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वेदान्त दर्शन: ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)

Vedanta Darshana: Brahma Sutra with Shankara Bhashya

by भगवान् बादरायण व्यास व आदि शङ्कराचार्य

Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (origin)

DevanagariSanskritpublished486 pages

सूत्र २० ] अध्याय ३ २७७

Page 280Permalink

सूत्र २० ] अध्याय ३ २७७
नीचेके लोकोंमें जाते हैं' (इसीके अन्तर्गत उक्त तीसरी गतिसे अधम यह
यमयातनास्वरूप गति भी है) इसका स्पष्टीकरण गीता अध्याय १६ श्लोक
२०में किया गया है। इस प्रकार इस यमयातनास्वरूप अधोगतिका वर्णन स्मृतियोंमें
पाया जाता है तथा लोकमें भी यह प्रसिद्ध है। पुराणोंमें तो इसका वर्णन बड़े
विस्तारसे आता है। इसको अधोगति कहते हैं, इसलिये वहाँसे जो नारकी
जीवोंका पुन: मृत्युलोकमें आना है, वह उनका पूर्व कथनके अनुसार ऊपर
उठना है और पुन: नरकमें जाना ही नीचे गिरना है।
सम्बन्ध— अब दूसरा प्रमाण देकर उसी बातको सिद्ध करते हैं—
दर्शनाच्च ॥ ३ । १ । २० ॥
दर्शनात्=श्रुतिमें भी ऐसा वर्णन देखा जाता है, इसलिये; च=भी (यह
मानना ठीक है कि इस प्रकरणमें बतायी हुई तीसरी गतिमें यमयातनाका
अन्तर्भाव नहीं है)।
व्याख्या—ईशावास्योपनिषद्में कहा है—
असुर्या नाम ते लोका अन्धेन तमसाऽऽवृताः।
ताँस्ते प्रेत्याभिगच्छन्ति ये के चात्महनो जनाः॥
(ईशा० ३)
'जो असुरोंके प्रसिद्ध लोक हैं, वे सब-के-सब अज्ञान तथा दुःख-
क्लेशरूप महान् अन्धकारसे आच्छादित हैं, जो कोई भी आत्माकी हत्या
करनेवाले मनुष्य हैं, वे मरनेके बाद उन्हीं भयंकर लोकोंको बार-बार प्राप्त
होते हैं।' इस प्रकार उपनिषदोंमें भी उस नरकादि लोकोंकी प्राप्तिरूप
गतिका वर्णन देखा जाता है। इसलिये भी यही सिद्ध होता है कि इस प्रसंगमें
कही हुई तीसरी गतिमें यमयातनावाली गतिका अन्तर्भाव नहीं है।
सम्बन्ध— यहाँ यह जिज्ञासा होती है कि छान्दोग्योपनिषद्में जीवोंकी
तीन श्रेणियाँ बतायी गयी हैं—अण्डज—अण्डेसे उत्पन्न होनेवाले, जीवज—
जेरसे उत्पन्न होनेवाले और उद्भिज्ज—पृथ्वी फोड़कर उत्पन्न होनेवाले
(छा० उ० ६ । ३ । १); किंतु दूसरी जगह जीवोंके चार भेद सुने जाते हैं।