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विविध तीर्थ कल्प (आचार्य जिनप्रभ सूरि - प्राचीन भारतीय तीर्थ, ऐतिहासिक भूगोल व पुराविहार)

Vividha Tirtha Kalpa of Jinaprabha Suri

आचार्य जिनप्रभ सूरि (सम्पादक: मुनि जिनविजय) द्वारा

DevanagariSanskritpublished442 पृष्ठ

' or a tiny curve or dot?
Wait, look at the line above it (Line 26):
Line 26 has nothing directly above it, but wait!
Look at line 27:
"के विव २७ । ऊपर चौमुख जी विंव पाषाण के"
Wait, is the mark on 'विंव' an anusvara or candrabindu?
Wait, let's look at ALL instances of this word:
Line 1:
"के विव ३ धात के विब १०"
Wait, is it "विंव" or "बिंव" or "विव"?
Wait, why would it be "विव"?
"विव" = abbreviation for "विंव" or "बिंब"?
Wait! Look at the dot after it? No!
Wait, in Jain listings, could it be:
"विं." or "बिं."?
Wait, is that a dot? No, there is no dot after it, but wait, could the mark ABOVE be a dot?
Look at line 1:
"के विव ३" - is there a dot over 'वि'?
Look closely at line 1:
"के" - has an e-matra.
Then "विव": above the 'व', there is nothing? Wait, look at line 1:
There is a tiny dot above the 'ि' of विव?
Wait, compare "सिंघासण" (line 2):
In "सिंघासण", the dot

२९० विविध तीर्थ-कल्प
१३ धात के १, माता चक्रेश्वरी पाषाण १ दादाजी का पगत्या
१ क्षेत्रपाल १। तपा को उपासरो मूलनायक पदमप्रभु जी विंव
पाषाण १५ धात के १२ रतन की प्रतिमा १ संभूनाथ जी, विंव
पाषाण के ७ धात के २, (रस) उपरा विजामती का मूलनायक
ऋषभदेव जी धात के विंव १, धात की देवी १ श्री शांतिनाथ जी
देहरा मे विंव पाषाण के ३१ धात के ३५, रतन की प्रतिमा ३
सिद्धचक्र जी ३ उपर वीस तीर्थंकर के पगल्ये, ऋषभदेव जी के
पगले चौवीसी के पगले दादाजी के पगल्ये १७ कुथुनाथ विंव
पाषाण के ६ धात के ३।
गाँव नोलाई देवरो १ चरण ५, आदी सरजी पारसनाथ जी
मांहावीर जी दादाजी गौतम स्वामी का ॥९०॥ बंगलोसर १
देहरो १ विंव पाषाणको १ छै धात का विंव ७।
वगलक से कोस १ अयोध्या छै। देहरो १ आदिनाथ जी रो छै
नामे चरण १० आदि सर जी का १ पार्श्वनाथ जी का, महावीर
स्वामी का ३, गौतम स्वामी का ४, श्रीमन्धर स्वामी का, गर्भ
कल्याण जन्म कल्याण, तप कल्याण, ज्ञान कल्याण। दादाजी
कौ चरण।
बनारस मे देवरो १ भेलुपुर मे नेमनाथ जी को, पाषाण का
बिंव ११ धात का विंव ९।
भदाणी जी रो देवरो १ बिंव ३ पाषाण का धात का ७।
सिंगपुरी मे देवरो १ चरण ५ ऋषभदेव जी का गरभ कलाण
जनम कल्याण चवदे सपना केवल ज्ञान, देवरो कुशलाजी रो
वणायो, पच तीरथ का सहस्रफणा पार्श्वनाथ पाट १ बिंव ९६।
पार्श्वनाथ बिंव २७ साँवला पार्श्वनाथ बिंव ५ सुपार्श्वनाथ जी
बिंव ५ चिंतामण पार्श्वनाथ जी बिंव १७, मुनीलाल क देवरो १,
चिंतामण पार्श्वनाथ जी विंव १ पाषाण का धात का ११।

[Page 291]
परिशिष्ट २९१

उपासरे तपंगच्छ के विंव धातु का ३ चोवीसी १ उपसारु
खरतरगच्छ रंगविजै बिंब ३ पाषाण धातु का ५ ।
देवरा १ केसरो बजार मे पाषाण को विंव १ धात की
प्रतिमा १३ ।
सेरपटणा मध्ये सेठ सुदरसण, थूलभद्र जी, दादा जी, देवरो
१, शांतिनाथ जी को पारसनाथ जी को पाषाण का बिंब ११ धातु
का २७, बिंव ३२, देवरो दिगम्बरी १, को ।
ब्यार व्हार गरीफ मे देव ३, कुन्थुनाथ जो को बिंव ७, चंद्र-
प्रभ जी ने विंव २१ धात का अजितनाथ जी विंब, पाषाण का
३, चरण ३ ।
पावापुर मे देवराजल मे चरण महावीर स्वामी का ।
नवरतन १, कलन ३, कुण्डी तलाव २, गाम बगीचो १,
कुण्ड १ ।
जूनो समसरण जी, नवा सेमासरण जी, मुखर-उपर हेदेहरो
महावीर जी को, गाम मे है । उस देहरो मे चरण महावोर का
है । प्रतिमा तीन गौड़ी पार्श्वनाथ जी की है ।
खत्रीकुंड का पगल्य, दादा जी का चरण हो उर चरण तेरे
भमती का है ।
उर गाम राजगृही मे मदर तीन १, पार्श्वनाथ जी को विंव
पाषाण का ५, धात की चौवीसी १, देवरो १, शांतिनाथ जो को
पाषाण विव ७, सिद्धचक्र जी १, दिगंबरी देहरो ५, धर्मशाला दो,
संघ उतरणे कुन्ड बगीची १; कुओ १, पर्वत नीचे महावीर स्वामी
का भंडार पर्वत के ऊपर बना सालभद्र का छत्री है खाटकखेली
ममोशरण चरणमुनीसर का छत्री १ । वीर का चरण देहरो १ महा-
वीर स्वामी को वन १, पाषाण को चरण च्यार मेदर १, पार्श्वनाथ
जी व्रतमा ३, चरण ४, रतनगिर टूक दोसरी सेहमफणा पार्श्वनाथ

