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सर्वकोश
विविध तीर्थ कल्प (आचार्य जिनप्रभ सूरि - प्राचीन भारतीय तीर्थ, ऐतिहासिक भूगोल व पुराविहार)

विविध तीर्थ कल्प (आचार्य जिनप्रभ सूरि - प्राचीन भारतीय तीर्थ, ऐतिहासिक भूगोल व पुराविहार)

Vividha Tirtha Kalpa of Jinaprabha Suri

आचार्य जिनप्रभ सूरि (सम्पादक: मुनि जिनविजय) द्वारा

DevanagariSanskritpublished442 पृष्ठ

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पृष्ठ 381

२९८ विविध तीर्थ-कल्प
केवलज्ञानी तीर्थंकर के पास ब्रह्मेन्द्र ने पूछा- मेरा निर्वाण कब
होगा ? उन्होने कहा भावी अरिष्टनेमि तीर्थ कर के समय वरदत्त
गणधर होकर मोक्ष जाओगे। यह सुनकर उसने अरिष्ट रत्नमयी प्रभु-
प्रतिमा बना कर ब्रह्मदेवलोक मे १०. कोडा-कोड़ी सागर पूजी और
फिर भरतेश्वर को समर्पित की। उसने उज्ज्वलगिरि शिखर पर
स्वर्ण-रौप्य मय अनेक चैत्यो के उद्धार कराये। २५-२०-१६-१०-२
योजन धनुष प्रमाणे अवसर्पिणी मे नेमिनाथ प्रभु की अरिष्टरत्न-
मय प्रतिमा असख्य उद्धारो मे विराजमान हुई ।
इस महातीर्थ के स्मरण मात्र से भव दुख से छुटकारा होता
है। तीर्थवन्दन-स्तुति का महाफल है। देवता लोग भी पूजते हैं।
'गठसहिय' आदि साधारण तप का भी महान् तप अठाई-पक्षक्षमण
मासक्षमण यावत् ८ मासक्षमण तक का फल पाता है। यहाँ काल
करने वाला आराधक व निकटमेक होता है।
प्रतिष्ठानपुर से बलमित्र-भानुमित्र भिन्न-भिन्न उद्देश्य से
निकले मार्ग मे पुलिंद द्वारा लूटे जाकर भी तीर्थ भक्ति के प्रभाव से
सर्वार्थसिद्धि विमान एकावतारित्व-सीमंधर-युगमंधरत्व प्राप्त किया।
जो पुण्डरीक (गिरि) को वन्दन करता है, आराधना करता है,
वैमानिक होता है और चतुर्विध संघ सहित वन्दना करने वाला
इन्द्र-चक्रवर्ती व तीसरे भव मोक्ष जाता है। इस पुण्डरीक अध्ययन
मे रेंवतगिरि का जो ऊपर २५-२०-१६-१०-२ योजन-धनुष प्रमाण
कहा है, वहाँ अनन्त तीर्थंकर सेवित-स्पर्शित उज्ज्वलगिरि का
चतुर्थ उद्देश मे भगवान् अरिष्टनेमि के चरित्र सम्बन्धी बाते
गौतम स्वामी के पूछने पर भगवान् ने इस प्रकार बतलाई ।
अरिष्टनेमिमोक्ष—रेवतगिरि
धन धनवती के भव से लेकर नौ भवो तक सबध कहते हुए,
तीर्थंकर नेमिनाथ राजिमती दशवें भव मे हुए। सौरीपुर में हरिवंश