट होनेसे बली, देह इन्द्रिय मनको तपायमान
करनेसे, जन्म मरणका कारण होनेसे, स्थावर जंगम प्राणियोंमें स्थिति होनेसे सम्पूर्ण
शरीरके रोगोंमें चरक, सुश्रुतादि आचार्योंने ज्वरको राजा कहा है ।
तदुक्तं चरके-
देहेन्द्रियमनस्तापी सर्वरोगाग्रजो बली ।
ज्वरः प्रधानो रोगाणामुक्तो भगवता पुरा ॥ १ ॥
देह इन्द्रिय मनको तपायमान करनेसे, रोगोंमें प्रथम प्रगट होनेसे बलवान्
ज्वरके सब रोगोंमें प्रधानता है ॥
ज्वरकी उत्पत्ति ।
दक्षापमानसंक्रुद्धरुद्रनिश्वाससम्भवः ।
ज्वरोऽष्टधा पृथग्द्वन्द्वसंघातागन्तुजः स्मृतः ॥ २ ॥
दक्षप्रजापतिकृत तिरस्कारसे क्रोधित श्रीरुद्र भगवान्‌के श्वाससे उत्पन्न जो
१ ज्वरयति शरीराणीति ज्वरः नान्ये व्याधयस्तथा दारुणा बहूपद्रवाः दुश्चिकित्स्याश्च यथा-
ऽयम्, स सर्वरोगाधिपतिर्नानातिर्यग्योनिषु च बहुविधैः शब्दैः श्रूयते । यथा-“पाकः स तु
नागानामभितापश्च वाजिनाम् । गवामीश्वरसंज्ञश्च मानवानां ज्वरो मतः।।अजावीनां प्रलापाख्यः
करभे चालसो भवेत् । हरिद्रो महिषाणां च मृगरागा मृगेषु च॥पक्षिणामभिघातस्तु मत्स्येष्विा
न्द्रमदो मतः । पक्षपातः पतंगानां व्यालेष्वाक्षिकसंज्ञकः ॥ इत्यादि” सर्वप्राणभृतश्च सज्ज्वर-
एव जायन्ते सज्ज्वरा एव म्रियन्ते । अतः सर्वरोगप्रगण्यत्वाज्ज्वर एव प्रागभिहितः ॥
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भाषाटीकासमेत। ( १३ )
ज्वर सो आठ प्रकारका है-वात, पित्त, कफ इनसे ३, द्वंद्वज ३ सन्निपात १ और
आगंतुज १ ऐसे मिलकर संक्षेपसे ज्वर आठ प्रकारका है ॥
इस श्लोकमें-“ निःश्वाससम्भव ” यह जो पद धरा है सो श्वास यहां क्रोधके
लक्षण करके कहा है किन्तु ज्वरकी श्वाससे उत्पत्ति नहीं है क्योंकि, जैसे सुश्रुतमें
लिखा है यथा-“ रुद्रकोपाग्निसंभूतः सर्वभूतप्रतापनः” इति । अर्थात् क्रोधित रुद्रनें
ललाटस्थ तीसरे अग्निमय चक्षु ( नेत्र ) को स्पर्श कर आग्नेयबाण निर्माण किया ।
तथा च चरके-“ स्पृष्ट्वा ललाटे चक्षुर्वै दग्ध्वा तानसुरान्प्रभुः । बाणं क्रोधाग्निसंतप्त-
मसृजच्छत्रुनाशनम्॥” इत्यादिक वाक्योंसे ज्वरमात्रकी पित्तप्रकृति जाननी, प्रयोजन
यह है कि सर्वज्वरमें पित्तकी विरोधी क्रिया न करे। सो वाग्भटने कहा है यथा-“ऊष्मा
पित्तादृते नास्ति नात्युष्माणं विना ज्वरः । तस्मात्पित्तविरुद्धानि त्यजेत्पित्ताधिके-
ऽधिकम् ॥ ” इति । अर्थात् गरमी पित्तके विना नहीं होती और ज्वर गरमीके विना
नहीं होता इसीसे ज्वरमें पित्तविरुद्ध क्रिया न करे और पित्तज्वरमें विशेषकरके
पित्तविरुद्ध क्रिया त्याज्य है । अन्य आचार्य कहते हैं कि-श्रीरुद्रसे उत्पत्ति होनेसें
ज्वर देवता है इस लिये ज्वरका पूजन करनेसे शांत होता है, जैसे विदेहका वाक्य
है-“ज्वरस्तु पूजनैर्वापि सहसैवोपशाम्यति ” और ज्वरका स्वरूप भी हरिवंशमें लिखा
है यथा-“ ज्वरस्त्रिपादस्त्रिशिराः षड्भुजो नवलोचनः । भस्मप्रहरणो रौद्रः कालान्तक-
यमोपमः ॥ ” इति । अर्थात् ज्वरके तीन चरण, तीन मस्तक, छः भुजा, नव नेत्र,
भस्मयुक्त देह, रौद्र, कालका भी काल और यमराजके समान है ॥
ज्वरकी सम्प्राप्ति ।
मिथ्याहारविहाराभ्यां दोषा ह्यामाशयाश्रयाः ।
बहिर्निरस्य कोष्ठाग्निं ज्वरदाः स्यू रसानुगाः ॥ ३ ॥
मिथ्या आहार ( देश काल प्रकृति आदिसे विरुद्ध और संयोगविरुद्ध भोजन )
जो दोष ( वात, पित्त, कफ ) सो नाभिस्तनके बीच आमाशयमें प्राप्त हों रसको
मिथ्याविहार ( देहके पुरुषार्थसे विशेष कामका करना ) इन कारणोंसे दुष्ट हुए
बिगाडकर और कोष्ठस्थानमें रहती हुई जो अग्नि उसको देहके बाहर निकाल करके
प्रगट करनेवाले होते हैं ॥
यह सम्प्राप्ति शरीररोगोंकी है आगन्तुजकी नहीं है, क्योंकि, आगन्तुज रोगोंका
१-अकाले चातिमात्रं च असात्म्यं यच्च भोजनम् । विषमाशनं च यद्भूक्तं मिथ्याहारःस उच्यते॥
२-अशक्तः कुरुते कर्म शक्तिमात्रं करोति वा।मिथ्याविहारमित्युक्तं सदा चैव विवर्जयेत् ॥
३-नाभिस्तनान्तरं जन्तोरामाशय इति स्मृतः ॥

