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१०८ उपनिषद् (ज्ञान खण्ड - भाग २)

108 Upanishads Part 2 - Gyan Khand

by पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य

Source: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (origin)

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DevanagariSanskritpublished505 pages

About this granth

This is the Gyan Khand (ज्ञान खण्ड), the second volume of the 108 Upanishad series edited by Pandit Shriram Sharma Acharya. The series sorts the Upanishads into three thematic groups; this one brings together texts focused on knowledge of the Self, Brahman and the world.

As in the other volumes, the Sanskrit mantras are printed with a simple Hindi bhavartha, and running heads mark adhyaya, khanda and mantra numbers. The Katha Upanishad appears here with its two adhyayas and six vallis, carrying the dialogue between Nachiketa and Yama. The introduction places the Upanishads within the four layers of Vedic literature (Samhita, Brahmana, Aranyaka and Upanishad) and contrasts their emphasis on knowledge with the ritual concerns of the earlier layers.

The copy was published by Yug Nirman Yojana, Gayatri Tapobhumi, Mathura, in 2005 and runs to 505 pages, making it the largest of the three parts in this printing.

अध्याय २ ब्राह्मण ४ मन्त्र ८ २७३

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अध्याय २ ब्राह्मण ४ मन्त्र ८ २७३
ऋषि याज्ञवल्क्य ने कहा-हे मैत्रेयी ! निश्चित ही पति की आकांक्षा पूर्ति के लिए पति प्रिय नहीं होता
वरन् अपनी (आत्मीयता) आकांक्षा पूर्ति के लिए (पत्नी को) पति प्रिय होता है। इसी प्रकार पत्नी के
प्रयोजन के लिए नहीं बल्कि अपने प्रयोजन के लिए (पति को) पत्नी प्रिय होती है। पुत्रों की आकांक्षा पूर्ति
के लिए नहीं, वरन् अपनी आकांक्षा पूर्ति के लिए (पिता को) पुत्र प्रिय होते हैं। धन के प्रयोजन पूर्ति के
लिए नहीं, वरन् अपने प्रयोजन की पूर्ति के लिए (व्यक्ति को) धन प्रिय होता है। ज्ञान या ब्राह्मण के प्रयोजन
के लिए नहीं, वरन् अपने प्रयोजन के लिए ज्ञान या ब्राह्मण प्रिय होता है। शक्ति अथवा क्षत्रिय की आकांक्षा
के लिए नहीं, वरन् अपनी आकांक्षा पूर्ति के लिए शक्ति (क्षत्रिय को) प्रिय होती है। देवों के प्रयोजन के
लिए नहीं, वरन् स्व प्रयोजन की पूर्ति के लिए देवता प्रिय होते हैं। लोकों के प्रयोजन के लिए नहीं, वरन्
अपनी ही इच्छा पूर्ति के लिए लोक प्रिय होते हैं। प्राणियों के हित के लिए नहीं, वरन् अपने हित के लिए
प्राणी प्रिय होते हैं। सभी के हित के निमित्त नहीं, वरन् अपने हित के निमित्त सब प्रिय होते हैं। इसलिए हे
मैत्रेयी ! यह आत्मा ही दर्शन करने योग्य, श्रवण करने योग्य, मनन करने योग्य और निदिध्यासन (अनुभव)
ध्यान करने योग्य है। इस आत्मा के दर्शन, श्रवण, मनन और ज्ञान से सभी का ज्ञान हो जाता है ॥ ५ ॥
ब्रह्म तं परादाद्यो ऽन्यत्रात्मनो ब्रह्म वेद क्षत्रं तं परादाद्यो ऽन्यत्रात्मनः क्षत्रं वेद लोकास्तं
परादुर्यो ऽन्यत्रात्मनो लोकान्वेद देवास्तं परादुर्यो ऽन्यत्रात्मनो देवान्वेद भूतानि तं
परादुर्योऽन्यत्रात्मनो भूतानि वेद सर्वं तं परादाद्योऽन्यत्रात्मनः सर्वं वेदेदं ब्रह्मेदं क्षत्रमिमे
लोका इमे देवा इमानि भूतानीदः सर्वं यदयमात्मा ॥ ६ ॥
जो ब्राह्मण या ज्ञान को आत्मा से भिन्न किसी अन्य वस्तु में जानने वाला होता है, उसे ब्राह्मण या ज्ञान
परित्यक्त कर देता है। क्षत्रिय या बल को आत्मा से भिन्न किसी अन्य वस्तु में देखने वाले को बल या क्षत्रिय
परित्यक्त कर देता है। लोकों को आत्मा के अतिरिक्त किसी अन्य में जानने वाले को लोक त्याग देते हैं।
देवताओं को आत्मा के अतिरिक्त किसी अन्य में जानने वाले को देवता छोड़ देते हैं और समस्त प्राणियों
को आत्मा के अतिरिक्त किसी अन्य में देखने वाले को समस्त प्राणी त्याग देते हैं। इस प्रकार ब्राह्मण
(ज्ञान), क्षत्रिय (शक्ति), लोक, देवता और समस्त प्राणी ये सभी आत्मा ही हैं, उसके अतिरिक्त कुछ नहीं ॥
स यथा दुन्दुभेर्हन्यमानस्य न बाह्याञ्छब्दाञ्छक्नुयाद्ग्रहणाय दुन्दुभेस्तु ग्रहणेन
दुन्दुभ्याघातस्य वा शब्दो गृहीतः ॥ ७ ॥
जिस प्रकार बजती हुई दुन्दुभि के बाहर निकलते हुए शब्दों को ग्रहण कर सकने में कोई दूसरा समर्थ
नहीं है। उन (शब्दों) को केवल स्वयं दुन्दुभि अथवा उसका वादक ही ग्रहण कर सकता है (उसी प्रकार
आत्म चेतना से आत्मा को प्राप्त किया जाता है।) ॥ ७ ॥
स यथा शङ्खस्य ध्मायमानस्य न बाह्याञ्छब्दाञ्छक्नुयाद्ग्रहणाय शङ्खस्य तु ग्रहणेन
शङ्खध्मस्य वा शब्दो गृहीतः ॥ ८ ॥
जैसे बजाये जाते हुए शङ्ख के शब्दों को केवल वह शङ्ख या उसका वादक ही ग्रहण कर सकता है,
अन्य कोई ग्रहण करने में समर्थ नहीं है (उसी प्रकार आत्मा द्वारा ही आत्मा को ग्रहण किया जा सकता है) ॥ ८ ॥

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२७४ बृहदारण्यकोपनिषद्
स यथा वीणायै वाद्यमानायै न बाह्यान् शब्दान् शक्नुयात् ग्रहणाय वीणायै तु
ग्रहणेन वीणावादस्य वा शब्दो गृहीतः ॥ ९ ॥
जैसे बजायी जाती हुई वीणा के शब्दों को स्वयं वह वीणा अथवा उसका वादक ही ग्रहण कर सकता
है,अन्य कोई नहीं (वैसे आत्मा को आत्मा अथवा उसके संचालक द्वारा ही ग्रहण किया जा सकता है) ॥
स यथार्द्राग्नेरभ्याहितात्पृथग्धूमा विनिश्चरन्त्येवं वा अरेऽस्य महतो भूतस्य
निःश्वसितमेतद्यदृग्वेदो यजुर्वेदः सामवेदोऽथर्वाङ्गिरस इतिहासः पुराणं विद्या उपनिषदः
श्लोकाः सूत्राण्यनुव्याख्यानानि व्याख्यानान्यस्यैवैतानि सर्वाणि निःश्वसितानि ॥ १० ॥
जिस तरह चारों ओर से आधान किये हुए गीले ईंधन से उत्पन्न अग्नि से धूम्र निकलता है, उसी प्रकार
हे मैत्रेयी ! ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद, अथर्ववेद, इतिहास, पुराण, उपनिषद्, सूत्र, श्लोक, व्याख्यान और
अनुव्याख्यान ये सभी उस महान् सत्ता के निःश्वास ही हैं ॥ १० ॥
स यथा सर्वासामपाः समुद्र एकायनमेवः सर्वेषाः स्पर्शानां त्वगेकायनमेवः सर्वेषां
गन्धानां नासिके एकायनमेवः सर्वेषाः रसानां जिह्वैकायनमेवः सर्वेषाः रूपाणां
चक्षुरेकायनमेवः सर्वेषाः शब्दानाः श्रोत्रमेकायनमेवः सर्वेषाः संकल्पानां मन
एकायनमेवः सर्वासां विद्यानाः हृदयमेकायनमेवः सर्वेषां कर्मणाः हस्तावेकायनमेवः
सर्वेषामानन्दानामुपस्थ एकायनमेवः सर्वेषां विसर्गाणां पायुरेकायनमेवः सर्वेषामध्वनां
पादावेकायनमेवः सर्वेषां वेदानां वागेकायनम् ॥ ११ ॥
जिस प्रकार समस्त जल का आश्रय स्थल एकमात्र समुद्र है, समस्त स्पर्शों का अयन त्वचा है, समस्त
गन्धों का आश्रय नासिका है, समस्त रसों का आश्रय रसना (जिह्वा) है, समस्त रूपों का आश्रय चक्षु है,
समस्त शब्दों का आश्रय श्रोत्र, समस्त संकल्पों का आश्रय मन, समस्त विद्याओं का आश्रय हृदय, समस्त
कर्मों का आश्रय हस्त, समस्त आनन्दों का आश्रय उपस्थ, समस्त विसर्गों (विसर्जनों) का आश्रय पायु
(गुदा), समस्त मार्गों का आश्रय चरण और समस्त वेदों का आश्रय वाक् शक्ति (वाणी) है ॥ ११ ॥
स यथा सैन्धवखिल्य उदके प्रास्त उदकमेवानुविलीयेत न हास्योद्ग्रहणायेव स्याद्यतो
यतस्त्वाददीत लवणमेवैवं वा अर इदं महद्भूतमनन्तमपारं विज्ञानघन एवैतेभ्यो भूतेभ्यः
समुत्थाय तान्येवानुविनश्यति न प्रेत्य संज्ञास्तीत्यरे ब्रवीमीति होवाच याज्ञवल्क्यः ॥ १२ ॥
जिस प्रकार जल के अन्दर नमक की डली डालने पर वह उसी में विलीन हो जाती है, उसे पकड़
सकना किसी के लिए सम्भव नहीं है, ठीक उसी प्रकार यह महद्भूत, अन्तहीन, पाररहित, विज्ञानघन
आत्मा समस्त भूतों से ऊँचा उठकर इन्हीं में विलुप्त हो जाता है। मृत्योपरान्त इस तत्त्व का नाम भी शेष नहीं
रहता, क्योंकि वह देहेन्द्रिय भाव से मुक्त हो जाता है- ऐसा ऋषि याज्ञवल्क्य ने मैत्रेयी से कहा ॥ १२ ॥
सा होवाच मैत्रेय्यत्रैव मा भगवान्मूमुहन्न प्रेत्य संज्ञास्तीति स होवाच याज्ञवल्क्यो
न वा अरेऽहं मोहं ब्रवीम्यलं वा अर इदं विज्ञानाय ॥ १३ ॥
मैत्रेयी ने कहा- हे भगवन् ! मृत्यु के उपरान्त नाम भी नहीं बचता, आपके इस वाक्य से तो मुझे