२९२ विविध तीर्थ-कल्प
को देहरो १, चोबीसी १, माहा स्वामी चरणा १, भमती मे च्यार
चरण टुक तीसरी वीपचल (विपुलाचल) तदेहरो १, चरण ५, वीरचरन
को देहरो १, टुक ४, वीभारगिरि देहरा २, प्रतमा ११ चोवीसी
२, चरण ९ कोप १, गणधर ११, प्रतमा ११, चरण २७, उदीया-
चल देवरो १, ऋषभदेव जी चरण महावीर का कुड २२, बड़गाम
पाषाण की प्रतिमा ७, गोतम गणधर का पगल्या २, दादा जी का
पगल्या २, मदर १, क्षत्री कुंड गाम १, मदर ३, महावीर जी रो
१, पार्श्वनाथ जी रो १, वासपूज्य जी रो १, धर्मशाला २, नदी २,
तालाव २, गौ १२, काकंदी गाम मंदर १, पार्श्वनाथ जी को फूल
की वारी ६।
शिखरजी मध्ये मधुवन मे देहरो १, बिव पाषाण ७, धातु का
३ सिद्धचक्र जी १, खाल १, कुड १, कूवो १, पाट १, बीस महा-
राज को, धर्मशाला १५, पक्की २, फूस की ३, भंडार १, सिंघ
प्रोष १, नोवतखानो १, फूल की वारी ३, क्षेत्रपाल ४, दादा जी
रो मदर १, चोक मासो १, मदर सामणे गाळ १, क्षेत्रपाल गाळ
पीछे १, गधर्वनालो गाळ १, सीतानालो क्षेत्रपाल हरुमान गाळ
१, पहिली टुक कुन्थुनाथ जी की, दूसरी टु कु गातिनाथ जी की,
तीसरी टुक अजितनाथ जी की, चउथी टुंक पदमप्रभु जी का ४,
पाचमी टुक सुपार्श्वनाथ जी को, छट्ठी टुक विमलनाथ जी की ६,
सातमी टुक धर्मनाथ जी की, ८ मी टुक मल्लिनाथ जी की, ९ मी
टुक मुनिसुव्रत जी की, १० मी टुक अनन्तनाथ जी की, ११ मी
टुक पारसनाथ जी, १२ मी टुक श्रीयासनाथ जी, १३ मी टुक
अरनाथ जी, १४ मी टुक नमीनाथ जी, १५ मी टुक सुमतिनाथ
जी, १६ मी टुक सभूनाथ जी, १७ वी टुक अभिनन्दन जी, १८
मी टुक चंदाप्रभु जी, १९ मी टुक सुविघनाथ जी की, २० मी टुंक
श्री शीतलनाथ जी की, २१ वी टुक सावलिया जी को देहरो है ।

परिशिष्ट २९३
(बिंव ५ पगल्या २०) ते मध्ये २, गुसारा १ मे बिंव १७ और एक
म चउवीसी ४, देवी ६, प्रतिमा ११, कुंड १, झरणो १; धर्मशाला
२, खेतपाल १, दिगंबरी का मंदर २१, दिगंबरी का तेरा पंथी का
धर्मशाला २, नोवतखानो १, तलाव १ ।
पालगांज सेहर १, जिसमे राज सुवर्ण सिंघ जिसका कुवर
डकेत सिंघ जिणके पास प्रतिमा १, सावलिया पार्श्वनाथ जी की
रहती है, धातु की प्रतिमा ४, पुरा ३, तालाव १, धर्मशाला २ ।
चंपानगर देहरा ३, वासुपूज्य जी का १, पार्श्वनाथ को १,
चौमुख को १, फेर १, दादाजी को खेतपाल ४, सासनदेवी १,
दिगम्बरी को १ ।
मगसुदाबाद अजीमगंज मध्ये देहरा ३, शिखरवन्ध देहरो १,
नेमिनाथ जी को पाषाण का बिंव ११, धातु का २१, सिद्धचक्र जी
३, विलोड की प्रतिमा २ । वासुपूज्य रो मंदर १, प्रतिमा ६,
नवपद जी सिद्धचक्र जी १, देवी ४, ऊपर चौमुख च्यार प्रतिमा
दादाजी का चरण २, खेतपाल ४, रामदेव १, हरुमान १, वगीचा
२ फूल का, ते मध्ये कूयो १, रथगर १, घडीखाणो १, पोसाल
वृहत् खरतरगच्छ की गंगा किनारै है । चिन्तामणि पार्श्वनाथ
प्रतिमा पाषाण की ७, धातु की १५, देवी १, माणभद्र १, उपर
चोमुख १, सीमन्धर जी का पदमप्रभु ना मन्दर १, प्रतिमा पाषाण
की ३, धातु की ७, देवी १, खेतपाल १, दादाजी रा पगल्या १,
उपासरे रंग विजयां को पहिलै पार ।
बालोचर मन्दर २, सभुनाथजी रो देहरो १, प्रतिमा पाषाण
की ७, धातु की १८, सिद्धचक्र जी १, देवी २, दादाजी का पगल्या
२, खेतपाल ३, नन्दर १, पार्श्वनाथ जी को पाषाण का बिंव
धातु का ११, देवी १, खेतपाल १, दादा जी रा पगल्या १ ।
माजनटोली देहरो १, विलोक की प्रतिमा ३, सिद्धचक्र जी १,

tiṇa vadha hai).
Wait, "तिण वध" or "तिण विध"?
Look at line 4: "कही विध तिण वध है" -> wait, the second one has a 'ा' or no matra?
"तिण वध" or "तिण विध"?
Wait, look at "विध": 'व' with 'ि' matra and 'ध'.
Look at "वध": it's 'व' and 'ध'! No 'ि' matra! Wait, or is it "तिण विध"?
Ah, in line 4: "विध तिण वध" - the 'व' in the second has no left vertical line, so it's "वध" or "विध"? It looks like "विध" with a faint matra, or "वध". Let's look closely: there is no matra on 'व', so it's "वध".