( १४ ) माधवनिदान ।

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( १४ ) माधवनिदान ।
तो व्यथापूर्वक वातादिदोषोंके रोकनेसे प्रयोजन है, जैसे—सुश्रुतमें लिखा है श्रम और
चोटके लगनेसे देहधारियोंके कुपित हुई वात सब देहको परिपूर्ण कर ज्वरको पैदा
करती है और चरकमें भी लिखा है कि चोटके लगनेसे प्रगट वात रुधिरको बिगाड
व्यथा और शोष तथा विवर्णयुक्त वातज्वरको प्रगट करती है । शंका-क्योंजी !
आगंतुज भी शरीररोगही है क्योंकि आगंतुजज्वरमें भी गरमी रहती है क्यों कि-
“उष्मा पित्तादृते नास्ति ” इत्यादि वाक्य प्रमाण होनेसे । उत्तर-यह जो तुमने
कहा सो ठीक है परन्तु इन आगंतुजरोगोंमें पित्तकी पूर्वकालसे ही उत्पत्ति नहीं
होती, पीछे उत्पत्ति होती है, इससे आगन्तुजरोगोंको शारीरत्व नहीं है । इस
श्लोकमें—“कोष्ठाग्निम् ” यह जो पद धरा है सो धातुकी अग्निके निवारणार्थ है
अर्थात् जब धातृग्नि बाहर आय जावेगी तो दोषोंका पचना नहीं होसके और दोष
पके बिना ज्वरशांति नहीं होवेगी इसलिये इसका अर्थ ऐसा न करना चाहिये
“बहिर्निरस्य कोष्ठाग्निम् ” कोठेके अग्निकी गरमीको बाहर निकालकर ऐसा
अर्थ करना चाहिये ॥
ज्वरके लक्षण ।
स्वेदावरोधः संतापः सर्वाङ्गग्रहणं तथा ।
युगपद्यत्र रोगे तु स ज्वरो व्यपदिश्यते ॥ ४ ॥
जिस रोगमें पसीना न आवे, देहमें सन्ताप और सर्वांगमें पीडा ये एक ही
समय हों उसको ज्वर ऐसे कहते हैं ॥ शंका-क्योंजी ! पित्तज्वरमें तो पसीना
आता है तो इस श्लोकमें विरुद्धता आती है—इसपर जैज्जटादिक उत्तर-लिखते हैं
कि स्वेदावरोध कहिये-“स्विद्यते अनेनेति स्वेदः ” इस व्युत्पत्ति करके स्वेद कहिये
अग्नि तिसका अवरोध कहिये दोषकी व्याप्ति ऐसा अर्थ करनेसे श्लोकार्थमें
विरुद्धता नहीं पडती ॥
ज्वरका पूर्वरूप ।
श्रमोऽरतिर्विवर्णत्वं वैरस्यं नयनप्लवः ।
इच्छा द्वेषो मुहुश्चापि शीतवातातपादिषु ॥ ५ ॥
जृम्भाऽङ्गमर्दो गुरुता रोमहर्षोऽरुचिस्तमः ।
अप्रहर्षश्च शीतं च भवत्युत्पत्स्यति ज्वरे ॥ ६ ॥
कारण बिनाही श्रम कर्म करनेमें उत्साह न हो अथवा खेलनेमें अरुचि, देहमें
मलिनता, मुखमें विरसता, नेत्र अश्रुपातयुक्त और सर्दी, गर्मी, पवन इनकी बार-
म्बार इच्छा होना और बारम्बार द्वेष हो इसमें जो आदि शब्द है उससे जल
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भाषाटीकासमेत । ( १५ )
और अग्निका ग्रहण है अर्थात् इनकी बारबार इच्छा और द्वेष, ये चरकका मत है ।
तदुक्तं चरके-“ ज्वलनातपवाम्ब्वम्बुभक्तद्वेषाभिलाषिता ” इति । अन्ये तु 'शैत्यौ-
ष्ण्यसाधर्म्याजलानलौ गृह्णन्ति ते तु आदिशब्देन शयनादिकं मन्यन्ते' और अन्य
आचार्य सर्दी गर्मीके साधर्म्यसे जल अग्निको कहते हैं और वे आदिशब्दसे शयन
आदि मानते हैं जम्भाई अंगोंका टूटना, देह भारी रोमांचोंका होना, अन्नमें अरुचि
अँधेरीके आना, आनन्दकी निवृत्ति सर्दीका लगना. शंका--क्योंजी! पूर्व कहि आये
कि सर्दी गरमीकी बार २ इच्छा और बार बार द्वेष पुनः शीत पद क्यों धरा ?
उत्तर--इस पदके धरनेसे सर्दीकी अधिकता दिखाई अर्थात् सर्दी विशेष लगे ये लक्षण
ज्वरके पूर्व होते हैं ॥
सामान्यतो विशेषात्तु जृम्भात्यर्थं समीरणात् ।
पित्तान्नयनयोर्दाहः कफान्नान्नाभिनन्दनम् ॥ ७ ॥
विशेषकरके वातज्वरमें जम्भाई बहुत आती हैं, पित्तज्वरमें नेत्रोंमें दाह होता है
और कफज्वरमें अरुचि होती है ॥
वातज्वरके लक्षण ।
वेपथुर्विषमो वेगः कण्ठौष्ठमुखशोषणम् ।
निद्रानाशः क्षवस्तंभो गात्राणां रौक्ष्यमेव च ॥ ८ ॥
शिरोहृद्गात्ररुग्वक्त्रवैरस्यं गाढविट्कता ।
शूलाध्माने जृंभणं च भवन्त्यनिलजे ज्वरे ॥ ९ ॥
कंप होना, ज्वरका विषमवेग, कण्ठ, होठ, मुख इनका सूखना, निद्राका नाश,
छींकका न आना, देहका रूखापना, चकारसे नेत्र, विष्ठा, मूत्र इनका काला होना
और आचार्य--“ रौक्ष्यमेव च ” इस जगह “ श्यावांगमलमूत्रता ” ऐसा पाठ
कहते हैं और मस्तक हृदय गात्र इनमें पीडा । कोई शंका-करे कि गात्र पदके धर-
नेसे ही मस्तक हृदय आदिका बोध होगया फिर मस्तक और हृदय पद क्यों धरा ?
उत्तर-इन दोनों पदोंके धरनेसे इनमें दर्दकी अधिकता दिखाई अर्थात् मस्तक हृद-
यमें बहुत पीडा होय, मुखकी विरसता, मलका रुकना, शूल, अफरा, जम्भाई ये
लक्षण वातज्वरके होते हैं ॥
पित्तज्वरके लक्षण ।
वेगस्तीक्ष्णोऽतिसारश्च निद्रालपत्वं तथा वमिः ।
कण्ठोष्ठमुखनासानां पाकः स्वेदश्च जायते ॥ १० ॥
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( १६ ) माधवनिदान ।