अध्याय २ ब्राह्मण ५ मन्त्र २ २७५

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अध्याय २ ब्राह्मण ५ मन्त्र २ २७५
मोहरूपी भ्रम उत्पन्न हो गया है। यह सुनकर महर्षि याज्ञवल्क्य बोले- हे मैत्रेयी ! ऐसा नहीं है, मैंने भ्रम में
डालने के लिए कुछ नहीं कहा है, वरन् जो कुछ कहा है, वह उस महद्भूत का ज्ञान प्राप्त कराने के लिए
कहा है और वह उस ज्ञान के लिए पर्याप्त है ॥ १३ ॥
यत्र हि द्वैतमिव भवति तदितर इतरं जिघ्रति तदितर इतरं पश्यति तदितर इतरः
शृणोति तदितर इतरमभिवदति तदितर इतरं मनुते तदितर इतरं विजानाति यत्र वा अस्य
सर्वमात्मैवाभूत्तत्केन कं जिघ्रेत्तत्केन कं पश्येत्तत्केन कः शृणुयात्तत्केन कमभिवदेत्तत्
केन कं मन्वीत तत्केन कं विजानीयाद्येनेदः सर्वं विजानाति तं केन विजानीयाद्विज्ञातारमरे
केन विजानीयादिति ॥ १४॥
जहाँ (अज्ञानावस्था में) द्वैत प्रतीत होता है, वहीं दूसरा दूसरे को सूँघता है, दूसरा दूसरे को देखता
है, दूसरा ही दूसरे का श्रवण करता है, दूसरा ही दूसरे के प्रति कहता है, दूसरा ही दूसरे का मनन करता
है और दूसरा ही दूसरे को जानता है; किन्तु जब यह सब आत्मरूप ही हो गया, तब वह किसके द्वारा
किसको सूँघे, किसके द्वारा किसको देखे, किसके द्वारा किसको सुने, किसके द्वारा किसको कहे और
किसके द्वारा किसका मनन करे एवं जाने। जिससे सब कुछ जाना जाता है, उसे किसके माध्यम से जाने।
अस्तु, हे मैत्रेयी ! विज्ञाता को कैसे जाना जा सकता है ? ॥ १४॥
॥ पञ्चमं ब्राह्मणम् ॥
इयं पृथिवी सर्वेषां भूतानां मध्वस्यै पृथिव्यै सर्वाणि भूतानि मधु यश्चायमस्यां
पृथिव्यां तेजोमयोऽमृतमयः पुरुषो यश्चायमध्यात्मं शारीरस्तेजोमयोऽमृतमयः पुरुषोऽयमेव
स योऽयमात्मेदममृतमिदं ब्रह्मेदः सर्वम् ॥ १ ॥
यह पृथ्वी समस्त प्राणियों का मधु है और समस्त प्राणी पृथ्वी के लिए मधु स्वरूप हैं। इस पृथ्वी में
जितने भी अमर्त्य और तेजरूपी पुरुष है एवं इस शरीर में विनाशरहित और तेजस् सम्पन्न जो आत्मा है, वही
सर्वव्यापी परमात्मा है। यही कभी नष्ट न होने वाला ब्रह्म है एवं जो कुछ भी है, सब कुछ यही है ॥ १॥
[मधु रोचक और पोषक होता है। पृथ्वी के लिए प्राणी तथा प्राणियों के लिए पृथ्वी रोचक एवं पोषक है,
इसीलिए वे एक दूसरे के मधु कहे गये हैं। यह संगति स्रष्टा का कौशल है- कमाल है। इसी प्रकार प्रकृति के अन्य
घटकों के बारे में भी कहा गया है।]
इमा आपः सर्वेषां भूतानां मध्वासामपाः सर्वाणि भूतानि मधु यश्चायमास्वप्सु
तेजोमयोऽमृतमयः पुरुषो यश्चायमध्यात्मः रैतसस्तेजोमयोऽमृतमयः पुरुषोऽयमेव स
योऽयमात्मेदममृतमिदं ब्रह्मेदः सर्वम् ॥ २॥
यह जल समस्त प्राणियों का मधु है और समस्त प्राणी जल के लिए मधु तुल्य हैं। जल में स्थित जो
तेजोमय अमृतस्वरूप पुरुष है और जो इस शरीर में अविनाशी आत्मास्वरूप पुरुष स्थित है, वही
सर्वव्यापी परमात्मा है, वही अविनाशी ब्रह्म है। यहाँ जो कुछ भी है, सब कुछ यही है ॥ २ ॥

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२७६ बृहदारण्यकोपनिषद्
अयमग्निः सर्वेषां भूतानां मध्वस्याग्नेः सर्वाणि भूतानि मधु यश्चायमस्मिन्नग्नौ
तेजोमयोऽमृतमयः पुरुषो यश्चायमध्यात्मं वाङ्मयस्तेजोमयोऽमृतमयः पुरुषोऽयमेव स
योऽयमात्मेदममृतमिदं ब्रह्मेदः सर्वम् ॥ ३ ॥
यह अग्नि समस्त प्राणियों का मधु है और समस्त प्राणी इस अग्नि के लिए मधुस्वरूप हैं। इस अग्नि
में स्थित तेजोमय और विनाशरहित जो पुरुष है और इस शरीर में स्थित वाङ्मय तेजस्वरूप जो पुरुष
आत्मा रूप में स्थित है, वही ब्रह्म, अमर्त्य और सर्व है अर्थात् जो कुछ भी है, सब यही है ॥ ३ ॥
अयं वायुः सर्वेषां भूतानां मध्वस्य वायोः सर्वाणि भूतानि मधु यश्चायमस्मिन्वायौ
तेजोमयोऽमृतमयः पुरुषो यश्चायमध्यात्मं प्राणस्तेजोमयोऽमृतमयः पुरुषोऽयमेव स
योऽयमात्मेदममृतमिदं ब्रह्मेदः सर्वम् ॥ ४ ॥
यह वायु समस्त जीवों का मधु है और समस्त जीव वायु के लिए मधु तुल्य हैं। वायु में संव्याप्त
तेजोमय अमृत पुरुष और देह में संव्याप्त प्राणरूप अमृतमय तेजस्वी आत्मा ही ब्रह्म (परमात्मा) है। यहाँ
जो कुछ भी है, सब कुछ यही है ॥ ४ ॥
अयमादित्यः सर्वेषां भूतानां मध्वस्यादित्यस्य सर्वाणि भूतानि मधु
यश्चायमस्मिन्नादित्ये तेजोमयोऽमृतमयः पुरुषो यश्चायमध्यात्मं चाक्षुषस्तेजोमयोऽमृतमयः
पुरुषोऽयमेव स योऽयमात्मेदममृतमिदं ब्रह्मेदः सर्वम् ॥ ५ ॥
यह आदित्य समस्त प्राणियों का मधु है। समस्त प्राणी आदित्य के लिए मधु स्वरूप है। इस आदित्य
में विद्यमान जो तेजःसम्पन्न और अविनाशी पुरुष है और इस शरीर में स्थित चाक्षुष तेजःसम्पन्न और अमृत
युक्त जो सर्वव्यापी आत्मा है। यही परब्रह्म, अमर्त्य और सब कुछ है ॥ ५ ॥
इमा दिशः सर्वेषां भूतानां मध्वासां दिशाः सर्वाणि भूतानि मधु यश्चायमासु दिक्षु
तेजोमयोऽमृतमयः पुरुषो यश्चायमध्यात्मः श्रोत्रः प्रातिश्रुत्कस्तेजोमयोऽमृतमयः
पुरुषोऽयमेव स योऽयमात्मेदममृतमिदं ब्रह्मेदः सर्वम् ॥ ६ ॥
ये दिशाएँ समस्त प्राणियों के लिए मधु स्वरूप हैं और समस्त प्राणी दिशाओं के निमित्त मधु स्वरूप
है। इन दिशाओं में स्थित तेजःसम्पन्न अमर पुरुष तथा शरीर में स्थित श्रोत्रमय तेजःसम्पन्न अविनाशी पुरुष
(आत्मा) ही सर्वव्यापी ब्रह्म, विनाश रहित और सर्वस्वरूप अर्थात् सब कुछ है ॥ ६ ॥
अयं चन्द्रः सर्वेषां भूतानां मध्वस्य चन्द्रस्य सर्वाणि भूतानि मधु यश्चायमस्मिँश्चन्द्रे
तेजोमयोऽमृतमयः पुरुषो यश्चायमध्यात्मं मानसस्तेजोमयोऽमृतमयः पुरुषोऽयमेव स
योऽयमात्मेदममृतमिदं ब्रह्मेदः सर्वम् ॥ ७ ॥
यह चन्द्रमा समस्त भूतों-प्राणियों के लिए और समस्त भूत (प्राणी) चन्द्रमा के लिए मधुरूप हैं।
चन्द्रमा में स्थित तेजोमय-अविनाशी पुरुष तथा शरीर में स्थित, मन में विद्यमान तेजोयुक्त अमर पुरुष ही
सर्व-व्यापक परब्रह्म है, यही अविनाशी तथा सभी कुछ है ॥ ७॥

अध्याय २ ब्राह्मण ५ मन्त्र १३ २७७

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अध्याय २ ब्राह्मण ५ मन्त्र १३ २७७
इयं विद्युत्सर्वेषां भूतानां मध्वस्यै विद्युत: सर्वाणि भूतानि मधु यश्चायमस्यां विद्युति
तेजोमयोऽमृतमय: पुरुषो यश्चायमध्यात्मं तैजसस्तेजोमयोऽमृतमय: पुरुषोऽयमेव स
योऽयमात्मेदममृतमिदं ब्रह्मेदँ सर्वम् ॥ ८ ॥
यह विद्युत् समस्त भूतों का मधु और समस्त भूत इस विद्युत् के लिए मधुरूप हैं। विद्युत् स्थित जो
तेजोमय और अमर्त्य पुरुष है एवं शरीर स्थित (तैजस) जो तेजःसम्पन्न और अमर पुरुष है, वही
सर्वव्यापक और कभी नष्ट न होने वाला आत्मा है, यही अमृत, यही ब्रह्म और यही सब कुछ है ॥ ८॥
अयँ स्तनयित्नुः सर्वेषां भूतानां मध्वस्य स्तनयित्नोः सर्वाणि भूतानि मधु
यश्चायमस्मिन्स्तनयित्नौ तेजोमयोऽमृतमयः पुरुषो यश्चायमध्यात्मँ शाब्दः
सौवरस्तेजोमयोऽमृतमयः पुरुषोऽयमेव स योऽयमात्मेदममृतमिदं ब्रह्मेदँसर्वम् ॥ ९ ॥
गरजते हुए मेघ प्राणियो के मधु हैं और प्राणी मेघों के मधु हैं। इस मेघ में जो तेजस्वी और अविनाशी
पुरुष है तथा शरीर में जो तेजोमय-अविनाशी पुरुष है, वही आत्मा है, अनश्वर है और सब कुछ है ॥ ९ ॥
अयमाकाशः सर्वेषां भूतानां मध्वस्याकाशस्य सर्वाणि भूतानि मधु
यश्चायमस्मिन्नाकाशे तेजोमयोऽमृतमयः पुरुषो यश्चायमध्यात्मँ हृद्याकाशस्तेजो
मयोऽमृतमयः पुरुषोऽयमेव स योऽयमात्मेदममृतमिदं ब्रह्मेदँ सर्वम् ॥ १० ॥
यह आकाश समस्त जीवों का मधु है और समस्त जीव आकाश के लिए मधुरूप हैं। इस अन्तरिक्ष
में जो तेजोयुक्त अविनाशी पुरुष स्थित है और इस शरीर में जो हृदयाकाश स्थित तेजः सम्पन्न और अनश्वर
आत्मा विद्यमान है, वही सर्वव्यापक ब्रह्म और समस्त भूतों से युक्त है, यही सब कुछ है ॥ १० ॥
अयं धर्मः सर्वेषां भूतानां मध्वस्य धर्मस्य सर्वाणि भूतानि मधु यश्चायमस्मिन्धर्मे
तेजोमयोऽमृतमयः पुरुषो यश्चायमध्यात्मं धार्मस्तेजोमयोऽमृतमयः पुरुषोऽयमेव स
योऽयमात्मेदममृतमिदं ब्रह्मेदँ सर्वम् ॥ ११ ॥
यह धर्म प्राणियों का मधु है और प्राणी धर्म के मधुरूप हैं। धर्म स्थित तेजोमय और अविनाशी पुरुष
तथा शरीर स्थित तेजोमय और अमर्त्य पुरुष ही सर्वव्यापी, अविनाशी परमात्मा है। यही सभी कुछ है ॥ ११ ॥
इदँ सत्यँ सर्वेषां भूतानां मध्वस्य सत्यस्य सर्वाणि भूतानि मधु यश्चायमस्मिन्सत्ये
तेजोमयोऽमृतमयः पुरुषो यश्चायमध्यात्मँ सात्यस्तेजोमयोऽमृतमयः पुरुषोऽयमेव स
योऽयमात्मेदममृतमिदं ब्रह्मेदँ सर्वम् ॥ १२ ॥
यह सत्य सभी भूतों (प्राणियों) के लिए मधु है तथा समस्त भूत (प्राणी) सत्य के लिए मधु स्वरूप
हैं। सत्य स्थित जो तेजः सम्पन्न अविनाशी पुरुष विद्यमान है और शरीर में स्थित जो सत्य स्वरूप तेजः
सम्पन्न अनश्वर आत्मा है, वही अविनाशी और सर्वस्वरूप ब्रह्म है, सब कुछ यही है ॥ १२ ॥
इदं मानुषँ सर्वेषां भूतानां मध्वस्व मानुषस्य सर्वाणि भूतानि मधु यश्चायमस्मिन्मानुषे
तेजोमयोऽमृतमयः पुरुषः यश्चायमध्यात्मं मानुषः तेजोमयोऽमृतमयः पुरुषोऽयमेव स
योऽयमात्मेदममृतमिदं ब्रह्मेदँ सर्वम् ॥ १३ ॥

