हिन्दुत्व: हिन्दू कौन है? (स्वातंत्र्यवीर विनायक दामोदर सावरकर - रत्नागिरि जेल में रचित वैचारिक ग्रन्थ)
Hindutva: Who is a Hindu? by Veer Savarkar
स्वातंत्र्यवीर विनायक दामोदर सावरकर द्वारा
तृतीय खण्ड: सार्वभौम मानव-कल्याण एवं हिन्दुत्व उपसंहार
हिन्दुत्वकी परिभाषा ११५,
; ही फल-फूल है। हिन्दू-धर्म हिन्दुओंकी नैसर्गिक परिस्थिति
और विचारप्रणालीका ही विकास नहीं बल्कि हिन्दू-संस्कृतिका
ही विकास है। वैदिक कालमें या बौद्ध, जैन आदि संप्रदा-
योंके उदयकालमें अथवा उससे भी आधुनिक चैतन्य, चक्रधर,
बसव, नानक, दयानन्द अथवा राजा राममोहनरायके समयमें
जब-जब जो-जो हिन्दू-धर्ममें विचार-क्रांति हुई, उस प्रत्येक क्रांति-
के समय ज्ञात हुई परमोच्च आनन्दकी अनुभूति जिस भाषा और
जिन लाक्षणिक शब्दोंद्वारा अभिव्यक्त हुई, वह भाषा और वे
शब्द, उनकी कथा और उनका तत्वज्ञान, उनके द्वारा विवादित
और स्वीकृत सिद्धान्त, इन सबपर हिन्दू-संस्कृतिकी ऐसी वज्र-
प्राय छाप लगी हुई है कि वह कभी मिट नहीं सकती। हिन्दू-
धर्मके सब संप्रदाय हिन्दू-संस्कृतिके ही वायुमण्डलमें जनमे हुए हैं
और उसीमें उनकी जीवन-रक्षा और वृद्धि हुई है; उसी प्रकार
प्रत्येक हिन्दूका धर्म उसकी जन्मभूमिसे इतना अभिन्न प्राण है
कि यह भूमि प्रत्येक हिन्दूके लिये केवल पितृभूमि ही नहीं प्रत्युत
पुण्यभूमि भी है।
हां, यह भारतभूमि, यह सिन्धुस्थान, यह हमारा देश
सिन्धुसे सिन्धुतक जो फैला हुआ है, हमारी पुण्यभूमि ही है,
कारण इसी भूमिमें हमारे धर्मप्रवर्त्तक उत्पन्न हुए, इसी भूमिमें
वे ऋषि उत्पन्न हुए जिन्हें वेदमंत्रोंके दर्शन हुए। उन वैदिक
ऋषियोंसे लेकर दयानन्दतक, जिनसे महावीरतक, बुद्धसे
नागसेनतक, नानकसे गोविन्दतक, बंदासे बसवतक; चन्द्र-
११६ हिन्दुत्व
धरसे चैतन्यतक, रामदाससे राममोहनतक हमारे सब गुरु
और महापुरुष इसी भूमिमें पैदा हुए और इसी भूमिमें पले और
फले फूले। इस भूमिकी रजके प्रत्येक कणसे उनके पदस्पर्शकी
ध्वनि प्रतिध्वनित होती है। इस भूमिकी सब नदियां पवित्र हैं
और उनसे इसकी वनश्री पावन हुई है; कारण, मानवी जीवन,
आत्मा और परमात्मा, ब्रह्म और माया—इन गूढ़तम प्रश्नोंका
परम विचार हमारे परम पूज्य ऋषियों और आचार्योंने इन्हीं
नदियोंके शीतल चन्द्रप्रकाशसे रम्य तटपर अथवा तरुलताओंके
कुञ्जमें बैठकर ही किया था। इस भूमिके प्रत्येक गिरि और
कन्दरामें कपिल और व्यास, बुद्ध और शङ्कराचार्य, शंकर
और रामदासकी स्मृति-समीर बह रही है। कहीं भगीरथने
राज्य किया है, कहीं कुरुक्षेत्र विद्यमान है। कहीं रामचन्द्रके
वनवासका प्रथम प्रस्थान है, कहीं जानकीके सुवर्णमृग-
दर्शनका स्थान है। इस यमुनातटपर खड़े गोपाल कृष्णने अपनी
विश्वविमोहिनी मधुर मुरली बजायी और वहां गोकुलके गोप
उसकी ध्वनिपर आनन्दोन्मत्त होकर नृत्य करने लगे। यहां
बोधिवृक्ष खड़ा है, वहां वह तपोवन है। यहां महावीरने निर्वाण
लाभ किया। वहां गुरु नानककी संगत “गगन थाल रविचंद
दीपक बने” वाली आरती गा रही है। उस राजा गोपीचंदने
राजपाटपर लात मारकर यहीं योगीका वेश लिया और भिक्षा-
पात्र हाथमें ले भगिनीके द्वारपर “मैया, भिक्षा दे” की पुका .
