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गरुड़ पुराण

Garuda Purana

by महर्षि वेदव्यास

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DevanagariHindipublished634 pages

About this granth

The Garuda Purana (गरुड़ पुराण) is one of the eighteen Mahapuranas. As the Gita Press introduction notes, its presiding deity is Vishnu, which makes it a Vaishnava Purana. Its Pretakalpa is widely recited in the days after a death, but the Purana as a whole covers much more.

This is the Gita Press abridged edition (Sankshipt Garudapuran, book no. 1189), illustrated, in large type and in Hindi only. The first part, the Acharakanda, covers creation, the lineages of Dhruva and of Daksha's daughters, rites of Vishnu worship, the Vishnu Panjara hymn, meditation, the Vishnu Sahasranama, the Mrityunjaya mantra, the worship of Shiva, Tripura, Ganesha, Gopala, the Sudarshana discus and Hayagriva, mantras against snake poison, and the Gayatri nyasa and sandhya. The second part, the Pretakalpa of the Dharmakanda, describes death, the journey of the soul and the rites for the departed.

The copy here is the 32nd reprint, of Samvat 2076, and runs to 634 pages, a way to read the whole Purana in simple Hindi without the Sanskrit.

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२३२संक्षिप्त गरुडपुराण[ आचार-

देवकीनन्दन श्रीश हरे संसारसागरात् ।
दुर्वृत्तांस्त्रायसे विष्णो ये स्मरन्ति सकृत्सकृत् ॥
सोऽहं देवातिदुर्वृत्तस्त्राहि मां शोकसागरात् ।
पुष्कराक्ष निमग्नोऽहं महत्यज्ञानसागरे ॥
त्राहि मां देवदेवेश त्वामृतेऽन्यो न रक्षिता ।
स्वजन्मवासुदेवाय गोब्राह्मणहिताय च ॥
जगद्धिताय कृष्णाय गोविन्दाय नमो नमः ।
शान्तिरस्तु शिवं चास्तु धनविख्यातिराज्यभाक् ॥
(१३१ । १७-२१)

हे देवदेवेश्वर ! हे हरे ! इस संसारसागरसे मेरी रक्षा करें। हे सर्वपापहन्ता प्रभो ! दुःख तथा शोकसे परिपूर्ण इस संसारसागरसे मेरी रक्षा करें। हे देवकीनन्दन ! हे श्रीपते ! हे हरे ! इस संसारसागरसे मेरी रक्षा करें। हे विष्णो ! जो एक बार भी आपका स्मरण करते हैं, उन सभीको आप दुराचरणके दुःखसे उबार लेते हैं। हे देव ! मैं भी वैसा ही इस संसारके अत्यन्त दुराचरणमें फँसा हुआ हूँ, आप मेरा भी इस शोकरूपी सागरसे उद्धार करें। हे राजीवलोचन ! मैं इस गहन अज्ञानरूपी संसारसागरमें डूबा हुआ हूँ। आप मेरी रक्षा करें। हे देवदेवेश ! आपके अतिरिक्त मेरा अन्य कोई रक्षक नहीं है। हे स्वजन्मा ! वासुदेव ! गोद्विजहितकारी ! जगत्त्राता ! कृष्ण ! गोविन्द ! आपको बारम्बार नमस्कार है। आपकी कृपासे मुझे शान्ति प्राप्त हो, मेरा कल्याण हो और धन, यश तथा राज्यवैभवका मैं अधिकारी बनूँ।
(अध्याय १३१)


बुधाष्टमीव्रत-कथा

**ब्रह्माजीने कहा—**जो मनुष्य अष्टमी तिथिको दिनभर व्रत रखकर नक्तव्रतकी विधिसे एक बार भोजन करता है और इस व्रतकर्मको वर्षपर्यन्त चलाकर व्रतकी समाप्तिपर गोदान करता है, उसे इन्द्रपदकी प्राप्ति होती है। इस व्रतको सद्गतिव्रत कहा गया है। पौषमासकी शुक्लाष्टमी तिथिके व्रतका नाम महारुद्रव्रत है। जब दोनों पक्षकी अष्टमी तिथि बुधवारसे युक्त हो तो नियमपूर्वक बुधाष्टमीव्रत करनेवालेकी सम्पत्ति कभी भी खण्डित नहीं होती। मुक्तिकी इच्छा रखनेवाला जो मनुष्य दो अंगुलियोंको हटाकर शेष तीन अंगुलियोंसे बाँधी गयी मुट्ठीके द्वारा आठ मुट्ठी चावल लेकर श्रद्धा-भक्तिपूर्वक भात बनाता है और कुशासे वेष्टित आम्रपत्रके दोनेमें करेमूके साग और इमलीके साथ उस भातको इस व्रतकी समाप्तिके बाद ग्रहण करता है और बुधाष्टमीकी कथा सुनता है, उसकी सभी इच्छाएँ पूर्ण हो जाती हैं।

बुधाष्टमीको जलाशयमें पञ्चोपचार-विधिसे बुधदेवकी पूजा करनी चाहिये। तदनन्तर यथाशक्ति दक्षिणासे युक्त ककड़ी और चावलका दान देना चाहिये। इस देवके पूजनका बीजमन्त्र 'ॐ बुं बुधाय नमः' है। इस देवपूजाके पश्चात् कमलगट्टे आदिकी आहुति देनेके लिये इसी बीजमन्त्रके अन्तमें 'स्वाहा' शब्दका प्रयोग करना चाहिये। जलाशयके मध्य जिस पूजामण्डलकी कल्पना करे, उस मण्डलके मध्य कल्पित पद्मदलके ऊपर धनुष-बाणसे युक्त श्यामवर्णवाले इन देवकी भावना कर उनके अङ्गोंकी पूजा करे।

इस बुधाष्टमीकी कथा बड़ी ही पुण्यदायिनी है। इस व्रतकी कथा व्रत करनेवाले जनोंको अवश्य सुननी चाहिये। वह कथा इस प्रकार है—

प्राचीनकालमें पाटलिपुत्र नामक नगरमें वीर नामका एक श्रेष्ठ ब्राह्मण रहता था। उसकी पत्नीका नाम रम्भा और पुत्रका नाम कौशिक था। उसके विजया नामकी एक पुत्री थी तथा धनपाल नामका एक बैल था। ग्रीष्म-ऋतुमें एक बार कौशिक उस

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काण्ड ] अशोकाष्टमी, महानवमी तथा नवमीके अन्य व्रत और ऋष्येकादशी व्रत-माहात्म्य २३३


बैलको लेकर गङ्गामें स्नान करते समय जलक्रीडा करने लगा और उसी समय चोर गोपालकोंने आकर बलात् उस धनपाल नामक बैलका अपहरण कर लिया। कौशिक दुःखी होकर वनमें भ्रमण करने लगा। उसी समय संयोगवश अपनी माताके साथ गङ्गाजल लेनेके लिये विजया वहींपर आ गयी। कौशिक भूख-प्याससे व्याकुल हो कमलनालको भक्षण करनेकी इच्छासे एक जलाशयके पास जा पहुँचा। जहाँपर दिव्यलोककी कुछ स्त्रियाँ पूजा कर रही थीं। उन्हें देखकर उसके आश्चर्यका ठिकाना न रहा। अतः विस्मयाभिभूत कौशिकने उन सबके पास जाकर कुछ अन्नके लिये याचना करते हुए कहा—मैं अपनी छोटी बहनके साथ भूखा हूँ, किंतु स्त्रियोंने कहा कि तुमको इस पूजन-सामग्रीमेंसे व्रत करनेके लिये ही कुछ द्रव्य मिल सकता है। तुम भी यहींपर व्रत करो। तत्पश्चात् कौशिकने वहींपर धनपाल बैलकी प्राप्तिके लिये और विजयाने पति-प्राप्तिके लिये बुधदेवकी व्रत-पूजा की। व्रत-पूजन करनेके पश्चात् स्त्रियोंके द्वारा दोनेमें दिये गये प्रसादको उन दोनोंने ग्रहण किया। उसके बाद वे स्त्रियाँ वहाँसे चली गयीं। कुछ समयके बाद चोरोंके साथ वहींपर धनपाल बैल भी दिखायी पड़ गया। चोरोंके द्वारा दिये हुए धनपाल बैलको लेकर प्रदोषकालमें वे दोनों घर वापस चले आये। घरमें दुःखित पिता वीरको प्रणामकर रात्रिमें कौशिक सुखपूर्वक सो गया।

इधर युवा हुई पुत्री विजयाको देखकर वीरको यह चिंता हो गयी कि मैं इस पुत्रीको किसे दूँ। दुःखित पिताने यमराजको पुत्री देनेका निश्चय किया। दैवयोगसे इसी बीच वीरकी मृत्यु हो गयी। पिताके स्वर्ग चले जानेके बाद कौशिकने राज्य-प्राप्तिके लिये पुनः बुधाष्टमीका व्रत किया, जिसके फलस्वरूप कौशिकको अयोध्याका विशाल राज्य प्राप्त हुआ। उसने अपनी उस बहन विजयाका विवाह भी पिताके द्वारा कहे गये वचनके अनुसार यमराजके साथ ही करनेकी बात मनमें ठान ली थी। व्रतके प्रभावसे यमराजने वहाँ स्वयं आकर विजयाको पत्नीके रूपमें स्वीकार किया और विजयासे कहा—'तुम चलकर मेरे घरमें गृहस्वामिनी बनकर रहो।' उसने भी वैसा ही स्वीकार कर लिया और पतिके घर जाकर रहने लगी। एक दिन यमने उसे सावधान करते हुए कहा—देवि! ये जो बंद कमरे हैं, इन्हें कभी खोलना नहीं। विजयाने कभी भी बंद कमरेका किंवाड़तक नहीं खोला और न तो अपने पतिके विरुद्ध कोई आचरण ही किया। वह एक सद्गृहिणीके समान ही उनके साथ रही, किंतु एक दिन जिज्ञासावश उसने पतिके न रहनेपर कमरा खोलनेपर वहाँ अपनी माताको पति यमके ही कष्टकारी पाशमें बँधा हुआ देखा, जिससे वह अत्यन्त दुःखित हो उठी। उसी समय कौशिकके द्वारा बताये गये मुक्ति प्रदान करनेवाले बुधाष्टमी-व्रतकी याद उसे हो आयी। अतः उसने पुनः उस व्रतको किया, जिसके फलस्वरूप माता उस यमपाशसे मुक्त हो गयी। तदनन्तर उसने भी उस व्रतका पालन किया और अन्तमें व्रतके पुण्यके प्रभावसे स्वर्गलोक प्राप्तकर वहाँ सुखपूर्वक निवास करने लगी।
(अध्याय १३२)


अशोकाष्टमी, महानवमी तथा नवमीके अन्य व्रत और ऋष्येकादशी व्रत-माहात्म्य

**ब्रह्माजीने कहा—**चैत्रमासमें पुनर्वसु नक्षत्रसे युक्त शुक्लाष्टमीको 'अशोकाष्टमी' व्रत होता है, इस दिन जो अशोकमञ्जरीकी आठ कलियोंका पान करते हैं, वे शोकको नहीं प्राप्त होते। अशोककलिकाओंका पान करते समय यह प्रार्थना करनी चाहिये—

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२३४संक्षिप्त गरुडपुराण[ आचार-

त्वामशोक हराभीष्ट मधुमाससमुद्भव।
पिबामि शोकसन्तप्तो मामशोकं सदा कुरु॥
(१३३।२)

हे शिवप्रिय! वसंतोद्भव! शोकसंतप्त मैं आपका सेवन कर रहा हूँ। हे अशोक! आप मुझे सदैव शोक-विमुक्त रखें।

**ब्रह्माजीने पुनः कहा—**आश्विनमासमें उत्तराषाढ नक्षत्र तथा शुक्लपक्षकी अष्टमीसे युक्त जो नवमी होती है, उसे महानवमी कहा जाता है। इस तिथिको स्नान-दानादि करनेसे अक्षय पुण्यकी प्राप्ति होती है। यदि केवल नवमी हो तो भी दुर्गाकी पूजा करनी चाहिये। भगवान् शिव आदिने इस व्रतको किया था। यह महाव्रत अत्यधिक पुण्यलाभ देनेवाला है। शत्रुपर विजय प्राप्त करनेके लिये राजाको यह व्रत करना चाहिये। उसे जप-होमके बाद कुमारियोंको भोजन कराना चाहिये।

इस व्रतमें देवीके पूजनादिक कृत्योंमें प्रयुक्त होनेवाला 'ॐ दुर्गे दुर्गे रक्षिणि स्वाहा' यह मन्त्र है।

व्रतीको चाहिये कि वह अष्टमी तिथिको लकड़ियोंसे देवीके लिये नौ अथवा एक भवन (मण्डप)-का निर्माण करे। उसमें देवीकी सुवर्ण या रजतमूर्ति स्थापित करे। देवीकी पूजा शूल, खड्ग, पुस्तक, पट अथवा मण्डलमें करनी चाहिये। अठारह हाथोंवाली दुर्गादेवी अपनी बायीं ओरके हाथोंमें कपाल, खेटक, घण्टा, दर्पण, तर्जनी, धनुष, ध्वज, डमरू और पाश धारण करती हैं। उनके दाहिनी ओरके हाथोंमें शक्ति, मुद्गर, शूल, वज्र, खड्ग, अंकुश, शर, चक्र और शलाका नामक आयुध रहते हैं। दुर्गादेवीके अतिरिक्त अन्य देवियोंकी जो प्रतिमाएँ होती हैं, उनके सोलह हाथ माने गये हैं। अञ्जन और डमरू उनके हाथोंमें नहीं रहता।