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२७८ बृहदारण्यकोपनिषद्
यह मनुष्य समुदाय समस्त प्राणियों का मधु है और समस्त प्राणी मानव समुदाय के लिए मधु हैं।
मनुष्य समुदाय में स्थित जो अविनाशी और तेजःसम्पन्न पुरुष है तथा इस मानव शरीर में जो भावयुक्त
तेजस्वी, अमर्त्य पुरुष है, वही सर्वव्यापक अविनाशी ब्रह्म है और सब कुछ यही है॥ १३॥
अयमात्मा सर्वेषां भूतानां मध्वस्यात्मनः सर्वाणि भूतानि मधु यश्चायमस्मिन्नात्मनि
तेजोमयोऽमृतमयः पुरुषो यश्चायमात्मा तेजोमयोऽमृतमयः पुरुषोऽयमेव स
योऽयमात्मेदममृतमिदं ब्रह्मेदं सर्वम्॥ १४॥
यह आत्मा जीवों का मधु है और जीव इस आत्मा के मधु हैं। आत्मा में स्थित जो तेजस्वी और
अविनाशी पुरुष है तथा आत्मा रूप में तेजस्वी और अविनाशी परब्रह्म है, वही सर्वव्यापक अविनाशी ब्रह्म
है, यही सब कुछ है ॥१४॥
स वा अयमात्मा सर्वेषां भूतानामधिपतिः सर्वेषां भूतानाꣳ राजा तद्यथा रथनाभौ
च रथनेमौ चाराः सर्वे समर्पिता एवमेवास्मिन्नात्मनि सर्वाणि भूतानि सर्वे देवाः सर्वे
लोकाः सर्वे प्राणाः सर्व एत आत्मानः समर्पिताः ॥ १५॥
निश्चित रूप से आत्मा ही समस्त प्राणियों का अधिपति और राजा है। जिस प्रकार रथ की नाभि में
एवं नेमि में सभी अरे जुड़े रहते हैं, उसी प्रकार समस्त जीव, समस्त देवता, समस्त लोक और समस्त प्राण
आत्मा से जुड़े रहते हैं अथवा आत्मा में सन्निहित हैं॥ १५ ॥
इदं वै तन्मधु दध्यङ्ङाथर्वणोऽश्विभ्यामुवाच तदेतदृषिः पश्यन्नवोचत् । तद्वां नरा
सनये दꣳस उग्रमाविष्कृणोमि तन्यतुर्न वृष्टिम् । दध्यङ् ह यन्मध्वाथर्वणो वामश्वस्य
शीर्ष्णा प्रयदिमुवाचेति ॥ १६॥
इस मधु (आत्मविद्या) का वर्णन दध्यङ् आथर्वण ने अश्विनीकुमारों से किया था। ऋषि ने उनसे
कहा कि हे अश्विनीकुमारो ! जिस प्रकार मेघ वृष्टि को प्रकट करते हैं, उसी प्रकार मैं तुम्हारे उग्र कर्म को
प्रकट करता हूँ। अश्व के मस्तक वाले तुम दोनों के लिए यह आथर्वण मधु विद्या प्रदान कर रहा हूँ॥ १६॥
इदं वै तन्मधु दध्यङ्ङाथर्वणोऽश्विभ्यामुवाच तदेतदृषिः पश्यन्नवोचदाथर्वणायाश्विना
दधीचेऽश्व्यꣳशिरः प्रत्यैरयतम्। स वां मधु प्रवोचदृतायन्त्वाष्ट्रं यद्दस्रावपि कक्ष्यं वामिति ॥ १७॥
इस मधु विद्या को आथर्वण दध्यङ् ने अश्विनीकुमारो को प्रदान किया था। मंत्रद्रष्टा ऋषि बोले- हे
अश्विनीकुमारो ! आप आथर्वण के निमित्त अश्व का मस्तक लाएँ। उन्होंने सत्य की रक्षा करते हुए आपको
त्वाष्ट्रोपदेश (अर्थात् सूर्य सम्बन्धी मधुविद्या का उपदेश) किया, वह ज्ञान गोपनीय था ॥ १७॥
इदं वै तन्मधु दध्यङ्ङाथर्वणोऽश्विभ्यामुवाच तदेतदृषिः पश्यन्नवोचत् । पुरश्चक्रे
द्विपदः पुरश्चक्रे चतुष्पदः पुरःस पक्षी भूत्वा पुरःपुरुष आविशदिति । स वा अयं पुरुषः
सर्वासु पूर्षु पुरिशयो नैनेन किंचनानावृतम् ॥ १८॥
इस मधुविद्या का उपदेश आथर्वण दध्यङ् ने अश्विनीकुमारों के प्रति किया था। मन्त्रद्रष्टा ने कहा कि
परब्रह्म ने सर्वप्रथम द्विपादों और चतुष्पादों वाले शरीरों का निर्माण किया। इसके पश्चात् वह विराट् पुरुष

अध्याय २ ब्राह्मण ६ मन्त्र ३ २७९

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अध्याय २ ब्राह्मण ६ मन्त्र ३ २७९
उन शरीरों में प्रविष्ट हो गया। इसी कारण पुरुष को "पुरिशय" (पुरों-शरीरों में स्थित) कहते हैं।
इस सृष्टि में ऐसा कोई नहीं है, जिसके अन्दर वह प्रविष्ट न हो ॥ १८ ॥
इदं वै तन्मधु दध्यङ्ङाथर्वणोऽश्विभ्यामुवाच तदेतदृषिः पश्यन्नवोचद्रूपं रूपं प्रतिरूपो
बभूव तदस्य रूपं प्रतिचक्षणाय। इन्द्रो मायाभिः पुरुरूप ईयते युक्ता ह्यस्य हरयः शता
दशेत्ययं वै हरयोऽयं वै दश च सहस्राणि बहूनि चानन्तानि च तदेतद्ब्रह्मापूर्वमनपरमन-
न्तरमबाह्यमयमात्मा ब्रह्म सर्वानुभूरित्यनुशासनम् ॥ १९ ॥
इस मधु का उपदेश दध्यङ् आथर्वण ने अश्विनीकुमारों को दिया था। मन्त्रद्रष्टा ऋषि ने कहा कि
शरीरधारी को उसके (वास्तविक) स्वरूप में प्रकट करने के लिए वह पुरुष शरीरधारी का प्रतिरूप (जल,
वायु या आकाश की तरह पात्र के आकार का) हो जाता है। वह परमात्मा एक होते हुए भी माया से अनेक
रूपों वाला प्रतिभासित होता है। शरीर रूपी रथ में जुते इन्द्रियों रूपी अश्व-दस, सहस्र और अनन्त हैं। वह
ब्रह्म कारण विहीन, कार्यविहीन, अन्तर और बाहर से भी विहीन है। समस्त विषयों का अनुभव करने वाला
आत्मा ही ब्रह्मरूप है। समस्त वेदान्तों का उपदेश भी यही है ॥ १९ ॥
॥ षष्ठं ब्राह्मणम् ॥
अथ वंशः पौतिमाष्यो गौपवनाद्गौपवनः पौतिमाष्यात्पौतिमाष्यो गौपवनाद्गौपवनः
कौशिकात्कौशिकः कौण्डिन्यात्कौण्डिन्यः शाण्डिल्याच्छाण्डिल्यः कौशिकाच्च
गौतमाच्च गौतमः ॥ १ ॥ आग्निवेश्यादाग्निवेश्यः शाण्डिल्याच्चानभिम्लाताच्चानभिम्लात
आनभिम्ला-तादानभिम्लात-आनभिम्लातादानभिम्लातो गौतमाद्गौतमः सैतवप्राची-
नयोग्याभ्याँ सैतवप्राचीनयोग्यौ पाराशर्यात्पाराशर्यो भारद्वाजाद्भारद्वाजो भारद्वाजाच्च
गौतमाच्च गौतमो भारद्वाजाद्भारद्वाजः पाराशर्यात् पाराशर्यो बैजवापायनाद्वैजवापायनः
कौशिकायनेः कौशिकायनिः ॥ २॥ घृतकौशिकाद्घृतकौशिकः पाराशर्यायणा-
त्पाराशर्यायणः पाराशर्यात् पाराशर्यो जातूकर्ण्याज्जातूकर्ण्य आसुरायणाच्च यास्का-
च्चासुरायणस्त्रैवणेस्त्रैवणिरौपजन्धनेरौपजन्धनिरासुरेरासुरिर्भारद्वाजाद्भारद्वाज
आत्रेयादात्रेयो माण्टेर्माण्टिर्गौतमाद्गौतमो गौतमाद्गौतमो वात्स्याद्वात्स्यः शाण्डिल्या-
च्छाण्डिल्यः कैशोर्यात्काप्यात्कैशोर्यः काप्यः कुमारहारितात्कुमारहारितो गालवाद्गालवो
विदर्भीकौण्डिन्याद्विदर्भीकौण्डिन्यो वत्सनपातो बाभ्रवाद्बत्सनपाद्बाभ्रवः पथः
सौभरात्पन्थाः सौभरोऽयास्यादाङ्गिरसादयास्य आङ्गिरस आभूतेस्त्वाष्ट्रादाभूतिस्त्वाष्ट्रो
विश्वरूपात्त्वाष्ट्राद्विश्वरूपस्त्वाष्ट्रोऽश्विभ्यामश्विनौ दधीच आथर्वणाद्दध्यङ्डाथर्वणोऽथर्वणो
दैवादथर्वा दैवो मृत्योः प्राध्वंसनान्मृत्युः प्राध्वंसनः प्रध्वंसनात्प्रध्वंसन
एकर्षेरैकर्षिर्विप्रचित्तेर्विप्रचित्तिर्व्यष्टेर्व्यष्टिः सनारोः सनारुः सनातनात्सनातनः सनगात्सनगः
परमेष्ठिनः परमेष्ठी ब्रह्मणो ब्रह्म स्वयंभु ब्रह्मणे नमः ॥ ३ ॥