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( १६ ) माधवनिदान ।
प्रलापो वक्त्रकटुता मूर्च्छा दाहो मदस्तृषा ।
पीतविण्मूत्रनेत्रत्वक् पैत्तिके भ्रम एव च ॥ ११ ॥
ज्वरका तीक्ष्ण वेग हो, अतिसार यानी पित्तके वेगसे दस्तका पतला होना न
कि अतिसार रोग हो, थोडी निद्रा आवे, पित्तको कफके स्थानमें पहुँचनेसे वम-
नका होना, कण्ठ, होठ, मुख, नाक इनका पकना और पसीनोंका आना, बडब-
डाना, मुखमें कडुआईट, मूर्च्छा, दाह, उन्मत्तपना, प्यास, विष्ठा, मूत्र, नेत्र, देहकीं
त्वचा इनका पीला होना तथा भ्रम ये लक्षण पित्तज्वरमें होते हैं। शंका-क्योंजी !
भ्रमको वातविकारमें लिखा है इससे तो वातका धर्म है फिर पित्तके विकारमें भ्रम
शब्द क्यों धरा ? उत्तर-तुमने कहा सो ठीक है परन्तु रोग एकही दोषसे नहीं प्रगट
होता अनेक दोषोंसे होय है। सो लिखा है-" न रोगोऽप्येकदोषजः" और " पैत्तिक
भ्रम एव च" इस श्लोकमें चकार जो पढा है इससे इस श्लोकमें जो तीव्र गरमी लाल
चकत्ते शीतकी इच्छा दाह अरुचि इत्यादि जानने ॥
कफज्वरके लक्षण ।
स्तैमित्यं स्तिमितो वेग आलस्यं मधुरास्यता ।
शुक्लमूत्रपुरीषत्वक्स्तम्भस्तृप्तिरथापि च ॥ १२ ॥
गौरवं शीतमुत्क्लेदो रोमहर्षोऽतिनिद्रता ।
प्रतिश्यायोऽरुचिः कासः कफजेऽक्ष्णोश्च शुक्लता ॥ १३ ॥
स्तैमित्य ( गीले कपडेसे देहको आच्छादित कर देनेसे जैसा हो ऐसा मालूम हो )
ज्वरका मन्दवेग, आलस्य, मुख मीठा, मल मूत्र सफेद, देहका जकडना, तृप्तके
सरीखा अन्नमें अरुचि, देह भारी, शीत लगे, ओकारी आवे । अन्य आचार्य कहते
हैं कि, कफका थूकना, रोमांचका होना, अतिनिद्रा, रसके बहनेवालीनाडीके मार्गोंका
रुकना, दस्तका थोडा उतरना, पसीना, मुखमें नोनकासा स्वाद हो, देहका थोडा
गरम होना, रद्दका होना, लारका गिरना, मुखपाक तथा मुख नाकसे कफका पडना,
अरुचि, खांसी, नेत्र श्वेत हों ये लक्षण कफज्वरमें होते हैं-"स्तंभस्तृप्तिरथापि च "
इस पदमें जो चकार है उससे देहमें पीडा; शीतका लगना, लारका गिरना, वमन,
तंद्रिकरोग, हृदय लिहसासा, गरमी प्यारी लगे, मन्दाग्नि इत्यादि जानने ॥
वातपित्तज्वरके लक्षण ।
तृष्णा मूर्च्छा भ्रमो दाहः स्वप्ननाशः शिरोरुजा ।
कण्ठास्यशोषो वमथू रोमहर्षोऽरुचिस्तमः ॥ १४ ॥
पर्वभेदश्च जृम्भा च वातपित्तज्वराकृतिः ।
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भाषाटीकासमेत । ( १७ )
प्यास, मूर्च्छा, भ्रम, दाह, निद्रानाश, मस्तकपीडा, कण्ठ, मुखका सूखना,
वमन, रोमाञ्च, अरुचि, अन्धकारदर्शन, संधियोंमें पीडा और जंभाई ये वातपित्त-
ज्वरके लक्षण हैं ॥
वातकफज्वरके लक्षण ।
स्तैमित्यं पर्वणां भेदो निद्रा गौरवमेव च ॥ १५ ॥
शिरोग्रहः प्रतिश्यायः कासः स्वेदाप्रवर्तनम् ।
सन्तापो मध्यवेगश्च वातश्लेष्मज्वराकृतिः ॥ १६ ॥
स्तैमित्य ( गीले कपड़ेसे देहको ढकनेसे जैसा हो ऐसा मालूम हो ) संधियोंमें
फूटनी, निद्रा, देह भारी, मस्तक भारी, नाकसे पानी गिरे, खांसी, पसीनेका न आना
शरीरमें दाह, ज्वरका मध्यम वेग ये वातश्लेष्मज्वरके लक्षण हैं ॥
पित्तकफज्वरके लक्षण ।
लिप्ततिक्तास्यता तन्द्रा मोहः कासोऽरुचिस्तृषा ।
मुहुर्दाहो मुहुः शीतं श्लेष्मपित्तज्वराकृतिः ॥ १७ ॥
मुख कफसे लिप्त हो तथा पित्तके जोरसे मुखमें कडुआहट, तन्द्रा, मूर्च्छा, खांसी,
अरुचि, प्यास, बारंबार दाह और शीतका लगना ये कफपित्तज्वरके लक्षण हैं,
स्तम्भ ( देहका जकड़ना ) पसीना, कफ, पित्तका गिरना ये सुश्रुतोक्त लक्षण और
भी जानने चाहिये ॥
सन्निपातज्वरके लक्षण ।
क्षणे दाहः क्षणे शीतमस्थिसन्धिशिरोरुजा । संस्रावे कलुषे रक्ते
निर्भुग्ने चापि लोचने ॥ १८ ॥ सस्वनौ सरुजौ कर्णौ कण्ठः
शूकैरिवावृतः । तन्द्रा मोहः प्रलापश्च कासः श्वासोऽरुचिर्भ्रमः
॥ १९ ॥ परिदग्धा खरस्पर्शा जिह्वा स्रस्ताङ्गता परम् । ष्ठीवनं
रक्तपित्तस्य कफेनोन्मिश्रितस्य च ॥ २० ॥ शिरसो लोठनं
तृष्णा निद्रानाशो हृदि व्यथा । स्वेदमूत्रपुरीषाणां चिराद्दर्शन-
मल्पशः ॥ २१ ॥ कृशत्वं नातिगात्राणां सततं कण्ठकूज-
नम् । कोष्ठानां श्यावरक्तानां मण्डलानां च दर्शनम् ॥ २२ ॥
मूकत्वं स्रोतसां पाको गुरुत्वमुदरस्य च । चिरात्पाकश्च दोषाणां
सन्निपातज्वराकृतिः ॥ २३ ॥

