विविध तीर्थ कल्प (आचार्य जिनप्रभ सूरि - प्राचीन भारतीय तीर्थ, ऐतिहासिक भूगोल व पुराविहार)
Vividha Tirtha Kalpa of Jinaprabha Suri
आचार्य जिनप्रभ सूरि (सम्पादक: मुनि जिनविजय) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३०० विविध तीर्थ-कल्प
विपुल परिवार युक्त छप्पन कुल कोटि यादव पुत्र पौत्रो के साथ
क्रीडा करते थे । भगवान् अरिष्टनेमि विषय विरक्त थे, एक वार
उन्होने शख बजा दिया तो लवणसमुद्र पर्यन्त तरगित हो गया,
प्रति शब्द से द्वारिका भयभीत हो गई, त्रिभुवन विस्मित हो
गया । कृष्णादि सोचने लगे क्या नया वासुदेव होगा ? जब अरिष्ट-
नेमि आये तो वल परीक्षा के हेतु पसारी हुई वाँह को उन्होने मोड
दिया । जब भगवान् ने वाह पसारी तो कृष्ण उस पर लटक गए
पर मोड़ न सके । भगवन को वसतक्राडा में ले जाकर सत्यभामा,
रुक्मिणी आदि ने विवाह प्रश्नादि से निरुत्तर—मौन स्वीकृति मान
कर द्वारिका के उग्रसेन की पुत्री राजिमती की माग की ।
विवाहोत्सव प्रारभ हुआ। भगवान् को वस्त्रालकार से सुसज्जित
किया गया । श्रावणसुदि ६ के दिन इन्द्र प्रेषित मातली सारथी
युक्त रथपर विराजमान कोरटक छत्र चामर धारण किए वडे
समारोह से वरातसह उग्रसेन-धारिणी के यहां तोरण पर पहुचे ।
राजिमती विवाह की प्रतीक्षा मे खडी थी । भगवान् ने जब पशु-
वाटक के दीन शब्द सुने और सारथी से बारात के भोजनार्थ होने
वाले विनाश की वार्ता ज्ञात कर वैराग्य रस रजित प्रभु ने रथ को
लौटा लिया और सभी पशुपक्षियो को मुक्त करा के सवत्सरी दान
पूर्वक यादवो को सबोधित किया । शुभमुहूर्त्त मे अभिषेक पूर्वक
देवासुर मानव वाहक शिविका मे विराजमान होकर हजार
राजाओ के साथ द्वारिका से रैवत गिरि की छत्र शिला पर आकर
दीक्षित हुए । छठ्ठ का पारणा द्वारिका मे राजा वरदत्त के घर
हुआ । उसने जातिस्मरण से अपना पूर्वभव जाना कि मैंने अरिष्ट-
नेमि प्रतिमा का पूजन किया था । सभी यादव प्रतिमा की पूजा
करने लगे, कृष्ण ने चैत्योद्धार किया। बीस कोडा कोडी वर्ष प्रतिमा
को हो गए । राजिमती के इच्छुक रथनेमि को उसने क्षीर पान कर