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२८० बृहदारण्यकोपनिषद्
अब इस (मधुकाण्ड) की वंशावली का वर्णन किया जाता है। पौतिमाष्य ने गौपवन से विद्या पायी।
गौपवन ने पौतिमाष्य से और पौतिमाष्य ने गौपवन से विद्या पायी। गौपवन ने कौशिक से, कौशिक ने
कौण्डिन्य से विद्या अर्जित की। कौण्डिन्य ने शाण्डिल्य से और शाण्डिल्य ने कौशिक से और गौतम से
विद्या प्राप्त की। गौतम ने आग्निवेश्य से, आग्निवेश्य ने शाण्डिल्य और आनभिम्लात से ज्ञान प्राप्त किया।
आनभिम्लात ने आनभिम्लात से, आनभिम्लात ने आनभिम्लात से विद्या प्राप्त की। आनभिम्लात ने गौतम
के माध्यम से, गौतम ने सैतव और प्राचीनयोग्य से ज्ञानार्जन किया। सैतव और प्राचीनयोग्य ने पाराशर्य से,
पाराशर्य ने भारद्वाज से विद्या पायी। भारद्वाज ने भारद्वाज और गौतम ऋषि से, गौतम ने भारद्वाज से, भारद्वाज
ने पाराशर्य से, पाराशर्य ने बैजवापायन से और बैजवापायन ने कौशिकायनि से विद्यार्जन किया। कौशिकायनि
ने घृतकौशिक से, घृतकौशिक ने पाराशर्यायण से ज्ञानार्जन किया। पाराशर्यायण ने पाराशर्य से, पाराशर्य ने
जातूकर्ण्य से, जातूकर्ण्य ने आसुरायण और यास्कमुनि से, आसुरायण ने त्रैवणि से, त्रैवणि ने औपजन्धनि
से ज्ञानार्जन किया। औपजन्धनि ने आसुरि से, आसुरि ने भारद्वाज से, भारद्वाज ने आत्रेय से, आत्रेय ने माण्टि
से विद्या प्राप्त की। माण्टि ने गौतम से, गौतम ने वात्स्य से, वात्स्य ने शाण्डिल्य से, शाण्डिल्य ने कैशोर्य
काप्य से ज्ञान लाभ प्राप्त किया। कैशोर्य काप्य ने कुमार हारित से, कुमार हारित ने गालव से, गालव ने
विदर्भी कौण्डिन्य से, विदर्भी कौण्डिन्य ने वत्सनपात् बाभ्रव से, वत्सनपात् बाभ्रव ने पन्थासौभर से,
पन्थासौभर ने अयास्य आङ्गिरस से, अयास्य आङ्गिरस ने आभूति त्वाष्ट्र से विद्यार्जन किया। आभूति त्वाष्ट्र
ने विश्वरूप त्वाष्ट्र से, विश्वरूप त्वाष्ट्र ने अश्विनीकुमारों के द्वारा, अश्विनीकुमारों ने दध्यङ् आथर्वण से,
दध्यङ् आथर्वण ने अथर्वादेव से, अथर्वादेव ने मृत्यु प्राध्वंसन से ज्ञान प्राप्त किया। मृत्यु प्राध्वंसन ने
प्रध्वंसन से एवं प्रध्वंसन ने एकर्षि से, एकर्षि ने विप्रचित्ति के द्वारा ज्ञान पाया। विप्रचित्ति ने व्यष्टि से, व्यष्टि
ने सनारु से, सनारु ने सनातन से, सनातन ने सनग के माध्यम से, सनग ने परमेष्ठी के द्वारा और परमेष्ठी ने
इस दिव्य ज्ञान को ब्रह्मा के द्वारा प्राप्त किया। ब्रह्मा स्वयंभू हैं। उन ब्रह्मा को नमन है॥ १-३॥
[ इस ब्राह्मण में ज्ञान-प्राप्त करने वाले ऋषियों की परम्परा का उल्लेख है। किसी-किसी ऋषि का परस्पर एक
दूसरे से ज्ञान प्राप्त करने का तथा किसी-किसी को एकाधिक बार परस्पर ज्ञान प्राप्त करने का उल्लेख है। लगता है
कि सर्वोच्च शक्तिमान् की जैसी अनुभूति जिसे हुई, उन्होंने एक दूसरे को उससे लाभान्वित किया और यह
एकाधिक बार भी हुआ होगा।]

अध्याय ३ ब्राह्मण १ मन्त्र ३ २८१

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अध्याय ३ ब्राह्मण १ मन्त्र ३ २८१
॥ अथ तृतीयोऽध्यायः ॥
॥ प्रथमं ब्राह्मणम् ॥
जनको ह वैदेहो बहुदक्षिणेन यज्ञेनेजे तत्र ह कुरुपञ्चालानां ब्राह्मणा अभिसमेता
बभूवुस्तस्य ह जनकस्य वैदेहस्य विजिज्ञासा बभूव कःस्विदेषां ब्राह्मणानामनूचानतम
इति स ह गवाँ सहस्रमवरुरोध दश दश पादा एकैकस्याः शृङ्गयोराबद्धा बभूवुः ॥ १ ॥
विदेहराज जनक ने एक महान् (बड़ी) दक्षिणा वाले यज्ञ (अश्वमेध) के द्वारा यजन किया। उस
यज्ञ में पाञ्चाल और कुरु प्रदेशों के बहुत से विद्वान् ब्राह्मण एकत्र हुए। तब राजा को यह ज्ञात करने की
इच्छा हुई कि इन विद्वानों में सर्वोत्कृष्ट कौन है ? इस निमित्त उनने अपनी गोशाला की एक सहस्र गौओं
के सींगों में दस-दस पाद (लगभग १०० ग्राम) स्वर्ण बँधवा दिया॥ १ ॥
तान्होवाच ब्राह्मणा भगवन्तो यो वो ब्रह्मिष्ठः स एता गा उदजतामिति ते ह ब्राह्मणा
न दधृषुरथ ह याज्ञवल्क्यः स्वमेव ब्रह्मचारिणमुवाचैताः सोम्योदज सामश्रवा ३ इति ता
होदाचकार ते ह ब्राह्मणाश्चुक्रुधुः कथं नो ब्रह्मिष्ठो ब्रुवीतेत्यथ ह जनकस्य वैदेहस्य होताश्वलो
बभूव स हैनं पप्रच्छ त्वं नु खलु नो याज्ञवल्क्य ब्रह्मिष्ठोऽसी३ति स होवाच नमो वयं
ब्रह्मिष्ठाय कुर्मो गोकामा एव वयँ स्म इति तँ ह तत एव प्रष्टुं दधे होताश्वलः ॥ २ ॥
राजा जनक ने उन ब्राह्मणों से कहा- हे पूज्य विद्वानो ! आप लोगों में जो सर्वाधिक ब्रह्मनिष्ठ हो, वह
इन गौओं को ले जाए। उन ब्राह्मणों में से किसी का भी अपने को श्रेष्ठ ब्रह्मनिष्ठ कहने का साहस न हुआ।
तब महर्षि याज्ञवल्क्य ने अपने एक शिष्य ब्रह्मचारी सामश्रवा से कहा- हे सोम्य सामश्रवा ! तुम इन गौओं
को (हमारे निमित्त) हाँक ले जाओ। उस ब्रह्मचारी द्वारा गौओं को हाँक ले जाने पर अन्य विद्वान् ब्राह्मण
बहुत क्रोधित हुए और बोले कि इसने हममें से अपने को सर्वश्रेष्ठ ब्रह्मनिष्ठ कैसे समझ लिया ? इसके पश्चात्
राजा के यज्ञ के होता अश्वल ने ऋषि याज्ञवल्क्य से पूछा- हे ऋषे ! क्या आप हम सभी में उत्कृष्ट ब्रह्मज्ञानी
हैं ? ऋषि याज्ञवल्क्य बोले-ब्रह्मज्ञानियों को तो मेरा नमन है। हमें तो केवल गौओं की आकांक्षा है। तब
अश्वल ने दृढ़ निश्चय करके ऋषि से प्रश्न किया ॥ २ ॥
याज्ञवल्क्येति होवाच यदिदँ सर्वं मृत्युनाप्तँ सर्वं मृत्युनाभिपन्नं केन यजमानो
मृत्योराप्तिमतिमुच्यत इति होत्रर्त्विजाग्निना वाचा वाग्वै यज्ञस्य होता तद्येयं वाक् सोऽयमग्निः
स होता स मुक्तिः सातिमुक्तिः ॥ ३ ॥
हे याज्ञवल्क्य ! यह समस्त विश्व जब मृत्यु से संव्याप्त और मृत्यु के द्वारा अधीन किया हुआ है, तब
केवल यजमान ही किस तरह मृत्यु के बन्धन का अतिक्रमण कर सकता है ? ऋषि याज्ञवल्क्य ने कहा कि
होता नामक ऋत्विक् वाक् और अग्नि है, वह (होता-वाक् शक्ति और अग्नि के द्वारा) मृत्यु को पार कर
सकता है। वही मुक्ति और अतिमुक्ति है ॥ ३ ॥

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२८२ बृहदारण्यकोपनिषद्
याज्ञवल्क्येति होवाच यदिद सर्वमहोरात्राभ्यामाप्त सर्वमहोरात्राभ्यामभिपन्नं केन
यजमानोऽहोरात्रयोराप्तिमतिमुच्यत इत्यध्वर्युणर्त्विजा चक्षुषादित्येन चक्षुर्वै यज्ञस्याध्व-
र्युस्तद्यदिदं चक्षुः सोऽसावादित्यः सोऽध्वर्युः स मुक्तिः सातिमुक्तिः ॥ ४ ॥
अश्वल ने कहा- हे याज्ञवल्क्य ! सब कुछ दिन और रात्रि से संव्याप्त है और सभी कुछ दिन और रात्रि
द्वारा अपने वश में किया हुआ है, फिर यजमान किस प्रकार दिन और रात्रि के बन्धन से मुक्त हो सकता
है ? ऋषि याज्ञवल्क्य ने कहा कि ऋत्विक् नेत्र और सूर्य के माध्यम से (यजमान दिन और रात्रि के बन्धन
से) मुक्त हो सकता है। अध्वर्यु ही यज्ञ का चक्षु है, अस्तु, नेत्र ही आदित्य और वही अध्वर्यु है। मुक्ति और
अतिमुक्ति भी वही है ॥ ४ ॥
याज्ञवल्क्येति होवाच यदिद सर्वं पूर्वपक्षापरपक्षाभ्यामाप्त सर्वं पूर्वपक्षापरपक्षा-
भ्यामभिपन्नं केन यजमानः पूर्वपक्षापरपक्षयोराप्तिमतिमुच्यत इत्युद्गात्रर्त्विजा वायुना प्राणेन
प्राणो वै यज्ञस्योद्गाता तद्योऽयं प्राणः स वायुः स उद्गाता स मुक्तिः सातिमुक्तिः ॥ ५ ॥
अश्वल ने प्रश्न किया- हे याज्ञवल्क्य ! सब कुछ पूर्वपक्ष (कृष्णपक्ष) और अपर पक्ष (शुक्लपक्ष) के
द्वारा आवृत है और उन्हीं के द्वारा ग्रसित है, फिर यजमान किस प्रकार कृष्णपक्ष और शुक्लपक्ष से मुक्त हो
सकता है ? तब ऋषि याज्ञवल्क्य ने कहा- ऋत्विज्, उद्गाता, वायु और प्राण के माध्यम से मुक्त हो सकता
है। उद्गाता को यज्ञ का प्राण कहा गया है तथा यह प्राण ही वायु और उद्गाता है। यही मुक्ति और
अतिमुक्ति स्वरूप है ॥ ५ ॥
याज्ञवल्क्येति होवाच यदिदमन्तरिक्षमनारम्बणमिव केनाक्रमेण यजमानः स्वर्गं
लोकमाक्रमत इति ब्रह्मणर्त्विजा मनसा चन्द्रेण मनो वै यज्ञस्य ब्रह्मा तद्यदिदं मनः सोऽसौ
चन्द्रः स ब्रह्मा स मुक्तिः सातिमुक्तिरित्यतिमोक्षा अथ संपदः ॥ ६ ॥
अश्वल ने कहा- हे याज्ञवल्क्य ! यह अन्तरिक्ष निरालम्ब प्रतीत होता है, फिर यजमान किस संसाधन
से स्वर्गारोहण करता है ? याज्ञवल्क्य बोले कि ऋत्विज्-ब्रह्मा और चन्द्रमा के माध्यम से स्वर्गारोहण करता
है। मन ही चन्द्रमा है। मन ही यज्ञ का ब्रह्मा है। मुक्ति और अतिमुक्ति भी वही है। यजमान इसी के द्वारा
अतिमुक्ति प्राप्त करता है। अब सम्पद निरूपण किया जाता है ॥ ६ ॥
याज्ञवल्क्येति होवाच कतिभिरयमद्यर्ग्भिर्होतास्मिन्यज्ञे करिष्यतीति तिसृभिरिति
कतमास्तास्तिस्त्र इति पुरोऽनुवाक्या च याज्या च शस्यैव तृतीया किं ताभिर्जयतीति
यत्किंचेदं प्राणभृदिति ॥ ७॥
अश्वल ने पूछा- हे याज्ञवल्क्य ! आज होता यज्ञ में कितनी ऋचाओं का शस्त्रशंसन (प्रयोग) करेगा ?
याज्ञवल्क्य ने कहा- तीन ऋचाओं के द्वारा। अश्वल ने पूछा- उन तीन ऋचाओं के क्या नाम हैं ? ऋषि ने
कहा- प्रथम- पुरोनुवाक्या (यजन से पहले वाली) है, द्वितीय- याज्या (यज्ञ के समय उच्चारित) है और
तृतीय - शस्या (यज्ञ के बाद की स्तुतियाँ) है। प्रश्नः- इनसे किसे जीता जाता है ? उत्तरः- यह जो भी
प्राणि-समुदाय है, वह सब (जीता जाता है) ॥ ७ ॥

