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माधव निदान (मधुकोश व्याख्या व हिन्दी अनुवाद सहित)

माधव निदान (मधुकोश व्याख्या व हिन्दी अनुवाद सहित)

Madhava Nidana with Madhukosha & Hindi Translation

by माधवकर

Source: खेमराज श्रीकृष्णदास · खेमराज श्रीकृष्णदास (origin)

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DevanagariSanskritpublished404 pages

Page 32 of 404

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Page 32

( १४ ) माधवनिदान ।
तो व्यथापूर्वक वातादिदोषोंके रोकनेसे प्रयोजन है, जैसे—सुश्रुतमें लिखा है श्रम और
चोटके लगनेसे देहधारियोंके कुपित हुई वात सब देहको परिपूर्ण कर ज्वरको पैदा
करती है और चरकमें भी लिखा है कि चोटके लगनेसे प्रगट वात रुधिरको बिगाड
व्यथा और शोष तथा विवर्णयुक्त वातज्वरको प्रगट करती है । शंका-क्योंजी !
आगंतुज भी शरीररोगही है क्योंकि आगंतुजज्वरमें भी गरमी रहती है क्यों कि-
“उष्मा पित्तादृते नास्ति ” इत्यादि वाक्य प्रमाण होनेसे । उत्तर-यह जो तुमने
कहा सो ठीक है परन्तु इन आगंतुजरोगोंमें पित्तकी पूर्वकालसे ही उत्पत्ति नहीं
होती, पीछे उत्पत्ति होती है, इससे आगन्तुजरोगोंको शारीरत्व नहीं है । इस
श्लोकमें—“कोष्ठाग्निम् ” यह जो पद धरा है सो धातुकी अग्निके निवारणार्थ है
अर्थात् जब धातृग्नि बाहर आय जावेगी तो दोषोंका पचना नहीं होसके और दोष
पके बिना ज्वरशांति नहीं होवेगी इसलिये इसका अर्थ ऐसा न करना चाहिये
“बहिर्निरस्य कोष्ठाग्निम् ” कोठेके अग्निकी गरमीको बाहर निकालकर ऐसा
अर्थ करना चाहिये ॥
ज्वरके लक्षण ।
स्वेदावरोधः संतापः सर्वाङ्गग्रहणं तथा ।
युगपद्यत्र रोगे तु स ज्वरो व्यपदिश्यते ॥ ४ ॥
जिस रोगमें पसीना न आवे, देहमें सन्ताप और सर्वांगमें पीडा ये एक ही
समय हों उसको ज्वर ऐसे कहते हैं ॥ शंका-क्योंजी ! पित्तज्वरमें तो पसीना
आता है तो इस श्लोकमें विरुद्धता आती है—इसपर जैज्जटादिक उत्तर-लिखते हैं
कि स्वेदावरोध कहिये-“स्विद्यते अनेनेति स्वेदः ” इस व्युत्पत्ति करके स्वेद कहिये
अग्नि तिसका अवरोध कहिये दोषकी व्याप्ति ऐसा अर्थ करनेसे श्लोकार्थमें
विरुद्धता नहीं पडती ॥
ज्वरका पूर्वरूप ।
श्रमोऽरतिर्विवर्णत्वं वैरस्यं नयनप्लवः ।
इच्छा द्वेषो मुहुश्चापि शीतवातातपादिषु ॥ ५ ॥
जृम्भाऽङ्गमर्दो गुरुता रोमहर्षोऽरुचिस्तमः ।
अप्रहर्षश्च शीतं च भवत्युत्पत्स्यति ज्वरे ॥ ६ ॥
कारण बिनाही श्रम कर्म करनेमें उत्साह न हो अथवा खेलनेमें अरुचि, देहमें
मलिनता, मुखमें विरसता, नेत्र अश्रुपातयुक्त और सर्दी, गर्मी, पवन इनकी बार-
म्बार इच्छा होना और बारम्बार द्वेष हो इसमें जो आदि शब्द है उससे जल
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