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गरुड़ पुराण

गरुड़ पुराण

Garuda Purana

by महर्षि वेदव्यास

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DevanagariHindipublished634 pages

Page 242 of 634

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Page 242
२३२संक्षिप्त गरुडपुराण[ आचार-

देवकीनन्दन श्रीश हरे संसारसागरात् ।
दुर्वृत्तांस्त्रायसे विष्णो ये स्मरन्ति सकृत्सकृत् ॥
सोऽहं देवातिदुर्वृत्तस्त्राहि मां शोकसागरात् ।
पुष्कराक्ष निमग्नोऽहं महत्यज्ञानसागरे ॥
त्राहि मां देवदेवेश त्वामृतेऽन्यो न रक्षिता ।
स्वजन्मवासुदेवाय गोब्राह्मणहिताय च ॥
जगद्धिताय कृष्णाय गोविन्दाय नमो नमः ।
शान्तिरस्तु शिवं चास्तु धनविख्यातिराज्यभाक् ॥
(१३१ । १७-२१)

हे देवदेवेश्वर ! हे हरे ! इस संसारसागरसे मेरी रक्षा करें। हे सर्वपापहन्ता प्रभो ! दुःख तथा शोकसे परिपूर्ण इस संसारसागरसे मेरी रक्षा करें। हे देवकीनन्दन ! हे श्रीपते ! हे हरे ! इस संसारसागरसे मेरी रक्षा करें। हे विष्णो ! जो एक बार भी आपका स्मरण करते हैं, उन सभीको आप दुराचरणके दुःखसे उबार लेते हैं। हे देव ! मैं भी वैसा ही इस संसारके अत्यन्त दुराचरणमें फँसा हुआ हूँ, आप मेरा भी इस शोकरूपी सागरसे उद्धार करें। हे राजीवलोचन ! मैं इस गहन अज्ञानरूपी संसारसागरमें डूबा हुआ हूँ। आप मेरी रक्षा करें। हे देवदेवेश ! आपके अतिरिक्त मेरा अन्य कोई रक्षक नहीं है। हे स्वजन्मा ! वासुदेव ! गोद्विजहितकारी ! जगत्त्राता ! कृष्ण ! गोविन्द ! आपको बारम्बार नमस्कार है। आपकी कृपासे मुझे शान्ति प्राप्त हो, मेरा कल्याण हो और धन, यश तथा राज्यवैभवका मैं अधिकारी बनूँ।
(अध्याय १३१)


बुधाष्टमीव्रत-कथा

**ब्रह्माजीने कहा—**जो मनुष्य अष्टमी तिथिको दिनभर व्रत रखकर नक्तव्रतकी विधिसे एक बार भोजन करता है और इस व्रतकर्मको वर्षपर्यन्त चलाकर व्रतकी समाप्तिपर गोदान करता है, उसे इन्द्रपदकी प्राप्ति होती है। इस व्रतको सद्गतिव्रत कहा गया है। पौषमासकी शुक्लाष्टमी तिथिके व्रतका नाम महारुद्रव्रत है। जब दोनों पक्षकी अष्टमी तिथि बुधवारसे युक्त हो तो नियमपूर्वक बुधाष्टमीव्रत करनेवालेकी सम्पत्ति कभी भी खण्डित नहीं होती। मुक्तिकी इच्छा रखनेवाला जो मनुष्य दो अंगुलियोंको हटाकर शेष तीन अंगुलियोंसे बाँधी गयी मुट्ठीके द्वारा आठ मुट्ठी चावल लेकर श्रद्धा-भक्तिपूर्वक भात बनाता है और कुशासे वेष्टित आम्रपत्रके दोनेमें करेमूके साग और इमलीके साथ उस भातको इस व्रतकी समाप्तिके बाद ग्रहण करता है और बुधाष्टमीकी कथा सुनता है, उसकी सभी इच्छाएँ पूर्ण हो जाती हैं।

बुधाष्टमीको जलाशयमें पञ्चोपचार-विधिसे बुधदेवकी पूजा करनी चाहिये। तदनन्तर यथाशक्ति दक्षिणासे युक्त ककड़ी और चावलका दान देना चाहिये। इस देवके पूजनका बीजमन्त्र 'ॐ बुं बुधाय नमः' है। इस देवपूजाके पश्चात् कमलगट्टे आदिकी आहुति देनेके लिये इसी बीजमन्त्रके अन्तमें 'स्वाहा' शब्दका प्रयोग करना चाहिये। जलाशयके मध्य जिस पूजामण्डलकी कल्पना करे, उस मण्डलके मध्य कल्पित पद्मदलके ऊपर धनुष-बाणसे युक्त श्यामवर्णवाले इन देवकी भावना कर उनके अङ्गोंकी पूजा करे।

इस बुधाष्टमीकी कथा बड़ी ही पुण्यदायिनी है। इस व्रतकी कथा व्रत करनेवाले जनोंको अवश्य सुननी चाहिये। वह कथा इस प्रकार है—

प्राचीनकालमें पाटलिपुत्र नामक नगरमें वीर नामका एक श्रेष्ठ ब्राह्मण रहता था। उसकी पत्नीका नाम रम्भा और पुत्रका नाम कौशिक था। उसके विजया नामकी एक पुत्री थी तथा धनपाल नामका एक बैल था। ग्रीष्म-ऋतुमें एक बार कौशिक उस