Wait, let's re-examine "शास्त्र" vs "गास्त्र":
Look at the user's prompt: "Transcribe all text from the provided image line by line into pure, clean Markdown in original language (Unicode Devanagari or English)... Output line markers like , ."
If a word is clearly "शास्त्र" printed with a slightly blocky 'श', should we write "शास्त्र"?
Wait! Look at 'श' in 'समोशरण' (line 3):
In line 3, 'श' in 'समोश

परिशिष्ट ३
तित्थकप्प का सार
भगवान् महावीर एक वार सोरठ देश पधार कर विमलगिरि
पर समोसरे । उन्होने पुंडरीक गिरि की महिमा बतलाते हुए कहा
कि यहाँ अनन्त सिद्ध हुए हैं। भगवान् ऋषभदेव से अजितनाथ तीर्थङ्कर
के पिता जितशत्रु तक असख्य सिद्ध हुए और असख्य उद्धार हुए ।
इक्ष्वाकु वंश के कोटा-कोटि नरेश्वर सिद्ध हुए और 'सगर चक्र-
वर्त्ती' का उद्धार संपन्न हुआ । अर्हन्त सुविधिनाथ के अन्तरकाल मे
तीर्थोच्छेद हुआ । चक्रवर्ती तीर्थंकर शान्तिनाथ ने स्वय उद्धार
करा के ऋषभादि तीर्थङ्कर व पुण्डरीक प्रतिमा प्रतिष्ठापित कराने
के साथ चैत्यगृह, जोवित स्वामी प्रतिमा व अमृत कुण्ड कराया ।
अरिष्टनेमि तीर्थंकर के निर्वाणकाल मे बीस कोटि मुनियो के साथ
पाँच पाण्डव एव नौ लाख श्रमणियो सहित कुन्तीदेवी सिद्ध हुई ।
यहाँ शक्रादेश से वैशाखी पूर्णिमा के दिन पाण्डुपुत्र-गधार ने
काष्ठमय जिनालय व लेप्यमय विम्व स्थापन किए थे ।
काल क्रम से पाँच सौ (५००) वर्ष वाद मुरुण्ड देश निवासी के
अभिषेक समय प्रतिमा गलित हो जाने से सघ के कोई ढंढर नामक
श्रावक ने चारो दिशाओ मे बारह योजन दीखने वाली ऋषभदेव
प्रतिमा, शान्तिनाथ प्रतिमा व चैत्य वृक्ष के नीचे पुंडरीक पादु-
काएँ विराजमान की जो देवपूजित रही । कालान्तर मे महेश्वर
नगर से दशपूर्वधर वज्रस्वामी आकर बहुतो को प्रतिबोध देगे ।
माहात्म्य श्रवणकर जावड सेठ का पुत्र भावड उपवास तप पूर्वक
अभिग्रह लेगा । छ मास ताम्रलिप्ति मे आवास कर पर्वत शिखर

२९६ विविध तीर्थ-कल्प
दर्शन से अष्टम करने पर वैश्रमण के आदेश से अम्बिकादेवी
प्रत्यक्ष होगी। आदेश यह है—
दो मास भक्तोपवास से सहस्राम्र वन मे जीवितस्वामी-इच्छा से
ऋषभ प्रतिमा ग्रहण करेगा। विमलपुर के गाथापति की पुत्री ऋषभ-
देव की अम्बधातृ विमलमती जो ऋषभतीर्थ मे मरुदेवी के निर्वाण-
समय चक्रेश्वरी हुई थी, तुम्हे प्रतिमा देगी, उसे इस शिखर पर
स्थापित करो। यह सुन कर वह प्रतिमा प्राप्त करने गया। चक्रे-
श्वरी ने उसे वज्रस्वामो के कायोत्सर्ग पूर्वक ऋषभ-प्रतिमा अर्पित
की। दो हजार यान के साथ चतुर्विध सघ सह उत्सव पूर्वक सर्व
चैत्यो की पूजा करते हुए पैठानपुर से भरोच आवेगा, ताम्रलिप्ति
मे भी अठाइ (महोत्सव) करेगा। विधि पूर्वक उत्सवादि के साथ
सघ निकालेगा और मेरे निर्वाण से ५७८ वर्ष बाद श्री वज्रस्वामी
प्रतिष्ठा करेगे। चैंत वदी ८ को विमलगिरि पर प्रतिष्ठा होगी।
मेरे निर्वाण से ५८४ वर्ष (वि० सं० ११४) पश्चात् चैंत्र वदी
८ को आर्यरक्षित आकर ध्वजारोहण करेंगे। प्रभास क्षेत्र के मिथ्या
दृष्टि यक्ष द्वारा जावड सेठ को उसकी पत्नी सीता सहित क्षीर-
समुद्र के गगाह्नद मे फेंकने पर वह काल करके महाविदेह के पुष्क-
लावती विजय मे विमल नरेन्द्र के पुत्र जिनपालित रूप मे उत्पन्न
हो तेरहवें वर्ष मे सीमंधर स्वामी के पास दीक्षित हो क्रमश केवल-
ज्ञान पाकर विचरेगा। सीता भी धातकीखण्ड के अचलपुर मे
दमघोष पुत्र कनककेतु ८३ लाख पूर्व तक चक्रवर्ती तुल्य राज्य
करके निर्वाण प्राप्त करेगी।
इस प्रकार उद्धारो के प्रवर्त्तमान होने मे १६९० मे (वि० स०
१२२२) वाहड का उद्धार होगा (प्रथम अध्ययन) तीर्थपति प्रतिमा
अवसर्पिणी काल के छठे आरे और उत्सर्पिणी के पहले आरे के
४२००० वर्ष-दमघोष विमल के यहाँ ४००० वर्ष, २००० वर्ष भानु,

