विविध तीर्थ कल्प (आचार्य जिनप्रभ सूरि - प्राचीन भारतीय तीर्थ, ऐतिहासिक भूगोल व पुराविहार)
Vividha Tirtha Kalpa of Jinaprabha Suri
आचार्य जिनप्रभ सूरि (सम्पादक: मुनि जिनविजय) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंतित्थकप्प का सार २९९
मुक्ताफल समुद्रविजय की रानी शिवादेवी के पुत्र रूप मे भगवान्
अरिष्टनेमि अपराजित विमान से कातीक वदी १२ को चतुर्दश स्वप्न
सूचित सर्वारिष्ट नाशक अवतरित हुए। श्रावण सुदि ५ को चित्रा
नक्षत्र मे भगवान् का जन्म हुआ। छप्पन दिगि कुमारियो ने
आकर सूतिकर्म किया। चौसठ इन्द्रोने मेरुशिखर ले जाकर अभि-
षेक किया। दिव्य वदन, वस्त्र, पुष्प, धूप, वलि, अष्टमंगल आरती-
दीपक-मंगल गीत नाटक युक्त उत्सव कर माता जी के गोद मे
छोडा। उज्ज्वल गिरि पर भी नेमिनाथ प्रतिमा को वन्दन अट्ठाई
महोत्सव किया और नन्दीश्वर द्वीप गए। सौरीपुर मे राजा के
घर उत्सव हुए। दसवे दिन अरिष्टनेमि नामकरण हुआ।
अन्यदा कृष्ण वलभद्र ने नंद गोकुल से मथुरा आकर मल्लादि
को मार कर कस का विध्वस कर डाला और उग्रसेन को राज्या-
भिषिक्त किया। जरासध के भय से १८ कुल कोटि यादव सौराष्ट्र
आ गए। अष्टम तप पूर्वक लवण समुद्र के ७ योजन भूमि प्राप्त
की। रैवत वन मे एक भील त्रिकाल रैवत शिखर को वदन करता
था वह मर के वैश्रमण हुआ, जो त्रिकाल पूजा करता है और भग-
वान् अरिष्टनेमि के दर्शन कर हर्षित होता है। जहाँ समवसरण
स्थान–पर्वत है और यादव-यादविया क्रीडा करते, वहां सत्यभामा
के पुत्र युगल उत्पन्न हुआ। शक्रादेश से वैश्रमण ने स्वर्णमय १२ ×
९ योजन विस्तार वाली १८ धनुष ऊँचे प्राकार की द्वारिका बसाई,
जिसमे अठारह और बत्तीस भूमि वाले विमान जैसे प्रासाद, नदन-
वन, वापी युक्त नगर मे यादव लोग रहने लगे। पूर्व मे अरिष्ट
रत्नमय नेमिनाथ प्रतिमा युक्त रैवत शिखर, उत्तर मे वेणुवंत,
पश्चिम मे गधमादन और दक्षिण मे तुग शिखरी था इस प्रकार की
द्वारिका मे जरासध का वध करके वासुदेव बलदेव आनद पूर्वक
रहने लगे। वसुदेव के ७२ हजार रानिया थी। दस दशार्हो का