की। यहां बन्दा बहादुरके पुत्रको बोटी बोटी काटकर उसने
हिन्दुत्वकी परिभाषा ११७
बापके सामने उसका वध किया गया और मृतप्राय पिताने
भी हिन्दूधर्मको नहीं छोड़ा, इसलिये उसके मुखमें उसके वीर
तनयका रक्ताक्त हृदय क्रूरतासे ढूंसा गया। यहांके प्रत्येक
स्थान और पाषाणमें किसी न किसी हुतात्माकी पुण्यकथा
संचित हुई है। हे जननी जन्मभूमि ! तेरी प्रत्येक रजःकणिका
यज्ञभूमि हो गयी है। 'जहां कृष्णसार मिलता है', वहीं नहीं,
काश्मीरसे कन्याकुमारीतक समग्र भारतभूमि यज्ञभूमि है, जो
ज्ञानयज्ञ अथवा आत्मयज्ञसे पतितपावनी हुई है। इसलिये
यह भारतभूमि, यह सिन्धुस्थान प्रत्येक हिन्दूके लिये पितृभू है
और पुण्यभू भी।
इसलिये ऐसे मुसलमान और क्रिस्तान जो जबर्दस्ती धर्मच्युत
करके परधर्ममें मिलाये गये और इसलिये अन्य हिन्दुओंके साथ
जिनकी यही मातृपितृभूमि है, हिन्दू-संस्कृतिके अधिक भागको
जो अब भी मानते हैं—जिनकी भाषा, व्यवहार-शास्त्र, रीति-
रस्म, लौकिक मनःसंस्कार और इतिहास अनेकांशमें अन्य
हिन्दुओंके ही समान हैं—ऐसे मुसलमान और क्रिस्तान-“पुण्यभू”
की उपर्युक्त लक्षणमीमांसाके कारण कदापि हिन्दू नहीं
माने जा सकते। कारण अन्य हिन्दुओंके समान उनके लिये भी
हिन्दुस्थान पितृभूमि है पर पुण्यभूमि नहीं है। उनकी पुण्यभू
यहांसे बहुत दूर अरबमें या फिलस्तीनमें है। उनके पुराण और
अवतार, उनकी कथाएं और उनके धर्मवीर इस भूमिके जने
नहीं हैं। और इसलिये उनके नामों और उनकी आकांक्षाओंमें
११८ हिन्दुत्व
परायापनकी गन्ध आती है। उनकी निष्ठा बंटी हुई है। उनमें
कुछ लोग जैसा कि कहा करते हैं वैसी ही यदि उनकी निष्ठा हो
तो कोई चारा भी नहीं है—उन्हें अपनी पुण्यभूमि अपनी पितृ-
भूमिसे 'गरीयसी' मानना ही होगा और उसीकी अधिक भावना
औ भक्ति करनी होगी। यह बिलकुल स्वाभाविक है। हम इसी-
लिये उन्हें बुरा नहीं कहते, न इसपर अश्रुपात ही करते हैं। हम
जो बात है उसीको सामने रख रहे हैं। हिन्दुत्वके लक्षण क्या हैं
यह निश्चित करनेका यहां तक प्रयत्न किया। उससे यह मालूम
हुआ कि बोहरा और ऐसे ही अन्य मुसलमान या क्रिस्तानोंमें
हिन्दुत्व-के और सब लक्षण हैं पर एक लक्षण नहीं है—कि वे
हिन्दुस्थानको अपनी पुण्यभू नहीं मानते ।
यहां यह प्रश्न नहीं है कि कौन धर्म अच्छा है और किस
धर्मको मानना चाहिये और न यहां परमात्मा, आत्मा और जीव-
त्माके संबंधमें ही कोई नया सिद्धान्त प्रतिपादित करना है।
कारण, हमारा अन्तःकरणवृत्तिसे ही यह प्रामाणिक विश्वास
है कि हिन्दू तत्वज्ञान—हम किसी संप्रदाय विशेषकी बात नहीं
कहते—हिन्दू तत्वज्ञान—उस पराकाष्ठाको पहुंचा हुआ है कि
मानवी कल्पनाशक्तिमें अब कोई ऐसी बात नहीं रह गयी है कि
उससे अज्ञेयके संबंधमें तो क्या, अज्ञातके संबंधमें भी कोई नई
कल्पना निकल सके अथवा "तत्" और "त्वम्" की कोई नई
मीमांसा हो सके। आप कौन हैं ? एकेश्वरवादी, जगदीश्वरवादी,
निरीश्वरवादी, नास्तिक्यवादी; कौन हैं ? जो कोई हों, यह
हिन्दुत्वकी परिभाषा ११६
आपके लिये पूरा अवसर और अवकाश है, जिसमें हे आत्मन् !
सब मन्दिरोंके इस मन्दिरमें आकर जो किसी वैयक्तिक नींवपर
नहीं बल्कि अटल, अचल, व्यापक सत्यकी नींवपर उठा हुआ है,
तुम चाहे जितने ऊंचे उड़कर ऊंचेसे ऊंचे और परमसुखधामको
प्राप्त कर सकते हो । कहां अपनी छोटीसी सुराही लेकर जलके
लिये कुओंकी तलाशमें भटक रहे हो, जब खड़े हो स्फटिकसे
स्वच्छ सलिलकी स्रोतस्वती पतितपावनी महानदी गङ्गाके तटपर !
क्या तुम्हारी नसोंमें प्रवाहित होनेवाला हमारे तुम्हारे पूर्वजोंका रक्त
तुम्हें उन प्रिय दृश्यों और प्रेमबंधनोंका स्मरण नहीं कराता, जिन्हें
काटकर जबर्दस्ती खड्गकी धारपर तुम हमसे अलग किये गये ?