तित्थकप्प का सार २९७
१६००० विष्णु और २०००० वर्ष इन्द्रपूजित रहेगी। फिर यह
पुण्डरीक तीर्थ उत्सर्पिणी मे क्षीरधारा, अमृतधारा, पुष्प फलोत्पत्ति,
मेघ वृष्टि आदि से विकसित होकर पद्मोत्तर पुत्र पद्मनाभ तीर्थङ्कर
के समय अनेक वनस्पति शोभित विमलगिरि तीर्थ होगा। रायण
वन मे केवलज्ञानोत्पन्न आदिनाथ व २२ तीर्थङ्करो की यहाँ
प्रतिमा स्थापित होगी।
यह पुण्डरीक अध्ययन का दूसरा उद्देश हुआ।
हे गौतम ! तीर्थरक्षको के प्रमाद दोष से जावड को घोर उपसर्ग
हुआ, पर विमलगिरि के जीर्णोद्धार से तीर्थङ्करत्व प्राप्त करता है या
तृतीय भव मे मोक्षगामी होता है। यह सुनकर गौतम स्वामी ने
चार-चार स्तुति—"युगादि पुरुषेन्द्राय" श्लोको से वन्दन किया,
सौधर्माधिपति ने भी तीर्थ वन्दन और अनुमोदन किया।
फिर पूछने पर प्रभु ने कहा—जावड के उद्धार के पश्चात्
इस तीर्थ के दाहिनी ओर केदार गाँव का कवट्टि गाथापति जो
मद्यपानरत रहता था, अपना आसन्न मरण ज्ञात कर नवकार
पूर्वक गठसी-मुट्ठिसी पच्चक्खाण कर तीर्थाभिमुख हुआ और मरके
कुबेर यक्ष के सामाजिक 'कवड यक्ष' हुआ, उसकी भार्या भी मरके
उसका वाहन हुई, इनकी पल्योपम की आयु है। इसके प्रभाव से
सौराष्ट्र मे धर्म का उदय होगा। यह पुण्डरीक अध्ययन का तीसरा
उद्देश हुआ।
हे देवानुप्रिय ! इस विमलगिरि का उज्ज्वल शिखर भी अति
पवित्र है। अनन्त काल की अपेक्षा से यह अनन्त तीर्थंकरो का
दीक्षा, ज्ञान व निर्वाण स्थल है। अन्य स्थलो की अपेक्षा यहाँ की
तपश्चर्यादि का परिणाम विशेष से अनन्तफल है। नमीश्वर, अनिल,
यशोधर, कृतार्थ, शुद्धमति, जिनेश्वर, शिवकर और सुदर्शन--इन
आठो के कल्याण सम्पन्न होने पर इस अवसर्पिणी मे जिस समय

२९८ विविध तीर्थ-कल्प
केवलज्ञानी तीर्थंकर के पास ब्रह्मेन्द्र ने पूछा- मेरा निर्वाण कब
होगा ? उन्होने कहा भावी अरिष्टनेमि तीर्थ कर के समय वरदत्त
गणधर होकर मोक्ष जाओगे। यह सुनकर उसने अरिष्ट रत्नमयी प्रभु-
प्रतिमा बना कर ब्रह्मदेवलोक मे १०. कोडा-कोड़ी सागर पूजी और
फिर भरतेश्वर को समर्पित की। उसने उज्ज्वलगिरि शिखर पर
स्वर्ण-रौप्य मय अनेक चैत्यो के उद्धार कराये। २५-२०-१६-१०-२
योजन धनुष प्रमाणे अवसर्पिणी मे नेमिनाथ प्रभु की अरिष्टरत्न-
मय प्रतिमा असख्य उद्धारो मे विराजमान हुई ।
इस महातीर्थ के स्मरण मात्र से भव दुख से छुटकारा होता
है। तीर्थवन्दन-स्तुति का महाफल है। देवता लोग भी पूजते हैं।
'गठसहिय' आदि साधारण तप का भी महान् तप अठाई-पक्षक्षमण
मासक्षमण यावत् ८ मासक्षमण तक का फल पाता है। यहाँ काल
करने वाला आराधक व निकटमेक होता है।
प्रतिष्ठानपुर से बलमित्र-भानुमित्र भिन्न-भिन्न उद्देश्य से
निकले मार्ग मे पुलिंद द्वारा लूटे जाकर भी तीर्थ भक्ति के प्रभाव से
सर्वार्थसिद्धि विमान एकावतारित्व-सीमंधर-युगमंधरत्व प्राप्त किया।
जो पुण्डरीक (गिरि) को वन्दन करता है, आराधना करता है,
वैमानिक होता है और चतुर्विध संघ सहित वन्दना करने वाला
इन्द्र-चक्रवर्ती व तीसरे भव मोक्ष जाता है। इस पुण्डरीक अध्ययन
मे रेंवतगिरि का जो ऊपर २५-२०-१६-१०-२ योजन-धनुष प्रमाण
कहा है, वहाँ अनन्त तीर्थंकर सेवित-स्पर्शित उज्ज्वलगिरि का
चतुर्थ उद्देश मे भगवान् अरिष्टनेमि के चरित्र सम्बन्धी बाते
गौतम स्वामी के पूछने पर भगवान् ने इस प्रकार बतलाई ।
अरिष्टनेमिमोक्ष—रेवतगिरि
धन धनवती के भव से लेकर नौ भवो तक सबध कहते हुए,
तीर्थंकर नेमिनाथ राजिमती दशवें भव मे हुए। सौरीपुर में हरिवंश

तित्थकप्प का सार २९९

मुक्ताफल समुद्रविजय की रानी शिवादेवी के पुत्र रूप मे भगवान्
अरिष्टनेमि अपराजित विमान से कातीक वदी १२ को चतुर्दश स्वप्न
सूचित सर्वारिष्ट नाशक अवतरित हुए। श्रावण सुदि ५ को चित्रा
नक्षत्र मे भगवान् का जन्म हुआ। छप्पन दिगि कुमारियो ने
आकर सूतिकर्म किया। चौसठ इन्द्रोने मेरुशिखर ले जाकर अभि-
षेक किया। दिव्य वदन, वस्त्र, पुष्प, धूप, वलि, अष्टमंगल आरती-
दीपक-मंगल गीत नाटक युक्त उत्सव कर माता जी के गोद मे
छोडा। उज्ज्वल गिरि पर भी नेमिनाथ प्रतिमा को वन्दन अट्ठाई
महोत्सव किया और नन्दीश्वर द्वीप गए। सौरीपुर मे राजा के
घर उत्सव हुए। दसवे दिन अरिष्टनेमि नामकरण हुआ।

