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वेदान्त दर्शन: ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)

Vedanta Darshana: Brahma Sutra with Shankara Bhashya

by भगवान् बादरायण व्यास व आदि शङ्कराचार्य

Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (origin)

DevanagariSanskritpublished486 pages

सूत्र ३ ] अध्याय १ २५

Page 28Permalink

सूत्र ३ ] अध्याय १ २५
है¹ तथा समस्त विशेषणोंसे युक्त होकर भी निर्विशेष² है। इस प्रकार उस
सर्वशक्तिमान् परब्रह्म परमेश्वरमें विपरीत भावोंका समावेश स्वाभाविक
होनेके कारण यहाँ शंकाके लिये स्थान नहीं है।³
सम्बन्ध—कर्तापन और भोक्तापनसे रहित, नित्य शुद्ध, बुद्ध, मुक्त ब्रह्मको
इस जगत्का कारण कैसे माना जा सकता है? इसपर कहते हैं—
शास्त्रयोनित्वात् ॥ १ । १ । ३ ॥
शास्त्रयोनित्वात्= शास्त्र (वेद)-में उस ब्रह्मको जगत्का कारण बताया
गया है, इसलिये (उसको जगत्का कारण मानना उचित है)।
१-एको देवः सर्वभूतेषु गूढः सर्वव्यापी सर्वभूतान्तरात्मा।
कर्माध्यक्षः सर्वभूताधिवासः साक्षी चेता केवलो निर्गुणश्च॥ (श्वेता० ६। ११)
'वह एक देव ही सब प्राणियोंमें छिपा हुआ, सर्वव्यापी और समस्त प्राणियोंका
अन्तर्यामी परमात्मा है; वही सबके कर्मोंका अधिष्ठाता, सम्पूर्ण भूतोंका निवास-स्थान,
सबका साक्षी, चेतनस्वरूप, सर्वथा विशुद्ध और गुणातीत है।'
२-एष सर्वेश्वर एष सर्वज्ञ एषोऽन्तर्याम्येष योनिः सर्वस्य प्रभवाप्ययौ हि भूतानाम् ॥
(मा० उ० ६)
'यह सबका ईश्वर है, यह सर्वज्ञ है, यह सबका अन्तर्यामी है, यह सम्पूर्ण
जगत्का कारण है; क्योंकि समस्त प्राणियोंकी उत्पत्ति, स्थिति, प्रलयका स्थान यही है।'
नान्तःप्रज्ञं न बहिष्प्रज्ञं नोभयतःप्रज्ञं न प्रज्ञानघनं न प्रज्ञं नाप्रज्ञम्।
अदृष्टमव्यवहार्यमग्राह्यमलक्षणमचिन्त्यमव्यपदेश्यमेकात्मप्रत्ययसारं प्रपञ्चोपशमं शान्तं शिवमद्वैतं
चतुर्थं मन्यन्ते स आत्मा स विज्ञेयः ॥ (मा० उ० ७)
'जो न भीतरकी ओर प्रज्ञावाला है, न बाहरकी ओर प्रज्ञावाला है, न दोनों ओर
प्रज्ञावाला है, न प्रज्ञानघन है, न जाननेवाला है, न नहीं जाननेवाला है, जो देखा नहीं
गया है, जो व्यवहारमें नहीं लाया जा सकता, जो पकड़नेमें नहीं आ सकता, जिसका
कोई लक्षण नहीं है, जो चिन्तन करनेमें नहीं आ सकता, जो बतलानेमें नहीं आ सकता,
एकमात्र आत्माकी प्रतीति ही जिसका सार है, जिसमें प्रपंचका सर्वथा अभाव है, ऐसा
सर्वथा शान्त, कल्याणमय, अद्वितीय तत्त्व परब्रह्म परमात्माका चतुर्थ पाद है, इस प्रकार
ब्रह्मज्ञानी मानते हैं। वह परमात्मा है, वह जाननेयोग्य है।'
३-इस विषयका निर्णय सूत्रकारने स्वयं किया है। देखो सूत्र ३।२।११ से
३।२।२३ तककी व्याख्या।