आओ भाई, अपने भाई-बहनोंमें लौट आओ, देखो, अपने बिछुड़े
हुए भाईका स्वागत करनेके लिये अपने हृदयका कपाट खोलकर
ये अपनी आलिङ्ग्नोत्सुक बाहें फैलाये हुए हैं। कहां तुम्हें उपा-
सना करनेकी इतनी स्वाधीनता मिलेगी जितनी इस पुण्यभूमिमें,
जहां महाकालके मन्दिरकी सीढ़ियोंपर खड़ा होकर चार्वाक भी
नास्तिक-दर्शनका उपदेश दे सकता है ? कहां इससे अधिक
समाज-संगठनकी स्वाधीनता पाओगे जितनी इस हिन्दू-समाजमें,
जहां विहारके पाटलीपुत्रसे काशीके पण्डितोंतक, सन्थालोंसे
राजपूतानेके राजाप्रासादोंतक, सबके अपने अपने विशिष्ट समाज
हैं—सब अपने अपने विशिष्ट समाज बना सकते और संघटित
कर सकते हैं। सच है—
'यदेहास्ति न सर्वत्र यन्नेहास्ति न कुत्र चित्।'
१२० हिन्दुत्व
यहां जो है वह सब जगह नहीं मिलेगा; यहां जो नहीं है वह
कहीं भी न मिलेगा। संसारमें जो कुछ है, वह यहां मौजूद है।
तुम जो जाति, रक्त, संस्कृति और राष्ट्रीयताके बन्धनोंसे हिन्दू
ही हो और जिसे हिंसाके हाथने ही अपने पितृ-गृहसे जबर्दस्ती
खींच लिया, तुम्हें यही करना है कि अपनी अनन्य भक्ति अपनी
इस माताको अर्पण करो और इसे केवल पितृ-भू नहीं, पुण्यभूमि
मानकर पूंजो और इस तरह फिरसे हिन्दूसंघमें आ जाओ।
हिन्दू-जाति अत्यन्त प्रसन्न चित्तसे तुम्हारा स्वागत करेगी।
बोहरा, खोजा, मेमन तथा अन्य मुसलमानों और ऐसे ही
क्रिस्तानोके लिये यही रास्ता खुला है और यह केवल उनकी
मर्जीपर है कि वे इसे स्वीकार करें या न करें। परन्तु जबतक
वे इस मार्गपर नहीं हैं तबतक हम उन्हें हिन्दू नहीं कह सकते।
यहां यह बात ध्यानमें रखनी चाहिये कि हम हिन्दुत्वके लक्षणों-
की जांच कर रहे हैं और इसलिये किसी पक्ष या पूर्वाग्रहके अनु-
कूल अर्थ निकालनेके लिये विवेच्य विषयके विवेचनमें खींच-तान
करना केवल अन्याय होगा।
तात्पर्य, हिन्दू वही है जो सिन्धु नदीसे सिन्धु-समुद्र पर्यंत
विस्तृत इस देशको अपनी पितृ-भू मानता है; जो रक्त-संबंधसे
उस जातिका वंशधर है जिसका प्रथम उद्गम वैदिक सप्त-सिन्धु-
ओंमें हुआ और जो पीछे बराबर आगे बढ़ती अन्तर्भूतको
पचाती और उसे महनीय रूप देती हिन्दू-जातिके नामसे विख्यात
हुई; जो उत्तराधिकार सम्बन्धसे उसी जातिकी उस संस्कृतिको
हिन्दुत्वकी परिभाषा १२१
अपनी संस्कृति मानता है जो संस्कृति संस्कृत भाषामें संचित
और जातिके इतिहास, साहित्य, कला, धर्मशास्त्र, व्यवहारशास्त्र,
रीति-नीति, विधि-संस्कार, पर्व और त्योहार-इनके द्वारा अभि-
व्यक्त हुई है; और जो इन सब बातोंके साथ इस देशको अपनी
पुण्य-भू, अपने अवतारों और ऋषियोंकी, अपने महापुरुषों और
आचार्योंकी निवास-भूमि तथा सदाचार और तीर्थयात्राकी
भूमि मानता है। हिन्दुत्वके ये लक्षण हैं—एक राष्ट्र, एक जाति,
और एक संस्कृति। इन सब लक्षणोंका अन्तर्भाव करके संक्षेपमें
यों कहा जा सकता है कि हिन्दू वह है जो सिन्धुस्थानको केवल
पितृभू नहीं, पुण्य-भू भी मानता है। हिन्दुत्वके प्रथम दो लक्षण-
राष्ट्र और जाति—"पितृ-भू" शब्दमें आ जाते हैं, और तीसरा
लक्षण—एक संस्कृति—"पुण्य-भू" शब्दसे मुख्यतः प्रकट होता
है, क्योंकि संस्कृतिमें सब संस्कार आ जाते हैं और संस्कृति ही
किसी भूमिको पुण्य-भूमि बनाती है। यह परिभाषा और भी
संक्षिप्त निम्नलिखित अनुष्टुपमें की जा सकती है —
आसिन्धु सिन्धुपर्यन्ता यस्य भारतभूमिका।
पितृ-भूः पुण्य-भूश्चैव स वै हिन्दुरितिस्मृतः ॥
( ७ )
परिभाषाकी जांच
❖
अबतक हिन्दुत्वका जो स्थूल विवेचन किया गया उससे
“हिन्दुत्व” के मुख्य लक्षणोंका बोध करानेवाली एक काम
चलाने लायक परिभाषा तैयार हो गयी । अब यह सर्वसामान्य
परिभाषा किस प्रकार सर्वत्र घटती है यह देखना बाकी है । यह
काम कुछ खास उदाहरण लेकर और जिन उदाहरणोंके कारण