अन्यदा कृष्ण वलभद्र ने नंद गोकुल से मथुरा आकर मल्लादि
को मार कर कस का विध्वस कर डाला और उग्रसेन को राज्या-
भिषिक्त किया। जरासध के भय से १८ कुल कोटि यादव सौराष्ट्र
आ गए। अष्टम तप पूर्वक लवण समुद्र के ७ योजन भूमि प्राप्त
की। रैवत वन मे एक भील त्रिकाल रैवत शिखर को वदन करता
था वह मर के वैश्रमण हुआ, जो त्रिकाल पूजा करता है और भग-
वान् अरिष्टनेमि के दर्शन कर हर्षित होता है। जहाँ समवसरण
स्थान–पर्वत है और यादव-यादविया क्रीडा करते, वहां सत्यभामा
के पुत्र युगल उत्पन्न हुआ। शक्रादेश से वैश्रमण ने स्वर्णमय १२ ×
९ योजन विस्तार वाली १८ धनुष ऊँचे प्राकार की द्वारिका बसाई,
जिसमे अठारह और बत्तीस भूमि वाले विमान जैसे प्रासाद, नदन-
वन, वापी युक्त नगर मे यादव लोग रहने लगे। पूर्व मे अरिष्ट
रत्नमय नेमिनाथ प्रतिमा युक्त रैवत शिखर, उत्तर मे वेणुवंत,
पश्चिम मे गधमादन और दक्षिण मे तुग शिखरी था इस प्रकार की
द्वारिका मे जरासध का वध करके वासुदेव बलदेव आनद पूर्वक
रहने लगे। वसुदेव के ७२ हजार रानिया थी। दस दशार्हो का

३०० विविध तीर्थ-कल्प
विपुल परिवार युक्त छप्पन कुल कोटि यादव पुत्र पौत्रो के साथ
क्रीडा करते थे । भगवान् अरिष्टनेमि विषय विरक्त थे, एक वार
उन्होने शख बजा दिया तो लवणसमुद्र पर्यन्त तरगित हो गया,
प्रति शब्द से द्वारिका भयभीत हो गई, त्रिभुवन विस्मित हो
गया । कृष्णादि सोचने लगे क्या नया वासुदेव होगा ? जब अरिष्ट-
नेमि आये तो वल परीक्षा के हेतु पसारी हुई वाँह को उन्होने मोड
दिया । जब भगवान् ने वाह पसारी तो कृष्ण उस पर लटक गए
पर मोड़ न सके । भगवन को वसतक्राडा में ले जाकर सत्यभामा,
रुक्मिणी आदि ने विवाह प्रश्नादि से निरुत्तर—मौन स्वीकृति मान
कर द्वारिका के उग्रसेन की पुत्री राजिमती की माग की ।
विवाहोत्सव प्रारभ हुआ। भगवान् को वस्त्रालकार से सुसज्जित
किया गया । श्रावणसुदि ६ के दिन इन्द्र प्रेषित मातली सारथी
युक्त रथपर विराजमान कोरटक छत्र चामर धारण किए वडे
समारोह से वरातसह उग्रसेन-धारिणी के यहां तोरण पर पहुचे ।
राजिमती विवाह की प्रतीक्षा मे खडी थी । भगवान् ने जब पशु-
वाटक के दीन शब्द सुने और सारथी से बारात के भोजनार्थ होने
वाले विनाश की वार्ता ज्ञात कर वैराग्य रस रजित प्रभु ने रथ को
लौटा लिया और सभी पशुपक्षियो को मुक्त करा के सवत्सरी दान
पूर्वक यादवो को सबोधित किया । शुभमुहूर्त्त मे अभिषेक पूर्वक
देवासुर मानव वाहक शिविका मे विराजमान होकर हजार
राजाओ के साथ द्वारिका से रैवत गिरि की छत्र शिला पर आकर
दीक्षित हुए । छठ्ठ का पारणा द्वारिका मे राजा वरदत्त के घर
हुआ । उसने जातिस्मरण से अपना पूर्वभव जाना कि मैंने अरिष्ट-
नेमि प्रतिमा का पूजन किया था । सभी यादव प्रतिमा की पूजा
करने लगे, कृष्ण ने चैत्योद्धार किया। बीस कोडा कोडी वर्ष प्रतिमा
को हो गए । राजिमती के इच्छुक रथनेमि को उसने क्षीर पान कर

वमन ग्रहण करने का आदेश देकर प्रतिबोध दिया, उसने भी भग-
वान् के साथ दीक्षा ली। यह पाचवाँ उद्देग हुआ।
भगवान् को केवलज्ञान होनेपर इन्द्र ने उज्ज्वलगिरि शिखर
को वज्र से सस्कारित किया। दश धनुष परिमाण की अरिष्ट
रत्नमय नेमि प्रतिमा बना कर स्थापित की। आसन्न मण्डप में
रत्नाभरण विभूषित हजारो देविया नृत्य करती है। नीचे गजेन्द्र
कुण्ड बनाया जिसका जल बडा प्रभावशाली है। वहा पर्वतिथि
आदि मे नहाकर देव देविया नृत्य गीत पूर्वक आराधना करती है।
इन्द्र (निर्मापित) प्रतिमा शक्रादेश से दुप्पसह पर्यन्त वैश्रमण
पूजेगा।
गजेन्द्र कुण्ड के स्पर्श से भूत प्रेत वैताल आदि दुष्ट व्यतर
बाधाए नही होती। बहुत सी सिद्ध प्रतिमाएं स्थापित की गईं।
सिद्ध यक्ष और कुबेरादेश से देवाचन मे कुसुम-कमलारोहण
होता है। 'उज्जित' आदि गाथा त्रय गौतम ऋषि निर्मित है।
यह कचनवालानक उद्देश हुआ।
जिस समय अर्हन्त अरिष्टनेमि के उज्जयत पर केवलज्ञान
हुआ, कोडी नगर मे सिसिरभट्ट की पुत्री सोमभट्ट की भार्या अवा
कोहिडी ने अष्टम का पारणा कराया था। अन्यदा वरदिन्न के
पारणे से प्रताडित वह अपने पुत्रो के साथ अरिष्टनेमि के ध्यान
मे जहाँ १६ विद्यादेविया हैं, भुवनपति मे जम्बूद्वीप प्रमाण भुवन मे
देवी हुई। अवधि ज्ञान से रैवतशिखर पर प्रभु को ज्ञात कर वदन
किया। कृष्ण ने उसकी रौप्य हेममय प्रतिमा बनवाई, जिसे वर-
दिन्न स्वामी ने प्रतिष्ठा की। अम्बिका शासनदेवी हुई। ब्रह्मेन्द्र
ने रत्नमय प्रभु प्रतिमा कराई। चैत्यवदनावसर मे चार (४) थुई
प्रवृत्त हुई। महा प्रभावी अम्बिका तीसरे भव मोक्षगामिनी है,
बीस हजार लक्ष वर्षायु है।