रुद्रचण्डा, प्रचण्डा, चण्डोग्रा, चण्डनायिका, चण्डा, चण्डवती, चण्डरूपा तथा अतिचण्डिका—इन आठ देवियोंके अतिरिक्त नवीं देवी उग्रचण्डा हैं। ये उग्रचण्डादेवी अन्य आठ देवियोंके बीच प्रज्वलित अग्निकी प्रभाके समान सुशोभित होती हैं। रुद्रचण्डाका वर्ण रोचनाके समान, प्रचण्डाका अरुण, चण्डोग्राका कृष्ण, चण्डनायिकाका नील, चण्डाका धूम्र, चण्डवतीका शुक्ल, चण्डरूपाका पीत, अतिचण्डिकाका वर्ण पाण्डुर और उग्रचण्डाका वर्ण अग्निकी ज्वालाके समान है। देवी उग्रचण्डा सिंहपर स्थित रहती हैं। इनके आगे हाथमें खड्ग लिये हुए महिषासुर स्थित रहता है। देवी अपने एक हाथसे उस महिषासुरका (मुण्डयुक्त) कच (केश) पकड़े हुई स्थित रहती हैं।

इन भगवती उग्रचण्डाके दशाक्षरी विद्या-मन्त्र ('ॐ दुर्गे दुर्गे रक्षिणि स्वाहा')-का जप करके मनुष्य किसी भी बाधासे बाधित नहीं होता। पंद्रह अंगुलवाले खड्ग तथा त्रिशूलके साथ ही देवीकी उग्र शक्तियों—पूतना, पापराक्षसी, चरकी तथा विदारिकाकी भी नैर्ऋत्य आदि कोणोंमें यथाविधि पूजा करनी चाहिये।

राजाओंको शत्रु आदिपर विजय प्राप्त करनेके लिये विविध मन्त्रोंसे इस महानवमीको देवीकी विशेष पूजा करनी चाहिये। ब्रह्माणी, माहेशी, कौमारी, वैष्णवी, वाराही आदि मातृकाओंको दूधसे स्नपन आदि कराकर देवीकी रथयात्रा निकालनी चाहिये, इससे उन्हें विजय तथा राज्य आदिकी प्राप्ति होती है।

आश्विनमासकी शुक्ला नवमीको एकभक्तव्रत करते हुए देवी और ब्राह्मणोंकी पूजा करके एक लाख बीजमन्त्रका जप करना चाहिये। इसे वीरनवमीव्रत कहा गया है। चैत्रशुक्ला नवमीको देवीकी पूजा दमनक नामक पुष्पसे करनी चाहिये। ऐसा करनेसे आयु, आरोग्य और सौभाग्यकी प्राप्ति होती है तथा व्रती शत्रुसे अपराजित रहता

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काण्ड ] श्रवणद्वादशीव्रत २३५


है। इसे दमनकनवमीव्रत कहा जाता है। इसी मासकी शुक्ला दशमीको एकभक्तव्रत करके वर्षके अन्तमें दस गौओंका दान तथा दिक्पालोंको स्वर्णमेखलाका निवेदन करनेवाला समस्त ब्रह्माण्डका स्वामी हो जाता है। इसका नाम दिग्दशमीव्रत है। एकादशी तिथिको ऋषिपूजा करनेका विधान है। इससे व्रतीका सब प्रकारसे उपकार होता है। वह इस लोकमें धनवान् और पुत्रवान् होकर रहता है और अन्तमें उसे ऋषिलोकमें प्रतिष्ठा प्राप्त होती है। चैत्रमासमें दमनक-पुष्प तथा इन्हीं पुष्पोंसे बनी मालाद्वारा मरीचि, अत्रि, अङ्गिरा, पुलस्त्य, पुलह, क्रतु, प्रचेता, वसिष्ठ, भृगु और नारद—इन ऋषियोंकी पूजा करनी चाहिये।

(अध्याय १३३—१३५)


श्रवणद्वादशीव्रत

ब्रह्माजीने कहा—अब मैं प्राणियोंको भोग और मोक्ष प्रदान करनेवाले श्रवणद्वादशीव्रतका वर्णन करूँगा। श्रवण नक्षत्रसे युक्त एकादशी और द्वादशी तिथि जब एक ही दिन पड़ती है तो उसे विजया तिथि कहा जाता है। इस दिन हरिकी पूजा आदि करनेसे प्राप्त पुण्यका फल अक्षय होता है। एकभुक्तव्रत करनेसे अथवा नक्तव्रत करनेसे या अयाचितव्रत करनेसे अथवा उपवास या भिक्षाचार करनेसे इस द्वादशीव्रतका पुण्य क्षीण नहीं होता है। व्रतीको इस द्वादशीके दिन कांस्यपात्र, मांस, शहद, लोभ, असत्यभाषण, व्यायाम, मैथुन, दिनमें सोना, अञ्जन, पत्थरपर पिसे हुए द्रव्य तथा मसूरका प्रयोग नहीं करना चाहिये।

यदि भाद्रपदमासमें शुक्लपक्षकी द्वादशी तिथि श्रवण नक्षत्रसे युक्त हो तो वह द्वादशी बहुत ही महत्त्वपूर्ण होती है। उस दिन उपवास करनेसे महान् फलोंकी प्राप्ति होती है। यदि यह तिथि बुधवारसे भी युक्त हो तो इस दिन नदियोंके संगममें स्नान करनेसे महनीय फल प्राप्त होते हैं। इस दिन रत्न एवं जलसे परिपूर्ण कुम्भमें दो श्वेतवस्त्रोंसे आच्छादित भगवान् वामनकी स्वर्णमयी प्रतिमाका छत्र और जूता-समन्वित पूजन करना चाहिये।

विद्वान्‌को चाहिये कि ‘ॐ नमो वासुदेवाय’ इस मन्त्रसे भगवान् वामनके सिरकी पूजा करके, ‘ॐ श्रीधराय नमः’ मन्त्रसे उनके मुखमण्डलकी, ‘ॐ कृष्णाय नमः’ मन्त्रसे उनके कण्ठकी, ‘ॐ श्रीपतये नमः’ मन्त्रसे उनके वक्षःस्थलकी, ‘ॐ सर्वास्त्रधारिणे नमः’ मन्त्रसे उनकी भुजाओंकी, ‘ॐ व्यापकाय नमः’ मन्त्रसे उनके कुक्षिप्रदेशकी, ‘ॐ केशवाय नमः’ मन्त्रसे उनके उदरकी, ‘ॐ त्रैलोक्यपतये नमः’ मन्त्रसे उनके मेढ्र (गुह्य)-भागकी तथा ‘ॐ सर्वभूते नमः’ मन्त्रसे उनकी जंघाओंकी और ‘ॐ सर्वात्मने नमः’ मन्त्रसे उनके पैरोंकी पूजा करनी चाहिये। उन्हें घृत और पायसका नैवेद्य समर्पित करे। कुम्भ और मोदक दे करके रात्रिमें जागरण करना चाहिये। तदनन्तर प्रातःकाल होनेपर स्नान और आचमन करे और उनकी पुनः पूजा करके पुष्पाञ्जलिसहित इस प्रकार प्रार्थना करे—

नमो नमस्ते गोविन्द बुधश्रवणसंज्ञक॥
अघौघसंक्षयं कृत्वा सर्वसौख्यप्रदो भव।
(१३६। ११-१२)

हे गोविन्द! ज्ञानस्वरूप! श्रवण नामवाले देव! आपको बारम्बार नमस्कार है। आप मेरे समस्त पापसमूहोंका विनाश करके मेरे लिये सभी सुखोंको प्रदान करनेवाले होवें।

प्रार्थनाके बाद ‘प्रीयतां देवदेवेश’—ऐसा कहते हुए ब्राह्मणोंको कलशोंका दान दे। इस व्रत-पूजाको नदीतट अथवा अन्य किसी पवित्र स्थानपर करनेसे सभी इच्छाएँ पूर्ण हो जाती हैं। (अध्याय १३६)

११९- भविष्यके राजवंशका वर्णन

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२३६संक्षिप्त गरुडपुराण[ आचार-

तिथिव्रत, वारव्रत एवं नक्षत्रादिव्रत-निरूपण और प्रतिपदादि तिथियोंमें पूजनीय देवता

**ब्रह्माजीने कहा—**कामदेवत्रयोदशी तिथिको श्वेतकमल आदिके पुष्पोंसे रति और प्रीतिसे युक्त मणिविभूषित शोकरहित कामदेवकी पूजा करनी चाहिये, इस व्रतका नाम मदनत्रयोदशी है। जो वर्षपर्यन्त प्रत्येक मासके शुक्ल और कृष्णपक्षकी चतुर्दशी एवं अष्टमी तिथिमें उपवास करके शिवपूजन करता है, वह मुक्ति प्राप्त करता है। इसे शिवचतुर्दशी तथा शिवाष्टमीव्रत कहा गया है। तीन रात्रियोंतक उपवास रखकर व्रतीको कार्तिकमासमें एक शुभ भवनका दान देना चाहिये। ऐसा करनेसे सूर्यलोककी प्राप्ति होती है, यह कल्याणकारी धामव्रत है। अमावास्या तिथिमें पितरोंको दिया गया जल आदि अक्षय होता है। नक्तव्रत करके वारोंके नामसे सूर्यादिकी पूजा करके व्रती सभी फलोंको प्राप्त करनेका अधिकारी हो जाता है। ये वारव्रत कहलाते हैं।

हे ब्रह्मर्षि ! प्रत्येक मासके नामकरणके प्रयोजक बारहोंने नक्षत्रसे युक्त उन-उन महीनोंकी पूर्णिमा तिथि हो तो उन नक्षत्रोंके नामसे मनुष्यको सम्यक्-रूपसे भगवान् अच्युतकी पूजा करनी चाहिये। इस व्रतको कार्तिकमाससे प्रारम्भ करना चाहिये। कृत्तिका नक्षत्रयुक्त कार्तिकमासमें केशवकी पूजा करनी चाहिये। क्रमशः चार महीनों (कार्तिक, मार्गशीर्ष, पौष तथा माघ)-में घृतका हवनकर तिल-चावल (कृसरान्न)-की खिचड़ीका भोग निवेदित करना चाहिये। आषाढ आदि चार महीनोंमें पायस निवेदन करके ब्राह्मणोंको पायसका ही भोजन निवेदित करना चाहिये। पञ्चगव्य, जलस्नान और नैवेद्यसे पूजन करना चाहिये। इस प्रकार संवत्सरके अन्तमें विशेषरूपसे भगवान्‌की पूजा करके निम्नलिखित मन्त्रोंसे प्रार्थना करनी चाहिये—

नमो नमस्तेऽच्युत संक्षयोऽस्तु
पापस्य वृद्धिं समुपैतु पुण्यम्।
ऐश्वर्यवित्तादिसदाऽक्षयं मे
तथास्तु मे सन्ततिरक्षयैव॥
यथाच्युत त्वं परतः परस्मात्
स ब्रह्मभूतः परतः परस्मात्।
तथाच्युतं मे कुरु वाञ्छितं सदा
मया कृतं पापहराप्रमेय॥
अच्युतानन्त गोविन्द प्रसीद यदभीप्सितम्।
तदक्षयममेयात्मन् कुरुष्व पुरुषोत्तम॥
(१३७।१०-१२)

हे अच्युत ! आपको बार-बार प्रणाम है। हे देव ! मेरे पापोंका विनाश हो और पुण्यकी वृद्धि हो। मेरे ऐश्वर्य और धनादि सदैव अक्षय रहें। मेरी सन्तान-परम्परा अक्षुण्ण हो। हे अच्युत ! जिस प्रकार आप परात्पर ब्रह्म हैं, वैसे ही मेरे मनोऽभिलषित फलको अविनाशी बना दें। हे अप्रमेय ! सदैव मेरे द्वारा किये जानेवाले पापका विनाश करते रहें। हे अच्युत ! हे अनन्त ! हे गोविन्द ! आप मुझपर प्रसन्न हों। हे अमेयात्मन् ! हे पुरुषोत्तम ! जो मेरे लिये अभीष्ट है, आप उसको भी अक्षय बना दें।

यह मास-नक्षत्रव्रत सात वर्षतक करना चाहिये। ऐसा करनेसे मनुष्यको आयु, लक्ष्मी तथा सद्गति प्राप्त होती है। यदि स्वच्छ हृदयसे उपवाससहित एक वर्षपर्यन्त यथाक्रम एकादशी, अष्टमी, चतुर्दशी और सप्तमी तिथियोंमें विष्णु, दुर्गा, शिव और सूर्यकी पूजा हो तो प्राणीको उन देवोंके लोक तो प्राप्त होते ही हैं, सभी निर्मल अभिलाषाएँ भी पूर्ण हो जाती हैं। व्रतकालमें एकभुक्त, नक्त अथवा

