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विविध तीर्थ कल्प (आचार्य जिनप्रभ सूरि - प्राचीन भारतीय तीर्थ, ऐतिहासिक भूगोल व पुराविहार)

विविध तीर्थ कल्प (आचार्य जिनप्रभ सूरि - प्राचीन भारतीय तीर्थ, ऐतिहासिक भूगोल व पुराविहार)

Vividha Tirtha Kalpa of Jinaprabha Suri

आचार्य जिनप्रभ सूरि (सम्पादक: मुनि जिनविजय) द्वारा

DevanagariSanskritpublished442 पृष्ठ

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पृष्ठ 374

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परिशिष्ट २९१

उपासरे तपंगच्छ के विंव धातु का ३ चोवीसी १ उपसारु
खरतरगच्छ रंगविजै बिंब ३ पाषाण धातु का ५ ।
देवरा १ केसरो बजार मे पाषाण को विंव १ धात की
प्रतिमा १३ ।
सेरपटणा मध्ये सेठ सुदरसण, थूलभद्र जी, दादा जी, देवरो
१, शांतिनाथ जी को पारसनाथ जी को पाषाण का बिंब ११ धातु
का २७, बिंव ३२, देवरो दिगम्बरी १, को ।
ब्यार व्हार गरीफ मे देव ३, कुन्थुनाथ जो को बिंव ७, चंद्र-
प्रभ जी ने विंव २१ धात का अजितनाथ जी विंब, पाषाण का
३, चरण ३ ।
पावापुर मे देवराजल मे चरण महावीर स्वामी का ।
नवरतन १, कलन ३, कुण्डी तलाव २, गाम बगीचो १,
कुण्ड १ ।
जूनो समसरण जी, नवा सेमासरण जी, मुखर-उपर हेदेहरो
महावीर जी को, गाम मे है । उस देहरो मे चरण महावोर का
है । प्रतिमा तीन गौड़ी पार्श्वनाथ जी की है ।
खत्रीकुंड का पगल्य, दादा जी का चरण हो उर चरण तेरे
भमती का है ।
उर गाम राजगृही मे मदर तीन १, पार्श्वनाथ जी को विंव
पाषाण का ५, धात की चौवीसी १, देवरो १, शांतिनाथ जो को
पाषाण विव ७, सिद्धचक्र जी १, दिगंबरी देहरो ५, धर्मशाला दो,
संघ उतरणे कुन्ड बगीची १; कुओ १, पर्वत नीचे महावीर स्वामी
का भंडार पर्वत के ऊपर बना सालभद्र का छत्री है खाटकखेली
ममोशरण चरणमुनीसर का छत्री १ । वीर का चरण देहरो १ महा-
वीर स्वामी को वन १, पाषाण को चरण च्यार मेदर १, पार्श्वनाथ
जी व्रतमा ३, चरण ४, रतनगिर टूक दोसरी सेहमफणा पार्श्वनाथ