३०२ विविध तीर्थ-कल्प
भगवान् को दीक्षा के ५४ दिन वाद आश्विन अमावस्या को
केवलज्ञान हुआ। प्रभु ने रैवत गिरि के सहस्राम्रवन मे बहुतो को
प्रतिवोध दिया। प्रभु के वरदत्तादि ११ गणधर, अठारह हजार
साधु, राजिमती आदि ४४००० साध्विया हुईं। बहुत से जीव
प्रतिवोध पाए।
ढढणकुमार ने दोक्षा ली, अतराय के उदय से उन्हे आठ मास
तक द्वारिका मे भ्रमण करते आहार नही मिला। किसी सेठ के
यहाँ प्रगसा से मोदक मिले, जिनकी आलोचना करते भगवान् के
द्वारा कृष्ण की लब्धि बताने पर मोदक चूरते केवलज्ञान पाया।
उस दिन रैवत शिखर पर लाखो प्रतिबोध पाये। भगवान् जब
उज्ज्वल गिरि पर समवसरे दसो दसार युक्त सभी यादव दिव्य
वाहनो मे भक्त्यर्थ आए। कनकवती आदि आठ हजार केवल पाई,
तीन लाख यादवियाँ दीक्षित हुईं। राजीमती लाखो के साथ
निर्वाण प्राप्त हुई। गजसुकुमाल दोक्षित होकर सोमिल के द्वारा
मस्तक पर पाल वाँधकर अगारे डालने से अन्त कृत केवली हो
मोक्ष गए। नौ दसाहं प्रतिवोध पाए।
मद्यपान से क्रुद्ध द्वीपायन द्वारा द्वारिका विनाश प्रसग ज्ञात
कर धर्म करने की घोषणा से बहत्तर करोड सडसठ लाख छ हजार
यादव मुक्त हुए। उससे २७ गुणी यादविर्याँ सिद्ध हुईं। यादव लोग
प्रतिदिन अरिष्टनेमि प्रभु की पूजा करते थे। साव प्रद्युम्नादि
रैवत गिरिशिखर पर अर्द्धमासोपवास पूर्वक मोक्ष गए। अनिरुद्ध
नवकोटि के साथ सिद्ध हुआ, पाण्डव प्रतिबोध पाए।
हे गौतम ! अठारह अक्षोहिणी और कौरवो के सहार के
पश्चात् हस्तिनापुर मे राज्य करते हुए पाण्डवो ने जब द्वारिका
दाह और जराकुमार के प्रसग से वलभद्र द्वारा कृष्ण को छ मास
वहन करने आदि प्रसंग ज्ञात कर वैराग रग से अभिभूत होकर

तित्थकप्प का सार ३०३
आत्म शुद्धि के लिए नारद मुनि से पृच्छा की और शत्रुंजय तीर्थ
गए। 'सारावली सूत्र' से प्रतिबोध पा, मोक्ष गए। भगवान्
नेमिनाथ आषाढ सुदी ८ पूर्वाह्नि मे उज्ज्वलगिरि शिखर पर निर्वाण
प्राप्त हुए। शाश्वत अशाश्वत चैत्य युक्त गिरनार महातीर्थ हुआ।
यहाँ पंच शक्रस्तवचारस्तुति पूर्वक चैत्यवंदन करने से तीसरे भव
मोक्ष होता है। यह नेमिनाथ का छट्ठा उद्देश हे।
'सारावली गंडिका' की बात सुनकर गौतम स्वामी ने शत्रुंजय
पधार कर मास कल्प किया। रैवत शिखर को वन्दन किया।
द्वारिका के प्रलयकाल व भगवान् के निर्वाण के ३०० वर्ष बाद
काष्ठसदीपनादि मिथ्यादृष्टियों द्वारा उपसर्ग हुआ। कचन गुफा मे
भरत स्थापित ब्रह्मेन्द्र वाली प्रतिमा चार हजार वर्ष पूजी गई।
भगवान् नेमिनाथ के निर्वाण के बाद पाण्डवो ने निर्वाण शिला पर
चैत्य बनवा कर लेप्यमय प्रतिमा स्थापित की।
चार हजार वर्ष बाद गंधार जनपद सरस्वती पत्तन मे मदन
सार्थवाह उज्ज्वल गिरि का माहात्म्य सुन कर यात्रार्थ गया।
मार्ग मे देवी ने रुदन करती हुई स्त्री के रूप मे हुताशन प्रवेश
कराया। अग्नि का जल हो गया। देवी ने स्तुति-महिमा की। आगे
अम्बा के वर से भील को जीत कर मथुरा स्तूप और चम्पा मे
वासुपूज्य स्वामी की वदना पूजा की। सौराष्ट्र के मार्ग मे
मिथ्यादृष्टि देवता ने स्त्री रूप मे मास की याचना की। संघपति
छुरी लेकर स्वमास देने लगा। संघ रक्षक का पुत्र अपना मास देने
को प्रस्तुत हुआ, माता भी देने लगी तो देवी ने संतुष्ट होकर जय-
जयकार पूर्वक निर्विघ्न यात्रा करने को कहा। अठाई करके क्रमशः
रत्नपुर आये। कही फले हुए शालि क्षेत्र, कही अमृतमय नदियाँ
और घडो दूध झरती गायें, सेना योद्धादि देखे। कम्पिलपुर आकर
अट्ठाई की। शक्रादेश से वैश्रमण निर्दिष्ट अम्बिका ने अहोरात्र मे

