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विविध तीर्थ कल्प (आचार्य जिनप्रभ सूरि - प्राचीन भारतीय तीर्थ, ऐतिहासिक भूगोल व पुराविहार)

विविध तीर्थ कल्प (आचार्य जिनप्रभ सूरि - प्राचीन भारतीय तीर्थ, ऐतिहासिक भूगोल व पुराविहार)

Vividha Tirtha Kalpa of Jinaprabha Suri

आचार्य जिनप्रभ सूरि (सम्पादक: मुनि जिनविजय) द्वारा

DevanagariSanskritpublished442 पृष्ठ

पृष्ठ 387, कुल 442 में से

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पृष्ठ 387

२०४ विविध तीर्थ-कल्प
८४ योजन दूर सौराष्ट्र देश पहुँचा दिया। पक्षोपवासी मयण ने
गिरिराज पर चढ कर गजेन्द्र कुण्ड मे नहाया और हर्ष पूर्वक
प्रभु का अभिषेक किया। प्रतिमा गलित होने के उपसर्ग से सघ
ने आहार का त्याग किया। अम्बिका ने वैश्रमण के निर्देश से
प्रगट होकर पारणा कराया। हेम गुफा मे कपास वोकर एक प्रहर मे
पुष्पित-फलित किया। कुमारी कन्या से कते हुए सूत की बतलाई
विधि के अनुसार मयण वधुओ के साथ गजेन्द्र कुण्ड मे नहाया और
संकेतानुसार जाते हुए २१ अष्टमंगल मंडप, २१ तोरण युक्त छत्र
शिला के अधोद्वार मे अरिष्टनेमि समवगरणो मे तीन प्रदक्षिणा
पूर्वक कान्ति पूर्ण सुन्दर अरिष्टनेमि प्रतिमात्रय को वदना किया।
भरत की प्रतिमा उदित सूर्य जैसी पुष्पारोहित दिव्य कुण्डलादि
भूषित एव गत्रु की अरिष्टरत्न की सातिशय प्रतिमा के दर्शन से
पाप बंधन दूर हुए। "णमो भगवओ अरिट्ठनेमिस्सण" बोलते
हुए जयजयकार पूर्वक आया, अंगुली से ततु स्पर्शमात्र था। एक ने
छत्र, दूसरे ने चामर और तीसरे ने धूपदान लिया। चैत्यके ऊपर
लाकर दुंदुभि बजाई, स्वर्ण-पुष्पो की वृष्टि की। मणिरत्नमय चैत्य
बनवाया गया चारो प्रकार के देव मनुष्यो से युक्त यह सोरठ देश
का तीर्थ हुआ। क्रमश अश्वसेन क्षत्रिय व नन्दिवर्द्ध^ने ने उद्धार
कराया। अस्सी हजार वर्ष पर्यन्त यह मणि रत्नमय चैत्य रहा,
जिसका उद्धार जितगत्रु (२०००), दमघोष (६०००) नयवाहन
(८०००), पद्म (१२०००), पुण्डरीक (१८०००), विमलवाहन
(२००००) आदि निकट सिद्ध होने वालो ने कराया था।
मेरे निर्वाण के ८४५ वर्ष (वि० ३७५) बाद भुवनपति इन्द्र
उद्धार करा देगा। दुषम काल प्रभाव से अधार्मिक लोगो के
अपवित्र-आशातना से देवताओ का आवागमन कम हो जायगा।
प्रतिष्ठान पति शालिवाहन सं० १३६० (८९०) मे कन्नौजपति आम्
सं० १६५० (११८०) मे गूर्जराधिपति का उद्धार 'सज्जन' करावेगा।