विविध तीर्थ कल्प (आचार्य जिनप्रभ सूरि - प्राचीन भारतीय तीर्थ, ऐतिहासिक भूगोल व पुराविहार)
Vividha Tirtha Kalpa of Jinaprabha Suri
आचार्य जिनप्रभ सूरि (सम्पादक: मुनि जिनविजय) द्वारा
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दर्शन से अष्टम करने पर वैश्रमण के आदेश से अम्बिकादेवी
प्रत्यक्ष होगी। आदेश यह है—
दो मास भक्तोपवास से सहस्राम्र वन मे जीवितस्वामी-इच्छा से
ऋषभ प्रतिमा ग्रहण करेगा। विमलपुर के गाथापति की पुत्री ऋषभ-
देव की अम्बधातृ विमलमती जो ऋषभतीर्थ मे मरुदेवी के निर्वाण-
समय चक्रेश्वरी हुई थी, तुम्हे प्रतिमा देगी, उसे इस शिखर पर
स्थापित करो। यह सुन कर वह प्रतिमा प्राप्त करने गया। चक्रे-
श्वरी ने उसे वज्रस्वामो के कायोत्सर्ग पूर्वक ऋषभ-प्रतिमा अर्पित
की। दो हजार यान के साथ चतुर्विध सघ सह उत्सव पूर्वक सर्व
चैत्यो की पूजा करते हुए पैठानपुर से भरोच आवेगा, ताम्रलिप्ति
मे भी अठाइ (महोत्सव) करेगा। विधि पूर्वक उत्सवादि के साथ
सघ निकालेगा और मेरे निर्वाण से ५७८ वर्ष बाद श्री वज्रस्वामी
प्रतिष्ठा करेगे। चैंत वदी ८ को विमलगिरि पर प्रतिष्ठा होगी।
मेरे निर्वाण से ५८४ वर्ष (वि० सं० ११४) पश्चात् चैंत्र वदी
८ को आर्यरक्षित आकर ध्वजारोहण करेंगे। प्रभास क्षेत्र के मिथ्या
दृष्टि यक्ष द्वारा जावड सेठ को उसकी पत्नी सीता सहित क्षीर-
समुद्र के गगाह्नद मे फेंकने पर वह काल करके महाविदेह के पुष्क-
लावती विजय मे विमल नरेन्द्र के पुत्र जिनपालित रूप मे उत्पन्न
हो तेरहवें वर्ष मे सीमंधर स्वामी के पास दीक्षित हो क्रमश केवल-
ज्ञान पाकर विचरेगा। सीता भी धातकीखण्ड के अचलपुर मे
दमघोष पुत्र कनककेतु ८३ लाख पूर्व तक चक्रवर्ती तुल्य राज्य
करके निर्वाण प्राप्त करेगी।
इस प्रकार उद्धारो के प्रवर्त्तमान होने मे १६९० मे (वि० स०
१२२२) वाहड का उद्धार होगा (प्रथम अध्ययन) तीर्थपति प्रतिमा
अवसर्पिणी काल के छठे आरे और उत्सर्पिणी के पहले आरे के
४२००० वर्ष-दमघोष विमल के यहाँ ४००० वर्ष, २००० वर्ष भानु,