Skip to content
SarvaKosh
Back to the archive

वेदान्त दर्शन: ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)

Vedanta Darshana: Brahma Sutra with Shankara Bhashya

by भगवान् बादरायण व्यास व आदि शङ्कराचार्य

Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (origin)

DevanagariSanskritpublished486 pages

४४२ वेदान्त-दर्शन [ पाद ३

Page 445Permalink

४४२ वेदान्त-दर्शन [ पाद ३
है। उस रास्तेसे ऊपर उठकर वह शोकरहित ब्रह्मलोकको प्राप्त हो जाता
है, वहाँ अनन्तकालतक निवास करता है (उसके बाद ब्रह्ममें लीन हो
जाता है) (बृह० उ० ५। १०। १)।
तीसरी श्रुति कहती है—'वह इस देवयानमार्गको प्राप्त होकर अग्निलोकमें
आता है, फिर वायुलोक, सूर्यलोक, वरुणलोक, इन्द्रलोक तथा प्रजापतिलोकमें
होता हुआ ब्रह्मलोकमें पहुँच जाता है।' (कौ० उ० १। ३)
इन वर्णनोंमें वायुलोकका वर्णन दो श्रुतियोंमें आया है। कौषीतकि-
उपनिषद्में तो केवल लोकोंका नाममात्र कह दिया, विशेषरूपसे क्रमका
स्पष्टीकरण नहीं किया; किंतु बृहदारण्यकमें वायुलोकसे सूर्यलोकमें
जानेका उल्लेख स्पष्ट है। अतः अर्चिसे आरम्भ करके मार्गका वर्णन
करनेवाली छान्दोग्योपनिषद्की श्रुतिमें अग्निके स्थानमें तो अर्चि कही है,
परंतु वहाँ वायुलोकका वर्णन नहीं है, इसलिये वायुलोकको संवत्सरके
बाद और सूर्यके पहले मानना चाहिये।
सम्बन्ध—वरुण, इन्द्र और प्रजापति लोकका भी अर्चि आदि मार्गमें
वर्णन नहीं है, अतः उनको किसके बाद समझना चाहिये? इस जिज्ञासापर
कहते हैं—
तडितोऽधि वरुणः सम्बन्धात्॥ ४। ३। ३॥
तडितः=विद्युत्से; अधि=ऊपर; वरुणः=वरुणलोक (समझना चाहिये);
सम्बन्धात्=क्योंकि उन दोनोंका परस्पर सम्बन्ध है।
व्याख्या—वरुण जलका स्वामी है, विद्युत्का जलसे निकटतम
सम्बन्ध है, इसलिये विद्युत्के ऊपर वरुणलोककी स्थिति समझनी
चाहिये। उसके बाद इन्द्र और प्रजापतिके लोकोंकी स्थिति भी उस श्रुतिमें
कहे हुए क्रमानुसार समझ लेनी चाहिये। इस प्रकार सब श्रुतियोंकी एकता
हो जायगी और एक मार्ग माननेमें किसी प्रकारका विरोध नहीं रहेगा।
सम्बन्ध—अर्चिरादि मार्गमें जो अर्चि, अहः, पक्ष, अयन, संवत्सर,