यह परिभाषा करनेकी आवश्यकता पड़ी ऐसे ही उदाहरण लेकर
किया जा सकता है । इस परिभाषाको निश्चित करते हुए, हमने
इस बातकी सावधानी रखी है कि इसमें अतिव्याप्तिका दोष न
आने पावे। अब कुछ खास उदाहरण लेकर उनपर इस परि-
भाषाको हम यथार्थमें घटा सके तो यह निश्चय हो जायगा कि
इसमें जैसे अति-व्याप्तिका दोष नहीं है, वैसे ही अव्याप्तिका भी
दोष नहीं है ।
हिन्दुओंमें जो दैशिक विभाग हुए हैं वे इस परिभाषासे पूर्ण
सुसंगत हैं, यह उन विभागोंको देखनेके साथ ही प्रतात हो
जायगा । हमारी परिभाषाका मूलतत्त्व “आसिन्धु सिन्धु-
पर्यन्ता” भूमि है । हमलोगोंमेंसे बहुतसे लोग सिन्धु नदीके उस
पारकी भूमिमें वास करते हैं । तथापि जब किसी नदीके तटका
परिभाषाकी जांच १२३
उल्लेख किया जाता है तब उसमें दोनों ही तट आ जाते हैं और
इसलिये सिन्धु नदीके पश्चिम तटका सारा प्रदेश निसर्गतः ही
“सिन्धुस्थान” का ही अंश है और इसलिये वह हमारी परि-
भाषाके अन्दर आ जाता है। सिंधु नदीके इस पश्चिम तटप्रदेश-
पर जो लोग रहते हैं वे निःसन्देह प्राचीन सिंधुओंके वंशज हैं
और उन्होंने आजतक अपना और अपनी भूमिका प्राचीन नाम
नहीं बदला है-वे आज भी सहस्रों वर्ष पूर्वकी तरह "सिंधुदेश"
की संतान "सिन्धी" ही कहलाते हैं। दूसरी बात यह है कि मुख्य
भूमिके आस-पासकी भूमि भी मुख्य भूमिके नामसे ही पुकारी
जाती है और तीसरी बात यह है कि सिंधुके उस पार रहनेवाले
ये हिन्दू परम्परासे इस हिन्दुस्थानको ही अपनी पितृ-भू और
पुण्य-भू मानते आये हैं। उन्होंने कभी अपने रहनेके छोटेसे
प्रदेशको ही “पितृ-भू” और “पुण्य-भू” मान बैठनेकी मातृ-
घातक कल्पना करनेका पाप नहीं किया। प्रत्युत हमारी जो
काशी, कैलास और गंगोत्री है वही काशी, कैलास और गंगोत्री
उनकी भी है। वैदिक कालसे ही वे भारतवर्षके एक प्रधान अंग
हैं। रामायण और महाभारतमें “सिन्धु शिविसौवीरों” का उल्लेख
है और वे महान् हिन्दू जातीय संघ और राष्ट्रके अंग ही हैं। वे
हमारे राष्ट्र, जाति और संस्कृतिके ही हैं; इसलिये वे हिन्दू हैं
और हमारी परिभाषाके अन्दर आते हैं।
परन्तु यदि कोई इस बातको न भी माने कि किसी नदीका
अपनी हदके अन्दर होना उसके दोनों तटोंका उस सीमाके अंदर
१२४, हिन्दुत्व
होना है तो भी उससे हमारी परिभाषामें कोई दोष नहीं आता;
और, और भी कुछ कारण हैं जिनसे यह परिभाषा हमारे सिन्धी
भाइयोंपर पूरे तौरपर घटती है। सिंधु नदीके उस पार रहनेवाले
इन सिन्धी भाइयोंके अतिरिक्त, हमारे और भी बहुतसे हिन्दू
भाई हैं जो संसारके भिन्न भिन्न भागोंमें बसे हुए हैं। कोई समय
आ सकता है जब हमारे ये उपनिवेशवासी हिन्दू जो आज भी उन
उन उपनिवेशोंमें संख्या, व्यापार, योग्यता और बुद्धिमत्तामें बड़े
माने जाते हैं, किसी किसी प्रदेशके मालिक बन सकते हैं और
अपना स्वतन्त्र राज्य स्थापित कर सकते हैं। परन्तु हिन्दुस्थानके
बाहर किसी अन्य देशमें जा बसनेसे ही कोई हिन्दू क्या अहिन्दू
हो जायगा ? कदापि नहीं; कारण, हिन्दुत्वका प्रथम लक्षण यह
नहीं है कि वह हिन्दुस्थानके बाहर रहनेवाला मनुष्य न हो, बल्कि
यह है कि वह और उसके वंशज जहां कहीं भी हों हिन्दुस्थान-
को अपनी पितृ-भूमि मानें। और यह केवल मानने न मानने-
का ही प्रश्न नहीं है। जिस किसीके पूर्वज हिन्दुस्थानसे जाकर
कहीं बाहर बसे होंगे उसको यह मानना ही पड़ेगा कि हमारी
पितृभूमि हिन्दुस्थान है। इस तरह हिन्दुत्वकी इस परिभाषामें
हिन्दू-जातिके चारों ओर फैलनेकी पूरी गुंजायश है। हमारे जो
लोग भिन्न भिन्न उपनिवेशोंमें बसे हुए हैं वे अपनी सारी सामर्थ्य
लगाकर 'भारत' को "महाभारत" या "हिन्दुस्थान" को "विराट
हिन्दुस्थान" निर्माण करनेका उद्योग बराबर करते रहें और
