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विविध तीर्थ कल्प (आचार्य जिनप्रभ सूरि - प्राचीन भारतीय तीर्थ, ऐतिहासिक भूगोल व पुराविहार)

विविध तीर्थ कल्प (आचार्य जिनप्रभ सूरि - प्राचीन भारतीय तीर्थ, ऐतिहासिक भूगोल व पुराविहार)

Vividha Tirtha Kalpa of Jinaprabha Suri

आचार्य जिनप्रभ सूरि (सम्पादक: मुनि जिनविजय) द्वारा

DevanagariSanskritpublished442 पृष्ठ

पृष्ठ 380, कुल 442 में से

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पृष्ठ 380

तित्थकप्प का सार २९७
१६००० विष्णु और २०००० वर्ष इन्द्रपूजित रहेगी। फिर यह
पुण्डरीक तीर्थ उत्सर्पिणी मे क्षीरधारा, अमृतधारा, पुष्प फलोत्पत्ति,
मेघ वृष्टि आदि से विकसित होकर पद्मोत्तर पुत्र पद्मनाभ तीर्थङ्कर
के समय अनेक वनस्पति शोभित विमलगिरि तीर्थ होगा। रायण
वन मे केवलज्ञानोत्पन्न आदिनाथ व २२ तीर्थङ्करो की यहाँ
प्रतिमा स्थापित होगी।
यह पुण्डरीक अध्ययन का दूसरा उद्देश हुआ।
हे गौतम ! तीर्थरक्षको के प्रमाद दोष से जावड को घोर उपसर्ग
हुआ, पर विमलगिरि के जीर्णोद्धार से तीर्थङ्करत्व प्राप्त करता है या
तृतीय भव मे मोक्षगामी होता है। यह सुनकर गौतम स्वामी ने
चार-चार स्तुति—"युगादि पुरुषेन्द्राय" श्लोको से वन्दन किया,
सौधर्माधिपति ने भी तीर्थ वन्दन और अनुमोदन किया।
फिर पूछने पर प्रभु ने कहा—जावड के उद्धार के पश्चात्
इस तीर्थ के दाहिनी ओर केदार गाँव का कवट्टि गाथापति जो
मद्यपानरत रहता था, अपना आसन्न मरण ज्ञात कर नवकार
पूर्वक गठसी-मुट्ठिसी पच्चक्खाण कर तीर्थाभिमुख हुआ और मरके
कुबेर यक्ष के सामाजिक 'कवड यक्ष' हुआ, उसकी भार्या भी मरके
उसका वाहन हुई, इनकी पल्योपम की आयु है। इसके प्रभाव से
सौराष्ट्र मे धर्म का उदय होगा। यह पुण्डरीक अध्ययन का तीसरा
उद्देश हुआ।
हे देवानुप्रिय ! इस विमलगिरि का उज्ज्वल शिखर भी अति
पवित्र है। अनन्त काल की अपेक्षा से यह अनन्त तीर्थंकरो का
दीक्षा, ज्ञान व निर्वाण स्थल है। अन्य स्थलो की अपेक्षा यहाँ की
तपश्चर्यादि का परिणाम विशेष से अनन्तफल है। नमीश्वर, अनिल,
यशोधर, कृतार्थ, शुद्धमति, जिनेश्वर, शिवकर और सुदर्शन--इन
आठो के कल्याण सम्पन्न होने पर इस अवसर्पिणी मे जिस समय