२०४ विविध तीर्थ-कल्प
८४ योजन दूर सौराष्ट्र देश पहुँचा दिया। पक्षोपवासी मयण ने
गिरिराज पर चढ कर गजेन्द्र कुण्ड मे नहाया और हर्ष पूर्वक
प्रभु का अभिषेक किया। प्रतिमा गलित होने के उपसर्ग से सघ
ने आहार का त्याग किया। अम्बिका ने वैश्रमण के निर्देश से
प्रगट होकर पारणा कराया। हेम गुफा मे कपास वोकर एक प्रहर मे
पुष्पित-फलित किया। कुमारी कन्या से कते हुए सूत की बतलाई
विधि के अनुसार मयण वधुओ के साथ गजेन्द्र कुण्ड मे नहाया और
संकेतानुसार जाते हुए २१ अष्टमंगल मंडप, २१ तोरण युक्त छत्र
शिला के अधोद्वार मे अरिष्टनेमि समवगरणो मे तीन प्रदक्षिणा
पूर्वक कान्ति पूर्ण सुन्दर अरिष्टनेमि प्रतिमात्रय को वदना किया।
भरत की प्रतिमा उदित सूर्य जैसी पुष्पारोहित दिव्य कुण्डलादि
भूषित एव गत्रु की अरिष्टरत्न की सातिशय प्रतिमा के दर्शन से
पाप बंधन दूर हुए। "णमो भगवओ अरिट्ठनेमिस्सण" बोलते
हुए जयजयकार पूर्वक आया, अंगुली से ततु स्पर्शमात्र था। एक ने
छत्र, दूसरे ने चामर और तीसरे ने धूपदान लिया। चैत्यके ऊपर
लाकर दुंदुभि बजाई, स्वर्ण-पुष्पो की वृष्टि की। मणिरत्नमय चैत्य
बनवाया गया चारो प्रकार के देव मनुष्यो से युक्त यह सोरठ देश
का तीर्थ हुआ। क्रमश अश्वसेन क्षत्रिय व नन्दिवर्द्ध^ने ने उद्धार
कराया। अस्सी हजार वर्ष पर्यन्त यह मणि रत्नमय चैत्य रहा,
जिसका उद्धार जितगत्रु (२०००), दमघोष (६०००) नयवाहन
(८०००), पद्म (१२०००), पुण्डरीक (१८०००), विमलवाहन
(२००००) आदि निकट सिद्ध होने वालो ने कराया था।
मेरे निर्वाण के ८४५ वर्ष (वि० ३७५) बाद भुवनपति इन्द्र
उद्धार करा देगा। दुषम काल प्रभाव से अधार्मिक लोगो के
अपवित्र-आशातना से देवताओ का आवागमन कम हो जायगा।
प्रतिष्ठान पति शालिवाहन सं० १३६० (८९०) मे कन्नौजपति आम्
सं० १६५० (११८०) मे गूर्जराधिपति का उद्धार 'सज्जन' करावेगा।

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इक्कीस हजार वर्ष वाद १००० धनुष ऊँचा गिरिराज रहेगा और
अणपत्री-पणपत्री देव चिरकाल पूजा करेंगे। यह पुंडरीक अध्ययन है।
यह विमलगिरि शाश्वत सिद्ध क्षेत्र है। इसका नाम सिद्ध
तीर्थ, भगीरथ, पुंडरीक, शत्रुञ्जयादि अनेक नाम अवसर्पिणी मे
है। यहाँ ५ कोडि से पुंडरीक, दो-दो कोड़ि से नमि विनमि,
८ कोड़ि से द्राविड-वारिखिल्ल, १० कोडी से भरत, सागर प्रमुख,
असख्य कोडा कोडी से, हरिवंग के असख्य कोडा कोडी राम-
सुग्रीव-विभीषणादि २० कोडी, वाली पाँच लाख से, सेलगाचार्य
सिद्ध हुए। साम्व प्रद्युम्नकोडी से, राजमति प्रमुख ९ करोड ७
लाख सात सौं यादव उज्ज्वलगिरि से सिद्ध हुए। इस प्रकार दिव्य

  • प्रभाव वाला पूंडरीक तीर्थ उज्ज्वल शिखर है।
    पुंडरीक अध्ययन का छट्ठा उद्देश पूर्ण हुआ।
    अश्वावबोध भृगुपुर तीर्थ .
    दक्षिण के नर्मदा प्रदेश के श्रीपुर मे पहले अजितनाथ तीर्थंकर
    समौसरे। चातुर्मास करने से तीर्थ हुआ। फिर सरस्वती पीठ मे
    चन्द्रपुर है जहाँ चन्द्रप्रभ तीर्थ हुआ।
    फिर भृगुपुर (भरौंच) के राजा जितशत्रु के अश्वरत्न को
    हनन करने के लिए नर्मदा मे स्नान कराया गया, वह जाति स्मरण
    से आर्त्तध्यान करने लगा। उसकी अनुकंपा वश भगवान् मुनिसुव्रत
    स्वामी प्रतिष्ठानपुर से चलकर माघ सुदी १ को भरौंच के
    कोरिंट वन मे सहकार वृक्ष के नीचे समौसरे। भगवान् ने अश्व
    और जितशत्रु राजा का पूर्वभव तथा अपना सबध वतलाकर
    प्रतिवोध दिया। अश्वरत्न अनशन करके सात अहोरात्र वाद मर
    के महर्द्धिक देव हुआ। उसने प्रत्यक्ष होकर तेरह कोटि उज्ज्वल
    रत्नो की वृष्टि की, सारा नगर प्रतिबोध पाया। स्वर्ण-रत्न मणि
    विभूपित हजार स्तभो वाला मुनिसुव्रत स्वामी का चैत्य निर्माण
    २०

कराया। माघी पूर्णिमा को स्थापना हुई। उस समय तीन करोड़
पाँच लाख मनुष्य प्रतिबोध पाये। जितशत्रु ने माघ सुदी १५ को
अपरान्ह में लेप्यमय प्रतिमा स्थापित की जिसका रक्षक शक्र है।
राजा अनशन पूर्वक नवहल्लपत्तन मे विद्याधर रूप मे उत्पन्न
हुआ। अजित अपराजित सह् रैवतगिरिशिखर पर विम्ब स्थापना
की। केवली होकर सिद्ध हुआ। अन्य भी स्नानादि करते हुए
क्रमशः सिद्ध हुए।
अश्वदेव जो इन्द्र का सामानिक देव हुआ, प्रतिदिन तीर्थ
प्रभावना करने लगा। भृगुपुर महातीर्थ हो गया। स्वामी के
निर्वाण के बारह हजार वर्ष पश्चात् अश्वावबोध तीर्थ का पद्मचक्री
ने, फिर हरिषेण चक्री ने उद्धार किया। कृष्ण-बलदेव नरेन्द्र व
ईश्वर सार्थवाह भी उद्धार कराया। इक्ष्वाकु वंशी दशरथ राम
आदि तथा हरिवंश के दशार यादव प्रतिवर्ष उद्धार करते थे।
बारह हजार के परिवार से सूर राजा तथा तीन लाख से परिवृत
पाडु राजा सिद्ध हुए। भ० अरिष्टनेमि भी यहाँ समवसरे। द्वारिका-
दाह के समय प्रत्यासन्न जलधि मे मूर्च्छागत हरिवंशोद्भव का
उद्धार हुआ।
ग्यारह लाख (छ सौ) चौरासी हजार दो सौ वर्ष बाद अश्वाव-
बोध क्षेत्र मे भाद्रव महीने मे सात अहोरात्रवर्ती वर्षा हुई, जिसमे
रक्षा के लिए उड़ती हुई एक शकुनिका बाण विद्ध होकर गिरी।
श्रमण चारुचन्द्र ने नवकार मंत्र सुनाकर चैत्य के आगे रख दी।
दो प्रहर के पश्चात् वह मर के सिंहलद्वीप के राजा विजयबाहु की
रानी सुमंगला के यहाँ 'सुदर्शना कुमारी' रूप मे जन्मी। यौवन
प्राप्त होने पर स्वयंवर की आयोजना हुई, बहुत से राजा आये।
भृगुपुर के सार्थवाह के "णमो अरिहंताणं" शब्दोच्चारण से राज-
कुमारी मूच्छित होकर जातिस्मरण को प्राप्त हुई। राजकुमारी