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काण्ड ] सूर्यवंशवर्णन २३७


अयाचित एवं उपवास करते हुए शाकादिके द्वारा इन सभी तिथियोंमें सभी देवताओंकी पूजा करनेसे भोग और मोक्ष दोनोंकी प्राप्ति हो जाती है। प्रतिपदा तिथिमें कुबेर, अग्नि, नासत्य और दस्र नामक देव पूज्य हैं। द्वितीया तिथिमें लक्ष्मी तथा यमराज, पञ्चमीमें श्रीसमन्वित पार्वती और नागगणोंकी पूजा करनी चाहिये। षष्ठी तिथिमें कार्तिकेय तथा सप्तमीमें अर्थदाता सूर्यदेवकी पूजा विहित है। अष्टमी तिथिमें दुर्गा, नवमीमें मातृकाओं एवं तक्षककी पूजाका विधान है। दशमीमें इन्द्र और कुबेर तथा एकादशीमें सप्तर्षियोंकी पूजा करनी चाहिये। द्वादशी तिथिमें हरि, त्रयोदशीमें कामदेव, चतुर्दशीमें महेश्वर शिव, पूर्णिमामें ब्रह्मा तथा अमावास्यामें पितरोंकी पूजा करनी चाहिये। (अध्याय १३७)


सूर्यवंशवर्णन

श्रीहरिने कहा—हे रुद्र! अब मैं राजाओंके वंश और उनके चरितका वर्णन करता हूँ। सर्वप्रथम सूर्यवंशका वर्णन सुनें।

भगवान् विष्णुके नाभिकमलसे ब्रह्मा उत्पन्न हुए। ब्रह्माके अङ्गुष्ठभागसे दक्षका जन्म हुआ। दक्षसे उनकी पुत्री अदितिका प्रादुर्भाव हुआ, जो देवमाता कहलाती हैं। उन्हीं अदितिसे विवस्वान् (सूर्य), विवस्वान्‌से वैवस्वत मनु हुए और उन मनुसे इक्ष्वाकु, शर्याति, नृग, धृष्ट, पृषध्र, नरिष्यन्त, नभग, दिष्ट तथा शशक (करूष) नामक नौ पुत्रोंकी उत्पत्ति हुई। हे रुद्र! मनुकी इला नामकी कन्या थी और सुद्युम्न नामक पुत्र था। इलाके बुधसे राजा पुरूरवा उत्पन्न हुए। सुद्युम्नसे उत्कल, विनत तथा गय नामक तीन पुत्रोंका जन्म हुआ।

गोवध करनेके कारण मनुका पुत्र पृषध्र शूद्र हो गया था। करूष (शशक)-से क्षत्रिय लोगोंकी उत्पत्ति हुई, जो कारूष नामसे विख्यात हुए। मनुके पुत्र दिष्टसे जो नाभाग नामका पुत्र हुआ वह वैश्य हो गया था। उससे एक भलन्दन नामक पुत्र हुआ। भलन्दनसे वत्सप्रीति नामक पुत्रकी उत्पत्ति हुई। वत्सप्रीतिसे पांशु और खनित्र—दो पुत्रोंका जन्म हुआ। खनित्रसे भूप, भूपसे क्षुप, क्षुपसे विंश और विंशसे विविंशकने जन्म लिया।

विविंशकसे खनिनेत्र और खनिनेत्रसे विभूति नामक पुत्रका जन्म हुआ। विभूतिसे करन्धम नामक पुत्र हुआ। करन्धमसे अविक्षित, अविक्षितसे मरुत् और मरुत्‌से नरिष्यन्तकी उत्पत्ति मानी जाती है। नरिष्यन्तसे तम, तमसे राजवर्धन, राजवर्धनसे सुधृति, सुधृतिसे नर, नरसे केवल तथा केवलसे बन्धुमान् हुआ।

बन्धुमान्‌के वेगवान्, वेगवान्‌के बुध और बुधके तृणबिन्दु नामक पुत्र हुआ। तृणबिन्दुने अलम्बुषा नामकी अप्सरासे इलविला नामकी कन्या तथा विशाल नामक पुत्र उत्पन्न किया। विशालके हेमचन्द्र नामक पुत्र हुआ। हेमचन्द्रसे चन्द्रक, चन्द्रकसे धूम्राश्व, धूम्राश्वसे सृञ्जय, सृञ्जयसे सहदेवकी उत्पत्ति हुई। सहदेवके कृशाश्व नामक पुत्र हुआ। कृशाश्वसे सोमदत्त और सोमदत्तसे जनमेजय हुआ। जनमेजयसे सुमन्ति नामक पुत्रकी उत्पत्ति हुई। इन सभी (राजाओं)-को वैशालक कहा गया है।

वैवस्वत मनुके पुत्र शर्यातिके सुकन्या नामकी पुत्री हुई, जो च्यवन ऋषिकी भार्या बनी। शर्यातिके अनन्त नामक पुत्र भी था। उससे रेवत नामका पुत्र हुआ। रेवतके भी रैवत नामक पुत्र हुआ। उससे रेवती नामकी कन्या हुई।

वैवस्वत मनुके पुत्र धृष्टके धार्ष्ट हुआ, जो वैष्णव हो गया था। उन्हीं मनुके पुत्र नभगके

१२१- रामचरितवर्णन (रामायणकी कथा)

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२३८ संक्षिप्त गरुडपुराण [ आचार-

नेदिष्ठ नामक एक पुत्रकी उत्पत्ति हुई। उससे
अम्बरीष हुआ। अम्बरीषके विरूप, विरूपके पृषदश्व
और उसके रथीनर हुआ, जो वासुदेवका भक्त था।
मनुपुत्र इक्ष्वाकुके विकुक्षि, निमि और दण्डक
तीन पुत्र हुए। विकुक्षि यज्ञीय शशक (खरगोश)-
का भक्षण करनेके कारण शशाद नामसे विख्यात
हुआ। शशादसे पुरञ्जय और ककुत्स्थ नामक दो
पुत्र हुए। इसी ककुत्स्थसे अनेनस् (वेण) तथा
अनेनस्‌से पृथु उत्पन्न हुआ। पृथुके विश्वरात नामक
पुत्र हुआ। विश्वरातसे आर्द्रकी उत्पत्ति हुई। आर्द्रसे
युवनाश्व, युवनाश्वके श्रीवत्स, श्रीवत्सके बृहदश्व,
बृहदश्वके कुवलाश्व और कुवलाश्वके दृढाश्व हुआ,
जिसकी प्रसिद्धि धुन्धुमारके नामसे हुई थी।
दृढाश्वके चन्द्राश्व, कपिलाश्व और हर्यश्व नामक
तीन पुत्र थे। हर्यश्वके निकुम्भ, निकुम्भके हिताश्व,
हिताश्वके पूजाश्व और उसके युवनाश्व हुआ।
युवनाश्वके मान्धाता हुए। मान्धाता एवं उनकी
पत्नी बिन्दुमतीसे मुचुकुन्द, अम्बरीष तथा पुरुकुत्स
नामक तीन पुत्रोंका जन्म हुआ। उनकी पचास
कन्याएँ भी थीं। जिनका विवाह सौभरि मुनिके
साथ हुआ था।
अम्बरीषके युवनाश्व तथा युवनाश्वके हरित
हुआ। पुरुकुत्सके नर्मदा नामक पत्नीसे त्रसदस्यु
नामक पुत्रकी उत्पत्ति हुई। उससे अनरण्य, अनरण्यसे
हर्यश्व, हर्यश्वसे वसुमना हुआ। उसीका पुत्र त्रिधन्वा
था। उसके त्रय्यारुण नामक पुत्र हुआ। त्रय्यारुणके
सत्यरत हुआ, जो त्रिशंकु नामसे प्रसिद्ध है।
हरिश्चन्द्र इसीसे उत्पन्न हुए थे। हरिश्चन्द्रके
रोहिताश्व और रोहिताश्वके हारीत हुआ। हारीतके
चंचु, चंचुके विजय, विजयके रुरुक, रुरुकके
वृक, वृकके राजा बाहु और बाहुके पुत्र राजा
सगर माने जाते हैं।
हे शिव! सगरसे सुमति नामक पत्नीके साठ
हजार पुत्र हुए। उनकी दूसरी पत्नी केशिनीसे
असमंजस नामक एक पुत्र हुआ। उस असमंजससे
अंशुमान् तथा अंशुमान्‌से दिलीप नामक एक
विद्वान् पुत्रने जन्म लिया। दिलीपसे भगीरथ हुए,
जिनके द्वारा पृथिवीपर गङ्गा लायी गयी हैं।
भगीरथका पुत्र श्रुत था। श्रुतसे नाभाग हुआ।
नाभागसे अम्बरीष, अम्बरीषसे सिन्धुद्वीप, सिन्धुद्वीपसे
अयुतायु हुआ। अयुतायुका पुत्र ऋतुपर्ण था, ऋतुपर्णसे
सर्वकाम और सर्वकामसे सुदास, सुदाससे सौदास
हुआ। जिसका नाम मित्रसह भी माना जाता है।
कल्माषपाद उसीका पुत्र है, जो दमयन्तीके गर्भसे
उत्पन्न हुआ था। कल्माषपादके अश्मक, अश्मकके
मूलक, मूलकके दशरथ हुआ। दशरथके
ऐलविल, ऐलविलके विश्वसह, विश्वसहके खट्वाङ्ग,
खट्वाङ्गके दीर्घबाहु, दीर्घबाहुके अज तथा अजके
दशरथ हुए। इनके महापराक्रमी चार पुत्र हुए, जो
राम, भरत, लक्ष्मण और शत्रुघ्न नामसे प्रसिद्ध हैं।
रामसे कुश और लव, भरतसे तार्क्ष तथा
पुष्कर, लक्ष्मणसे चित्राङ्गद एवं चन्द्रकेतु और
शत्रुघ्नसे सुबाहु तथा शूरसेन नामक पुत्र हुए।
कुशके अतिथि, अतिथिके निषध नामक पुत्र
हुआ। निषधके नल तथा नलके नभस नामका पुत्र
माना गया है। नभसके पुण्डरीक और पुण्डरीकसे
क्षेमधन्वा नामक पुत्रने जन्म लिया। उसका पुत्र
देवानीक था, उससे अहीनक, अहीनकसे रुरु तथा
रुरुसे पारियात्र नामक पुत्रका जन्म हुआ। पारियात्रसे
दलकी उत्पत्ति हुई और दलसे छल, छलसे उक्थ,
उक्थसे वज्रनाभ और वज्रनाभसे गण, गणसे उषिताश्व,
उषिताश्वसे विश्वसहकी उत्पत्ति हुई। हिरण्यनाभ
उसीका पुत्र था। उसका पुत्र पुष्प्य माना गया है।
पुष्प्यसे ध्रुवसन्धि, ध्रुवसन्धिसे सुदर्शन, सुदर्शनसे
अग्निवर्ण, अग्निवर्णसे पद्मवर्ण हुआ। पद्मवर्णसे
शीघ्र और शीघ्रसे मरु हुए। मरुसे सुश्रुत और

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काण्ड ] चन्द्रवंशवर्णन २३९


उससे उदावसु नामका पुत्र उत्पन्न हुआ। उदावसुसे नन्दिवर्धन, नन्दिवर्धनसे सुकेतु, सुकेतुसे देवरातकी उत्पत्ति हुई। देवरातका पुत्र बृहदुक्थ था। बृहदुक्थके महावीर्य, महावीर्यके सुधृति, सुधृतिके धृष्टकेतु, धृष्टकेतुके हर्यश्व, हर्यश्वके मरु, मरुके प्रतीन्धक हुआ। प्रतीन्धकसे कृतिरथ और कृतिरथके देवमीढ नामक पुत्र हुआ। देवमीढसे विबुध, विबुधसे महाधृति, महाधृतिसे कीर्तिरात तथा कीर्तिरातसे महारोमा नामक पुत्र हुआ।

महारोमाके स्वर्णरोमा हुए। स्वर्णरोमाके ह्रस्वरोमा नामका पुत्र था। ह्रस्वरोमाके सीरध्वज हुआ। उसके सीता नामकी एक पुत्री हुई। सीरध्वजके कुशध्वज नामका एक भाई भी था। सीताके अतिरिक्त सीरध्वजके भानुमान् नामका एक पुत्र भी हुआ। उस भानुमान्‌से शतद्युम्न, शतद्युम्नसे शुचि नामक पुत्रकी उत्पत्ति हुई। शुचिके ऊर्ज नामक पुत्र था। उस ऊर्जसे सनद्वाज उत्पन्न हुआ। सनद्वाजसे कुलिने जन्म लिया। उस कुलिस अनञ्जन नामक पुत्र हुआ। अनञ्जनसे कुलजित्‌की उत्पत्ति हुई। उसके भी आधिनमिक नामका पुत्र था। उसका पुत्र श्रुतायु हुआ और उस श्रुतायुसे सुपार्श्व नामक पुत्रने जन्म ग्रहण किया। सुपार्श्वसे सृञ्जय, सृञ्जयसे क्षेमारि, क्षेमारिसे अनेना और उस अनेनाका पुत्र रामरथ माना गया है।