अध्याय ३ ब्राह्मण २ मन्त्र १ २८३

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अध्याय ३ ब्राह्मण २ मन्त्र १ २८३
याज्ञवल्क्येति होवाच कत्ययमद्याध्वर्युुरस्मिन्यज्ञ आहुतीर्होष्यतीति तिस्र इति
कतमास्तास्तिस्र इति या हुता उज्ज्वलन्ति या हुता अतिनेदन्ते या हुता अधिशेरते किं
ताभिर्जयतीति या हुता उज्ज्वलन्ति देवलोकमेव ताभिर्जयति दीप्यत इव हि देवलोको
या हुता अतिनेदन्ते पितृलोकमेव ताभिर्जयत्यतीव हि पितृलोको या हुता अधिशेरते
मनुष्यलोकमेव ताभिर्जयत्यध इव हि मनुष्यलोकः ॥ ८ ॥
अश्वल ने प्रश्न किया-हे याज्ञवल्क्य ! इस यज्ञ में आज अध्वर्यु कितनी आहुतियाँ प्रदान करेगा ? उन्होंने
कहा- 'तीन' । फिर उसने पूछा कि तीन कौन-कौन सी ? तब याज्ञवल्क्य ने कहा कि पहली वह जो होमे
जाने पर प्रज्वलित होती है, दूसरी वह जो तीव्र शब्द करती है और तीसरी आहुति वह, जो होमे जाने पर
पृथ्वी में विलीन हो जाती है। अश्वल ने पुनः प्रश्न किया कि इन आहुतियों के द्वारा यजमान किस प्रकार
विजय प्राप्त करता है ? ऋषि ने बताया-प्रथम आहुति से यजमान देवलोक को जीत लेता है,द्वितीय के द्वारा
पितृलोक को और तृतीय के द्वारा मनुष्य लोक को जीत लेता है,क्योंकि मनुष्य लोक निम्नवर्ती है ॥ ८ ॥
याज्ञवल्क्येति होवाच कतिभिरयमद्य ब्रह्मा यज्ञं दक्षिणतो देवताभिर्गोपायतीत्येकयेति
कतमा सैकेति मन एवेत्यनन्तं वै मनोऽनन्ता विश्वेदेवा अनन्तमेव स तेन लोकं जयति ॥ ९ ॥
अश्वल ने पूछा- यज्ञ के ब्रह्मा आज इस यज्ञ में दक्षिण दिशा की ओर से कितने देवताओं के द्वारा यज्ञ
का संरक्षण करेंगे ? ऋषि ने उत्तर दिया केवल एक देवता के द्वारा। अश्वल ने कहा- किस देवता के द्वारा ?
ऋषि ने कहा- वह देवता मन है। मन अनन्त है और विश्वेदेवा भी अनन्त हैं। उस मन रूपी देवता के द्वारा
यजमान अनन्त लोकों पर विजय प्राप्त कर लेता है ॥ ९ ॥
याज्ञवल्क्येति होवाच कत्ययमद्योद्गातास्मिन्यज्ञे स्तोत्रियाः स्तोष्यतीति तिस्र इति
कतमास्तास्तिस्र इति पुरोनुवाक्या च याज्या च शस्यैव तृतीया कतमास्ता या अध्यात्ममिति
प्राण एव पुरोनुवाक्याऽपानो याज्या व्यानः शस्या किं ताभिर्जयतीति पृथिवीलोकमेव
पुरोनुवाक्यया जयत्यन्तरिक्षलोकं याज्यया द्युलोकँ शस्यया ततो ह होताश्वल उपरराम ॥
अश्वल ने पूछा-हे याज्ञवल्क्य ! आज उद्गाता इस यज्ञ में कितने स्तोत्रों का गायन करेगा ? याज्ञवल्क्य
ने कहा-तीन स्तोत्रों का। तब अश्वल ने पूछा- वे तीन स्तोत्र कौन से हैं ? ऋषि ने कहा-पुरोनुवाक्या, याज्या
और शस्या नामक वे तीन स्तोत्र हैं। अश्वल ने पूछा-इनमें शरीर में रहने वाले कौन से हैं ? ऋषि ने कहा- प्राण
ही पुरोनुवाक्या है, अपान ही याज्या है और व्यान ही शस्या है। अश्वल के यह पूछने पर कि इन स्तोत्रों द्वारा
किस पर विजय प्राप्त की जा सकती है, ऋषि बोले-पुरोनुवाक्या से पृथिवी लोक पर, याज्या द्वारा अन्तरिक्ष
लोक पर और शस्या द्वारा द्युलोक पर विजय प्राप्त की जा सकती है। यह सुन कर अश्वल चुप हो गये ॥१०॥
॥ द्वितीयं ब्राह्मणम् ॥
अथ हैनँ जारत्कारव आर्तभागः पप्रच्छ याज्ञवल्क्येति होवाच कति ग्रहाः कत्यतिग्रहा
इत्यष्टौ ग्रहा अष्टावतिग्रहा इति ये ते तेऽष्टौ ग्रहा अष्टावतिग्रहाः कतमे त इति ॥ १ ॥

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२८४ बृहदारण्यकोपनिषद्
इसके बाद जारत्कारव आर्तभाग (जरत्कारु के पुत्र आर्तभाग) ने ऋषि याज्ञवल्क्य से पूछा - हे
याज्ञवल्क्य! ग्रह और अतिग्रहों की संख्या कितनी है ? ऋषि ने उत्तर दिया कि ये आठ-आठ हैं। इस पर
आर्तभाग ने पूछा- वे आठ ग्रह-आठ अतिग्रह कौन-कौन है ॥ १ ॥
प्राणो वै ग्रहः सोऽपानेनातिग्राहेण गृहीतोऽपानेन हि गन्धाञ्जिघ्रति ॥ २ ॥
ऋषि याज्ञवल्क्य बोले - प्राण ही ग्रह है, वह प्राण रूपी ग्रह अपान रूपी अतिग्रह के द्वारा गृहीत है,
क्योंकि प्राणग्रह अपान अतिग्रह द्वारा ही सूँघने का कार्य सम्पन्न कर सकता है ॥ २ ॥
वाग्वै ग्रहः स नाम्नातिग्राहेण गृहीतो वाचा हि नामान्यभिवदति ॥ ३॥
वाक् शक्ति ही ग्रह है, वह नाम रूपी अतिग्रह द्वारा ग्रहण की हुई है, क्योंकि वाक् के द्वारा ही
उच्चारण सम्पन्न होता है ॥ ३ ॥
जिह्वा वै ग्रहः स रसेनातिग्राहेण गृहीतो जिह्वया हि रसान्विजानाति ॥ ४ ॥
रसना ही ग्रह है, वह रसरूपी अतिग्रह द्वारा ग्रहण की हुई है, क्योंकि रसना के द्वारा ही स्वादानुभूति होती है ॥
चक्षुर्वै ग्रहः स रूपेणातिग्राहेण गृहीतश्चक्षुषा हि रूपाणि पश्यति ॥ ५ ॥
नेत्रेन्द्रिय ही ग्रह है, वह रूप के अतिग्रह द्वारा ग्रहण किया गया है; क्योंकि नेत्रेन्द्रिय द्वारा ही रूप का
दर्शन किया जा सकता है ॥ ५ ॥
श्रोत्रं वै ग्रहः स शब्देनातिग्राहेण गृहीतः श्रोत्रेण हि शब्दाञ्छृणोति ॥ ६ ॥
श्रोत्रेन्द्रिय ही ग्रह है, वह शब्द रूपी अतिग्रह द्वारा ग्रहण किया हुआ है; क्योंकि जीवात्मा श्रोत्र द्वारा
ही शब्द का श्रवण करता है ॥ ६ ॥
मनो वै ग्रहः स कामेनातिग्राहेण गृहीतो मनसा हि कामान्कामयते ॥ ७॥
मन ही ग्रह है,वह कामनारूपी अतिग्रह द्वारा ग्रहण किया हुआ है; क्योंकि मन से ही कामनाएँ की जाती हैं॥
हस्तौ वै ग्रहः स कर्मणातिग्राहेण गृहीतो हस्ताभ्यां हि कर्म करोति ॥ ८ ॥
हाथ ही ग्रह हैं, वे कर्मरूपी अतिग्रह से ग्रस्त हैं; क्योंकि व्यक्ति हाथों द्वारा ही कार्य सम्पादित करता है ॥ ८ ॥
त्वग्वै ग्रहः स स्पर्शनातिग्राहेण गृहीतस्त्वचा हि स्पर्शान्वेदयत इत्येतेऽष्टौ
ग्रहाअष्टावतिग्रहाः ॥ ९ ॥
त्वचा ही ग्रह है, वह स्पर्श रूपी अतिग्रह से गृहीत है; क्योंकि त्वचा द्वारा ही स्पर्श की अनुभूति की
जाती है। इस प्रकार ग्रह और अतिग्रह ये आठ-आठ हैं ॥ ९ ॥
याज्ञवल्क्येति होवाच यदिदं सर्वं मृत्योरन्नं का स्वित्सा देवता यस्या मृत्युरन्नमित्यग्निर्वै
मृत्युः सोऽपामन्नमप पुनर्मृत्युं जयति ॥ १० ॥
आर्तभाग जारत्कारव ने कहा- हे याज्ञवल्क्य ! इस सृष्टि में जो कुछ है, सब मृत्यु का ही खाद्य पदार्थ है, अतः
वह कौन सा देवता है, जिसका भोजन मृत्यु है ? ऋषि याज्ञवल्क्य ने कहा- अग्नि ही मृत्यु है और वह अप् (कारण
रूप प्रकृति अथवा जल) का भोजन है। इस तथ्य को जानने वाला मृत्यु पर विजय प्राप्त कर लेता है ॥ १० ॥
याज्ञवल्क्येति होवाच यत्रायं पुरुषो म्रियत उदस्मात्प्राणाः क्रामन्त्याहो ३ नेति नेति
होवाच याज्ञवल्क्योऽत्रैव समवनीयन्ते स उच्छ्वयत्याध्मायत्याध्मातो मृतः शेते ॥ ११॥

अध्याय ३ ब्राह्मण ३ मन्त्र १ २८५

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अध्याय ३ ब्राह्मण ३ मन्त्र १ २८५
आर्तभाग ने पुनः प्रश्न किया- हे याज्ञवल्क्य ! मरने के समय इस पुरुष के प्राण उत्क्रमण (बहिर्गमन)
करते हैं या नहीं ? ऋषि याज्ञवल्क्य ने कहा- नहीं ऐसा नहीं है। उस पुरुष के प्राण मृत्यु के पश्चात् यहीं
विलीन हो जाते हैं। वह फूल जाता है (वायु को अन्दर खींचता है) और मृत होकर वहीं शयन करता है॥
याज्ञवल्क्येति होवाच यत्रायं पुरुषो म्रियते किमेनं न जहातीति नामेत्यनन्तं वै
नामानन्ता विश्वेदेवा अनन्तमेव स तेन लोकं जयति ॥ १२ ॥
आर्तभाग ने फिर पूछा- हे याज्ञवल्क्य ! मृत्यु के उपरान्त पुरुष का कौन परित्याग नहीं करता ? ऋषि
ने उत्तर दिया- मृत्यु के पश्चात् 'नाम' पुरुष का परित्याग नहीं करता। नाम अनन्त है और विश्वेदेवा भी
अनन्त हैं, अतः पुरुष अनन्तलोक पर विजय प्राप्त कर लेता है ॥ १२ ॥
यज्ञवल्क्येति होवाच यत्रास्य पुरुषस्य मृतस्याग्निं वागप्येति वातं प्राणश्चक्षुरादित्यं
मनश्चन्द्रं दिशः श्रोत्रं पृथिवीग्ं शरीरमाकाशमात्मौषधीलॊमानि वनस्पतीन्केशा अप्सु लोहितं
च रेतश्च निधीयते क्कायं तदा पुरुषो भवतीत्याहर सोम्य हस्तमार्तभागावामेवैतस्य वेदिष्यावो
न नावेतत् सजन इति तौ होत्क्रम्य मन्त्रयांचक्राते तौ ह यदूचतुः कर्म हैव तदूचतुरथ
यत्प्रशशग् सतुः कर्म हैव तत्प्रशशग् सतुः पुण्यो वै पुण्येन कर्मणा भवति पापः पापेनेति
ततो ह जारत्कारव आर्तभाग उपरराम ॥ १३ ॥
जारत्कारव आर्तभाग ने पुनः पूछा- हे याज्ञवल्क्य ! जिस समय इस पुरुष की वाक् अग्नि में विलीन
हो जाती है, प्राण वायु में, चक्षु आदित्य में, मन चन्द्रमा में, श्रोत्र दिशाओं में, शरीर पृथ्वी में, आत्मा
आकाश में, लोम समूह ओषधियों में, केश वनस्पतियों में लीन हो जाते हैं और रक्त तथा रेतस् का जल में
स्थापन हो जाता है, उस समय वह पुरुष कहाँ निवास करता है ? याज्ञवल्क्य बोले- हे सोम्य आर्तभाग ! तुम
मुझे अपना हाथ पकड़ाओ, हम दोनों को ही इस प्रश्न का उत्तर समझना होगा; किन्तु इस जनसभा के बीच
यह उचित नहीं है। (हम दोनों बाहर चलें) दोनों ने उठकर बाहर (एकान्त में) जाकर चिन्तन किया और
लौटकर दोनों कर्म के विषय में प्रशंसा करने लगे। निश्चित ही पुण्य कृत्यों से पुण्य और पाप कृत्यों से पाप
प्राप्त होता है। इसके अनन्तर जारत्कारव आर्तभाग मौन हो गये ॥ १३ ॥
[ यहाँ स्पष्ट हो जाता है कि ऋषियों के वार्तालाप जिज्ञासा समाधान के लिए, सत्य शोध के लिए ही होते थे।
जो तथ्य सुनिश्चित रूप से पता था, वे वही कहते थे, जिन तथ्यों को परामर्श द्वारा स्पष्ट किया जाना है, उनके बारे
में स्पष्ट रूप से सुपात्र के साथ विचार मंथन किया जाता था।]
॥ तृतीयं ब्राह्मणम् ॥
अथ हैनँ भुज्युर्लाह्यायनिः पप्रच्छ याज्ञवल्क्येति होवाच मद्रेषु चरकाः पर्यव्रजाम
ते पतञ्चलस्य काप्यस्य गृहानैम तस्यासीद्दुहिता गन्धर्वगृहीता तमपृच्छाम कोऽसीति सोऽब्र-
वीत्सुधन्वाऽऽङ्गिरस इति तं यदा लोकानामन्तानपृच्छामाथैनमब्रूम क्व पारिक्षिता अभवन्निति
क्व पारिक्षिता अभवन् स त्वा पृच्छामि याज्ञवल्क्य क्व पारिक्षिता अभवन्निति ॥ १ ॥