( १८ ) माधवनिदान ।

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( १८ ) माधवनिदान ।
अकस्मात् क्षणमें दाह, क्षणभरमें शीत लगे, हाड, संधि, मस्तक इनमें शूल,
अश्रुपातयुक्त काले और लाल तथा फटेसे नेत्र होजावें ( अथवा टेढ़े नेत्र हों, यह
जय्यटका मत है ) कानोंमें शब्द और पीडा हो, कण्ठमें कांटे पड़जायें, तन्द्रा, बेहोशी
हो, अनर्थ बोले, खांसी, श्वास, अरुचि, भ्रम ये हो; जीभ परिदग्धवत् ( काली )
और खर्दरी गोजीभके समान तथा शिथिल ( लठर ) हो पित्त रुधिर मिला कफ
थूके, शिरको इधर उधर पटके, तृषा बहुत लगे, निद्राका नाश हो, हृदयमें पीडा,
पसीना मूत्र मल इनका बहुत कालमें थोडा उतरना, दोषोंके पूर्ण होनेसे देहका कृश
न होना, कण्ठमें कफका निरन्तर बोलना, रुधिरसे काले लाल कोठे और चकत्तोंका
होना, शब्द बहुत मन्द निकले, कान नाक मुख आदि छिद्रोंका पकना, पेटका
भारी होना, वात पित्त कफ इनका देरमें पाक हो “उदरस्य च” इस पदमें जो
चकार है इससे वाग्भटने जो लिखे हैं कौन, शीतका लगना, दिनमें घोर निद्राका
आना, नित्य रात्रिमें जागना अथवा निद्रा कभी आवेही नहीं, पसीना बहुत
आवे और नहीं आवे, कभी गान करे, कभी नाचे, हंसे, रोवे और चेष्टा पलट जाय
इत्यादि जानने ये सन्निपातज्वरके लक्षण जानने ॥
शंका-क्योंजी ! वातादिक दोषोंके परस्पर विरुद्ध गुण हैं फिर उनका एकत्र
मिलकर एकही कार्यका करना कहीं घट सके हैं, क्योंकि परस्पर विरुद्ध गुण होनेसे
जैसे अग्नि और जलके विरुद्ध गुण होनेसे एकही कार्य नहीं हो सके ऐसेही वात पित्त
कफके विरुद्ध गुण हैं फिर ये कैसे सन्निपातरूपी विकारको प्रगट करते हैं ? उत्तर-
इसका समाधान दृढबल आचार्यने इस प्रकार कहा है कि, गुण विरुद्ध भी वात
पित्त कफ दोष हैं तथा एक संग उत्पन्न होनेसे तथा परस्पर समानगुण होनेसे एक
दूसरे दोषको शांत नहीं कर सकता, जैसे-सर्पका विष सर्पको बाधक नहीं। गदाधर
आचार्य इसमें और हेतु कहते हैं जैसे दैवकी इच्छासे और दोषोंके स्वभावसे
तथा विरुद्ध गुण होनेसे सन्निपातमें एक दोष दूसरे दोषका नाशक नहीं है. शंका-
क्योंजी ! वात पित्त कफका अलग अलग कालमें संचय होता है और अलग अलग
कोप होता है इनका एक ही कालमें प्रगट होना असम्भव है तो कहिये तीनों
दोष मिलकर कैसे सन्निपातज्वरको प्रगट करते हैं ? उत्तर-ये त्रिदोष प्रगट कारक
कारण औषध अन्न विहारके बल करके एक ही कालमें इन तीनों दोषोंका प्रकोप
होता है यह सिद्धान्त है ॥
१ कोठके ७ लक्षण भालुकिने कहे हैं यथा-“वरटीदंशसंकाशः कण्डूमान् लोहितोऽस्र-
कफपित्तक्षणिकोत्पत्तिविनाशः कोठ इत्यभिधीयते सद्भिः” इति । २ विरुद्धैरपि नत्वेते
गुणैर्घ्नन्ति परस्परम् । दोषास्तु सहसाम्यात्त्वाद्विषं घोरमहीनिव । ३ दैवा दोषस्वभावाद्वा दोषाणां
सान्निपातिके । विरुद्धैश्च गुणैस्तैश्च नोपघातः परस्परम् ॥
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भाषाटीकासमेत । (१९)
सन्निपातोंके भेद ।
सुश्रुत और वाग्भटके मतसे सन्निपात एक ही प्रकारका है परन्तु और आचार्योंके
मतसे उल्बणादि भेदों करके ५२ प्रकारका है, यथा-
भ्रमः पिपासा दाहश्च गौरवं शिरसोऽतिरुक् । वातपित्तोल्बणे
विद्याल्लिङ्गं मन्दकफे ज्वरे ॥ १ ॥ शैत्यं कासोऽरुचिस्तन्द्रा
पिपासा दाहहृद्व्यथाः । वातश्लेष्मोल्बणे व्याधौ लिङ्गं पित्ता-
नुगे विदुः ॥२॥ छर्दिः शैत्यं मुहुर्दाहस्तृष्णा मोहोऽस्थिवेदना ।
मन्दवाते व्यवस्यन्ति लिङ्गं पित्तकफोल्बणे ॥ ३ ॥
जिस सन्निपातज्वरमें वातपित्तकी अधिकता और कफकी मन्दता हो उसमें
भ्रम प्यास दाह और शरीरका भारीपन शिरमें अत्यन्त पीडा ये लक्षण जानने
चाहिये ॥ १ ॥ वातकफकी अधिकता और कफकी मन्दतामें शीत लगना खांसी
अरुचि तन्द्रा प्यास दाह हृदयमें दर्द होता है ॥ २ ॥ पित्त कफकी अधिकता
और वातकी मन्दतामें वमन जाडा लगना बारम्बार दाह प्यास मोह हड्डियोंमें
पीडा होती है ॥ ३ ॥
सन्ध्यस्थिशिरसः शूलं प्रलापो गौरवं भ्रमः । वातोल्बणे स्याद्
द्वयनुगे तृष्णा कण्ठास्यशुष्कता ॥ ४ ॥ रक्तविण्मूत्रता दाहः
स्वेदस्तृष्णा बलक्षयः । मूर्च्छा चेति त्रिदोषे स्याल्लिङ्गं पित्ते
गरीयसि ॥ ५ ॥ आलस्यारुचिहल्लासदाहवम्यरतिभ्रमैः । कफो-
ल्वणं सन्निपातं तन्द्राकासेन चादिशेत् ॥ ६ ॥
वातकी अधिकता और पित्त कफकी न्यूनतामें सन्धिस्यान और हड्डी और
शिरमें शूल, बड़बडाना, शरीरका भारीपन, भ्रम प्यास कण्ठ और मुखका सूखना
होता है ॥ ४ ॥ पित्तकी अधिकता और वात कफकी मन्दतावाले सन्निपातमें लाल
पुरीष और लाल मूत्र दाह पसीना प्यास बलका नाश मूर्च्छा ये लक्षण होते
हैं ॥ ५ ॥ कफकी अधिकता पित्तवातकी न्यूनतामें आलस्य अरुचि (में) उवकाई
जलन वमन पीडा भ्रम तन्द्रा और खांसी होती है ॥ ६ ॥
प्रतिश्यायश्छर्दिरास्यं तन्द्रारुच्यग्निमार्दवम् । हीनवाते पित्त-
मध्ये लिङ्गं श्लेष्माधिके मतम् ॥ ७ ॥ हारिद्रमूत्रनेत्रत्वं दाह-
स्तृष्णा भ्रमोऽरुचिः । हीनवाते मध्यकफे लिङ्गं पित्ताधिके