रामरथका पुत्र सत्यरथ, सत्यरथका पुत्र उपगुरु, उपगुरुका उपगुप्त तथा उपगुप्तका पुत्र स्वागत था। स्वागतसे स्ववरकी उत्पत्ति हुई। सुवर्चा उसीका पुत्र था। सुवर्चासे सुपार्श्व और सुपार्श्वसे सुश्रुत, सुश्रुतसे जयकी उत्पत्ति हुई। जयसे विजय, विजयसे ऋत, ऋतसे सुनय, सुनयसे वीतहव्य, वीतहव्यसे धृतिकी उत्पत्ति मानी गयी है। धृतिके बहुलाश्व और बहुलाश्वके कृति नामक पुत्र था। उस कृतिके जनक हुए। जनकके दो वंश कहे गये हैं, जिन्होंने योगमार्गका अनुसरण किया था। (अध्याय १३८)


चन्द्रवंशवर्णन

**श्रीहरिने कहा—**हे रुद्र! सूर्यके वंशका वर्णन तो मैंने कर दिया। अब मुझसे चन्द्रवंशका वर्णन आप सुनें।

नारायण (विष्णु)-से ब्रह्मा प्रादुर्भूत हुए। ब्रह्मासे अत्रिकी उत्पत्ति हुई। अत्रिसे सोम हुए। उनकी पत्नी तारा थी, जो पहले बृहस्पतिकी भी प्रियतमा थी। ताराने चन्द्र (सोम)-से बुधको उत्पन्न किया। उसी बुधका पुत्र पुरूरवा हुआ। बुधपुत्र पुरूरवासे उर्वशीके छः पुत्र हुए, जिनके नाम श्रुतात्मक, विश्वावसु, शतायु, आयु, धीमान् और अमावसु थे।

अमावसुके भीम, भीमके काञ्चन, काञ्चनसे सुहोत्र और सुहोत्रके जह्नु हुए। जह्नुसे सुमन्तु, सुमन्तुसे उपजापक हुआ। उसका पुत्र बलाकाश्व था। बलाकाश्वसे कुश, कुशसे कुशाश्व, कुशनाभ, अमूर्तरय और वसु नामक चार पुत्र हुए। कुशाश्वसे गाधिका जन्म हुआ। विश्वामित्र उसीके पुत्र थे। गाधिकी सत्यवती नामकी एक कन्या थी। उसको उन्होंने ब्राह्मण ऋचीकको सौंप दिया। ऋचीकके जमदग्नि नामक पुत्र हुआ। जमदग्निसे परशुराम हुए। विश्वामित्रसे देवरात तथा मधुच्छन्दा आदि अनेक पुत्रोंका जन्म हुआ।

बुधके पुत्र आयुसे नहुषकी उत्पत्ति हुई। नहुषके अनेना, राजि, रम्भक तथा क्षत्रवृद्ध नामक चार पुत्र हुए। क्षत्रवृद्धका सुहोत्र नामक पुत्र राजा हुआ। सुहोत्रके काश्य, काश और गृत्समद नामक तीन पुत्र हुए। गृत्समदसे शौनक तथा काश्यसे दीर्घतमा हुआ। दीर्घतमासे वैद्य धन्वन्तरिका जन्म हुआ। केतुमान् उन्हींका पुत्र था। केतुमान्‌से भीमरथ,

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२४० संक्षिप्त गरुडपुराण [ आचार-

भीमरथसे दिवोदास, दिवोदाससे प्रतर्दन हुआ, जो शत्रुजित् नामसे विख्यात हुआ।

ऋतध्वज उसी शत्रुजित्‌का पुत्र था। ऋतध्वजसे अलर्क, अलर्कसे सन्नति, सन्नतिसे सुनीत, सुनीतसे सत्यकेतु, सत्यकेतुसे विभु नामक पुत्र हुआ। विभुसे सुविभु, सुविभुसे सुकुमार, सुकुमारसे धृष्टकेतुकी उत्पत्ति हुई। उस धृष्टकेतुका पुत्र वीतिहोत्र था। वीतिहोत्रके भर्ग और भर्गके भूमिक नामका पुत्र हुआ। ये सभी विष्णुधर्मपरायण राजा थे।

नहुषपुत्र राजि या रजिके पाँच सौ पुत्र थे, जिनका संहार इन्द्रने किया था। नहुषके पुत्र क्षत्रवृद्धसे प्रतिक्षत्र हुए। उसका पुत्र संजय था। संजयके भी विजय हुआ। विजयका पुत्र कृत था। कृतके वृषधन, वृषधनसे सहदेव, सहदेवसे अदीन और अदीनके जयत्सेन हुआ। जयत्सेनसे संकृति और संकृतिसे क्षत्रधर्माकी उत्पत्ति हुई।

नहुषके क्रमशः यति, ययाति, संयाति, अयाति तथा विकृति नामक अन्य पाँच पुत्र थे। ययातिसे देवयानीने यदु और तुर्वसु नामक दो पुत्रोंको जन्म दिया। राजा वृषपर्वाकी पुत्री शर्मिष्ठाने ययातिसे द्रुह्यु, अनु और पूरु नामक तीन पुत्रोंको उत्पन्न किया।

यदुके सहस्त्रजित्, क्रोष्टुमना और रघु नामक तीन पुत्र थे। सहस्त्रजित्‌से शतजित्, शतजित्‌से हय तथा हैहय नामक दो पुत्र हुए। हयसे अनरण्य तथा हैहयसे धर्म हुआ। धर्मका पुत्र धर्मनेत्र हुआ। उस धर्मनेत्रका पुत्र कुन्ति था। कुन्तिसे साहंजि हुआ। साहंजिसे महिष्मान्, महिष्मान्‌से भद्रश्रेण्य, भद्रश्रेण्यसे दुर्दमकी उत्पत्ति हुई। दुर्दमसे धनक, कृतवीर्य, जानकि, कृताग्नि, कृतवर्मा और कृतौजा नामक छह बलवान् पुत्र हुए। कृतवीर्यसे अर्जुन तथा अर्जुनसे शूरसेन नामक पुत्र हुआ। उस पुत्रके अतिरिक्त कृतवीर्यके जयध्वज, मधु, शूर और वृषण नामक चार पुत्र हुए। शूरसेनसहित ये पाँचों पुत्र बड़े ही सुव्रती थे। जयध्वजसे तालजंघ, तालजंघसे भरत हुआ। कृतवीर्य वृषणका पुत्र मधु था। मधुसे वृष्णि हुआ, जिससे वृष्णिवंशियोंकी उत्पत्ति हुई।

क्रोष्टुके विजज्ञिवान् हुआ। उस विजज्ञिवान्‌का पुत्र आहि था। आहिसे उशंकु हुआ। उसका पुत्र चित्ररथ था। चित्ररथसे शशबिन्दु हुआ, जिसके एक लाख पत्नियाँ तथा पृथुकीर्ति, पृथुजय, पृथुदान, पृथुश्रवा आदि श्रेष्ठ दस लाख पुत्र थे। पृथुश्रवासे तम, तमसे उशना हुआ। उसका पुत्र शितगु था। तत्पश्चात् उसके श्रीरुक्मकवच हुआ। श्रीरुक्मकवचसे रुक्म, पृथुरुक्म, ज्यामघ, पालित और हरि—ये चार पुत्र हुए। ज्यामघसे विदर्भका जन्म हुआ।

विदर्भकी शैब्या नामकी एक पत्नी थी, उससे विदर्भने क्रथ, कौशिक तथा रोमपाद नामक तीन पुत्रोंको जन्म दिया। रोमपादसे बभ्रु और बभ्रुसे धृति हुआ।

कौशिकके ऋचि नामक पुत्र था। उसीसे चेदि नामका राजा हुआ। इसका पुत्र कुन्ति था। कुन्तिसे वृष्णि नामक पुत्र हुआ। वृष्णिसे निवृत्ति, निवृत्तिसे दशार्ह, दशार्हसे व्योम और व्योमसे जीमूत नामका पुत्र हुआ। जीमूतसे विकृतिका जन्म हुआ। उस विकृतिका पुत्र भीमरथ था। भीमरथसे मधुरथ और मधुरथसे शकुनि उत्पन्न हुआ। शकुनिका पुत्र करम्भि था। उस करम्भिका पुत्र देवमान् माना जाता है। देवमान् या देवनतसे देवक्षत्र तथा देवक्षत्रसे मधु नामक पुत्र हुआ। मधुसे कुरुवंश, कुरुवंशसे अनु, अनुसे पुरुहोत्र, पुरुहोत्रसे अंशु, अंशुसे सत्त्वश्रुत और उससे सात्वत नामका राजा हुआ।

सात्वतके भजिन्, भजमान्, अन्धक, महाभोज, वृष्णि, दिव्यावन्य तथा देवावृध नामक सात पुत्र हुए। भजमान्‌से निमि, वृष्णि, अयुताजित्, शतजित्, सहस्त्राजित्, बभ्रु, देव और बृहस्पति नामके पुत्र हुए।

१२२- हरिवंशवर्णन (श्रीकृष्णकथा)

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काण्ड ] चन्द्रवंशवर्णन २४१


महाभोजसे भोज और उस वृष्णिसे सुमित्र नामक पुत्र हुआ। सुमित्रसे स्वधाजित्, अनमित्र तथा अशिनि हुए। अनमित्रका पुत्र निघ्न और निघ्नका पुत्र सत्राजित् हुआ। अनमित्रसे प्रसेन तथा शिबि नामक दो अन्य पुत्र भी हुए थे। शिबिसे सत्यक, सत्यकसे सात्यकि हुआ। सात्यकिके संजय और उस संजयके कुलि हुए। उस कुलिका पुत्र युगन्धर था। इन सभीको शिबिवंशी शैबेय कहा गया है।

अनमित्रके ही वंशमें वृष्णि, श्वफल्क तथा चित्रक नामक अन्य तीन पुत्र हुए थे। श्वफल्कने गान्दिनीके गर्भसे अक्रूरको जन्म दिया, जो परम वैष्णव थे। अक्रूरसे उपमद्गु हुआ, जिसका पुत्र देवद्योत था। उपमद्गुके अतिरिक्त अक्रूरके देववान् और उपदेव नामक दो पुत्र माने गये हैं।

अनमित्र-पुत्र चित्रकके पृथु तथा विपृथु नामक दो पुत्र थे। सात्वतनन्दन अन्धकका पुत्र शुचि माना जाता है। भजमानके कुकुर और कम्बलवर्हिष दो पुत्र हुए। कुकुरसे धृष्टका जन्म हुआ। उसका पुत्र कापोतरोमक था। उस कापोतरोमकका विलोमा और विलोमासे तुम्बुरुका जन्म हुआ। तुम्बुरुसे दुन्दुभि तथा दुन्दुभिका पुनर्वसु माना जाता है। उस पुनर्वसुका पुत्र आहुक था। आहुकके एक पुत्री हुई, जिसका नाम आहुकी था। आहुकके दो पुत्र हुए जिनका नाम देवक और उग्रसेन था। देवकसे देवकीका जन्म हुआ। इसके अतिरिक्त देवकके वृकदेवा, उपदेवा, सहदेवा, सुरक्षिता, श्रीदेवी और शान्तिदेवी नामकी छः कन्याएँ और भी थीं। इन सातों कन्याओंका विवाह वसुदेवके साथ हुआ था। सहदेवाके देववान् और उपदेव नामक दो पुत्र थे।

आहुकपुत्र उग्रसेनके कंस, सुनामा तथा वट आदि नामके अनेक पुत्र हुए। अन्धकपुत्र भजमान्‌से विदूरथ नामका पुत्र हुआ था। विदूरथसे शूर और शूरके शमी नामका पुत्र हुआ। शमीसे प्रतिक्षत्र, प्रतिक्षत्रसे स्वयंभोज, स्वयंभोजसे हृदिक तथा हृदिकसे कृतवर्मा हुए। शूरसे ही देव, शतधनु और देवामीढुषका भी जन्म हुआ था। मारिषाके गर्भसे शूरके वसुदेव आदि अन्य दस पुत्र थे। शूरसे पृथा, श्रुतदेवी, श्रुतकीर्ति, श्रुतश्रवा और राजाधिदेव (राजाधिदेवी) नामवाली पाँच पुत्रियाँ भी थीं। शूरने पुत्री पृथाको कुन्तिराजको दे दिया था। कुन्तिराजने शूरसे प्राप्त उस कन्याका विवाह पाण्डुसे कर दिया। पाण्डुकी उस पृथा नामकी पत्नीसे धर्म, वायु और इन्द्रादि देवोंके अंशसे युधिष्ठिर, भीम, अर्जुन तथा पाण्डुकी पत्नी माद्रीमें अश्विनीकुमारके अंशसे नकुल तथा सहदेव नामक पुत्र हुए। विवाहके पूर्व ही पृथासे कर्णका जन्म हुआ था।

