१०८ उपनिषद् (ज्ञान खण्ड - भाग २)
108 Upanishads Part 2 - Gyan Khand
by पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य
Source: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (origin)
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Read in context२७६ बृहदारण्यकोपनिषद्
अयमग्निः सर्वेषां भूतानां मध्वस्याग्नेः सर्वाणि भूतानि मधु यश्चायमस्मिन्नग्नौ
तेजोमयोऽमृतमयः पुरुषो यश्चायमध्यात्मं वाङ्मयस्तेजोमयोऽमृतमयः पुरुषोऽयमेव स
योऽयमात्मेदममृतमिदं ब्रह्मेदः सर्वम् ॥ ३ ॥
यह अग्नि समस्त प्राणियों का मधु है और समस्त प्राणी इस अग्नि के लिए मधुस्वरूप हैं। इस अग्नि
में स्थित तेजोमय और विनाशरहित जो पुरुष है और इस शरीर में स्थित वाङ्मय तेजस्वरूप जो पुरुष
आत्मा रूप में स्थित है, वही ब्रह्म, अमर्त्य और सर्व है अर्थात् जो कुछ भी है, सब यही है ॥ ३ ॥
अयं वायुः सर्वेषां भूतानां मध्वस्य वायोः सर्वाणि भूतानि मधु यश्चायमस्मिन्वायौ
तेजोमयोऽमृतमयः पुरुषो यश्चायमध्यात्मं प्राणस्तेजोमयोऽमृतमयः पुरुषोऽयमेव स
योऽयमात्मेदममृतमिदं ब्रह्मेदः सर्वम् ॥ ४ ॥
यह वायु समस्त जीवों का मधु है और समस्त जीव वायु के लिए मधु तुल्य हैं। वायु में संव्याप्त
तेजोमय अमृत पुरुष और देह में संव्याप्त प्राणरूप अमृतमय तेजस्वी आत्मा ही ब्रह्म (परमात्मा) है। यहाँ
जो कुछ भी है, सब कुछ यही है ॥ ४ ॥
अयमादित्यः सर्वेषां भूतानां मध्वस्यादित्यस्य सर्वाणि भूतानि मधु
यश्चायमस्मिन्नादित्ये तेजोमयोऽमृतमयः पुरुषो यश्चायमध्यात्मं चाक्षुषस्तेजोमयोऽमृतमयः
पुरुषोऽयमेव स योऽयमात्मेदममृतमिदं ब्रह्मेदः सर्वम् ॥ ५ ॥
यह आदित्य समस्त प्राणियों का मधु है। समस्त प्राणी आदित्य के लिए मधु स्वरूप है। इस आदित्य
में विद्यमान जो तेजःसम्पन्न और अविनाशी पुरुष है और इस शरीर में स्थित चाक्षुष तेजःसम्पन्न और अमृत
युक्त जो सर्वव्यापी आत्मा है। यही परब्रह्म, अमर्त्य और सब कुछ है ॥ ५ ॥
इमा दिशः सर्वेषां भूतानां मध्वासां दिशाः सर्वाणि भूतानि मधु यश्चायमासु दिक्षु
तेजोमयोऽमृतमयः पुरुषो यश्चायमध्यात्मः श्रोत्रः प्रातिश्रुत्कस्तेजोमयोऽमृतमयः
पुरुषोऽयमेव स योऽयमात्मेदममृतमिदं ब्रह्मेदः सर्वम् ॥ ६ ॥
ये दिशाएँ समस्त प्राणियों के लिए मधु स्वरूप हैं और समस्त प्राणी दिशाओं के निमित्त मधु स्वरूप
है। इन दिशाओं में स्थित तेजःसम्पन्न अमर पुरुष तथा शरीर में स्थित श्रोत्रमय तेजःसम्पन्न अविनाशी पुरुष
(आत्मा) ही सर्वव्यापी ब्रह्म, विनाश रहित और सर्वस्वरूप अर्थात् सब कुछ है ॥ ६ ॥
अयं चन्द्रः सर्वेषां भूतानां मध्वस्य चन्द्रस्य सर्वाणि भूतानि मधु यश्चायमस्मिँश्चन्द्रे
तेजोमयोऽमृतमयः पुरुषो यश्चायमध्यात्मं मानसस्तेजोमयोऽमृतमयः पुरुषोऽयमेव स
योऽयमात्मेदममृतमिदं ब्रह्मेदः सर्वम् ॥ ७ ॥
यह चन्द्रमा समस्त भूतों-प्राणियों के लिए और समस्त भूत (प्राणी) चन्द्रमा के लिए मधुरूप हैं।
चन्द्रमा में स्थित तेजोमय-अविनाशी पुरुष तथा शरीर में स्थित, मन में विद्यमान तेजोयुक्त अमर पुरुष ही
सर्व-व्यापक परब्रह्म है, यही अविनाशी तथा सभी कुछ है ॥ ७॥