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२८६ बृहदारण्यकोपनिषद्
इसके बाद भुज्यु लाह्यायनि (लाह्य के पुत्र) ने ऋषि याज्ञवल्क्य से पूछा- हे याज्ञवल्क्य ! हम लोग
मद्र प्रदेश में व्रताचरण (भ्रमण) करते हुए विद्यार्थी के रूप में कपि गोत्र में उत्पन्न पतञ्चल काप्य के घर
गये। काप्य की पुत्री गन्धर्व (से आवेशित) गृहीत थी। हमारे उससे यह पूछने पर कि तुम कौन हो ? वह
(गन्धर्व जो काप्यसुता पर आवेशित था) बोला- मैं आङ्गिरस सुधन्वा हूँ। तदुपरान्त लोकों के अन्त के
सम्बन्ध में प्रश्न करते हुए हमने उससे यह भी पूछा कि पारिक्षित कहाँ रहे ? पारिक्षित कहाँ रहे ? अतः हे
याज्ञवल्क्य ! हम आप से भी पूछते हैं कि पारिक्षित कहाँ रहे ? ॥ १ ॥
स होवाचोवाच वै सोगच्छन्वै ते तद्यत्राश्वमेधयाजिनो गच्छन्तीति क्व न्वश्वमेधयाजिनो
गच्छन्तीति द्वात्रिंशतं वै देवरथाह्नान्यान्वयं लोकस्तं समन्तं पृथिवी द्विस्तावत्पर्येति तां
समन्तं पृथिवीं द्विस्तावत्समुद्रः पर्येति तद्यावती क्षुरस्य धारा यावद्वा मक्षिकायाः पत्रं
तावानन्तरेणाकाशस्तानिन्द्रः सुपर्णो भूत्वा वायवे प्रायच्छत्तान्वायरात्मनि धित्वा
तत्रागमयद्यत्राश्वमेधयाजिनोऽभवन्नित्येवमेव वै स वायुमेव प्रशशंस तस्माद्वायुरेव
व्यष्टिर्वायुः समष्टिरप पुनर्मृत्युं जयति य एवं वेद ततो ह भुज्युर्लाह्यायनिरुपरराम ॥ २ ॥
ऋषि याज्ञवल्क्य बोले- उस गन्धर्व ने अवश्य ही यह उत्तर दिया होगा कि पारिक्षित वहीं चले गये,
जहाँ अश्वमेध सम्पन्न करने वाले जाते हैं। भुज्यु ने पूछा- अश्वमेध सम्पादक कहाँ जाते हैं ? ऋषि बोले-
एक दिन और रात्रि में आदित्य का रथ जितने स्थान में चलता है, उतने को 'आह्नय' कहते हैं। ऐसे बत्तीस
आह्नय परिमाण वाला वह लोक है। उस लोक को चारों ओर से पृथिवी और उस पृथिवी से दुगुना समुद्र
उसे घेरे हुए है। उन अण्ड कपालों के बीच में छुरे की धार अथवा मक्खी के पंख जितना चौड़ा आकाश
(अथवा प्रवेश मार्ग) है। इन्द्र ने उन्हें (पारिक्षित को) वायु को प्रदान किया और वायुदेव उन्हें अपने में
स्थापित करके वहाँ ले गये, जहाँ अश्वमेध सम्पन्न करने वाले रहते हैं। इस प्रकार उस गन्धर्व ने वायुदेव की
सराहना की। अस्तु, वायु ही व्यष्टि और समष्टि है। इस प्रकार ज्ञान रखने वाला पुनर्मृत्यु को जीत लेता है।
यह सुनकर भुज्यु लाह्यायनि भी चुप हो गये ॥ २ ॥
॥ चतुर्थ ब्राह्मणम् ॥
अथ हैनमुषस्तश्चाक्रायणः पप्रच्छ याज्ञवल्क्येति होवाच यत्साक्षादपरोक्षाद्ब्रह्म य आत्मा
सर्वान्तरस्तं मे व्याचक्ष्व इत्येष त आत्मा सर्वान्तरःकतमो याज्ञवल्क्य सर्वान्तरो यः प्राणेन प्राणिति
स त आत्मा सर्वान्तरो योऽपानेनापानीति स त आत्मा सर्वान्तरो यो व्यानेन व्यानिति स त आत्मा
सर्वान्तरो य उदानेनोदानिति स त आत्मा सर्वान्तर एष त आत्मा सर्वान्तरः ॥ १ ॥
इसके पश्चात् चक्रपुत्र उषस्त ने ऋषि याज्ञवल्क्य से प्रश्न किया- हे याज्ञवल्क्य ! जो प्रत्यक्ष और
साक्षात् ब्रह्म है तथा सबके अन्तर में स्थित आत्मा है, उसका मेरे लिए वर्णन कीजिए। ऋषि याज्ञवल्क्य ने
उत्तर दिया- तुम्हारी आत्मा ही सबके अन्तर में विराजमान है। जब उषस्त ने कहा- हे याज्ञवल्क्य ! सर्वान्तर
कौन है ? तब ऋषि ने कहा- जो प्राण के द्वारा प्राणन प्रक्रिया करता है (श्वास लेता है), वही तुम्हारा

अध्याय ३ ब्राह्मण ५ मन्त्र १ २८७

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अध्याय ३ ब्राह्मण ५ मन्त्र १ २८७
आत्मा सर्वान्तर है, जो अपान के द्वारा अपानन क्रिया करता है, वही तुम्हारा आत्मा सर्वान्तर है, जो व्यान
से व्यानन क्रिया करता है, वह तुम्हारा आत्मा ही सर्वान्तर है, जो उदान से उदानन क्रिया सम्पन्न करता
है, वही तुम्हारी आत्मा सर्वान्तर होकर विराजित है ॥ १ ॥
स होवाचोषस्तश्चाक्रायणो यथा विब्रूयादसौ गौरसावश्व इत्येवमेवैतद्व्यपदिष्टं भवति
यदेव साक्षादपरोक्षाद्ब्रह्म य आत्मा सर्वान्तरस्तं मे व्याचक्ष्वेत्येष त आत्मा सर्वान्तरः कतमो
याज्ञवल्क्य सर्वान्तरो न दृष्टेर्द्रष्टारं पश्येर्न श्रुतेः श्रोतारँ शृणुयान्न मतेर्मन्तारं मन्वीथा न
विज्ञातेर्विज्ञातारं विजानीया एष त आत्मा सर्वान्तरोऽतोऽन्यदार्तं ततो होषस्तश्चाक्रायण
उपरराम ॥ २ ॥
चाक्रायण उषस्त ने कहा- जिस प्रकार कोई यह कहता है कि यह गौ है, यह अश्व है, आपका यह
कथन उसी प्रकार का है। अतः आप हमें साक्षात्, प्रत्यक्ष ब्रह्म और सर्वान्तर आत्मा के विषय में स्पष्ट रूप
से बतलाएँ। याज्ञवल्क्य ने कहा- तुम्हारी आत्मा ही सर्वान्तर में प्रतिष्ठित है। दृष्टि के द्रष्टा को देख सकना,
श्रुति के श्रोता को सुन सकना, मति के मन्ता को मनन करना और विज्ञाति के विज्ञाता को जान सकना तुम्हारे
लिए असम्भव है। तुम्हारा यह आत्मा ही सर्वान्तर है, इसके अतिरिक्त सब नाशवान् (और दुःख का कारण)
है। यह सुनने के पश्चात् उषस्त मौन हो गए ॥ २ ॥
॥ पञ्चमं ब्राह्मणम् ॥
अथ हैन Kahोल: कौषीतकेयः पप्रच्छ याज्ञवल्क्येति होवाच यदेव साक्षादपरोक्षाद्ब्रह्म
य आत्मा सर्वान्तरस्तं मे व्याचक्ष्वेत्येष त आत्मा सर्वान्तरः कतमो याज्ञवल्क्य सर्वान्तरो
योऽशनायापिपासे शोकं मोहं जरां मृत्युमत्येति। एतं वै तमात्मानं विदित्वा ब्राह्मणाः
पुत्रैषणायाश्च वित्तैषणायाश्च लोकैषणायाश्च व्युत्थायाथ भिक्षाचर्यं चरन्ति या ह्येव पुत्रैषणा
सा वित्तैषणा या वित्तैषणा सा लोकैषणोभे ह्येते एषणे एव भवतस्तस्माद् ब्राह्मणः
पाण्डित्यं निर्विद्य बाल्येन तिष्ठासेद्बाल्यं च पाण्डित्यं च निर्विद्याथ मुनिरमौनं च मौनं च
निर्विद्याऽथ ब्राह्मणः स ब्राह्मणः केन स्याद्येन स्यात्तेनेदृश एवातोऽन्यदार्तं ततो ह कहोलः
कौषीतकेय उपरराम ॥ १ ॥
तत्पश्चात् कौषीतकेय कहोल ने ऋषि याज्ञवल्क्य से पूछा- हे याज्ञवल्क्य ! आप साक्षात्, अपरोक्ष ब्रह्म
और सर्वान्तर आत्मा का हमारे प्रति वर्णन कीजिए। तब याज्ञवल्क्य ने कहा- तुम्हारा आत्मा ही सर्वान्तर में
प्रतिष्ठित है। पुनः कहोल ने पूछा कि यह सर्वान्तर आत्मा कौन सा है ? तब याज्ञवल्क्य ने कहा- वह भूख,
प्यास, जरा, मृत्यु, शोक और मोह से परे है। इस आत्म तत्त्व को जानकर ही ब्रह्मवेत्ता पुत्रैषणा, वित्तैषणा
और लोकैषणा का परित्याग कर भिक्षाटन करते हुए विचरण करते हैं। पुत्रैषणा ही वित्तैषणा है और
वित्तैषणा ही लोकैषणा है। अतः ब्रह्मज्ञानी को चाहिए कि इन दोनों (काम्य और कामनाओं) को जानता
हुआ आत्मबल सम्पन्न होकर मनन करे। अमौन (बोलने की शक्ति) और मौन साधना युक्त होकर ब्राह्मण
(धन्य) होता है। ब्राह्मण होने के यही साधन हैं। इसके अतिरिक्त जो भी हैं, वह नाशवान् और दुःख के हेतु
हैं। यह सुनने के बाद कौषीतकेय कहोल मौन हो गए ॥ १ ॥