शूरकी पुत्री श्रुतदेवीके गर्भसे दन्तवक्त्र हुआ, जो अत्यन्त वीर योद्धा था। श्रुतकीर्ति कैकयराजको ब्याही गयी थी। कैकयराजसे उसके सन्तर्दन आदि पाँच पुत्र हुए। राजाधिदेवीके गर्भसे दो पुत्र उत्पन्न हुए थे, जिनका नाम विन्दु और अनुविन्दु था। चेदिराज दमघोषको श्रुतश्रवा ब्याही थी। उससे शिशुपालका जन्म हुआ।

वसुदेवके पौरव, रोहिणी, मदिरा, देवकी, भद्रा आदि जो अन्य स्त्रियाँ हैं, उनमें रोहिणीके गर्भसे बलभद्र हुए। बलभद्रकी पत्नी रेवतीके गर्भसे सारण और शठ आदिका जन्म हुआ। देवकीके गर्भसे पहले छः पुत्र उत्पन्न हुए। जिनके नाम कीर्तिमान्, सुषेण, उदार्य, भद्रसेन, ऋजुदास और भद्रदेव हैं। कंसने इन सभी पुत्रोंको मार डाला था। देवकीके सातवें पुत्रके रूपमें बलराम और आठवें कृष्ण थे। कृष्णकी सोलह हजार रानियाँ थीं। रुक्मिणी, सत्यभामा, लक्ष्मणा, चारुहासिनी तथा जाम्बवती आदि आठ प्रधान पत्नियाँ थीं। इनसे उनके बहुत-से पुत्र हुए।

१२३- महाभारतकी कथा एवं बुद्ध आदि अवतारोंकी कथाका वर्णन

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२४२ || संक्षिप्त गरुड़पुराण || [ आचार-


प्रद्युम्न, चारुदेष्ण तथा साम्ब कृष्णके प्रधान पुत्र हैं। प्रद्युम्नकी पत्नी ककुद्मिनीके गर्भसे महापराक्रमशाली अनिरुद्धका जन्म हुआ। अनिरुद्धके सुभद्रा नामक पत्नीके गर्भसे वज्र नामके राजा हुए। उनका पुत्र प्रतिबाहु था। प्रतिबाहुका पुत्र चारु हुआ।

ययाति-पुत्र तुर्वसुके वंशमें वह्नि नामक पुत्रका जन्म हुआ। वह्निसे भर्ग हुआ। भर्गसे भानु, भानुसे करन्धम तथा करन्धमसे मरुत्की उत्पत्ति हुई।

हे रुद्र! अब मुझसे द्रुह्युवंशका वर्णन सुनें—

ययातिपुत्र द्रुह्युका पुत्र सेतु, सेतुका पुत्र आरद्ध था। आरद्धके गान्धार, गान्धारके धर्म, धर्मके घृत, घृतके दुर्गम, दुर्गमके प्रचेता हुए।

अब आप अनुवंशको सुनें—अनुका पुत्र सभानर हुआ। सभानरका कालञ्जय, कालञ्जयका सृञ्जय, सृञ्जयका पुरञ्जय, पुरञ्जयका जनमेजय, जनमेजयका पुत्र महाशाल था। इसी महात्मा महाशालका पुत्र उशीनर माना गया है। उशीनरसे राजा शिवि उत्पन्न हुए। शिविके पुत्र वृषदर्भ हुए। वृषदर्भसे महामनोज और महामनोजसे तितिक्षु और तितिक्षुसे रुषद्रथका जन्म हुआ। रुषद्रथसे हेम तथा हेमसे सुतप हुए। सुतपसे बलि और बलिसे अंग, बंग, कलिंग, आन्ध्र तथा पौण्ड्र नामके पुत्र हुए। अंगसे अनपान, अनपानसे दिविरथ, दिविरथसे धर्मरथ हुआ। धर्मरथसे रोमपाद तथा रोमपादसे चतुरंग, चतुरंगसे पृथुलाक्ष, पृथुलाक्षसे चम्प, चम्पसे हर्यङ्ग, हर्यङ्गसे भद्ररथ नामक पुत्र उत्पन्न हुआ।

भद्ररथका पुत्र बृहत्कर्मा था। उसके बृहद्भानु नामक पुत्र हुआ। बृहद्भानुका पुत्र बृहन्मना और बृहन्मनाका पुत्र जयद्रथ था। जयद्रथसे विजय और विजयसे धृति हुआ। धृतिका पुत्र धृतव्रत था। धृतव्रतसे सत्यधर्मा हुआ। सत्यधर्माका पुत्र अधिरथ था। अधिरथके कर्ण और कर्णके वृषसेन नामक पुत्र हुआ।

हरिने पुनः कहा—हे रुद्र! इसके बाद आप पुरुवंशका वर्णन सुनें।

पुरुका पुत्र जनमेजय, जनमेजयका पुत्र नमस्यु था। नमस्युका अभय तथा अभयका सुद्यु हुआ। सुद्युके बहुगति नामक पुत्रका जन्म हुआ। उसका पुत्र संजाति था। संजातिके वत्सजाति और उसके रौद्राश्व हुआ। रौद्राश्वके ऋतेयु, स्थण्डिलेयु, कक्षेयु, कृतेयु, जलेयु और सन्ततेयु नामक श्रेष्ठ पुत्र हुए।

ऋतेयुके रतिनार नामका पुत्र हुआ। उसका पुत्र प्रतिरथ था। प्रतिरथका मेधातिथि, मेधातिथिका ऐनिल नामक पुत्र माना जाता है। ऐनिलका पुत्र दुष्यन्त था। शकुन्तलाके गर्भसे दुष्यन्तके भरत नामक पुत्र हुआ। भरतसे वितथ, वितथसे मन्यु, मन्युसे नरका जन्म माना गया है। नरके संकृति और संकृतिके गर्ग हुआ। गर्गसे अमन्यु, अमन्युसे शिनि नामक पुत्रकी उत्पत्ति हुई।

मन्युपुत्र महावीरसे उरुक्षय, उरुक्षयसे त्रय्यारुणि, त्रय्यारुणिसे व्यूहक्षत्र, व्यूहक्षत्रसे सुहोत्र, सुहोत्रसे हस्ती, अजमीढ तथा द्विमीढ नामक तीन पुत्र हुए। हस्तीका पुत्र पुरुमीढ और अजमीढका कण्व था। कण्वके मेधातिथि हुए। इन्हींसे काण्वायन नामक गोत्र ब्राह्मणोंके हुए और वे काण्वायन कहलाये।

अजमीढसे बृहदिषु नामक एक अन्य पुत्र भी हुआ था। उस पुत्रके बृहद्धनु हुआ। बृहद्धनुके बृहत्कर्मा तथा बृहत्कर्माके जयद्रथ नामका पुत्र था। जयद्रथसे विश्वजित् और विश्वजित्से सेनजित्, सेनजित्से रुचिराश्व, रुचिराश्वसे पृथुसेन, पृथुसेनसे पार तथा पारसे द्वीप और नृप हुए। नृपका पुत्र सुमर हुआ। पृथुसेनका एक अन्य पुत्र था, जिसका नाम सुकृति कहा गया है। सुकृतिके विभ्राज और विभ्राजके अश्वह नामक पुत्र हुआ। कृतिके गर्भसे उत्पन्न उस अश्वहके ब्रह्मदत्त नामका पुत्र था। उस पुत्रसे विष्वक्सेनने जन्म लिया।

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काण्ड ]
चन्द्रवंशवर्णन
२४३

द्विमीढके यवीनर, यवीनरके धृतिमान्, धृतिमान्‌के सत्यधृति नामका पुत्र हुआ। उसका पुत्र दृढनेमि था। दृढनेमिसे सुपार्श्व और सुपार्श्वसे सन्न्रतिका जन्म हुआ। सन्न्रतिका पुत्र कृत तथा कृतका पुत्र उग्रायुध था। उग्रायुधसे क्षेम्य नामक पुत्र हुआ। उसका पुत्र सुधीर था। सुधीरसे पुरञ्जय, पुरञ्जयसे विदूरथ नामके पुत्रने जन्म लिया।

अजमीढकी नलिनी नामकी एक पत्नी थी। उसके गर्भसे राजा नीलकी उत्पत्ति हुई। नीलसे शान्ति नामका पुत्र हुआ। उसका पुत्र सुशान्ति था। सुशान्तिके पुरु हुआ। पुरुका पुत्र अर्क, अर्कका हर्यश्व, हर्यश्वका मुकुल और मुकुलके यवीर, बृहद्भानु, कम्पिल्ल, सृञ्जय एवं शरद्वान् नामक पाँच पुत्र हुए। इनमें शरद्वान् परम वैष्णव था। इस शरद्वान्‌के अहल्या नामकी पत्नीसे दिवोदास नामक पुत्र हुआ। उसके शतानन्द हुए। शतानन्दके सत्यधृति हुआ। सत्यधृतिके उर्वशीसे कृप तथा कृपी नामक दो संतानें हुईं। कृपीका विवाह द्रोणाचार्यसे हुआ था। उसी कृपीसे द्रोणाचार्यके अश्वत्थामा नामक श्रेष्ठ पुत्र उत्पन्न हुए।

दिवोदासके मित्रयु और मित्रयुके च्यवन नामका पुत्र था। च्यवनसे सुदास, सुदाससे सौदास नामक पुत्र हुआ। उसका पुत्र सहदेव था। सहदेवसे सोमक, सोमकसे जन्तु (जह्नु) और पृषत नामक महान् पुत्र उत्पन्न हुआ। पृषतसे द्रुपद, द्रुपदसे धृष्टद्युम्नकी उत्पत्ति हुई। धृष्टद्युम्नसे धृष्टकेतु हुआ।

अजमीढके एक ऋक्ष नामका पुत्र था। उस ऋक्षसे संवरण, संवरणसे कुरुका जन्म हुआ। कुरुके सुधनु, परीक्षित् और जह्नु नामके तीन पुत्र थे। सुधनुसे सुहोत्र तथा सुहोत्रसे च्यवन, च्यवनसे कृतक तथा उपरिचर वसु हुए। वसुके बृहद्रथ, प्रत्यग्र और सत्य आदि अनेक पुत्र थे। बृहद्रथसे कुशाग्र, कुशाग्रसे ऋषभ, ऋषभसे पुष्पवान् तथा उस पुष्पवान्‌से सत्यहित नामका राजा हुआ। सत्यहितसे सुधन्वा, सुधन्वासे जह्नुकी उत्पत्ति हुई।

बृहद्रथका एक अन्य पुत्र था, जिसका नाम जरासन्ध था। उस जरासन्धसे सहदेव, सहदेवसे सोमापि, सोमापिसे श्रुतवान्, भीमसेन, उग्रसेन, श्रुतसेन तथा जनमेजय हुए। जह्नुके सुरथ नामक पुत्र था। सुरथके विदूरथ, विदूरथके सार्वभौम, सार्वभौमके जयसेन तथा उस जयसेनसे अवधीत हुआ। उस अवधीतसे अयुतायु, अयुतायुसे अक्रोधन, अक्रोधनसे अतिथि, अतिथिसे ऋक्ष, ऋक्षसे भीमसेन, भीमसेनसे दिलीप, दिलीपसे प्रतीप, प्रतीपसे देवापि, शान्तनु और बाह्लीक नामके राजा तीन सहोदर भ्राता हुए।

बाह्लीकसे सोमदत्त हुआ। सोमदत्तसे भूरि और भूरिसे भूरिश्रवाकी उत्पत्ति हुई। इस भूरिश्रवाका पुत्र शल था। गङ्गाके गर्भसे शान्तनुके महाप्रतापी धर्मपरायण पुत्र भीष्म हुए। उस शान्तनुकी दूसरी पत्नी सत्यवतीसे चित्राङ्गद और विचित्रवीर्य नामक अन्य दो पुत्रोंका जन्म हुआ। विचित्रवीर्यकी दो पत्नियाँ थीं, जिनका अम्बिका तथा अम्बालिका नाम था। व्यासजीने अम्बिकासे धृतराष्ट्रको, अम्बालिकासे पाण्डुको तथा उनकी दासीसे विदुरजीको पैदा किया।

धृतराष्ट्रने गान्धारीसे दुर्योधनादि सौ पुत्रोंको उत्पन्न किया। पाण्डुसे युधिष्ठिर आदि पाँच पुत्र हुए। द्रौपदीसे क्रमशः प्रतिविन्ध्य, श्रुतसोम, श्रुतकीर्ति, शतानीक और श्रुतकर्मा नामक पाँच पुत्रोंका जन्म हुआ। यौधेयी, हिडिम्बा, कौशी, सुभद्रिका (सुभद्रा), विजया तथा रेणुमती नामकी पत्नियाँ भी थीं। इनके गर्भसे देवक, घटोत्कच, अभिमन्यु, सर्वग, सुहोत्र और निरमित्र नामक पुत्र हुए। अभिमन्युके परीक्षित् तथा परीक्षित्‌के जनमेजय नामका पुत्र हुआ।

(अध्याय १३९-१४०)

१२४- निदानका अर्थ तथा रोगोंका सामान्य निदान-निरूपण

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२४४संक्षिप्त गरुडपुराण[ आचार-