तित्थकप्प का सार ३०७
सुदर्शना ने वैराग्य प्राप्त होकर अश्वावबोध तीर्थ मे श्री मुनिसुव्रत
स्वामी को वदनार्थ अभिग्रह किया। विवाह और राज्य से निष्प्रयो-
जन हो दृढप्रतिज्ञ राजकुमारी अपनी सखियो व १६ राजपुत्रो-अग-
रक्षको के साथ १८ जहाजो मे आरूढ़ होकर भृगुपुर की ओर चली।
मार्ग मे शील प्रभाव से दानवराज का हनन किया। नवकार मंत्र
का जप करते भृगुपुर पहुँच कर प्रभु के दर्शन किए। अठाईमहोत्सव-
पूर्वक अश्वदेव का आराधन किया। 'शकुनिका विहार' नामक
नया मंदिर निर्माण कराया, जो १००८ ध्वजाओ से विभूषित था।
सुदर्शना महादेवी ने वारह वर्ष तक तीर्थभक्ति करके अनशनपूर्वक
१६ विद्यादेवियो के पास हजारो देवो और बाण व्यंतरो की
स्वामिनी, जवूद्वीप प्रमाण धवलगृह मे उत्पन्न हुई।
अपना पूर्वभव स्मरण कर स्नानपूर्वक भद्रसाल, नदन वन,
पद्मद्रह से पद्मकमल और गोशीर्ष चन्दनादि ले जाकर अठाई
महोत्सव किया फिर नंदीश्वरादि मे चैत्यवन्दना कर भगवान्
महावीर को वंदन किया, नाटक किया। शक्रेन्द्र के प्रश्न पर प्रभु
ने कहा—यह शकुनिका है, तीसरे भव मे सिद्ध होगी।
आर्य सुहस्तिसूरि के शिष्य संप्रति राजा ने इसका उद्धार
कराया। कालिकाचार्य ने चातुर्मास कर उपसर्ग को दूर किया।
सिद्धसेन सूरि प्रतिबोधित विक्रम राजा ने जीर्णोद्धार कराया।
कालिकाचार्य के समय बनवायो हुई गोशीर्ष चन्दनमय सुदर्शना-
प्रतिमा को सिद्धसेन ने प्रतिष्ठापित की। यहाँ भद्रगुप्ताचार्य के
पास वज्रस्वामी ने दशपूर्व पूर्ण किये। आकाशगामिनी विद्या
(महापरिज्ञा अध्ययन से) उद्धृत की। जृंभक देवो ने महिमा की।
भगवान् ने गौतम स्वामी के पूछने पर कहा कि मेरे निर्वाण से
४८४ (वि० स० १४) मे आर्य खपुटाचार्य मिथ्यादृष्टि देवों द्वारा की
हुई रजवृष्टि बंद करेगे।

३०८ विविध तीर्थ-कल्प
सं० ८४५ मे वल्लभी भंग कर आते हुए अनार्यों को सुदर्शना
निवारण करेगी ।
सं० ८४० मे मल्लवादी आचार्य मिथ्यात्वी देवो का उपद्रव दूर
कर एक हजार आचार्यों सहित प्रभावना करेंगे । प्रतिष्ठानपुर का
राजा गालिवाहन उद्धार करावेगा । एवं कृष्ण, नरवाहन, शिला-
दित्य चारो राजा महोत्सव करेगे । कालकाचार्य और पादलिप्ता-
चार्य के समय सुदर्शना प्रत्यक्ष होकर नृत्यादि करेगी । इस प्रकार
११ लाख ८५ हजार ९८० वर्ष अनेक राजा सार्थवाहादि से पूजित
व्यतीत होगे ।
अंवड़, पाटलिपुत्र के दत्त कनक रत्न विभूषित करेंगे । दमघोष
जितशत्रु, सुदर्शनादि से उद्धार होगा । बारह लाख पाँच हजार से
अधिक वर्ष पूजित रहने वाले इस तीर्थ की दो हजार वर्ष बाद
नर्मदा जल कल्लोल और घोरांधकार का मिथ्यादृष्टि देवियो का
उपद्रव अश्वदेव दूर करेगा । भगवान् के अठारह हजार वर्ष बाद
मुनिसुव्रत प्रतिमा को सुदर्शना स्वस्थान ले जाकर पूजेगी । वह
आयु पूर्ण कर घातकी खंड की विजयकेतु राजा होगी फिर सर्वार्थ-
सिद्धि जाकर सर्वानुभूति तीर्थंकर (के समय मुक्त) होगी !
इस तीर्थ की बड़ी महिमा है । कल्याणक पर्वादि मे पूजा का
असंख्यगुण फल है । इस प्रकार अश्वावबोध तीर्थ के १३२ उद्धार
वज्रस्वामी ने बतलाया । पाँच हजार के परिवार से पांडुराजा
और हरिवंश के कोटि-सहस्र सिद्ध हुए ।
चंदेरी-चन्द्रप्रभास
उस काल में चन्द्रप्रभ स्वामी अनेकश चन्देरी नगरी मे समो-
सरे । ज्वालामालिनी देवी ने वहाँ सिंहकीर्ति राजा को अपने चैत्य
की प्रतिमा दी, जिसे वहाँ स्थापित की । वह चन्द्रकान्त मणि की
मणिभूषण नामक निरालंब प्रतिमा है । प्रभास यक्ष नित्य नाटक