हिन्दू-संस्कृतिमें जो कुछ उत्तम है उसे मानव-जातिके उद्धारमें
परिभाषाकी जांच • १२५
लगाते रहें, एक ध्रुवसे दूसरे ध्रुवतक इस समग्र पृथ्वीके
लोगोंको अपने सद्गुणोंसे सम्पन्न करें और अन्य देशोंमें जहां
जो कुछ उत्तम हो उसे लेकर उससे अपने देशको भी समृद्ध करें।
हिन्दुत्व हिमालयके गरुड़ोंके पंख नहीं काटता प्रत्युत उनकी
उड़ानकी शक्तिको बढ़ाता है। जबतक, हे हिन्दू भाइयो, तुम
अपने हिंदुस्थान देशको अपनी पितृ-भू और पुण्यभू मानते हो
और हिन्दू-जातिकी संस्कृति और हिंदू-जातिके रक्तका अभिमान
तुम्हारे अन्दर है, तबतक आगे बढ़े चलो, संसारमें अपने उप-
निवेश कायम किये चलो। हिंदुत्वकी भौगोलिक चतुःसीमा
पृथ्वीकी चतुःसीमा है।
अब हमारी परिभाषामें जाति-संबंधी जो लक्षण है, हम नहीं
समझते कि कोई भी उसपर कोई आपत्ति कर सकता है। जिस
प्रकार इंग्लैंडमें इबेरियन, केल्ट, आंग्ल, सैक्सन, डेन आदि भिन्न
भिन्न लोग, परस्पर विवाह-संबंधी जातीय प्रतिबंधोंके रहते
हुए भी, एक जाति बन गये हैं; उसी प्रकार प्राचीन आर्य, कोलार,
द्राविड़ तथा अन्य लोगोंमें परस्पर-विवाह-संबंधी जातीय प्रति-
बंधोंके रहते हुए भी वे एक जाति हुए हैं और अब वे प्रतिबन्ध
प्रतिबंध नहीं माने जा सकते। हम पिछले परिच्छेदोंमें इस विष-
यका विस्तारके साथ प्रतिपादन करके यह दिखला चुके हैं कि
विवाहके जिन प्रतिलोम और अनुलोम प्रकारोंको हमारे धर्म-
शास्त्रमें स्थान मिला हुआ है उन्हींसे यह प्रमाणित हो जाता
है कि उसी समय ये भिन्न भिन्न वंश एक दूसरेमें इस हदतक मिल
१२६ , हिन्दुत्व
गये थे कि संपूर्ण राष्ट्र-शरीरमें एक ही रक्त प्रवाहित होता
था। जहां रूढ़िने विरोध किया वहां स्वयं प्रकृतिने उन बांधोंको
तोड़ डाला। आर्योंमें अकेले भीमसेन ही नहीं हुए जिन्होंने हिडिं-
बासे प्रणय किया हो। भील और संथाल जातिकी दस-बीस लड़-
कियोंमेंसे भी यदि किसी लड़कीको उठाकर किसी कन्यापाठ-
शालामें छोड़ दें तो उसको आकृति या नैतिक संस्कारसे कोई
यह पता लगाना चाहे कि यह किस जातिकी है तो वह नहीं लगा
सकेगा। आर्य, कोलार, द्रविड़ आदि वंशोंके संमिश्रणसे जो
जाति उत्पन्न हुई वह ठीक ही है कि आर्य, कोलार या द्रविड़ न
कहलाकर, हिंदू-जाति कहलाती है—अर्थात् वह जाति जो एक
ही मातृ-भूमिकी संतति और एक ही पुण्यभूकी उपासक है।
इसलिये संथाल, धोवर, भील, पंचम, नमःशूद्र और ऐसी अन्य
सब जातियां हिंदू ही मानी जाती हैं। यह हिंदुस्थान जितना
आर्यों के पूर्वपुरुषोंका देश है उससे यदि अधिक नहीं तो कमसे
कम उतना ही वह उनका भी है। उनमें वही हिंदू-रक्त है, उनमें
वही हिन्दू-संस्कृति है। उनमें कुछ लोग ऐसे भी हैं जो अभी
किसी कट्टर पुराणप्रिय हिंदू-सम्प्रदायके पूर्ण प्रभावके अन्दर
नहीं आये हैं तौभी वे ऐसे देवताओं और साधु-सन्तोंका नाम
लेते हैं, ऐसे ही "धर्म" का पालन करते हैं जो देवता, साधु
और धर्म-संप्रदाय केवल इसी देशसे सम्बद्ध हैं और इसलिये यह
भूमि उनकी केवल पितृभू नहीं, पुण्यभू भी है।
हिन्दुत्वका जो सांस्कृतिक पहलू है उसपर भी कोई आपत्ति
१७
परिभाषाकी जांच १२७
[न]हीं हो सकती; पर “हिन्दुत्व” और “हिन्दू-धर्म” इन दोनोंको
[ए]क ही वस्तु मानकर लोग भ्रममें पड़ जाते हैं। हम इन दोनों
कल्पनाओंके बीच जो भेद है उसे स्पष्ट रूपसे दिखला चुके हैं
और यह भी बतला चुके हैं कि हिन्दूधर्मको 'सनातनधर्म'
कहना या हिन्दुत्वको हिन्दूधर्म कहना ये—दोनों बातें ठीक नहीं
हैं। यह जो दोहरी गलती होती है कि हिन्दुत्वको हिन्दूधर्म
समझा जाता है और हिन्दुत्व तथा हिन्दूधर्मसे सनातनधर्म
संप्रदाय माना जाता है, इससे सनातनेतर धर्मसंप्रदाय चिढ़ते
हैं और कुछ लोग इस भ्रमका भण्डा फोड़नेके बदले एक दूसरी,
और वह भी बड़ी भारी, गलती करते हैं जो अपने हिन्दू होनेका