( २० ) माधवनिदान ।

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( २० ) माधवनिदान ।
मतम् ॥ ८ ॥ शिरोरुग्वेपथुः श्वासः प्रलापच्छर्द्यरोचकाः ।
हीनपित्ते मध्यकफे लिङ्गं वाताधिके मतम् ॥ ९ ॥
हीन वायु पित्त मध्यम और कफकी अधिकतामें जुकाम वमन आलस्य तन्द्रा
अरुचि मन्दाग्नि होती है ॥ ७ ॥ हीन वात कफ मध्यम पित्त अधिक होवे तो पीला
मूत्र और नेत्रमें पीलापन जलन प्यास भ्रम अरुचि ये लक्षण होते हैं ॥ ८ ॥ हीन
पित्त और कफ मध्यम और वातकी अधिकतामें शिरमें पीडा कांपना श्वास
बड़बड़ाना वमन अरुचि होती है ॥ ९ ॥
शीतकं गौरवं तन्द्रा प्रलापोऽस्थिशिरोऽतिरुक् । हीनपित्ते
वातमध्ये लिङ्गं श्लेष्माधिके विदुः ॥१०॥ वर्चोभेदोऽग्निदौर्बल्यं
तृष्णा दाहोऽरुचिर्भ्रमः । कफहीने वातमध्ये लिङ्गं पित्ताधिके
विदुः ॥ ११ ॥ श्वासः कासप्रतिश्यायौ मुखशोषोऽति पार्श्वरुक् ।
कफहीने पित्तमध्ये लिङ्गं वाताधिके मतम् ॥ १२ ॥
हीन पित्त और वात मध्यम कफकी अधिकतामें शीत शरीरका भारीपन तन्द्रा
बड़बड़ाना हड्डी और शिरमें अत्यन्त पीडा होती है ॥ १० ॥ हीन कफ वात मध्यम
पित्तकी अधिकतामें दस्त पतला अग्नि मन्द प्यास दाह अरुचि भ्रम ये लक्षण होतें
हैं ॥ ११॥ हीन पित्त मध्यम वात कफ अधिक हो तो श्वास खांसी जुकाम मुखका
सूखना पसवाडेमें अत्यन्त पीडा होती है ॥ १२ ॥
ये उल्बणादि भेद चरकके मतसे कहे हैं परन्तु भालुकि आचार्यने अपने ग्रन्थमें
उल्बणादिलक्षण और ही प्रकारसे कहे हैं, यथा-
वातपित्ताधिको यस्य सन्निपातः प्रकुप्यति । तस्य ज्वरोऽङ्ग-
मर्दस्तृट्तालुशोषप्रमीलकाः ॥ १३ ॥ आध्मानतन्द्रावरुचि-
श्वासकासभ्रमश्रमाः । पित्तश्लेष्माधिको यस्य सन्निपातः प्रकुप्यति
॥ १४ ॥ अन्तर्दाहो बहिः शीतस्तस्य तन्द्रा विवर्द्धते । तुद्यते
दक्षिणं पार्श्वमुरःशीर्षगलग्रहाः ॥ १५ ॥
जिस पुरुषके वात पित्त अधिक हैं जिसमें ऐसा सन्निपात कोपको प्राप्त होता है
उस पुरुषके ज्वर, सब शरीरमें दर्द, प्यास, तलुवा सूखना, नेत्र मिचना, अफारा,
तन्द्रा, अरुचि, श्वास, कास, भ्रम, थकावत होती है। पित्तश्लेष्म अधिकवाला सन्नि-
पात कुपित हो तो भीतर जलन बाहर ठंडा और तन्द्रा अधिक बढती है। दायें
पसवाडेमें सुईसी चुभती है, हृदय शिर गला पकड़ा हुआ मालूम होता है॥१३-१५॥
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भाषाटीकासमेत । ( २१ )
निष्ठीवेत्कफपित्तं च तृष्णा कण्ठश्च दूयते ।
विड्भेदश्वासहिक्काश्च बाध्यन्ते सप्रमीलकाः ॥ १६ ॥
कफ और पित्तको थूकता है, प्यास लगती है, कण्ठ दुखता है अथवा प्यासकी
अधिकतासे कण्ठ दुखता है । दस्त पतला सांस और हिचकीसे पीडित होता है,
आंखें मिच जाती हैं ॥ १६ ॥
[ विधुफल्गू ] च तौ नाम्ना सन्निपातावुदाहृतौ । श्लेष्मानिला-
धिको यस्य सन्निपातः प्रकुप्यति ॥ १७ ॥ तस्य शीतज्वरो
निद्रा क्षुत्तृष्णा पार्श्वसंग्रहः । शिरोगौरवमालस्यं मन्यास्तम्भ-
प्रमीलकाः ॥ १८ ॥ उदरं तुद्यते चास्य कटी वस्तिश्च दूयते ।
सन्निपातः स विज्ञेयो [ मकरीति ] सुदारुणः ॥ १९ ॥
विधु और फल्गुनामसे दोनों सन्निपात कहे हैं अर्थात् वातपित्ताधिकवाला (विधु)
और पित्तश्लेष्माधिकवाला ( फल्गु) कहा है । कफ और वात अधिक होकर सन्निपात
जिसके कुपित होता है उसके शीतज्वर, नींद, क्षुधा, प्यास, पसवाडोंका जकडना,
शिरका भारीपन, आलकस, मन्या ( नाडीकी दोनों नस ) का जकडना, नेत्र
मिचना, पेटमें सुईसी चुभना, मुख कमर बस्ति इनमें दर्द होना ये सब लक्षण होते हैं.
यह अतिभयंकर (मकरी ) इस नामवाला सन्निपात जानना चाहिये ॥ १७-१९ ॥
वातोल्वणः सन्निपातो यस्य जन्तोः प्रकुप्यति । तस्य तृष्णा-
ज्वरग्लानिपाश्र्वरुग्दृष्टिसंक्षयाः ॥ २० ॥ पिण्डिकोद्वेष्टनं दाह
ऊरुसादो बलक्षयः । सरक्तं चास्य विण्मूत्रं शूलं निद्राविपर्ययः
॥ २१ ॥ निर्भिद्यते गुदं चास्य वस्तिश्च परिकृष्यति ।
आयम्यते भिद्यते च हिक्कते विलपत्यपि। मूर्च्छति स्फार्यते
रौति नाम्ना [ विस्फूरकः ] स्मृतः ॥ २२ ॥
वात अधिक है जिसमें ऐसा सन्निपात जिस पुरुषके कुपित हुआ हो उसके
प्यास, ज्वर, ग्लानि, पसवाडेमें दर्द, नेत्रसे न दीखना, पीडियोंका ऐंठना, जलन,
जंघामें पीडा, बलनाश, रक्तसहित विष्ठा और मूत्रका निकलना, शूल, निद्राविपर्यय
( दिनमें सोना रात्रिमें जागना ), गुदाका फटना और वस्तिका खिंचना ( सिकु-
डना ) फूटनी होनी, हिचकी लेना, बडबडाना, मूर्छा होना, नेत्रोंका फटना, रोना
ये सब लक्षण होते हैं यह (विस्फूरक ) कहा है ॥ २०-२२ ॥