॥ षष्ठं ब्राह्मणम् ॥

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२८८ बृहदारण्यकोपनिषद

॥ षष्ठं ब्राह्मणम् ॥

अथ हैनँ गार्गी वाचक्नवी पप्रच्छ याज्ञवल्क्येति होवाच यदिद सर्वमप्स्वोतं च
प्रोतं च कस्मिन्नु खल्वाप ओताश्च प्रोताश्चेति वायौ गार्गीति कस्मिन्नु खलु वायुरोतश्च
प्रोतश्चेत्यन्तरिक्षलोकेषु गार्गीति कस्मिन्नु खल्वन्तरिक्षलोका ओताश्च प्रोताश्चेति
गन्धर्वलोकेषु गार्गीति कस्मिन्नु खलु गन्धर्वलोका ओताश्च प्रोताश्चेत्यादित्यलोकेषु गार्गीति
कस्मिन्नु खल्वादित्यलोका ओताश्च प्रोताश्चेति चन्द्रलोकेषु गार्गीति कस्मिन्नु खलु
चन्द्रलोका ओताश्च प्रोताश्चेति नक्षत्रलोकेषु गार्गीति कस्मिन्नु खलु नक्षत्रलोका ओताश्च
प्रोताश्चेति देवलोकेषु गार्गीति कस्मिन्नु खलु देवलोका ओताश्च प्रोताश्चेतीन्द्रलोकेषु गार्गीति
कस्मिन्नु खल्विन्द्रलोका ओताश्च प्रोताश्चेति प्रजापतिलोकेषु गार्गीति कस्मिन्नु खलु
प्रजापतिलोका ओताश्च प्रोताश्चेति ब्रह्मलोकेषु गार्गीति कस्मिन्नु खलु ब्रह्मलोका ओताश्च
प्रोताश्चेति स होवाच गार्गि मातिप्राक्षीर्मा ते मूर्धा व्यपप्तदनतिप्रश्न्यां वै देवतामतिपृच्छसि
गार्गि मातिप्राक्षीरिति ततो ह गार्गी वाचक्नव्युपरराम ॥ १ ॥

इसके पश्चात् वचक्रुसुता गार्गी ने याज्ञवल्क्य से पूछा- हे याज्ञवल्क्य ! जब सभी कुछ जल में ओत-प्रोत है, तब जल
किसमें ओत-प्रोत है ? ऋषि याज्ञवल्क्य ने कहा- हे गार्गी ! जल, वायु में ओत-प्रोत है। गार्गी ने पुनः प्रश्न किया, फिर वायु
किसमें ओत-प्रोत है ? ऋषि ने कहा- वायु, अन्तरिक्ष लोकों में ओत-प्रोत है। पुनः पूछा गया- और अन्तरिक्ष किसमें ओत-
प्रोत है ? तब उत्तर दिया गया कि अन्तरिक्ष गन्धर्व लोकों में ओत-प्रोत है। गार्गी के पुनः यह पूछे जाने पर कि गन्धर्व लोक
किसमें ओत-प्रोत हैं ? ऋषि ने उत्तर दिया- आदित्य लोकों में । गार्गी ने पूछा- आदित्य लोक किसमें ओत-प्रोत है ?
याज्ञवल्क्य ने कहा- चन्द्रलोकों में, फिर चन्द्रलोक किसमें ओत-प्रोत है ? उत्तर मिला- नक्षत्र लोकों में। नक्षत्र लोक किसमें
ओत-प्रोत है ? देव लोकों में। देवलोक किसमें है ? इन्द्र लोकों में। पुनः गार्गी ने पूछा- इन्द्र लोक किसमें ओत-प्रोत है ?
ऋषि ने कहा- प्रजापति लोकों में। प्रजापति लोक किसमें ओत-प्रोत है ? ब्रह्म लोकों में । गार्गी ने पुनः पूछा- हे याज्ञवल्क्य !
फिर ब्रह्म लोक किसमें ओत-प्रोत है ? इस पर याज्ञवल्क्य ने कहा- हे गार्गी ! आप अधिक न पूछें। अधिक पूछने से कहीं ऐसा
न हो कि आपका मस्तक गिर जाए। आप ऐसे देवता के विषय में अति प्रश्न कर रही हैं, जिसके विषय में अति प्रश्न करना
वर्जित है। तब वाचक्नवी गार्गी चुप हो गई ॥ १ ॥

[ जो वाणी से व्यक्त नहीं हो सकता, उस विषय को केवल तर्क से सिद्ध करने का प्रयास करना अति प्रश्न
है। जो विद्वान् जानबूझकर अपनी मेधा का उपयोग अहंकारवश ऐसे अनर्गल प्रसंगों में करता है, परा प्रकृति उसे
दण्डित कर सकती है। अस्तु, ऋषि ने गार्गी को सावधान कर दिया और वह चुप हो गयी ]

॥ सप्तमं ब्राह्मणम् ॥

अथ हैनमुद्दालक आरुणिः पप्रच्छ याज्ञवल्क्येति होवाच मद्रेष्ववसाम पतञ्चलस्य
काप्यस्य गृहेषु यज्ञमधीयानास्तस्यासीद्भार्या गन्धर्वगृहीता तमपृच्छाम कोऽसीति सोऽब्रवीत्
कबन्ध आथर्वण इति सोऽब्रवीत्पतञ्चलं काप्यं याज्ञिकाँश्च वेत्थ नु त्वं काप्य तत्सूत्रं

अध्याय ३ ब्राह्मण ७ मन्त्र ३ २८९

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अध्याय ३ ब्राह्मण ७ मन्त्र ३ २८९
येनायं च लोकः परश्च लोकः सर्वाणि च भूतानि संदृब्धानि भवन्तीति सोऽब्रवीत्पतञ्चलः
काप्यो नाहं तद्भगवन्वेदेति सोऽब्रवीत्पतञ्चलं काव्यं याज्ञिकाꣳश्च वेत्थ नु त्वं काप्य
तमन्तर्यामिणं य इमं च लोकं परं च लोकꣳ सर्वाणि च भूतानि योऽन्तरो यमयतीति
सोऽब्रवीत्पतञ्चलः काप्यो नाहं तं भगवन्वेदेति सोऽब्रवीत्पतञ्चलं काव्यं याज्ञिकाꣳश्च यो
वै तत्काप्यसूत्रं विद्यात्तं चान्तर्यामिणमिति स ब्रह्मवित्स लोकवित्स देववित्स वेदवित्स
भूतवित्स आत्मवित्स सर्वविदिति तेभ्योऽब्रवीत्तदहं वेद तच्चेत्त्वं याज्ञवल्क्य सूत्रमविद्वाꣳस्तं
चान्तर्यामिणं ब्रह्मगवीरुदजसे मूर्धा ते विपतिष्यतीति वेद वा अहं गौतम तत्सूत्रं तं
चान्तर्यामिणमिति यो वा इदं कश्चिद्ब्रूयाद्वेद वेदेति यथा वेत्थ तथा ब्रूहीति ॥ १ ॥
इसके पश्चात् आरुणि-उद्दालक ने महर्षि याज्ञवल्क्य से पूछा- हे याज्ञवल्क्य ! हम मद्र देश में काप्य
पतञ्चल के यहाँ यज्ञ शास्त्र का अध्ययन कर रहे थे। उनकी पत्नी एक गन्धर्व के द्वारा आवेशित थी। हमने
उस (पत्नी पर आवेशित गन्धर्व) से पूछा- तुम कौन हो ? उसने उत्तर दिया कि मैं अथर्वापुत्र कबन्ध हूँ।
तब उसने काप्य पतञ्चल और यज्ञ शास्त्र अध्येताओं से प्रश्न किया कि क्या आप उस सूत्र को जानते हैं,
जिससे ये लोक, परलोक और समस्त प्राणी गुँथे हुए हैं। काप्य पतञ्चल ने कहा- मुझे वह सूत्र ज्ञात नहीं
है। पुनः उसके यह पूछे जाने पर कि क्या आप उस सूत्र और अन्तर्यामी को जानते हैं, जो इस लोक,
परलोक और सभी प्राणियों का नियन्ता है ? काप्य पतञ्चल ने कहा कि मुझे यह भी विदित नहीं है। उस
आवेशित गन्धर्व ने पुनः कहा कि जो उस सूत्र और अन्तर्यामी का ज्ञाता है, वह ब्रह्म, लोक, वेद, देवभूतों,
आत्मा और सभी का ज्ञाता हो जाता है। इसके पश्चात् गन्धर्व ने उन (काप्य आदि) से सूत्र और अन्तर्यामी
को बताया। उसे मैं जानता हूँ। हे याज्ञवल्क्य ! यदि तुम्हें उस सूत्र और अन्तर्यामी का ज्ञान नहीं है और तुम
इन ब्रह्मवेत्ताओं की गौओं को ले जाते हो, तो तुम्हारा मस्तक गिर (झुक) जायेगा। ऋषि याज्ञवल्क्य ने
कहा- हे गौतम ! मैं उस अन्तर्यामी को निश्चित रूप से जानता हूँ। आरुणि बोले- यह बात तो कोई भी कह
सकता है कि मैं उस सूत्र और अन्तर्यामी को जानता हूँ। आप जिस प्रकार जानते हैं,उसका वर्णन करें ॥ १ ॥
स होवाच वायुर्वै गौतम तत्सूत्रं वायुना वै गौतम सूत्रेणायं च लोकः परश्च लोकः
सर्वाणि च भूतानि संदृब्धानि भवन्ति तस्माद्वै गौतम पुरुषं प्रेतमाहुर्व्यस्रꣳ सिषतास्याङ्गानीति
वायुना हि गौतम सूत्रेण संदृब्धानि भवन्तीत्येवमेवैतद्याज्ञ-वल्क्य़ान्तर्यामिणं ब्रूहीति ॥ २ ॥
याज्ञवल्क्य ने कहा-हे गौतम ! वह सूत्र वायु ही है, क्योंकि इहलोक, परलोक और समस्त
प्राणी उसी के द्वारा गुँथे हुए हैं। इसीलिए प्रायः यह कहते हैं कि मृतक के अंग गिर गये (विशीर्ण
हो गये); क्योंकि हे गौतम ! वे (अंग) वायुरूप सूत्र से ही संग्रथित होते हैं। उद्दालक ने कहा- हाँ
यह तो ठीक है, अब अन्तर्यामी के विषय में वर्णन करो ॥ २ ॥
यः पृथिव्यां तिष्ठन् पृथिव्या अन्तरो यं पृथिवी न वेद यस्य पृथिवी शरीरं यः
पृथिवीमन्तरो यमयत्येष त आत्मान्तर्याम्यमृतः ॥ ३ ॥
याज्ञवल्क्य ने कहा- जो पृथिवी में स्थित एवं पृथिवी में संव्यास है, पृथिवी ही जिसका शरीर
है, पर उसे पृथिवी नहीं जानती, जो पृथिवी के अन्दर विराजमान रहकर उसका नियन्त्रण करता है,
वह तुम्हारा आत्मा ही अविनाशी और अन्तर्यामी है ॥ ३.॥