दावा ही उठा लेते हैं। हमें आशा है कि हमारी हिन्दुत्वकी इस
परिभाषासे इस तरहकी गलती करनेकी किसीके लिये भी गुंजा-
यश न रहेगी। उसी प्रकार यह परिभाषा सत्यके सुदृढ़ आधार-
पर खड़ी होनेसे इसे अखिल हिन्दू-समाजके समझदार लोग
मान लेंगे, परन्तु अबतक इस प्रश्नके सामान्य विवेचनमें हम कोई
किसी समाजका उदाहरण लेकर जांच न कर सके सो अब
करते हैं। सबसे पहले अपने सिखसंघका उदाहरण लीजिये।
कोई भी सिख इतना मूर्ख न होगा जो सिन्धुस्थानको—आसिंधु
सिंधुपर्यंता भारतभूको अपनी पितृ-भूमि न माने—जहां वैदिक
कालसे अबतक उसके पूर्वपुरुष जीये, जहां रहकर उन्होंने
भजन किये और जहां उनकी समाधि लगी। दूसरी बात, उनके
शरीरमें भी उतना ही हिन्दूरक्त है जितना मद्रास या बंगालके
१२८ हिन्दुत्व
किसी हिन्दूमें। महाराष्ट्र और बंगालके हिन्दुओंमें आर्योंके
रक्तके साथ वहां बसनेवाली जातियोंका भी रक्त मिला हुआ
है। परन्तु सिख तो अभिमानके साथ यह दावा कर सकते हैं
कि हम तो उन्हीं प्राचीन सिन्धुओंके ही प्रत्यक्ष वंशज हैं, और
हिन्दू-जीवनकी यह गंगा नीचे आकर बहने लगनेके पूर्व ही उस
गंगाके उद्गम स्थानमें हमारा जन्म हुआ है। तीसरी बात, हिन्दू-
संस्कृतिकी संपत्ति बढ़ानेमें उनका भी हाथ है और इसलिये हिन्दू-
संस्कृतिके हमारी तरह वे भी अधिकारी हैं। कारण सरस्वती
विद्या और कलाकी अधिष्ठात्री देवी मानी जानेके पूर्व पञ्जाबमें
एक नदी थी। आज भी हिन्दुस्थानभरमें लाखों-करोड़ों हिन्दू वही
स्तुति गाते हैं जो, हे सिख भाइयों, तुम्हारे पूर्वज 'सिन्धू' उस
नदीके किनारे जहां हमारी संस्कृति और सभ्यताका बीज बोया
गया, गाते थे और गाकर अपनी कृतज्ञता ज्ञापन करते थे।
“अंबितमे नदीतमे। देवितमे सरस्वति !” यह सस्वर मंत्र-
पाठ आज भी होता है। वेद जैसे हमारे हैं वैसे ही सिखोंके भी
हैं। वे वेदोंको अपौरुषेय न मानते हों जैसे हम मानते हैं, यह
बात दूसरी है। पर वेदोंमें भी प्रकृतिकी शक्तियोंको स्वकार्य-
साधनमें लगानेके मनुष्यके प्रथम प्रचंड प्रयत्नका वर्णन है—
स्वर्गीय सुधाको अन्धकारमें कैद कर रखनेवाले और इस तरह
आत्मज्योतिकी किरणोंका प्रकाश मानवी मनसे रोककर चैतन्यको
अचेतन बना रखनेवाले अज्ञानके साथ मनुष्यके तुमुल संग्रामका
वर्णन है;इस नाते वेद उनके लिये भी पूज्य हैं। सिखोंका इतिहास
भी अन्य सब हिन्द-समाजोंके समान. यथार्थमें वेदोंसे ही आरंभ
परिभाषाकी जांच १२६
होकर, अयोध्याके राजमहलों और लंकाकी समर-भूमिसे होता हुआ
लहुसे लाहोरकी नींव पड़ती देखता और कपिलवस्तुसे प्रस्थान
करते सिद्धार्थके दर्शन करता, त्रितापदग्ध मनुष्यकी मुक्तिका
उपाय ढूंढनेके लिये गुफाओंमें जा छिपता है। हमारे साथ सिख
भी पृथ्वीराजकी हारपर अश्रुपात करते हैं और हिन्दूके नाते
हिन्दुओंके दुर्भाग्य और दुःखोंका अनुभव करते हैं। उदासी,
निर्मले, गहनगंभीर और सिन्धी सिख संस्कृत भाषाको केवल
अपने पूर्वजोंकी भाषा ही नहीं मानते प्रत्युत उसे अपने देशकी
पवित्र भाषा-देववाणी मानते हैं। अन्य सिखोंको भी इसे अपने
पूर्वजोंकी भाषा और उन गुरुमुखी और पञ्जाबीकी जननी मान-
कर पूजना ही पड़ता है जो गुरुमुखी और पञ्जाबी अभी अपनी
बाल्यावस्थामें हैं और जो जननीके स्तनोंसे ही अपने जीवनका
पोषक रस पान करती हैं। अन्तिम बात यह है कि यह “आसिंधु
सिंधु-पर्यंता” भूमि न केवल उनकी पितृभू है, बल्कि पुण्यभू भी
है। गुरु नानक और गुरु गोविन्द, श्री बंदा और रामसिंह हिन्दु-
स्थानमें ही पैदा हुए और पवित्र हिन्दुस्थानके ही सरोवर अमृतसर
और मुक्तसर हैं, हिन्दुस्थानकी ही भूमि गुरुद्वार और गुरु-
गृह है। सचमुच ही यदि किसी जातिके हिन्दू होनेमें कुछ भी
कोर-कसर नहीं है तो वह सिख-जाति ही है। कारण, ये सिख