( २२ ) माधवनिदान ।

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( २२ ) माधवनिदान ।
पित्तोल्वणः सन्निपातो यस्य जन्तोः प्रकुप्यति ॥ २३ ॥
तस्य दाहज्वरो घोरो बहिरन्तश्च वर्धते । शीतं च सेवमानस्य
कुप्यतः कफमारुतौ ॥ २४ ॥ ततश्चैनं प्रधावन्ते हिक्काश्वास-
प्रमीलकाः । विसूचिका पर्वभेदः प्रलापो गौरवं क्लमः ॥२५॥
नाभिपाश्र्वरुजा तस्य स्विन्नस्याशु विवर्द्धते । स्विद्यमानस्य
रक्तं च स्रोतोभ्यः संप्रपद्यते ॥ २६ ॥ शूलेन पीड्यमानस्य
तृष्णा दाहश्च वर्द्धते । असाध्यसन्निपातोऽयं [ शीघ्रकारीति]
कथ्यते । नहि जीवत्यहोरात्रमेतेनाविष्टविग्रहः ॥ २७ ॥
पित्त अधिक है जिसमें ऐसा सन्निपात जिसके कुपित हुआ है ॥ २३ ॥
उस पुरुषके घोर दाह और ज्वर भीतर और बाहर बढता है उस समय शीतका
सेवन करनेसे पुरुषके कफ और वायु कुपित होते हैं, तदनन्तर हिचकी, सांस और
आंखोंका मिचना बाधा करते हैं । विसूचिका ( दस्त और उलटी ), पर्वोंमें फूटन,
बडबडाना, शरीरका भारी होना, खेद होना, नाडी और पसवाडेमें दर्द, स्वेदन
देनेसे शीघ्र बढना और उस स्विन्न पुरुषके स्रोतोंसे रक्त झरने लगना और शूलसे
पीडित पुरुषके प्यास और दाहका बढना यह असाध्य सन्निपात होता है, उसको
( शीघ्रकारी ) नामसे बोलते हैं । इस सन्निपातसे ग्रसित शरीरवाला पुरुष एक
दिन रात भी नहीं जीता ॥ २४-२७॥
कफोल्वणः सन्निपातो यस्य जन्तोः प्रकुप्यति ॥२८॥ तस्य
शीतज्वरस्वप्नगौरवालस्यतन्द्रिकाः । छर्दिमूर्च्छाकृषादाह-
तृणारोचकहृद्ग्रहाः ॥ २९ ॥ ष्ठीवनं मुखमाधुर्यं श्रोत्रवाग्-
दृष्टिनिग्रहः । श्लेष्मणो निग्रहं चास्य यदा प्रकुरुते भिषक्
॥३०॥ तदा तस्य भृशं पित्तं कुर्यात्सोपद्रवं ज्वरम् । निगृहीते
तु पित्ते च भृशं वायुः प्रकुप्यति ॥३१॥ निराहारस्य सोऽत्यर्थं
मेदो मज्जास्थि बाधते । तथाऽत्र स्नाति भुंक्ते वा त्रिरात्रं नहि
जीवति । मेदोगतः सन्निपातः [ कप्फणः ] स उदाहृतः ॥३२ ॥
कफ अधिक है जिसमें ऐसा सन्निपात जिसके कुपित हो उस पुरुषके शीतज्वर,
स्वप्न, शरीरका भारीपन, आलस्य, तन्द्रा, वमन, मूर्च्छा, दाह, प्यास, अरुचि,
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भाषाटीकासमेत । ( २३ )
हृदयका जकडना, थूकना, मुखमें मीठापन, कानोंसे सुनना वाणीसे बोलना
दृष्टिसे देखना बन्द होजाय, यदि इस पुरुषके कफको वैद्य रोके तो अत्यंत कुपित
हुआ पित्त उपद्रव सहित ज्वरको पैदा करे और यदि पित्तको रोकाजाय तो वात
अत्यन्त कुपित होता है और कुपित हुआ वात निराहार पुरुषकी मेदा मज्जा और
हड्डियोंको पीडित करता है। इसमें स्नान करता है और खाता भी है लेकिन तीन
रात नहीं जीता है अर्थात् तीन रातके अन्दर ही मर जाता है यह मेदोगत सन्निपात
(कफण) नामसे कहा है ॥ २८-३२ ॥
मतान्तरभेद ।
कुम्भीपाकः प्रौर्णुनावः प्रलापी ह्यन्तर्दाहो दण्डपातोऽन्तकश्च ।
एणीदाहश्चाथ हारिद्रसंज्ञो भेदा एते सन्निपातज्वरस्य ॥ १ ॥
अजघोषभूतहासौ यन्त्रापीडश्च संन्यासः ।
संशोषी च विशेषास्तस्यैवोक्तास्त्रयोदशान्यत्र ॥ २ ॥
१ कुम्भीपाक, २ प्रौर्णुनाव, ३ प्रलापी, ४ अन्तर्दाह, ५ दण्डपात, ६ अन्तक,
७ एणीदाह, ८ हारिद्रसंज्ञक, ९ अजघोष, १० भूतहास, ११ यन्त्रापीड, १२ संन्यास,
१३ संशोषी ये तेरह प्रकारके संनिपात हैं ॥
इन तेरहोंके क्रमसे लक्षण लिखते हैं-
कुम्भीपाक १ ।
घोणाविवरगलद्बहुशोणासितलोहितं सार्त्ति ।
विलुठनमस्तकमभितः कुम्भीपाकेन पीडितं विद्यात् ॥ १ ॥
जिस पुरुषके नासिकाके छिद्रसे पीला काला लाल गाढा जल बहुत झरता हो
और शिरको चारों तरफ पटकता हो उस पुरुषको कुम्भीपाकसे पीडित जानना चाहिये॥
प्रौर्णुनाव २ ।
उत्क्षिप्य यः स्वमङ्गं क्षिपत्यधस्तान्नितान्तमुच्छ्वसिति ।
तं प्रौर्णुनावजुष्टं विचित्रकष्टं विजानीयात् ॥ २ ॥
जो पुरुष अपने अंगको उठाकर नीचे पटकता है और बहुत जल्दी २ श्वास लेता
है, अनेक प्रकारसे दुःखी उस पुरुषको प्रौर्णुनाव सन्निपातसे ग्रसित जानना चाहिये॥
प्रलापी ३ ।
स्वेदभ्रमाङ्गमर्दाः कम्पो दवथुर्वमिर्व्यथा कण्ठे ।
गात्रं च गुर्वतीव प्रलापिजुष्टस्य जायते लिङ्गम् ॥ ३ ॥
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( २४ ) माधवनिदान ।