भविष्यके राजवंशका वर्णन

श्रीहरिने कहा—हे रुद्र! परीक्षित्‌के पुत्र जनमेजयके पश्चात् इस चन्द्रवंशमें शतानीक, अश्वमेधदत्त, अधिसीमक, कृष्ण, अनिरुद्ध, उष्ण, चित्ररथ, शुचिद्रथ, वृष्णिमान्, सुषेण, सुनीथक, नृचक्षु, मुखाबाण, मेधावी, नृपञ्जय, पारिप्लव, सुनय, मेधावी, नृपञ्जय, बृहद्रथ, हरि, तिग्म, शतानीक, सुदानक, उदान, अहिनर, दण्डपाणि, निमित्तक, क्षेमक तथा शूद्रक नामक राजा हुए। ये सभी यथाक्रम अपने पूर्ववर्ती राजाके पुत्र थे।

हे रुद्र! अब मैं इक्ष्वाकुवंशीय बृहद्बलके उस वंशका वर्णन करता हूँ, जिसे बृहद्बलवंशीय कहा गया है। यथा—बृहद्बलसे उरुक्षय उसके बाद वत्सव्यूह हुआ। वत्सव्यूहसे सूर्य और उसके पुत्र सहदेव हुए। इसके बाद बृहदश्व, भानुरथ, प्रतीच्य, प्रतीकक, मनुदेव, सुनक्षत्र, किन्नर और अन्तरिक्षक हुए। तत्पश्चात् सुवर्ण, कृतजित् और धार्मिक बृहद्भ्राज हुए। तदनन्तर कृतंजय, धनंजय, संजय, शाक्य, शुद्धोदन, बाहुल, सेनजित्, क्षुद्रक, समित्र, कुडव और सुमित्र हुए।

अब मगधवंशीय राजाओंको सुनें—

मगध वंशमें जरासन्ध, सहदेव, सोमापि, श्रुतश्रवा, अयुतायु, निरमित्र, सुक्षत्र, बहुकर्मक, श्रुतञ्जय, सेनजित्, भूरि, शुचि, क्षेम्य, सुव्रत, धर्म, श्मश्रुल तथा दृढसेन आदि राजा हुए।

इसी प्रकार आगे सुमति, सुबल, नीत, सत्यजित्, विश्वजित् तथा इषुंजय—ये सभी बार्हद्रथवंशमें उत्पन्न होनेसे बार्हद्रथ नामसे जाने जाते हैं। इसके बाद जितने भी राजा होंगे, वे सभी अधार्मिक और शूद्र होंगे।

स्वर्गादि समस्त लोकोंके रचयिता साक्षात् अव्यय भगवान् नारायण हैं। वे ही सृष्टि, स्थिति और प्रलयके कर्ता हैं। नैमित्तिक, प्राकृतिक तथा आत्यन्तिक भेदसे प्रलय तीन प्रकारका होता है। प्रलयकाल आनेपर पृथिवी जलमें, जल तेजमें, तेज वायुमें, वायु आकाशमें, आकाश अहंकारमें, अहंकार बुद्धिमें, बुद्धि जीवमें और वह जीवात्मा अव्यक्त परब्रह्म परमात्मामें विलीन हो जाता है। आत्मा ही परमेश्वर है, वही विष्णु है और वही नारायण है। वही देव एकमात्र नित्य है, अविनाशी है, उसके अतिरिक्त स्वर्गादि समस्त संसार नाशवान् है। इसी नश्वरताके कारण ये सभी राजा मृत्युको प्राप्त हुए हैं। अतः मनुष्यको पापकर्म छोड़कर अविनाशी धर्माचरणमें अनुरक्त रहना चाहिये, जिससे निष्पाप होकर वह भगवान् हरिको प्राप्त कर सके।

(अध्याय १४१)


भगवान्‌के विभिन्न अवतारोंकी कथा तथा पतिव्रता-माहात्म्यमें ब्राह्मणपत्नी, अनसूया एवं भगवती सीताके पातिव्रतका आख्यान

ब्रह्माजीने कहा—वेद आदि धर्मोंकी रक्षाके लिये और आसुरी धर्मके विनाशके लिये सर्वशक्तिमान् भगवान् हरिने अवतार धारण किया और इन सूर्य-चन्द्रादिके वंशोंका पालन-पोषण किया। ये अजन्मा हरि ही मत्स्य, कूर्म आदि रूपोंमें अवतरित होते हैं।

मत्स्यका अवतार लेकर भगवान् विष्णुने युद्धकण्टक हयग्रीव नामक दैत्यका विनाश किया और वेदोंको पुनः पृथिवीपर लाकर मनु आदिकी रक्षा की। समुद्र-मन्थनके समय देवोंका हितसाधन करनेके लिये कूर्म (कच्छप)-का अवतार ग्रहण करके उन्होंने मन्दराचलको धारण किया। क्षीरसागरके

१२५- ज्वर-निदान

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काण्ड ]भगवान्‌के विभिन्न अवतारोंकी कथा तथा पतिव्रता-माहात्म्य२४५

मन्थनके समय अमृतसे परिपूर्ण कमण्डलुको लिये हुए धन्वन्तरि वैद्यके रूपमें समुद्रसे वे ही प्रकट हुए। उन्हींके द्वारा सुश्रुतको अष्टाङ्ग आयुर्वेदकी शिक्षा दी गयी थी। उन श्रीहरिने स्त्री (मोहिनी)-का रूप धारण करके देवोंको अमृतका पान कराया।

वराहका अवतार लेकर उन्होंने हिरण्याक्षको मारा। उसके अधिकारसे पृथिवीको छीनकर पुनः स्थापित किया और देवताओंकी रक्षा की। तदनन्तर नरसिंहरूपमें इन्होंने हिरण्यकशिपु तथा अन्य दैत्योंका विनाशकर वैदिकधर्मका पालन किया। तत्पश्चात् इस सम्पूर्ण संसारके स्वामी उन विष्णुने जमदग्निसे परशुरामका अवतार लेकर इक्कीस बार पृथिवीको क्षत्रियजातिसे रहित किया था।<sup>१</sup> कृतवीर्यके पुत्र कार्तवीर्य सहस्रार्जुनको युद्धमें मार करके इन्हीं भगवान् परशुरामने यज्ञानुष्ठानमें उसके सम्पूर्ण राज्यका आधिपत्य महर्षि कश्यपको सौंप दिया और स्वयं महाबाहु (परशुराम) महेन्द्रगिरिपर जाकर तपमें स्थित हो गये।

इसके बाद दुष्टोंका मर्दन करनेवाले भगवान् विष्णु राम आदि चार स्वरूपोंमें राजा दशरथके पुत्रके रूपमें अवतीर्ण हुए। जिनके नाम राम, भरत, लक्ष्मण और शत्रुघ्न हैं। रामकी पत्नी जानकी हुईं। पिताके वचनको सत्य करनेके लिये तथा माता (कैकेयी)-के हितकी रक्षा करते हुए रामने अयोध्याका राजवैभव त्यागकर शृंगवेरपुर, चित्रकूट तथा दण्डकारण्यमें निवास किया। तदनन्तर वहींपर शूर्पणखाकी नाक कटवाकर उसके भाई खर तथा दूषण नामक दो राक्षसोंको मारा। तत्पश्चात् जानकीका अपहरण करनेवाले दैत्याधिपति रावणका वधकर उसके छोटे भाई विभीषणको लङ्कापुरीमें राक्षसोंके राजाके रूपमें अभिषिक्त किया। उसके बाद अपने मुख्य सहयोगी सुग्रीव तथा हनुमानादिके साथ पुष्पक विमानपर आरूढ़ होकर पतिपरायणा सीता एवं लक्ष्मणके साथ वे अपनी पुरी अयोध्या आ गये। यहाँ उन्होंने राज्यसिंहासन प्राप्तकर देवताओं, ऋषियों, ब्राह्मणों तथा प्रजाका पालन किया।

उन्होंने धर्मकी भलीभाँति रक्षा की। अश्वमेधादि अनेक यज्ञोंका अनुष्ठान किया। भगवती सीताने राजा रामके साथ सुखपूर्वक रमण किया। यद्यपि सीता रावणके घरमें रहीं, फिर भी उन्होंने रावणको अंगीकार नहीं किया और सर्वदा मन, वचन तथा कर्मसे राममें ही अनुरक्त रहीं। वे सीता तो अनसूयाके समान पतिव्रता थीं।

**ब्रह्माजीने पुनः कहा—**अब मैं पतिव्रता स्त्रीका माहात्म्य कह रहा हूँ, आप सुनें।

पुराने समयमें प्रतिष्ठानपुरमें कौशिक नामका एक कुष्ठरोगी ब्राह्मण रहता था। उस ब्राह्मणकी पत्नी अपने पतिकी देवताके समान ही सेवा-शुश्रूषा करती थी। पतिके द्वारा तिरस्कार मिलनेपर भी वह पतिव्रता पतिको देवता-रूप ही मानती थी। एक बार पतिके द्वारा कहे जानेपर वेश्याको शुल्क देनेके लिये अधिकतम धन साथ लेकर वह उन्हें कन्धेपर बैठाकर वेश्याके घर पहुँचाने निकल पड़ी।

मार्गमें माण्डव्य ऋषि थे। यद्यपि वे ऋषि परम तपस्वी महात्मा थे, तथापि उन्हें चोर समझकर राजदण्डके रूपमें लोहेके लम्बे शङ्कुपर बिठा दिया गया था। अतः शरीरके नीचेके छिद्रसे ऊपर सिरके छिद्र ब्रह्मरन्ध्रतक शरीरके भीतर-ही-भीतर लौह शङ्कुके प्रवेशके कारण माण्डव्य ऋषिका असह्य तीव्र वेदनासे ग्रस्त होना स्वाभाविक


१. यहाँ क्षत्रिय जातिसे रहित करनेका तात्पर्य इतना ही है कि श्रीपरशुरामने क्षत्रियोंके दर्पका मर्दन किया और उनकी कर्तव्यविमुखताको नष्ट किया।

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२४६ | संक्षिप्त गरुडपुराण | [ आचार-

था। इसीलिये माण्डव्य ऋषि वेदनाके अनुभवसे स्वयंको बचानेकी दृष्टिसे समाधिस्थ हो गये थे।

कुष्ठ-व्याधियुक्त ब्राह्मण कौशिककी पतिव्रता पत्नी रातमें ही अपने पतिकी इच्छाके अनुसार वेश्याके यहाँ जा रही थी, इसलिये अन्धकार रहनेके कारण अपनी पत्नीके कन्धेपर बैठे कौशिकने माण्डव्य ऋषिको नहीं देखा और अपना पाँव स्वभावतः हिलाया-डुलाया। इसका दुष्परिणाम यह हुआ कि कौशिकके पाँवोंसे माण्डव्य ऋषि आहत हो गये और उनकी समाधि टूट गयी। समाधि-भंग होनेसे उन्हें असह्य वेदना होने लगी। इससे माण्डव्य ऋषिका क्रुद्ध होना स्वाभाविक था। अतः क्रोधवश उन्होंने शाप देते हुए कहा— जिसने मेरे ऊपर यह अपना पैर चलाया है, उसकी सूर्योदय होते ही मृत्यु हो जायगी। यह सुनकर उस ब्राह्मण-पत्नीने कहा कि (यदि ऐसी बात है तो) अब सूर्योदय ही नहीं होगा। इसके बाद सूर्योदय न होनेसे बहुत वर्षोंतक निरन्तर रात्रि ही छायी रही। जिससे देवता भी भयभीत हो गये।

देवताओंने ब्रह्माकी शरण ली। ब्रह्माने उन देवोंसे कहा कि पतिव्रताके इस तेजसे तो तपस्वियोंके तेजका भी ह्रास हो रहा है। पातिव्रत-धर्मके माहात्म्यसे सूर्यदेव उदित नहीं हो रहे हैं। उनके उदय न होनेसे मानवों और आप सभीको यह हानि उठानी पड़ रही है। अतः सूर्योदयकी कामनासे आप सब अत्रिमुनिकी धर्म-पत्नी तपस्विनी पतिपरायणा अनसूयाको प्रसन्न करें। वे ही सूर्योदय कराके पतिव्रता ब्राह्मणीके पतिको भी जीवित कर सकती हैं। ब्रह्माजीके कथनानुसार अनसूयाकी शरणमें जाकर देवताओंने उनकी प्रार्थना की। देवताओंकी प्रार्थनासे अनसूया प्रसन्न हो गयीं। अपने तपःप्रभावसे सूर्योदय कराके उन्होंने ब्राह्मणीके पति कौशिकको जीवित कर दिया। इन महातपस्विनी पतिव्रताकी अपेक्षा सीता और अधिक पतिपरायणा थीं।

(अध्याय १४२)


रामचरितवर्णन (रामायणकी कथा)

ब्रह्माजीने कहा— अब मैं रामायणका वर्णन करता हूँ, जिसके श्रवणमात्रसे समस्त पापोंका विनाश हो जाता है।