सप्तसिन्धुके तटपर रहनेवाले आदि निवासी हैं और “सिन्धु”
अथवा “हिन्दु” के प्रत्यक्ष वंशज हैं। आज जो सिख है वह कल
हिन्दू था और आजका हिन्दू कलका सिख हो सकता है। शेषमें,
१३० हिन्दुत्व
रहन-सहनमें, नित्यके जीवनकी किसी बातमें कोई परिवर्तन हो
जानेसे ही किसीका रक्त या बीज नहीं बदल जाता न इतिहास ही
मिट सकता है।
लाखों सिखोंका हिन्दुत्व स्वयंसिद्ध ही है। सहजधारी,
उदासी, निर्मले, गहनगंभीर और सिंधी सिखोंको, जाति और
राष्ट्रके विचारसे, अपने हिन्दू होनेका पूर्ण अभिमान है। उनके
गुरु जब हिन्दू-सन्तान थे तब उन्हें कोई अहिन्दू कहकर उनका
क्रोध-भाजन हुए बिना कैसे रह सकता है? गुरुग्रन्थको पूज्य
मानकर सनातनी भी पढ़ते हैं और सिख भी। दोनोंके पर्व और
त्योहार एकसे हैं। “तत्खालसा” पन्थके सिख भी अधिकांशमें
अपनेको हिन्दू ही मानते हैं और हिन्दुओंमें हिन्दुओंकी तरह ही
रहते हैं। उनसे जाकर यदि कोई कहे कि आप लोग हिन्दू नहीं
हैं तो वे चकित स्तम्भित हो जायंगे—उनके हृदयको बड़ा भारी
धक्का लगेगा। हमारी जातीय एकता इतनी संशय-रहित, प्रत्यक्ष
और पूर्ण है कि सिख और सनातनियोंमें विवाह-सम्बन्ध भी
होते हैं।
अब यह बात है कि कभी कभी कुछ सिख-नेता यह कहा
करते हैं कि हम हिन्दू नहीं हैं। इसका कारण क्या है? कारण
यह है कि “हिन्दू-धर्म” का अर्थ गलतीसे “सनातनधम” माना
जाने लगा। यदि इन शब्दोंके अर्थके सम्बन्धमें ऐसी गड़बड़ न
होती तो उनकी यह आवाज भी किसीको न सुनायी देती कि
“हम हिन्दू नहीं हैं”। “हिन्दू-धर्म” के अर्थके सम्बन्धमें भ्रम और
परिभाषाकी जांच १३१
उसके अयथार्थ प्रयोगकी इस गड़बड़ीसे यह आत्मघात करनेवाली
प्रवृत्ति उत्पन्न हुई जो समय समयपर भाई भाईमें बैर कराती
है। हम यह स्पष्ट रूपसे दिखला चुके हैं कि हिन्दुत्वकी कसौटी
कोई धार्मिक कल्पना नहीं है। यहां हम फिर वही बात कहते
हैं कि सिख यदि चाहें तो "सनातनधर्म" की उन सब बातोंको,
यहां तक कि वेदोंके अपौरुषेयत्वको भी अन्धविश्वास कहकर
अस्वीकार कर सकते हैं। ऐसा करनेसे वे सनातनी नहीं रहेंगे,
पर तौभी हिन्दुत्वपर उनका पूरा अधिकार रहेगा। हिन्दुत्वकी
हमारी जो परिभाषा है उसी परिभाषाके अनुसार सिख हिन्दू हैं,
किसी धार्मिक कल्पनाके अनुसार नहीं। सम्प्रदायतः वे सिख
हैं, जैसे जैन जैन हैं, लिंगायत लिंगायत हैं या वैष्णव वैष्णव हैं।
पर जाति, राष्ट्र और संस्कृतिके नाते ये सब एक अखण्ड जाति
और राष्ट्र हैं और सनातनसे ही ये सब हिन्दू कहलाते चले आते
हैं। यही हिन्दू नाम ही इनके लिये यथार्थ है। और कोई दूसरा
नाम हमारी जातीय एकताको अभिव्यक्त नहीं कर सकता। भार-
तीय शब्दसे भी वह संपूर्ण भाव नहीं प्रकट होता, यह हम पिछले
परिच्छेदोंमें दिखला ही चुके हैं। भारतीय शब्द इससे अधिक
व्यापक है, उससे भारत या हिन्दुस्थानमें रहनेवाले व्यक्तिमात्रका
बोध होता है—हम सब हिन्दुओंकी जातीय एकताका नहीं। हम
सिख हैं, हिन्दू हैं और भारतीय हैं। हम एक साथ तीनों हैं,
अलग अलग कुछ भी नहीं।
हमारे कुछ सिख भाई जो अपनेको हिन्दुओंसे पृथक् गिनाने
१६२ हिन्दुत्व
लगे, उसका एक कारण तो यह हुआ कि उन्हें यह भय था
कि अपनेको हिन्दू कहनेसे हम सनातनी समझे जायंगे; इसके
साथ ही एक और दूसरा कारण भी हुआ और वह
कारण राजनीतिक है। यहां "विशेष प्रतिनिधित्व" के गुण-
दोषोंकी चर्चा करना उचित न होगा। सिख अपने समाजके
विशिष्ट अधिकारोंकी रक्षा चाहते थे, और यदि मुसलमान अपने
लिये विशिष्ट और सांप्रदायिक प्रतिनिधित्वका अधिकार पा
सकते हैं तो कोई कारण नहीं है कि भारतवर्षके अन्य अल्प-
संख्यक समाज वैसा ही अधिकार न मांगें। परन्तु यह जरूर
है कि सिखोंको अपनी मांगकी पुष्टिके लिये ऐसी निराधार और