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( २४ ) माधवनिदान ।
प्रलापीसन्निपातसे ग्रसित मनुष्यके पसीना भ्रम सब शरीरमें दर्द कंप दाह वमन
कण्ठमें पीडा और शरीरमें भारीपन ये लक्षण होते हैं ॥
अन्तर्दाह ४ ।
अन्तर्दाहः शैत्यं बहिः श्वयथुररतिरपि तथा श्वासः ।
अङ्गमपि दग्धकल्पं सोऽन्तर्दाहार्दितः कथितः ॥ ४ ॥
भीतर दाह और बाहर शरीर ठंडा शरीरमें सूजन पीडा श्वास शरीरभी जले हुएके
सदृश ये लक्षण जिसमें हों उसको अन्तर्दाह सन्निपातसे पीडित कहा है ॥
दण्डपात ५ ।
नक्तं दिवा न निद्रामुपैति गृह्णाति मूढधीर्नभसः ।
उत्थाय दण्डपाते भ्रमातुरः सर्वतो भ्रमति ॥ ५ ॥
दण्डपात सन्निपातमें मनुष्य रात्रिमें और दिनमें कभी सोता नहीं है और बेव-
कूफ हुआ आकाशसे कोई चीज लेनेके लिये हाथ फैलाता है । भ्रमसे पीडित हुआ
उठकर सब जगह भ्रमता है ॥
अन्तक ६ ।
संपूर्यते शरीरं ग्रन्थिभिरभितस्तथोदरं मरुता ।
श्वासातुरस्य सततं विचेतनस्यान्तकार्तस्य ॥ ६ ॥
निरन्तर श्वासोंसे पीडित चेतणारहित अन्तक सन्निपातसे पीडित मनुष्यको शरीर
गांठोंसे भर जाता है और वायुसे उदर चारों तरफसे भरजाता है ॥
एणीदाह ७ ।
परिधावतीव गात्रे रुक्पात्रे भुजगपतंगहरिणगणः ।
वेपथुमतः सदाहस्यैणीदाहज्वरार्त्तस्य ॥ ७ ॥
कम्पयुक्त दाहयुक्त एणीदाह सन्निपातसे पीडित मनुष्यको अपने शरीरमें सर्प
पतंग मृगोंका समुदाय दौडताहुआ मालम होता है ॥
हारिद्र ८ ।
यस्यातिपीतमङ्गं नयने सुतरां मलं ततोऽप्यधिकम् ।
दाहोऽतिशीतता बहिरस्य स हारिद्रको ज्ञेयः ॥ ८ ॥
जिस पुरुषका शरीर अत्यन्त पीला और नेत्र भी पीले और विष्ठा मूत्र सबसे
भी अधिक पीले हों, भीतर दाह और बाहिरसे शरीर ठंडा हो तो उस पुरुषको हारिद्र-
सन्निपातसे पीडित जानना ॥

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भाषाटीकासमेत । ( २६ )
अजघोष ९ ।
छगलकशरीरगन्धः स्कन्धरुजावान्निरुद्धगलरन्ध्रः ।
अजघोषसन्निपातादाताम्राक्षः पुमान्भवति ॥ ९ ॥
अजजोष सन्निपातसे बकरेकी गंधके समान शरीरमें गंध आती है, कन्धेमें पीडा
और गलेका छिद्र रुक जाता है लाल नेत्र हो जाते हैं इन लक्षणोंयुक्त पुरुष होता है ॥
भूतहास १० ।
शब्दादीनधिगच्छति न स्वान्विषयान् यदिन्द्रियग्रामैः ।
हसति प्रलपति परुषं स ज्ञेयो भूतहासार्त्तः ॥ १० ॥
जो इन्द्रियसमुदायसे अपने शब्दादि विषयोंको न समझता हो अर्थात् श्रोत्रे-
न्द्रियसे शब्द न सुनता हो, त्वगिन्द्रियसे स्पर्श न जानता हो इत्यादि, हँसता
होवे कठोर बडबडाता हो उसको भूतहासार्त सन्निपातसे पीडित जानना ॥
यंत्रापीड ११ ।
येन मुहुर्ज्वरवेगाद्यन्त्रेणेवावपीड्यते गात्रम् ।
रक्तं पीतं च वमेद्यन्त्रापीडः स विज्ञेयः ॥ ११ ॥
बारम्बार ज्वरके वेगसे यंत्रके सदृश जिसका शरीर पीडित किया जाय और
लाल पीला वमन करे उस मनुष्यको यन्त्रापीडसे पीडित जानना चाहिये ॥
संन्यास १२ ।
अतिसरति वमति कूजति गात्राण्यभिताश्चिरं नरः क्षिपति ।
संन्याससन्निपाते प्रलपति भुग्नाक्षिमण्डलो भवति ॥ १२ ॥
संन्याससन्निपातमें मनुष्यके दस्त होते हैं, वमन करता है, कुन २ शब्द . करता
है, चारों तरफ बहुत कालतक शरीरको फेंकता है, प्रलाप करता है और उस पुरु-
षकी आंखोंकी पुतली टेढी हो जाती है ॥
संशोषी १३ ।
मेचकवपुरतिमेचकलोचनयुगलो मलोत्सर्गात् ।
संशोषिणि सितपिटकामण्डलयुक्तो ज्वरो भवति ॥ १३ ॥
संशोषी सन्निपातमें मलके त्याग होनेसे काला शरीर और अत्यन्त काले दोनों
नेत्र हो जाते हैं और सफेद फुनसियोंके मण्डलसे युक्त पुरुष होता है ॥
इति कुम्भीपाकादीनां त्रयोदशानां लक्षणानि ।

( २६ ) माधवनिदान ।

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( २६ ) माधवनिदान ।
सन्निपातके विस्फारकादि १६ भेदोंको कहते हैं-१ विस्फारक २ शीघ्र-
कारी ३ कम्पन ४ बभ्र ५ विद्दारख्य ६ शर्कराख्य ७ भल्ल ८ कूटपालक ९ सम्मोहक
१० पाकल ११ याम्य १२ संग्राम १३ क्रकच १४ कर्कोटक १५ दारिक १६ व्याल-
कृति इन १६ सन्निपातोंके लक्षण ग्रन्थ बढनेके भयसे हमने नहीं लिखे ।
अब प्रसंगवशसे सम्पूर्ण सन्निपातोंकी उत्पत्ति और सम्प्राप्ति ग्रन्थान्तरोंसे लिखते हैं-
अम्लास्निग्धोष्णतीक्ष्णैः कटुमधुरसुरातापसेवाकषायैः
कामक्रोधातिरूक्षैर्गुरुतरपिशिताहारनीहारशीतैः ।
शोकव्यायामचिंताग्रहगणवनितात्यन्तसङ्गप्रसङ्गैः
प्रायः कुप्यन्ति पुंसां मधुसमयशरद्वर्षणे सन्निपाताः ॥ १ ॥
खट्टा चिकना गरम तीखा कडुआ मीठा मद्य, सूर्यके घामसे आदि ले तापका
सेवन, कसेला, काम क्रोध रूक्ष भारी मांस आदि पदार्थोंका सेवन, नीहार काल
शीत शोक दंड कसरत आदि श्रम, चिंता भूतपिशाचकी बाधा, अत्यन्त स्त्रीसंग
इन कारणोंसे और चैत्र वैशाख आश्विन कार्त्तिक श्रावण भाद्रपद इन महीनोंमें
मनुष्योंके प्रायः सन्निपातोंका कोप होता है ॥
आमो ह्याहारदोषात्प्रथममुपचितो हंति वह्निं शरीरे
श्लेष्मत्वं याति भुक्तं सकलमपि ततोऽसौ कफो वायुदुष्टः ।
स्रोतांस्यापूर्य्य रुंध्यादनिलमथ मरुत्कोपयेत्पित्तमन्तः
संमूर्च्छार्यान्योन्यमेते प्रबलमिति नृणां कुर्वते सन्निपातम् ॥ २ ॥
आहारके दोषसे प्रथम संगृहीत जो आम सो देहकी अग्निको शान्त करे और
मनुष्य जो कुछ खाया सो सब कफ होजाय और फिर इस कफको वायु दूषित
करे तब ये पवनके बहनेवाली नाडियोंके मार्गमें प्राप्त हो उनको रोक दे तब पवन
पित्तको कुपित करे ऐसे तीनों दोष अन्योन्य कुपित हों मनुष्योंके प्रबल सन्निपात
रोग प्रगट करते हैं ॥
अब संधिकादि तेरह सन्निपातोंके नाम पृथक् २ लिखते हैं-
संधिकश्चान्तकश्चैव रुग्दाहाश्चित्तविभ्रमः । शीतांगस्तंद्रिकः प्रोक्तः
कण्ठकुब्जश्च कर्णकः ॥ ३ ॥ विख्यातो भुग्ननेत्रश्च रक्तष्ठीवी
प्रलापकः । जिह्वकश्चेत्यभिन्यासः सन्निपातास्त्रयोदश ॥ ४ ॥