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२९० बृहदारण्यकोपनिषद्
योऽप्सु तिष्ठन्नद्भ्योऽन्तरो यमापो न विदुर्यस्यापः शरीरं योऽपोऽन्तरो यमयत्येष त
आत्मान्तर्याम्यमृतः ॥ ४ ॥
जो जल में निवास करने वाला और उसी में संव्याप्त है, जल जिसका शरीर है, जल के भीतर रहकर
वह उसका नियमन भी करता है; किन्तु जल उसे नहीं जानता, वही आत्मा अमर्त्य-अन्तर्यामी है ॥ ४ ॥
योऽग्नौ तिष्ठन्नग्नेरन्तरो यमग्निर्न वेद यस्याग्निः शरीरं योऽग्निमन्तरो यमयत्येष त
आत्मान्तर्याम्यमृतः ॥ ५ ॥
जो अग्नि में निवास करने वाला, अग्नि में संव्याप्त है और अग्नि ही जिसका शरीर है; किन्तु अग्नि उसे
नहीं जानता, जो अग्नि के अन्दर रहकर उसका नियमन करता है, वह तुम्हारा आत्मा ही अन्तर्यामी और
अविनाशी है ॥ ५ ॥
योऽन्तरिक्षे तिष्ठन्नन्तरिक्षादन्तरो यमन्तरिक्षं न वेद यस्यान्तरिक्षः शरीरं
योऽन्तरिक्षमन्तरो यमयत्येष त आत्मान्तर्याम्यमृतः ॥ ६ ॥
जो अन्तरिक्ष में निवास करने वाला और उसी में संव्याप्त है, अन्तरिक्ष ही जिसका शरीर है और
अन्तरिक्ष जिसे जानता नहीं है, अन्तरिक्ष के अन्दर रहकर ही जो उसका नियमन करता है, वह तुम्हारा
आत्मा ही अन्तर्यामी और अविनाशी है ॥ ६ ॥
यो वायौ तिष्ठन्वायोरन्तरो यं वायुर्न वेद यस्य वायुः शरीरं यो वायुमन्तरो यमयत्येष
त आत्मान्तर्याम्यमृतः ॥ ७ ॥
जो वायु में निवासित, उसी में व्याप्त है, पर वायु द्वारा ही अज्ञात है, वायु ही जिसका देह है और जो
वायु में रहकर ही उसका नियन्त्रण करता है, वह तुम्हारा आत्मा ही अन्तर्यामी और अविनाशी है ॥ ७ ॥
यो दिवि तिष्ठन्दिवोऽन्तरो यं द्यौर्न वेद यस्य द्यौः शरीरं यो दिवमन्तरो यमयत्येष त
आत्मान्तर्याम्यमृतः ॥ ८ ॥
जो द्युलोक में निवास करता है, उसी में संव्याप्त है; किन्तु द्युलोक जिसे नहीं जानता, द्युलोक ही जिसका शरीर
है तथा जो उस द्युलोक में रहकर ही उसका नियामक है, वह तुम्हारा आत्मा ही अन्तर्यामी और अमर्त्य है ॥ ८ ॥
य आदित्ये तिष्ठन्नादित्यादन्तरो यमादित्यो न वेद यस्यादित्यः शरीरं य आदित्यमन्तरो
यमयत्येष त आत्मान्तर्याम्यमृतः ॥ ९ ॥
जो आदित्य में निवास करने वाला है, उसी में संव्याप्त है, आदित्य रूप शरीर वाला है; किन्तु
आदित्य जिसे नहीं जानता, वह आदित्य के अन्दर रहकर ही उसका नियन्त्रण करता है, वह तुम्हारा आत्मा
ही अन्तर्यामी और मृत्यु से परे है ॥ ९ ॥
यो दिक्षु तिष्ठन्दिग्भ्योऽन्तरो यं दिशो न विदुर्यस्य दिशः शरीरं यो दिशोऽन्तरो यमयत्येष
त आत्मान्तर्याम्यमृतः ॥ १०॥
जो दिशाओं में रहने वाला है, दिशाओं के अन्दर प्रतिष्ठित है, दिशाएँ ही जिसकी देह हैं;
किन्तु दिशाओं द्वारा वह अज्ञात है, दिशाओं के अन्दर रहकर ही जो दिशाओं का नियमन करता है,
वह तुम्हारा आत्मा ही अन्तर्यामी और अमर है ॥ १० ॥

अध्याय ३ ब्राह्मण ७ मन्त्र १७ २९१

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अध्याय ३ ब्राह्मण ७ मन्त्र १७ २९१
यश्चन्द्रतारके तिष्ठंश्चन्द्रतारकादन्तरो यं चन्द्रतारकं न वेद यस्य चन्द्रतारकः शरीरं
यश्चन्द्रतारकमन्तरो यमयत्येष त आत्मान्तर्याम्यमृतः ॥ ११॥
जो चन्द्र और तारों में स्थित है, उन्हीं में संव्यास है, चन्द्र और तारा रूपी देह वाला है; किन्तु चन्द्र और
तारागण उसे नहीं जानते, वह उनके अन्दर रहकर ही उनका नियन्त्रण करता है, वह तुम्हारा आत्मा ही
अन्तर्यामी और अमर्त्य है ॥ ११ ॥
य आकाशे तिष्ठन्नाकाशादन्तरो यमाकाशो न वेद यस्याकाशः शरीरं य आकाशमन्तरो
यमयत्येष त आत्मान्तर्याम्यमृतः ॥ १२ ॥
जो आकाशस्थ है, आकाश जिसका देह है, जो आकाश के भीतर रहकर ही उसका नियन्त्रण करता
है; किन्तु आकाश उसे नहीं जानता, वह तुम्हारा आत्मा ही अन्तर्यामी और अमर है ॥ १२ ॥
यस्तमसि तिष्ठंस्तमसोऽन्तरो यं तमो न वेद यस्य तमः शरीरं यस्तमोऽन्तरो यमयत्येष
त आत्मान्तर्याम्यमृतः ॥ १३ ॥
जो तमस् (अन्धकार) में स्थित है, तमरूप देहवाला है; किन्तु तम जिसे नहीं जानता, जो तम में
रहकर ही उसका नियन्त्रण करता है, वह तुम्हारा आत्मा ही अन्तर्यामी और अविनाशी है ॥ १३ ॥
यस्तेजसि तिष्ठंस्तेजसोऽन्तरो यं तेजो न वेद यस्य तेजः शरीरं यस्तेजोऽन्तरो
यमयत्येष त आत्मान्तर्याम्यमृत इत्यधिदैवतमथाधिभूतम् ॥ १४ ॥
जो तेज में निवास करने वाला है, तेजरूप शरीर वाला है; किन्तु तेज जिसे नहीं जानता, जो तेज में
रहकर ही उसका नियन्त्रण करता है, वह तुम्हारा आत्मा ही अन्तर्यामी और अमर्त्य है ॥ १४॥
यः सर्वेषु भूतेषु तिष्ठन्सर्वेभ्यो भूतेभ्योऽन्तरो यः सर्वाणि भूतानि न विदुर्यस्य
सर्वाणि भूतानि शरीरं यः सर्वाणि भूतान्यन्तरो यमयत्येष त आत्मान्तर्याम्यमृत
इत्यधिभूतमथाध्यात्मम् ॥ १५ ॥
जो समस्त भूतों में निवास करता है, समस्त भूत जिसके शरीर हैं; किन्तु समस्त भूत जिसे नहीं जानते,
समस्त भूतों के अन्तर में स्थित रहकर, जो सबका नियमन करता है, वही तुम्हारा आत्मा अन्तर्यामी और
अनश्वर है, यह अधिभूत दर्शन सम्पन्न हुआ। अब अध्यात्म दर्शन का वर्णन किया जाता है ॥ १५ ॥
यः प्राणे तिष्ठन्प्राणादन्तरो यं प्राणो न वेद यस्य प्राणः शरीरं यः प्राणमन्तरो
यमयत्येष त आत्मान्तर्याम्यमृतः ॥ १६ ॥
जो प्राण के अन्दर स्थित है, प्राण ही जिसका शरीर है; किन्तु प्राण जिसे नहीं जानता, प्राण में रहकर
ही वह उसका नियन्त्रण करता है, वह तुम्हारा आत्मा ही अन्तर्यामी और अमृत है ॥ १६ ॥
यो वाचि तिष्ठन्वाचोऽन्तरो यं वाङ् न वेद यस्य वाक् शरीरं यो वाचमन्तरो यमयत्येष
त आत्मान्तर्याम्यमृतः ॥ १७॥
जो वाणी में निवास करता है, वाणी ही जिसकी काया है, जो वाणी में स्थित रहकर ही उसका
नियमन करता है; किन्तु वाणी जिसे नहीं जानती, वह आत्मा ही अन्तर्यामी और अविनाशी है ॥ १७ ॥

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२९२ बृहदारण्यकोपनिषद्
यश्चक्षुषि तिष्ठꣳश्चक्षुषोऽन्तरो यं चक्षुर्न वेद यस्य चक्षुः शरीरं यश्चक्षुरन्तरो यमयत्येष
त आत्मान्तर्याम्यमृतः ॥ १८ ॥
जो नेत्रेन्द्रिय में विराजित है, नेत्र ही जिसका शरीर है, नेत्र में रहकर ही जो उसका नियमन करता है;
किन्तु नेत्र उसे नहीं जानता, वह तुम्हारा अन्तरात्मा ही अन्तर्यामी और अमर्त्य है ॥ १८ ॥
यः श्रोत्रे तिष्ठञ्छ्रोत्रादन्तरो यः श्रोत्रं न वेद यस्य श्रोत्रꣳ शरीरं यः श्रोत्रमन्तरो
यमयत्येष त आत्मान्तर्याम्यमृतः ॥ १९ ॥
जो श्रोत्रेन्द्रिय में विद्यमान है, श्रोत्र ही जिसका शरीर है, जो श्रोत्र के अन्दर रहकर ही उसका नियमन
करता है; किन्तु श्रोत्र उसे नहीं जानता, वह तुम्हारा आत्मा ही अन्तर्यामी और अविनाशी है ॥ १९ ॥
यो मनसि तिष्ठन्मनसोऽन्तरो यं मनो न वेद यस्य मनः शरीरं यो मनोऽन्तरो यमयत्येष
त आत्मान्तर्याम्यमृतः ॥ २० ॥
जो मन के अन्दर निवास करने वाला है, मन ही जिसका शरीर है, मन में रहकर ही जो मन का
नियामक है; किन्तु मन उसे नहीं जानता। वह तुम्हारा आत्मा ही अविनाशी और अन्तर्यामी है ॥ २० ॥
यस्त्वचि तिष्ठꣳस्त्वचोऽन्तरो यं त्वङ् न वेद यस्य त्वक् शरीरं यस्त्वचमन्तरो यमयत्येष
त आत्मान्तर्याम्यमृतः ॥ २१ ॥
जो त्वचा में विराजित है, त्वचा ही जिसका शरीर है, त्वचा में रहकर ही जो त्वचा का नियमन करता
है और त्वचा जिससे अपरिचित है, वह तुम्हारा आत्मा ही अविनाशी और अन्तर्यामी है ॥ २१ ॥
यो विज्ञाने तिष्ठन्विज्ञानादन्तरो यं विज्ञानं न वेद यस्य विज्ञानꣳ शरीरं यो विज्ञानमन्तरो
यमयत्येष त आत्मान्तर्याम्यमृतः ॥ २२ ॥
जो विज्ञान में निवास करने वाला है, विज्ञान ही जिसका शरीर है, जो विज्ञान में रहकर ही उसका
नियन्त्रण करता है; किन्तु विज्ञान उससे अपरिचित है, वह अन्तरात्मा ही अविनाशी और अन्तर्यामी है ॥ २२ ॥
यो रेतसि तिष्ठन् रेतसोऽन्तरो यः रेतो न वेद यस्य रेतः शरीरं यो रेतोऽन्तरो यमयत्येष
त आत्मान्तर्याम्यमृतोऽदृष्टो द्रष्टाश्रुतः श्रोतामतो मन्ताविज्ञातो विज्ञाता नान्योऽतोऽस्ति
द्रष्टा नान्योऽतोऽस्ति श्रोता नान्योऽतोऽस्ति मन्ता नान्योऽतोऽस्ति विज्ञातैष त
आत्मान्तर्याम्यमृतोऽतोऽन्यदार्तं ततो होद्दालक आरुणिरुपरराम ॥ २३ ॥
जो वीर्य में निवास करता है, वीर्य ही जिसका शरीर है, जो वीर्य में रहकर ही वीर्य का नियन्त्रण
करता है; किन्तु वीर्य उससे अपरिचित है, वह तुम्हारा आत्मा ही अनश्वर और अविनाशी है। वह दिखाई
नहीं देता; किन्तु देखता है, सुनाई नहीं देता; किन्तु सुनता है, वह मनन करने का विषय नहीं है; किन्तु
मनन करता है, वह स्वयं अविज्ञात है, पर सबको जानता है। इसके अतिरिक्त अन्य कोई द्रष्टा, श्रोता, मनन
करने वाला और जानने वाला नहीं है। तुम्हारा आत्मा ही अन्तर्यामी और अविनाशी है। इससे भिन्न सभी
नश्वर हैं। इसके अनन्तर आरुणि उद्दालक मौन हो गये ॥ २३ ॥