आत्मघात करनेवाली दलीलका सहारा न लेना चाहिये था कि
हम हिन्दू नहीं हैं। सिख अपने सांप्रदायिक स्वार्थों की रक्षाके
लिये एक महत् अल्पसंख्यक समाजके नाते विशिष्ट सांप्रदायिक
प्रतिनिधित्व मांग सकते थे और उसमें उन्हें यश भी मिलता,
जैसा कि अब्राह्मणों और अन्य समाजोंको मिला है। इसके लिये
वे हिन्दुत्वका अपना जन्मसिद्ध अधिकार क्यों छोड़ें ? हमारे सिख
भाईयोंका समाज मुसलमानोंके समाजसे किसी प्रकारसे भी कम
महत्त्वका नहीं है—हम हिन्दुओंके लिये तो हिन्दुस्थानके किसी
भी अहिन्दू समाजसे यह समाज अधिक महत्त्वका है। विशिष्ट
और सांप्रदायिक प्रतिनिधित्वसे होनेवाली हानि उतनी बड़ी
नहीं होती जितनी जातीय अलगावकी मनोभावनासे होती है।
सिख, जैन, लिंगायत, अब्राह्मण और ब्राह्मण भी यदि चाहें तो
परिभाषाकी जांच १३३
अपने अपने विशिष्ट और सांप्रदायिक प्रतिनिधित्वके लिये लड़ें,
यदि वे समझते हैं कि इसके बिना उनके समाजकी उन्नति नहीं
हो सकती। कारण, इन समाजोंकी उन्नति ही तो समग्र हिन्दू-
जातिकी उन्नति है। प्राचीन कालमें भी हमारे चार वर्णोंको राज-
सभा और स्थानिक संस्थाओंमें संप्रदायमूलक पृथक् प्रतिनिधित्व
प्राप्त था। सब वर्ण यह विशेष अधिकार भोगते थे, पर इसके
लिये उन्हें हिन्दुत्वसे पृथक् होनेकी आवश्यकता न होती थी।
सिख अपने धर्म-संप्रदायके नाते सिख बने रहें; पर जाति, राष्ट्र
और संस्कृतिके नाते वे हिन्दू हैं और उन्हें हिन्दू ही कहलाना
चाहिये।
जिन वीरोंने सैकड़ोंकी संख्यामें घातकके खड्गपर अपने सिर
कटा दिये पर अपने गुरुका वचन नहीं टाला—"धर्म हेत शाका
जिन किया। सिर दिया पर सिरर न दिया !" क्या वे अपना बीज
भुला देंगे, क्या अपने पूर्वजोंको ही धिक्कारेंगे और एक छोटीसी
चीजके लिये अपना जन्म-सिद्ध अधिकार बेंच देंगे ? ईश्वर ऐसा
न करें ! हिन्दू-जातिमें जो अल्पसंख्यक समाज हैं वे इस बातको
ध्यानमें रखें कि संघमें शक्ति है तो हिन्दुत्व ही वह दृढ़तम और
प्रियतम बन्धन है जिससे हमारी जातिका वास्तविक, चिरस्थायी
और शक्तिशाली संघ बन सकता है। आप यह समझते होंगे कि
अभी तो अलग रहनेमें ही फायदा है, पर इससे इस प्राचीन जाति
और सभ्यताकी अशेष हानि होगी—विशेषकर आपकी हानि
होगी। आपका हित आपके अन्य हिन्दू भाइयोंके हितमें
१३४ हिन्दुत्व
ऐसा मिला हुआ है कि उसे उससे अलग नहीं कर सकते।
अतीतकालकी तरह भविष्यकालमें भी जहां कहीं विदेशियोंका
हिन्दू सभ्यतापर आक्रमण होगा, वहांपर वह आपके लिये भी
उतना ही प्राणान्तक होगा जितना अन्य किसी भी हिन्दू-समाज-
के लिये। अतीतकालकी तरह भविष्यकालमें भी जब कभी यह
समग्र हिन्दू-जाति किसी शिवाजी या रणजीतके नायकत्वमें,
रामचन्द्र या युधिष्ठिरके नायकत्वमें, अथवा किसी अशोक या
अमोघवर्षके नायकत्वमें पूर्ण चैतन्य लाभ कर,विक्रम और गौरव-
के शिखरपर आरोहण करेगी तब उसकी प्रभा आपपर भी उतनी
ही पड़ेगी जितनी हिन्दू-जातिके अन्य किसी भी समाजपर।
इसलिये, प्यारे भाइयो, छोटी छोटी बातोंके लोभमें पड़कर या
इतिहासका विपरीत अर्थ ग्रहण कर हतबुद्धि मत हो। एक बार
एक ग्रन्थीसे मेरी भेंट हुई। था तो ग्रन्थी, पर एक ब्राह्मणके
घरपर डाका डालनेके अपराधमें इसे सजा हुई थी। उस
ब्राह्मणका यह कर्जदार था और इसने उसका खून किया था।
इस ग्रन्थीने मुझसे कहा कि सिख हिन्दू नहीं हैं और किसी
ब्राह्मणको मारनेमें कोई पाप नहीं है; क्योंकि गुरु गोविन्दसिंहके
बेटोंके साथ एक ब्राह्मण रसोइयेने दगा की थी। सौभाग्यवश
वहां एक और सिख महाशय थे। ये भी ग्रन्थी थे और यथार्थमें
ग्रन्थी थे। बड़े बड़े सिख विद्वान इन्हें मानते थे। इन्होंने उस
ग्रन्थीकी बातका खंडन किया। मतिदास आदि ब्राह्मणोंने गुरु
गोविन्दसिंहको आश्रय दिया था और अनेक ब्राह्मणोंने सिखोंकी