विविध तीर्थ कल्प (आचार्य जिनप्रभ सूरि - प्राचीन भारतीय तीर्थ, ऐतिहासिक भूगोल व पुराविहार)
Vividha Tirtha Kalpa of Jinaprabha Suri
आचार्य जिनप्रभ सूरि (सम्पादक: मुनि जिनविजय) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंतित्थकप्प का सार ३०३
आत्म शुद्धि के लिए नारद मुनि से पृच्छा की और शत्रुंजय तीर्थ
गए। 'सारावली सूत्र' से प्रतिबोध पा, मोक्ष गए। भगवान्
नेमिनाथ आषाढ सुदी ८ पूर्वाह्नि मे उज्ज्वलगिरि शिखर पर निर्वाण
प्राप्त हुए। शाश्वत अशाश्वत चैत्य युक्त गिरनार महातीर्थ हुआ।
यहाँ पंच शक्रस्तवचारस्तुति पूर्वक चैत्यवंदन करने से तीसरे भव
मोक्ष होता है। यह नेमिनाथ का छट्ठा उद्देश हे।
'सारावली गंडिका' की बात सुनकर गौतम स्वामी ने शत्रुंजय
पधार कर मास कल्प किया। रैवत शिखर को वन्दन किया।
द्वारिका के प्रलयकाल व भगवान् के निर्वाण के ३०० वर्ष बाद
काष्ठसदीपनादि मिथ्यादृष्टियों द्वारा उपसर्ग हुआ। कचन गुफा मे
भरत स्थापित ब्रह्मेन्द्र वाली प्रतिमा चार हजार वर्ष पूजी गई।
भगवान् नेमिनाथ के निर्वाण के बाद पाण्डवो ने निर्वाण शिला पर
चैत्य बनवा कर लेप्यमय प्रतिमा स्थापित की।
चार हजार वर्ष बाद गंधार जनपद सरस्वती पत्तन मे मदन
सार्थवाह उज्ज्वल गिरि का माहात्म्य सुन कर यात्रार्थ गया।
मार्ग मे देवी ने रुदन करती हुई स्त्री के रूप मे हुताशन प्रवेश
कराया। अग्नि का जल हो गया। देवी ने स्तुति-महिमा की। आगे
अम्बा के वर से भील को जीत कर मथुरा स्तूप और चम्पा मे
वासुपूज्य स्वामी की वदना पूजा की। सौराष्ट्र के मार्ग मे
मिथ्यादृष्टि देवता ने स्त्री रूप मे मास की याचना की। संघपति
छुरी लेकर स्वमास देने लगा। संघ रक्षक का पुत्र अपना मास देने
को प्रस्तुत हुआ, माता भी देने लगी तो देवी ने संतुष्ट होकर जय-
जयकार पूर्वक निर्विघ्न यात्रा करने को कहा। अठाई करके क्रमशः
रत्नपुर आये। कही फले हुए शालि क्षेत्र, कही अमृतमय नदियाँ
और घडो दूध झरती गायें, सेना योद्धादि देखे। कम्पिलपुर आकर
अट्ठाई की। शक्रादेश से वैश्रमण निर्दिष्ट अम्बिका ने अहोरात्र मे