भगवान् विष्णुके नाभिकमलसे ब्रह्माकी उत्पत्ति हुई। ब्रह्मासे मरीचि, मरीचिसे कश्यप, कश्यपसे सूर्य, सूर्यसे वैवस्वत मनु हुए। वैवस्वत मनुसे इक्ष्वाकु हुए। इन्हीं इक्ष्वाकुके वंशमें रघुका जन्म हुआ। रघुके पुत्र अजसे दशरथ नामक महाप्रतापी राजाने जन्म लिया। उनके महान् बल और पराक्रमवाले चार पुत्र हुए। कौसल्यासे राम, कैकेयीसे भरत और सुमित्रासे लक्ष्मण तथा शत्रुघ्नका जन्म हुआ।

माता-पिताके भक्त श्रीरामने महामुनि विश्वामित्रसे अस्त्र-शस्त्रकी शिक्षा प्राप्तकर ताड़का नामक

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काण्ड ]
रामचरितवर्णन ( रामायणकी कथा )
२४७


यक्षिणीका विनाश किया। विश्वामित्रके यज्ञमें बलशाली रामके द्वारा ही सुबाहु नामक राक्षस मारा गया। जनकराजके यज्ञस्थलमें पहुँचकर उन्होंने जानकीका पाणिग्रहण किया। वीर लक्ष्मणने उर्मिला, भरतने कुशध्वजकी पुत्री माण्डवी तथा शत्रुघ्नने कीर्तिमतीका पाणिग्रहण किया, ये महाराज कुशध्वजकी पुत्री थीं।

विवाहके पश्चात् अयोध्यामें जाकर चारों भाई पिताके साथ रहने लगे। भरत और शत्रुघ्न अपने मामा युधाजित्‌के यहाँ चले गये। उन दोनोंके ननिहाल जानेके बाद नृपश्रेष्ठ महाराज दशरथ रामको राज्य देनेके लिये उद्यत हुए। उसी समय कैकेयीने रामको चौदह वर्ष वनमें रहनेका दशरथजीसे वर माँग लिया। अतः लक्ष्मण और सीतासहित मर्यादापुरुषोत्तम श्रीराम पिताके हितकी रक्षाके लिये राज्यको तृणवत् त्यागकर शृंगवेरपुर चले गये। वहाँपर रथका भी परित्यागकर वे सभी प्रयाग गये और वहाँसे चित्रकूटमें जाकर रहने लगे।

इधर रामके वियोगसे दुःखित महाराज दशरथ शरीरका परित्याग कर स्वर्ग पधार गये। मामाके घरसे आकर भरतने पिताका अन्तिम संस्कार किया। तदनन्तर वे दल-बलके साथ रामके पास पहुँचे। उन्होंने विनम्रतापूर्वक अपने ज्येष्ठ भ्राता श्रीरामसे कहा—‘हे महामते ! आप अयोध्या लौट चलें और वहाँका राज्य करें।' रामने राज्यके प्रति अनिच्छा प्रकट कर दी और भरतको अपनी पादुका देकर राज्यकी रक्षाके लिये वापस अयोध्या भेज दिया। भरत वहाँसे लौटकर रामके प्रतिनिधिरूपमें राज्यकार्य देखने लगे। तपस्वी भरतने नन्दिग्राममें ही रहकर राज्यका संचालन किया, वे अयोध्यामें नहीं गये।

राम भी चित्रकूट छोड़कर अत्रिमुनिके आश्रममें चले आये। तदनन्तर वहाँ उन्होंने सुतीक्ष्ण और अगस्त्यमुनिके आश्रममें जाकर उन्हें प्रणाम किया और उसके बाद वे दण्डकारण्य चले गये। वहाँ उन सभीका भक्षण करनेके लिये शूर्पणखा नामकी एक राक्षसी आ धमकी। अतः रामचन्द्रने नाक-कान कटवाकर उस राक्षसीको वहाँसे भगा दिया। उसने जाकर खर-दूषण तथा त्रिशिरा नामके राक्षसोंको युद्धके लिये प्रेरित किया। चौदह हजार राक्षसोंकी सेना लेकर उन लोगोंने रामपर आक्रमण कर दिया। रामने अपने बाणोंसे उन राक्षसोंको यमपुर भेज दिया। राक्षसी शूर्पणखासे प्रेरित रावण सीताका हरण करनेके लिये वहाँ त्रिदण्डी संन्यासीका वेश धारणकर मृगरूपधारी मारीचकी अगुवाईमें आ पहुँचा। मृगका चर्म प्राप्त करनेके लिये सीतासे प्रेरित रामने मारीचको मार डाला। मरते समय उसने ‘हा सीते ! हा लक्ष्मण !' ऐसा कहा।

इसके बाद सीताकी सुरक्षामें लगे लक्ष्मण भी सीताके कहनेपर वहाँ जा पहुँचे। लक्ष्मणको देखकर रामने कहा— यह निश्चित ही राक्षसी माया है। सीताका हरण अवश्य हो गया होगा। इसी बीच बली रावण अवसर पाकर अङ्कमें सीताको लेकर, जटायुको क्षत-विक्षतकर लङ्का चला गया। वहाँ पहुँचकर उसने राक्षसियोंकी निगरानीमें सीताको अशोक-वृक्षकी छायामें ठहरा दिया।

रामने आकर पर्णशालाको सूनी देखा। वे अत्यन्त दुःखित हो उठे। उसके बाद वे सीताकी खोजमें निकल पड़े। मार्गमें उन्होंने जटायुका अन्तिम संस्कार किया और उसीके कहनेसे वे दक्षिण दिशाकी ओर चल पड़े। उस दिशामें आगे बढ़नेपर सुग्रीवके साथ रामकी मित्रता हुई। उन्होंने अपने तीक्ष्ण बाणसे सात तालवृक्षोंका भेदन किया तथा वालीको मारकर किष्किन्धामें रहनेवाले वानरोंके राजाके रूपमें सुग्रीवको अभिषिक्त किया और

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२४८संक्षिप्त गरुडपुराण[ आचार-

स्वयं जाकर ऋष्यमूक पर्वतपर निवास करने लगे।
सुग्रीवने पर्वताकार शरीरवाले उत्साहसे भरे हुए वानरोंको सीताकी खोजमें पूर्वादि दिशाओंमें भेजा। वे सभी वानर जो पूर्व, पश्चिम और उत्तरकी दिशाओंमें गये थे, खाली हाथ वापस लौट आये, किंतु जो लोग दक्षिण दिशामें गये थे उन्होंने वन, पर्वत, द्वीप तथा नदियोंके तटोंको खोज डाला; पर जानकीका कुछ भी पता न चल सका। अन्तमें हताश होकर उन सबने मरनेका निश्चय कर लिया। सम्पातिके वचनसे सीताकी जानकारी प्राप्त करके कपिश्रेष्ठ हनुमान्‌जीने शतयोजन (चार सौ कोस) विस्तृत समुद्रको लाँघकर लङ्कामें अशोकवाटिकाके अन्दर रह रही सीताका दर्शन किया, जिनका तिरस्कार राक्षसियाँ और रावण स्वयं करता था। इन सबके द्वारा बराबर यह कहा जा रहा था कि तुम रावणकी पत्नी बन जाओ, किंतु वे हृदयमें सदैव रामका ही चिन्तन करती थीं।
हनुमान्‌ने (ऐसी दयनीय स्थितिमें रह रही) सीताको कौसल्यानन्दन रामके द्वारा दी गयी अंगूठी देकर अपना परिचय देते हुए कहा कि 'हे मैथिलि ! मैं श्रीरामका दूत हूँ। आप अब दुःख न करें। आप मुझे कोई अपना चिह्नविशेष दें, जिससे भगवान् श्रीराम आपको समझ सकें।' हनुमान्‌का यह वचन सुनकर सीताने अपना चूडामणि उतारकर दे दिया और कहा कि 'हे कपिराज ! राम जितना ही शीघ्र हो सके उतना ही शीघ्र मुझको यहाँसे ले चलें।' ऐसा आप उनसे कहियेगा। हनुमान्‌ने कहा कि ऐसा ही होगा। तदनन्तर वे उस दिव्य अशोक वनको विध्वंस करने लगे। उसे विनष्टकर उन्होंने रावणके पुत्र अक्ष तथा अन्य राक्षसोंको मार डाला और स्वयं मेघनादके पाशमें बन्दी भी बन गये। रावणको देखकर हनुमान्‌ने कहा कि हे रावण ! मैं श्रीरामका दूत हनुमान् हूँ। आप रामको सीता लौटा दें। यह सुनकर रावण क्रुद्ध हो उठा। उसने उनकी पूँछमें आग लगवा दी।
महाबली हनुमान्‌ने उस जलती हुई पूँछसे लंकाको जला डाला। वे पुनः रामके पास लौट आये और बताया कि मैंने सीता माताको देखा, तदनन्तर हनुमान्‌जीने सीताद्वारा दिया गया चूडामणि उन्हें दे दिया। इसके बाद सुग्रीव, हनुमान्, अंगद तथा लक्ष्मणके साथ राम लङ्कापुरीमें जा पहुँचे। रावणका भाई विभीषण भी रामकी शरणमें आ गया। श्रीरामने उसे लङ्काके राजपदपर अभिषिक्त कर दिया। रामने नलके द्वारा सेतुका निर्माण कराकर समुद्रको पार किया था। (समुद्रके तटपर) सुवेल पर्वतपर उपस्थित होकर उन्होंने लङ्कापुरीको देखा।
तदनन्तर नील, अंगद, नलादि मुख्य वानरों तथा धूम्राक्ष, वीरेन्द्र तथा ऋक्षपति जाम्बवान्, मैन्द, द्विविद आदि मुख्य वीरोंने लङ्कापुरीको नष्ट कर डाला। विशाल शरीरवाले काले-काले पहाड़के समान राक्षसोंको अपनी वानरी सेनाके साथ राम-लक्ष्मणने मार गिराया। विद्युज्जिह्व, धूम्राक्ष, देवान्तक, नरान्तक, महोदर, महापार्श्व, महाबल, अतिकाय, कुम्भ, निकुम्भ, मत्त, मकराक्ष, अकम्पन, प्रहस्त, उन्मत्त, कुम्भकर्ण तथा मेघनादको अस्त्रादिसे राम-लक्ष्मणने काट डाला। तदनन्तर उन महापराक्रमी श्रीरामने बीस भुजाओंके समूहको छिन्न-भिन्न करके रावणको भी धराशायी कर दिया।
उसके बाद अग्निमें प्रविष्ट होकर अपनी शुद्धताको प्रमाणित की हुई सीताके साथ लक्ष्मण एवं वानरोंसे युक्त राम पुष्पक विमानमें बैठकर अपनी श्रेष्ठतम नगरी अयोध्या लौट आये। वहाँपर राज्य-सिंहासन प्राप्तकर उन्होंने प्रजाका पुत्रवत् पालन करते हुए राज्य किया। दस अश्वमेध-यज्ञोंका अनुष्ठान करके रामने गयातीर्थमें पितरोंको विधिवत् पिण्डदान दिया और ब्राह्मणोंको विभिन्न

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काण्ड ] हरिवंशवर्णन ( श्रीकृष्णकथा ) २४१

प्रकारका दान देकर कुश और लवको राज्यसिंहासन सौंप दिया।

रामने ग्यारह हजार वर्षतक राज्य किया।* शत्रुघ्नने लवण नामक दैत्यका विनाश किया। भरतके द्वारा शैलूष नामक गन्धर्व मारे गये। इसके पश्चात् उन सभीने अगस्त्यादि मुनियोंको प्रणाम करके उनसे राक्षसोंकी उत्पत्तिकी कथा सुनी। तदनन्तर अपने अवतारका प्रयोजन पूर्ण करके भगवान् श्रीराम अयोध्यामें रहनेवाली प्रजाके साथ स्वर्गलोकको चले गये। (अध्याय १४३)

हरिवंशवर्णन ( श्रीकृष्णकथा )

ब्रह्माजीने कहा—अब मैं हरिवंशका वर्णन करूँगा, जो भगवान् कृष्णके माहात्म्यसे परिपूर्ण होनेके कारण श्रेष्ठतम है।

पृथिवीपर धर्म आदिकी रक्षा और अधर्मादिके विनाशके लिये वसुदेव तथा देवकीसे कृष्ण और बलरामका प्रादुर्भाव हुआ। जन्मके कुछ ही दिन बाद कृष्णने पूतनाके स्तनोंको दृढ़तापूर्वक पीकर उसे मृत्युके पास पहुँचा दिया था। तदनन्तर शकट (छकड़े)-को बालक्रीडामें उलटकर सभीको विस्मित करते हुए इन्होंने यमलार्जुन-उद्धार, कालियनाग-दमन, धेनुकासुर-वध, गोवर्धन-धारण आदि अनेक लीलाएँ कीं और इन्द्रद्वारा पूजित होकर पृथिवीको भारसे विमुक्त किया तथा अर्जुनकी रक्षाके लिये प्रतिज्ञा की।

इनके द्वारा अरिष्टासुर आदि अनेक बलवान् शत्रु मारे गये। इन्होंने केशी नामक दैत्यका वध किया तथा गोपोंको संतुष्ट किया। उसके बाद चाणूर और मुष्टिक नामक मल्ल इनके द्वारा ही पराजित हुए। ऊँचे मंचपर अवस्थित कंसको वहाँसे नीचे पटककर इन्होंने ही मारा था।

