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विविध तीर्थ कल्प (आचार्य जिनप्रभ सूरि - प्राचीन भारतीय तीर्थ, ऐतिहासिक भूगोल व पुराविहार)

विविध तीर्थ कल्प (आचार्य जिनप्रभ सूरि - प्राचीन भारतीय तीर्थ, ऐतिहासिक भूगोल व पुराविहार)

Vividha Tirtha Kalpa of Jinaprabha Suri

आचार्य जिनप्रभ सूरि (सम्पादक: मुनि जिनविजय) द्वारा

DevanagariSanskritpublished442 पृष्ठ

पृष्ठ 385, कुल 442 में से

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पृष्ठ 385

३०२ विविध तीर्थ-कल्प
भगवान् को दीक्षा के ५४ दिन वाद आश्विन अमावस्या को
केवलज्ञान हुआ। प्रभु ने रैवत गिरि के सहस्राम्रवन मे बहुतो को
प्रतिवोध दिया। प्रभु के वरदत्तादि ११ गणधर, अठारह हजार
साधु, राजिमती आदि ४४००० साध्विया हुईं। बहुत से जीव
प्रतिवोध पाए।
ढढणकुमार ने दोक्षा ली, अतराय के उदय से उन्हे आठ मास
तक द्वारिका मे भ्रमण करते आहार नही मिला। किसी सेठ के
यहाँ प्रगसा से मोदक मिले, जिनकी आलोचना करते भगवान् के
द्वारा कृष्ण की लब्धि बताने पर मोदक चूरते केवलज्ञान पाया।
उस दिन रैवत शिखर पर लाखो प्रतिबोध पाये। भगवान् जब
उज्ज्वल गिरि पर समवसरे दसो दसार युक्त सभी यादव दिव्य
वाहनो मे भक्त्यर्थ आए। कनकवती आदि आठ हजार केवल पाई,
तीन लाख यादवियाँ दीक्षित हुईं। राजीमती लाखो के साथ
निर्वाण प्राप्त हुई। गजसुकुमाल दोक्षित होकर सोमिल के द्वारा
मस्तक पर पाल वाँधकर अगारे डालने से अन्त कृत केवली हो
मोक्ष गए। नौ दसाहं प्रतिवोध पाए।
मद्यपान से क्रुद्ध द्वीपायन द्वारा द्वारिका विनाश प्रसग ज्ञात
कर धर्म करने की घोषणा से बहत्तर करोड सडसठ लाख छ हजार
यादव मुक्त हुए। उससे २७ गुणी यादविर्याँ सिद्ध हुईं। यादव लोग
प्रतिदिन अरिष्टनेमि प्रभु की पूजा करते थे। साव प्रद्युम्नादि
रैवत गिरिशिखर पर अर्द्धमासोपवास पूर्वक मोक्ष गए। अनिरुद्ध
नवकोटि के साथ सिद्ध हुआ, पाण्डव प्रतिबोध पाए।
हे गौतम ! अठारह अक्षोहिणी और कौरवो के सहार के
पश्चात् हस्तिनापुर मे राज्य करते हुए पाण्डवो ने जब द्वारिका
दाह और जराकुमार के प्रसग से वलभद्र द्वारा कृष्ण को छ मास
वहन करने आदि प्रसंग ज्ञात कर वैराग रग से अभिभूत होकर