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विविध तीर्थ कल्प (आचार्य जिनप्रभ सूरि - प्राचीन भारतीय तीर्थ, ऐतिहासिक भूगोल व पुराविहार)

विविध तीर्थ कल्प (आचार्य जिनप्रभ सूरि - प्राचीन भारतीय तीर्थ, ऐतिहासिक भूगोल व पुराविहार)

Vividha Tirtha Kalpa of Jinaprabha Suri

आचार्य जिनप्रभ सूरि (सम्पादक: मुनि जिनविजय) द्वारा

DevanagariSanskritpublished442 पृष्ठ

पृष्ठ 378, कुल 442 में से

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पृष्ठ 378

परिशिष्ट ३
तित्थकप्प का सार
भगवान् महावीर एक वार सोरठ देश पधार कर विमलगिरि
पर समोसरे । उन्होने पुंडरीक गिरि की महिमा बतलाते हुए कहा
कि यहाँ अनन्त सिद्ध हुए हैं। भगवान् ऋषभदेव से अजितनाथ तीर्थङ्कर
के पिता जितशत्रु तक असख्य सिद्ध हुए और असख्य उद्धार हुए ।
इक्ष्वाकु वंश के कोटा-कोटि नरेश्वर सिद्ध हुए और 'सगर चक्र-
वर्त्ती' का उद्धार संपन्न हुआ । अर्हन्त सुविधिनाथ के अन्तरकाल मे
तीर्थोच्छेद हुआ । चक्रवर्ती तीर्थंकर शान्तिनाथ ने स्वय उद्धार
करा के ऋषभादि तीर्थङ्कर व पुण्डरीक प्रतिमा प्रतिष्ठापित कराने
के साथ चैत्यगृह, जोवित स्वामी प्रतिमा व अमृत कुण्ड कराया ।
अरिष्टनेमि तीर्थंकर के निर्वाणकाल मे बीस कोटि मुनियो के साथ
पाँच पाण्डव एव नौ लाख श्रमणियो सहित कुन्तीदेवी सिद्ध हुई ।
यहाँ शक्रादेश से वैशाखी पूर्णिमा के दिन पाण्डुपुत्र-गधार ने
काष्ठमय जिनालय व लेप्यमय विम्व स्थापन किए थे ।
काल क्रम से पाँच सौ (५००) वर्ष वाद मुरुण्ड देश निवासी के
अभिषेक समय प्रतिमा गलित हो जाने से सघ के कोई ढंढर नामक
श्रावक ने चारो दिशाओ मे बारह योजन दीखने वाली ऋषभदेव
प्रतिमा, शान्तिनाथ प्रतिमा व चैत्य वृक्ष के नीचे पुंडरीक पादु-
काएँ विराजमान की जो देवपूजित रही । कालान्तर मे महेश्वर
नगर से दशपूर्वधर वज्रस्वामी आकर बहुतो को प्रतिबोध देगे ।
माहात्म्य श्रवणकर जावड सेठ का पुत्र भावड उपवास तप पूर्वक
अभिग्रह लेगा । छ मास ताम्रलिप्ति मे आवास कर पर्वत शिखर