१०८ उपनिषद् (ज्ञान खण्ड - भाग २)
108 Upanishads Part 2 - Gyan Khand
by पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य
Source: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (origin)
Page 290 of 505
Read in context२९० बृहदारण्यकोपनिषद्
योऽप्सु तिष्ठन्नद्भ्योऽन्तरो यमापो न विदुर्यस्यापः शरीरं योऽपोऽन्तरो यमयत्येष त
आत्मान्तर्याम्यमृतः ॥ ४ ॥
जो जल में निवास करने वाला और उसी में संव्याप्त है, जल जिसका शरीर है, जल के भीतर रहकर
वह उसका नियमन भी करता है; किन्तु जल उसे नहीं जानता, वही आत्मा अमर्त्य-अन्तर्यामी है ॥ ४ ॥
योऽग्नौ तिष्ठन्नग्नेरन्तरो यमग्निर्न वेद यस्याग्निः शरीरं योऽग्निमन्तरो यमयत्येष त
आत्मान्तर्याम्यमृतः ॥ ५ ॥
जो अग्नि में निवास करने वाला, अग्नि में संव्याप्त है और अग्नि ही जिसका शरीर है; किन्तु अग्नि उसे
नहीं जानता, जो अग्नि के अन्दर रहकर उसका नियमन करता है, वह तुम्हारा आत्मा ही अन्तर्यामी और
अविनाशी है ॥ ५ ॥
योऽन्तरिक्षे तिष्ठन्नन्तरिक्षादन्तरो यमन्तरिक्षं न वेद यस्यान्तरिक्षः शरीरं
योऽन्तरिक्षमन्तरो यमयत्येष त आत्मान्तर्याम्यमृतः ॥ ६ ॥
जो अन्तरिक्ष में निवास करने वाला और उसी में संव्याप्त है, अन्तरिक्ष ही जिसका शरीर है और
अन्तरिक्ष जिसे जानता नहीं है, अन्तरिक्ष के अन्दर रहकर ही जो उसका नियमन करता है, वह तुम्हारा
आत्मा ही अन्तर्यामी और अविनाशी है ॥ ६ ॥
यो वायौ तिष्ठन्वायोरन्तरो यं वायुर्न वेद यस्य वायुः शरीरं यो वायुमन्तरो यमयत्येष
त आत्मान्तर्याम्यमृतः ॥ ७ ॥
जो वायु में निवासित, उसी में व्याप्त है, पर वायु द्वारा ही अज्ञात है, वायु ही जिसका देह है और जो
वायु में रहकर ही उसका नियन्त्रण करता है, वह तुम्हारा आत्मा ही अन्तर्यामी और अविनाशी है ॥ ७ ॥
यो दिवि तिष्ठन्दिवोऽन्तरो यं द्यौर्न वेद यस्य द्यौः शरीरं यो दिवमन्तरो यमयत्येष त
आत्मान्तर्याम्यमृतः ॥ ८ ॥
जो द्युलोक में निवास करता है, उसी में संव्याप्त है; किन्तु द्युलोक जिसे नहीं जानता, द्युलोक ही जिसका शरीर
है तथा जो उस द्युलोक में रहकर ही उसका नियामक है, वह तुम्हारा आत्मा ही अन्तर्यामी और अमर्त्य है ॥ ८ ॥
य आदित्ये तिष्ठन्नादित्यादन्तरो यमादित्यो न वेद यस्यादित्यः शरीरं य आदित्यमन्तरो
यमयत्येष त आत्मान्तर्याम्यमृतः ॥ ९ ॥
जो आदित्य में निवास करने वाला है, उसी में संव्याप्त है, आदित्य रूप शरीर वाला है; किन्तु
आदित्य जिसे नहीं जानता, वह आदित्य के अन्दर रहकर ही उसका नियन्त्रण करता है, वह तुम्हारा आत्मा
ही अन्तर्यामी और मृत्यु से परे है ॥ ९ ॥
यो दिक्षु तिष्ठन्दिग्भ्योऽन्तरो यं दिशो न विदुर्यस्य दिशः शरीरं यो दिशोऽन्तरो यमयत्येष
त आत्मान्तर्याम्यमृतः ॥ १०॥
जो दिशाओं में रहने वाला है, दिशाओं के अन्दर प्रतिष्ठित है, दिशाएँ ही जिसकी देह हैं;
किन्तु दिशाओं द्वारा वह अज्ञात है, दिशाओं के अन्दर रहकर ही जो दिशाओं का नियमन करता है,
वह तुम्हारा आत्मा ही अन्तर्यामी और अमर है ॥ १० ॥