विविध तीर्थ कल्प (आचार्य जिनप्रभ सूरि - प्राचीन भारतीय तीर्थ, ऐतिहासिक भूगोल व पुराविहार)
Vividha Tirtha Kalpa of Jinaprabha Suri
आचार्य जिनप्रभ सूरि (सम्पादक: मुनि जिनविजय) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंवमन ग्रहण करने का आदेश देकर प्रतिबोध दिया, उसने भी भग-
वान् के साथ दीक्षा ली। यह पाचवाँ उद्देग हुआ।
भगवान् को केवलज्ञान होनेपर इन्द्र ने उज्ज्वलगिरि शिखर
को वज्र से सस्कारित किया। दश धनुष परिमाण की अरिष्ट
रत्नमय नेमि प्रतिमा बना कर स्थापित की। आसन्न मण्डप में
रत्नाभरण विभूषित हजारो देविया नृत्य करती है। नीचे गजेन्द्र
कुण्ड बनाया जिसका जल बडा प्रभावशाली है। वहा पर्वतिथि
आदि मे नहाकर देव देविया नृत्य गीत पूर्वक आराधना करती है।
इन्द्र (निर्मापित) प्रतिमा शक्रादेश से दुप्पसह पर्यन्त वैश्रमण
पूजेगा।
गजेन्द्र कुण्ड के स्पर्श से भूत प्रेत वैताल आदि दुष्ट व्यतर
बाधाए नही होती। बहुत सी सिद्ध प्रतिमाएं स्थापित की गईं।
सिद्ध यक्ष और कुबेरादेश से देवाचन मे कुसुम-कमलारोहण
होता है। 'उज्जित' आदि गाथा त्रय गौतम ऋषि निर्मित है।
यह कचनवालानक उद्देश हुआ।
जिस समय अर्हन्त अरिष्टनेमि के उज्जयत पर केवलज्ञान
हुआ, कोडी नगर मे सिसिरभट्ट की पुत्री सोमभट्ट की भार्या अवा
कोहिडी ने अष्टम का पारणा कराया था। अन्यदा वरदिन्न के
पारणे से प्रताडित वह अपने पुत्रो के साथ अरिष्टनेमि के ध्यान
मे जहाँ १६ विद्यादेविया हैं, भुवनपति मे जम्बूद्वीप प्रमाण भुवन मे
देवी हुई। अवधि ज्ञान से रैवतशिखर पर प्रभु को ज्ञात कर वदन
किया। कृष्ण ने उसकी रौप्य हेममय प्रतिमा बनवाई, जिसे वर-
दिन्न स्वामी ने प्रतिष्ठा की। अम्बिका शासनदेवी हुई। ब्रह्मेन्द्र
ने रत्नमय प्रभु प्रतिमा कराई। चैत्यवदनावसर मे चार (४) थुई
प्रवृत्त हुई। महा प्रभावी अम्बिका तीसरे भव मोक्षगामिनी है,
बीस हजार लक्ष वर्षायु है।