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भाषाटीकासमेत । ( २७ )
१ संधिक, २ अन्तक, ३ रुग्दाह, ४ चित्तविभ्रम, ५ शीतांग, ६ तन्द्रिक,
७ कण्ठकुब्ज, ८ कर्णक, ९ भुग्ननेत्र, १० रक्तष्ठीवी, ११ प्रलापक, १२ जिह्वक,
१३ अभिन्यास-ये तेरह सन्निपात कहे हैं ॥
तेरह सन्निपातोंकी मर्यादा ।
संधिके वासराः सप्त चान्तके दश वासराः । रुग्दाहे विंशतिर्ज्ञेया
वह्न्यष्टौ चित्तविभ्रमे ॥ ५ ॥ पक्षमेकं तु शीताङ्गे तन्द्रिके पञ्च-
विंशतिः । विज्ञेया वासराश्चैव कण्ठकुब्जे त्रयोदश ॥ ६ ॥
कर्णके च त्रयो मासा भुग्ननेत्रे दिनाष्टकम् । रक्तष्ठीवी दशा-
हानि चतुर्दश प्रलापके ॥ ७ ॥ जिह्वके षोडशाहानि कला-
ऽभिन्यासलक्षणे । परमायुरिति प्रोक्तं म्रियते तत्क्षणादपि ॥ ८ ॥
संधिककी ७, अन्तककी १०, रुग्दाहकी २०, चित्तविभ्रमकी २४, शीतांगकी १५,
तन्द्रिककी २५, कण्ठकुब्जकी १३, कर्णककी तीन महीना (९० दिन), भुग्ननेत्रकी, ८
रक्तष्ठीवीकी १०, प्रलापककी १४, जिह्वककी १६, अभिन्यासकी १६ दिनकी ये
सन्निपातोंकी परमायुके दिन कहे हैं परन्तु रोगी शीघ्रभी मरजाता है ॥
उक्त सन्निपातोंमें साध्यासाध्य विचार ।
सन्धिकस्तन्द्रिकश्चैव कर्णकः कण्ठकुब्जकः ।
जिह्वकश्चित्तविभ्रंशः षट् साध्याः सप्त मारकाः ॥ ९ ॥
सन्धक १ तन्द्रिक २ कर्णक ३ कण्ठकुब्ज ४ जिह्वक ५ चित्तविभ्रंश ६, ये छः
साध्य हैं बाकी बचे सात सो मारक हैं ॥
असाध्य कृच्छ्रसाध्यके लक्षण ।
दोषे विवृद्धे नष्टेऽग्नौ सर्वसम्पूर्णलक्षणः ।
सन्निपातज्वरोऽसाध्यः कृच्छ्रसाध्यस्ततोऽन्यथा ॥ १० ॥
जिसमें दोष (वात पित्त कफ) वृद्धि होकर अर्थात् सम्पूर्ण लक्षण होकर
मिलते हों और अग्नि शांत होगई हो वह सन्निपात ज्वर असाध्य है और इससे
विपरीत अर्थात् दोष बढे न हों, अल्प लक्षण हों, अग्नि थोडी दीप्त हो वह सन्नि-
पातज्वर कृच्छ्रसाध्य है ॥
जैयटने दोषशब्दका मल अर्थ करा है अर्थात् पुरीषादिक बडे । 'सते' इत्यादि
इस श्लोकका तात्पर्यार्थ यह है कि, असाध्य और कृच्छ्रसाध्य भयेपर सुखसाध्य
नहीं होता है इसीस भालुकि आचार्यने लिखा है-
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( २८ ) माधवनिदान ।

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( २८ ) माधवनिदान ।
मृत्युना सह योद्धव्यं सन्निपातं चिकित्सता ।
यस्तु तत्र भवेज्जेता स जेताऽऽमयसंकुले ॥ ११ ॥
जो वैद्य सन्निपातकी चिकित्सा करे है वह मौतके साथ संग्राम करे है, जो इस
सन्निपातको जीते अर्थात् शांत करे वह सर्व रोगके गणोंका जीतनेवाला है ॥
सन्निपातार्णवे मग्नं योऽभ्युद्धरति मानवम् ।
कस्तेन न कृतो धर्मः कां च पूजां न सोऽर्हति ॥ १२ ॥
जो वैद्य सन्निपातरूपी सागरमें डूबे मनुष्यको निकालता है उसने कौनसा धर्म
न करा अर्थात् सब धर्म कर चुका और वह कौन पूजाके योग्य नहीं है अर्थात् वह
सब पूजाओंके योग्य है ॥
संधिकादि त्रयोदश संनिपातोंके पृथक्पृथक् लक्षण।
१ संधिक ।
पूर्वरूपकृतशूलसम्भवं शोषवातबहुवेदनान्वितम् ।
श्लेष्मतापबलहानिजागरं सन्निपातामिति सन्धिकं वदेत् ॥ १ ॥
जिसके पूर्वरूपमें शूल, शोष, वातसे बहुत पीडा, कफका गिरना, सन्ताप, बल-
हानि, रात्रिमें जागरण ये लक्षण होयँ तिसको (संधिक) सन्निपात कहते हैं ॥
२ अन्तक ।
दाहं करोति परितापनमातनोति मोहं ददाति विदधाति
शिरःप्रकम्पम् । हिक्कां करोति कसनं च समाज़ुहोति
जानीहि तं विबुधवर्जितमन्तकाख्यम् ॥ २ ॥
दाह करे, संतापको बढावे, मोहको देवे, शिर कंपावे, हिचकी करे और खांसीको
बढावे, ऐसा पंडितोंकरके त्याज्य (अन्तक) सन्निपात जानना ॥
३ रुग्दाह ।
प्रलापपरितापनप्रबलमोहमान्द्यश्रमः परिश्रमरणवेदनाव्यथित-
कण्ठमन्याहनुः । निरन्तरतृषाकरश्वसनकासहिक्काकुलः स कष्ट-
तरसाधनो भवति हन्त रुग्दाहकः ॥ ३ ॥
अनर्थभाषण, सन्ताप, अतिमोह, मंदता, अनायास श्रम और पीडा, कंठ, मन्या
नाडी और ठोडी इनमें व्यथा, निरन्तर प्यास लगे, श्वास, खांसी और हिचकी इन
लक्षणोंकरके युक्त ऐसा यह (रुग्दाहनामक) सन्निपात कष्टसाध्य है ॥