श्रीकृष्णकी रुक्मिणी, सत्यभामा आदि आठ प्रधान पत्नियाँ थीं। इनके अतिरिक्त महात्मा श्रीकृष्णकी सोलह हजार अन्य स्त्रियाँ थीं। उन स्त्रियोंसे उत्पन्न हुए पुत्र-पौत्रोंकी संख्या सैकड़ों-हजारोंमें थी। रुक्मिणीके गर्भसे प्रद्युम्न उत्पन्न हुए, जिन्होंने शम्बरासुरका वध किया था। इनके पुत्र अनिरुद्ध हुए, जो बाणासुरकी पुत्री उषाके पति थे। अनिरुद्धके विवाहमें कृष्ण और शङ्करका महाभयंकर युद्ध हुआ और इसी युद्धमें हजार भुजाओंवाले बाणासुरकी दो भुजाओंको छोड़कर शेष सभी भुजाएँ कृष्णके द्वारा काट डाली गयीं।

नरकासुरका वध इन्हीं महात्मा श्रीकृष्णने किया था। नन्दनवनसे बलात् पारिजात-वृक्ष सत्यभामाके लिये ये ही उखाड़कर लाये थे। बल नामक दैत्य, शिशुपाल नामक राजा तथा द्विविद नामक बन्दरका वध इन्हींके द्वारा हुआ था।

अनिरुद्धसे वज्र नामका पुत्र हुआ। कृष्णके स्वर्गारोहणके पश्चात् वही इस वंशका राजा बना था। सान्दीपनि नामक मुनि कृष्णके गुरु थे। कृष्णने ही गुरु सान्दीपनिकी पुत्रप्राप्तिकी अभिलाषाको पूर्ण किया था। मथुरामें उग्रसेन और देवताओंकी रक्षा इन्होंने ही की थी। (अध्याय १४४)


* एकादशसहस्राणि रामो राज्यमकारयत्। (ग०पु० १४३। ५०)

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२५० संक्षिप्त गरुडपुराण [ आचार-

महाभारतकी कथा एवं बुद्ध आदि अवतारोंकी कथाका वर्णन

ब्रह्माजीने कहा—अब मैं महाभारतके युद्धकी कथाका वर्णन करूँगा, जो पृथिवीपर बढ़े हुए अत्याचारके भारको उतारनेके लिये हुआ था, जिसकी योजना युधिष्ठिरादि पाण्डवोंकी रक्षाके लिये तत्पर कृष्णने स्वयं की थी।

भगवान् विष्णुके नाभिकमलसे ब्रह्माकी उत्पत्ति हुई। ब्रह्मासे अत्रि, अत्रिसे सोम, सोमसे बुध हुए। बुधने इला नामक अपनी पत्नीसे पुरूरवाको उत्पन्न किया। पुरूरवासे आयु, आयुसे ययाति और ययातिके वंशमें भरत, कुरु तथा शान्तनु हुए। राजा शान्तनुकी पत्नी गङ्गासे भीष्म हुए। भीष्म सर्वगुणसम्पन्न तथा ब्रह्मविद्याके पारङ्गत विद्वान् थे।

शान्तनुकी सत्यवती नामक एक दूसरी पत्नी थी। उस पत्नीके दो पुत्र हुए, जिनका नाम चित्रांगद तथा विचित्रवीर्य था। चित्रांगद नामवाले गन्धर्वके द्वारा युद्धमें चित्रांगद मार डाला गया। विचित्रवीर्यका विवाह काशिराजकी पुत्री अम्बिका और अम्बालिकाके साथ हुआ। विचित्रवीर्य भी निःसंतान ही मर गये थे। अतः व्याससे उनके दो क्षेत्रज पुत्रों—अम्बिकाके गर्भसे धृतराष्ट्र तथा अम्बालिकाके गर्भसे पाण्डुका जन्म हुआ। उन्हीं व्यासके द्वारा दासीके गर्भसे विदुरका जन्म हुआ। धृतराष्ट्रके गान्धारीसे सौ पराक्रमी पुत्र हुए, जिनमें दुर्योधन सबसे बड़ा था। पाण्डुपत्नी कुन्ती और माद्रीसे पाँच पुत्रोंका जन्म हुआ। युधिष्ठिर, भीमसेन, अर्जुन, नकुल तथा सहदेव—ये पाँचों पुत्र बड़े ही बलवान् और पराक्रमशाली थे।

दैववशात् कौरव और पाण्डवोंमें वैरभाव उत्पन्न हो गया। उद्धत स्वभाववाले दुर्योधनद्वारा पाण्डवजन बहुत ही सताये गये। लाक्षागृहमें उन्हें विश्वासघातसे जलाया गया, किंतु वे अपनी बुद्धिमत्तासे बच गये। उसके बाद उन लोगोंने एकचक्रा नामक पुरीमें जाकर एक ब्राह्मणके घरमें शरण ली। वहाँ रहते हुए उन सभीने बक नामक राक्षसका संहार किया। तदनन्तर पाञ्चाल नगरमें हो रहे द्रौपदीके स्वयंवरको जानकर वे सभी वहाँ पहुँचे। वहाँ अपने पराक्रमका परिचय देकर उन पाण्डवोंने द्रौपदीको पत्नीके रूपमें प्राप्त किया।

इसके बाद द्रोणाचार्य और भीष्मकी अनुमतिसे धृतराष्ट्रने पाण्डवोंको अपने पास बुला लिया और आधा राज्य उन्हें दे दिया। आधा राज्य प्राप्त करनेके पश्चात् इन्द्रप्रस्थ नामक एक सुन्दर नगरीमें रहकर वे राज्य करने लगे। उन तपस्वी पाण्डवोंने वहाँपर एक सभामण्डपका निर्माण करके राजसूय-यज्ञका अनुष्ठान किया।

तत्पश्चात् मुरारि भगवान् वासुदेवकी अनुमतिसे ही द्वारकापुरीमें जाकर अर्जुनने उनकी बहन सुभद्राका पाणिग्रहण किया। उन्हें अग्निदेवसे नन्दिघोष नामक दिव्य रथ, तीनों लोकोंमें प्रसिद्ध गाण्डीव नामका श्रेष्ठतम दिव्य धनुष, अविनाशी बाण तथा अभेद्य कवच प्राप्त हुआ। उसी धनुषसे कृष्णके सहचर वीर अर्जुनने अग्निको खाण्डव-वनमें संतुष्ट किया था। दिग्विजयमें देश-देशान्तरके राजाओंको जीतकर उनसे प्राप्त रत्नराशि लाकर उन्होंने अपने नीति-परायण ज्येष्ठ भ्राता युधिष्ठिरको सौंप दी।

भाइयोंके साथ धर्मराज युधिष्ठिर कर्ण, दुःशासन और शकुनिके मतमें स्थित पापी दुर्योधनके द्वारा द्यूतक्रीड़ाके मायाजालमें जीत लिये गये। उसके बाद बारह वर्षोंतक उन्हें वनमें महान् कष्ट उठाना पड़ा। तदनन्तर धौम्य ऋषि तथा अन्य मुनियोंके साथ द्रौपदीसहित वे पाँचों पाण्डव विराट-नगर गये और गुप्तरूपसे वहाँ रहने लगे। एक वर्षतक वहाँ रहकर दुर्योधनद्वारा हरण की जाती हुई गायोंका प्रत्याहरण करके अर्थात् वापस लौटाकर वे अपने राज्यमें जा पहुँचे। सम्मानपूर्वक दुर्योधनसे उन्होंने अपने आधे राज्यके हिस्सेके रूपमें पाँच गाँव माँगे, किंतु दुर्योधनसे वे भी प्राप्त न हो सके। अतः कुरुक्षेत्रके मैदानमें उन वीरोंको युद्ध करना पड़ा। उसमें पाण्डवोंकी ओर सात दिव्य अक्षौहिणी सेना थी और दुर्योधनादि

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काण्ड ] महाभारतकी कथा एवं बुद्ध आदि अवतारोंकी कथाका वर्णन २५१


ग्यारह अक्षौहिणी सेनासे युक्त थे। यह युद्ध देवासुर-संग्रामके समान महाभयंकर हुआ था।

सबसे पहले दुर्योधनकी सेनाके सेनापति भीष्म हुए और पाण्डवोंका सेनापति शिखण्डी बना। उन दोनोंके बीचमें शस्त्र-से-शस्त्र तथा बाण-से-बाण भिड़ गये। दस दिनोंतक महाभयंकर युद्ध होता रहा। शिखण्डी और अर्जुनके सैकड़ों बाणोंसे बिंधकर भीष्म धराशायी हो गये, किंतु इच्छामृत्युका वरदान होनेसे भीष्मकी उस समय मृत्यु नहीं हुई। जब सूर्य उत्तरायणमें आ गये तब धर्म-सम्बन्धित विभिन्न उपदेश देकर उन्होंने अपने पितरोंका तर्पण किया और भगवान् गदाधरका ध्यान करते हुए अन्तमें वे उस परमपदको प्राप्त हुए, जहाँपर आनन्द-ही-आनन्द है और जो निर्मल आत्माओंके लिये मुक्तिका स्थान है।

तदनन्तर सेनापतिके पदपर द्रोणाचार्य आसीन हुए। उनका युद्ध पाण्डव-सेनापति धृष्टद्युम्नके साथ हुआ। यह परम दारुण युद्ध पाँच दिनोंतक चलता रहा। जितने भी राजा इस युद्धमें सम्मिलित हुए, वे सभी अर्जुनके द्वारा मारे गये। पुत्रशोकका समाचार सुनकर द्रोणाचार्य उस शोकके सागरमें डूबकर मर गये।

इसके बाद वीर अर्जुनसे लड़नेके लिये कर्ण युद्धभूमिमें आया। दो दिनोंतक महाभयानक युद्ध करके वह भी उनके द्वारा प्रयुक्त अस्त्रोंसे न बच सका। तत्पश्चात् शल्य धर्मराजसे युद्ध करनेके लिये गया। अपराह्नकाल होनेके पूर्व ही धर्मराजके तीक्ष्ण बाणोंसे वह भी चल बसा।

तदनन्तर कालान्तक यमराजके समान क्रुद्ध दुर्योधन गदा लेकर भीमसेनको मारनेके लिये दौड़ा, किंतु वीर भीमसेनने अपनी गदासे उसे गिरा दिया। उसके बाद द्रोणपुत्र अश्वत्थामाने रात्रिमें सोयी हुई पाण्डवोंकी सेनापर आक्रमण कर दिया। अपने पिताके वधका स्मरण करके उसने बड़ी ही बहादुरीसे बहुतोंको मौतके घाट उतार दिया। धृष्टद्युम्नका वध करके उसने द्रौपदीके पुत्रोंको भी मार डाला। इस प्रकार पुत्रोंका वध होनेसे दुःखित एवं रोती हुई द्रौपदीको देखकर अर्जुनने अश्वत्थामाको परास्तकर ऐषिक नामक अस्त्रसे उसकी शिरोमणिको निकाल लिया।

उसके बाद अत्यन्त शोकसन्तप्त स्त्रीजनोंको आश्वस्त करके धर्मराज युधिष्ठिरने स्नान करके देवता और पितृजनोंका तर्पण किया। तत्पश्चात् भीष्मके द्वारा दिये गये सदुपदेशोंसे आश्वस्त महात्मा युधिष्ठिर पुनः राज्यकार्यमें लग गये। अश्वमेध-यज्ञका अनुष्ठान करके उन्होंने भगवान् विष्णुका पूजन किया तथा विधिवत् ब्राह्मणोंको दक्षिणादि देकर संतुष्ट किया। साम्बके पेटसे निकले हुए मूसलके द्वारा यदुवंशियोंके विनाशका समाचार सुनकर उन्होंने राज्यसिंहासनपर अभिमन्युके पुत्र परीक्षित्को बैठाकर भीमादि अपने सभी भाइयोंसहित विष्णुसहस्रनामका जप करते हुए स्वयं भी स्वर्गके मार्गका अनुगमन किया।

वासुदेव कृष्ण असुरोंको व्यामोहित करनेके लिये बुद्धरूपमें अवतरित हुए। अब वे कल्कि होकर फिर सम्भल ग्राममें अवतार लेंगे और घोड़ेपर सवार होकर वे संसारके सभी विधर्मियोंका विनाश करेंगे।

अधर्मको दूर करनेके लिये, सत्त्वगुण-प्रधान देवता आदिकी रक्षा और दुष्टोंका संहार करनेके निमित्त भगवान् विष्णुका समय-समयपर वैसे ही अवतार होता है, जैसे समुद्रमन्थनके समय धन्वन्तरि होकर उन्होंने देवता आदिकी रक्षाके लिये विश्वामित्रके पुत्र महात्मा सुश्रुतको आयुर्वेदका उपदेश किया।

इस तरह महाभारतकी कथा एवं भगवान्के अवतारोंकी कथाका मैंने वर्णन किया, इसे सुनकर मनुष्य स्वर्गको प्राप्त करता है। (अध्याय १४५)