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१०८ उपनिषद् (ज्ञान खण्ड - भाग २)

१०८ उपनिषद् (ज्ञान खण्ड - भाग २)

108 Upanishads Part 2 - Gyan Khand

by पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य

Source: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (origin)

DevanagariSanskritpublished505 pages

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Page 275

अध्याय २ ब्राह्मण ५ मन्त्र २ २७५
मोहरूपी भ्रम उत्पन्न हो गया है। यह सुनकर महर्षि याज्ञवल्क्य बोले- हे मैत्रेयी ! ऐसा नहीं है, मैंने भ्रम में
डालने के लिए कुछ नहीं कहा है, वरन् जो कुछ कहा है, वह उस महद्भूत का ज्ञान प्राप्त कराने के लिए
कहा है और वह उस ज्ञान के लिए पर्याप्त है ॥ १३ ॥
यत्र हि द्वैतमिव भवति तदितर इतरं जिघ्रति तदितर इतरं पश्यति तदितर इतरः
शृणोति तदितर इतरमभिवदति तदितर इतरं मनुते तदितर इतरं विजानाति यत्र वा अस्य
सर्वमात्मैवाभूत्तत्केन कं जिघ्रेत्तत्केन कं पश्येत्तत्केन कः शृणुयात्तत्केन कमभिवदेत्तत्
केन कं मन्वीत तत्केन कं विजानीयाद्येनेदः सर्वं विजानाति तं केन विजानीयाद्विज्ञातारमरे
केन विजानीयादिति ॥ १४॥
जहाँ (अज्ञानावस्था में) द्वैत प्रतीत होता है, वहीं दूसरा दूसरे को सूँघता है, दूसरा दूसरे को देखता
है, दूसरा ही दूसरे का श्रवण करता है, दूसरा ही दूसरे के प्रति कहता है, दूसरा ही दूसरे का मनन करता
है और दूसरा ही दूसरे को जानता है; किन्तु जब यह सब आत्मरूप ही हो गया, तब वह किसके द्वारा
किसको सूँघे, किसके द्वारा किसको देखे, किसके द्वारा किसको सुने, किसके द्वारा किसको कहे और
किसके द्वारा किसका मनन करे एवं जाने। जिससे सब कुछ जाना जाता है, उसे किसके माध्यम से जाने।
अस्तु, हे मैत्रेयी ! विज्ञाता को कैसे जाना जा सकता है ? ॥ १४॥
॥ पञ्चमं ब्राह्मणम् ॥
इयं पृथिवी सर्वेषां भूतानां मध्वस्यै पृथिव्यै सर्वाणि भूतानि मधु यश्चायमस्यां
पृथिव्यां तेजोमयोऽमृतमयः पुरुषो यश्चायमध्यात्मं शारीरस्तेजोमयोऽमृतमयः पुरुषोऽयमेव
स योऽयमात्मेदममृतमिदं ब्रह्मेदः सर्वम् ॥ १ ॥
यह पृथ्वी समस्त प्राणियों का मधु है और समस्त प्राणी पृथ्वी के लिए मधु स्वरूप हैं। इस पृथ्वी में
जितने भी अमर्त्य और तेजरूपी पुरुष है एवं इस शरीर में विनाशरहित और तेजस् सम्पन्न जो आत्मा है, वही
सर्वव्यापी परमात्मा है। यही कभी नष्ट न होने वाला ब्रह्म है एवं जो कुछ भी है, सब कुछ यही है ॥ १॥
[मधु रोचक और पोषक होता है। पृथ्वी के लिए प्राणी तथा प्राणियों के लिए पृथ्वी रोचक एवं पोषक है,
इसीलिए वे एक दूसरे के मधु कहे गये हैं। यह संगति स्रष्टा का कौशल है- कमाल है। इसी प्रकार प्रकृति के अन्य
घटकों के बारे में भी कहा गया है।]
इमा आपः सर्वेषां भूतानां मध्वासामपाः सर्वाणि भूतानि मधु यश्चायमास्वप्सु
तेजोमयोऽमृतमयः पुरुषो यश्चायमध्यात्मः रैतसस्तेजोमयोऽमृतमयः पुरुषोऽयमेव स
योऽयमात्मेदममृतमिदं ब्रह्मेदः सर्वम् ॥ २॥
यह जल समस्त प्राणियों का मधु है और समस्त प्राणी जल के लिए मधु तुल्य हैं। जल में स्थित जो
तेजोमय अमृतस्वरूप पुरुष है और जो इस शरीर में अविनाशी आत्मास्वरूप पुरुष स्थित है, वही
सर्वव्यापी परमात्मा है, वही अविनाशी ब्रह्म है। यहाँ जो कुछ भी है, सब कुछ यही है ॥ २ ॥