विविध तीर्थ कल्प (आचार्य जिनप्रभ सूरि - प्राचीन भारतीय तीर्थ, ऐतिहासिक भूगोल व पुराविहार)
Vividha Tirtha Kalpa of Jinaprabha Suri
आचार्य जिनप्रभ सूरि (सम्पादक: मुनि जिनविजय) द्वारा
३६. पाटलिपुत्रनगर-कल्प
श्री नेमिनाथ भगवान को नमस्कार करके अनेक पुरुष-रत्नो
के जन्म से पवित्रित पाटलिपुत्र नामक नगर का कल्प प्रस्तुत
करता हूँ ।
पूर्वकाल मे महाराजा श्रेणिक का निधन होने पर उसके पुत्र
कूणिक ने पितृगोक से चम्पापुरी नई वसाई । उसकी मृत्यु के
पश्चात् उसका पुत्र उदयि चम्पा की राजगद्दी पर बैठा । वह भी
अपने पिता के क्रीडास्थान-राजसभा-शयनागार-भोजनालय आदि
स्थानो को देखकर अत्यन्त गोकाकुल हो जाता था । तब अमात्य
लोगो की अनुमति से नया नगर बसाने के लिए नैमित्तिक लोगो
को स्थान-गवेषणार्थ आदेश दिया । वे सर्वत्र उन स्थानो को देखते
हुए गगा-तट पर गये । वहाँ पाडल कुसुम वाले पाटलि वृक्ष को
देखकर उसकी गोभा से चमत्कृत हुए । उसकी गाखा पर बैठे हुए
चाषपक्षी के मुँह मे कीटकादि जन्तु स्वयमेव आकर गिरते देखकर
सोचा—अहो ! इस चाप पक्षी के मुँह मे स्वयं कीडे आकर गिर
रहे हैं तो इस स्थान पर नगर बसाने से राजा को स्वयं लक्ष्मी
प्राप्त होगी । उन्होने राजा से विज्ञप्ति की । वह भी अत्यन्त प्रसन्न
हुआ । वहाँ एक वृद्ध नैमित्तिक ने कहा—देव ! यह पाडल वृक्ष
साधारण नही है । पूर्वकाल मे ज्ञानियो ने कहा है कि—
“महामुनि की खोपडी मे उत्पन्न यह पवित्र पाटल वृक्ष है,
विगेश इसका मूल जीव एकावतारी है ।”
राजा ने कहा—वे महामुनि कौन ? नैमित्तिक ने कहा—देव !
सुनिये । उत्तर मथुरा मे रहने वाला देवदत्त नामक वणिक पुत्र
एक वार पर्यटन करने के लिए दक्षिण मथुरा गया । वहाँ जयसिंह
पाटलिपुत्रनगर-कल्प १५१
नामक वणिक पुत्र के साथ उसकी मित्रता हो गई। वह एक वार
उसके घर भोजन करने गया तो थाल मे भोजन परोस कर पखा
झलकर हवा करती हुई उसकी अन्निका नामक बहिन के सौन्दर्य
को देखकर उसमे अनुरक्त हो गया और दूसरे दिन चरो को भेज-
कर जयसिंह से अन्निका की याचना की। उसने कहा—मैं अपनी
बहिन को उसे दूँगा जो मेरे घर से दूर न हो और जब तक उसके
सन्तान जन्मे में उन्हे प्रतिदिन देख सकूँ। इस लिए तब तक यदि
वह मेरे घर रहे तो मै उसे अपनी वहिन दूँगा। देवदत्त के स्वीकार
करने पर शुभ मुहूर्त्त मे उनका विवाह कर दिया।
देवदत्त उसके साथ भोग भोगते हुए वहाँ रहने लगा। एक
दिन उसके पास अपने माता-पिता का पत्र आया, जिसे पढकर
उसके नेत्रो मे अश्रु-वर्षा होने लगी। कारण पूछने पर भी न बोला
तो अन्निका ने स्वयं पत्र लेकर पढा। उसमे माता पिता ने लिखा
था—बेटा ! हम दोनो वृद्ध हो गए, मृत्यु निकट है, यदि हमे जीते
देखना चाहते हो तो शीघ्र आ जाना। उसने पति को आश्वासन
देकर अपने भाई को हठ छोडने की प्रार्थना की। और पति के
साथ उत्तर मथुरा को जाते उस सगर्भा ने पुत्र जन्म दिया। देवदत्त
के “इसका नामकरण पिताजी करेंगे” ऐसा कहने पर परिजन
लोग उस बालक को 'अन्निका पुत्र' नाम से पुकारने लगे। क्रमश·
देवदत्त अपने घर पहुँचा। माता पिता को नमस्कार कर उसने
उन्हे पुत्र को अर्पण किया। उसका नाम सधीरण रखा तो भी
अन्निकापुत्र नाम ही प्रसिद्ध हुआ।
अन्निकापुत्र ने बडे होकर तरुणावस्था मे भोगो को तृणवत्
छोडकर जयसिंहाचार्य के पास दीक्षा ग्रहण कर ली और गीतार्थ
होकर आचार्य पद प्राप्त किया।
एक वार वृद्धावस्था मे विचरते हुए अन्निकापुत्राचार्य पुष्प-
भद्रपुर पहुंचे। वहाँ पुष्पकेतु राजा और पुष्पवती रानी के पुष्प-
१५२ विविध तीर्थ-कल्प
चूल, पुष्पचूला नामक पुत्र-पुत्री युगल थे । वे दोनो साथ-साथ
वढते-खेलते परस्पर अत्यन्त प्रीति वाले हो गए । राजा ने देखा
इन दोनो का वियोग कराने से निश्चय ही ये जीवित नही रहेगे ।
और मै भी इनका विरह नही सहूँगा, अत इनका परस्पर विवाह
कर दूँ तो अच्छा हो, यह विचार कर मन्त्री-मित्र और नागरिको
से उसने छलपूर्वक पूछा—यदि अन्त पुरमे रत्न उत्पन्न हो तो
उसका स्वामी कौन ? उन लोगो ने कहा—
देव ! अन्त पुर का तो कहना ही -या ? जिस देश मे रत्न
उत्पन्न हो उसे राजा स्वेच्छानुसार विनियुक्त करे, इसमे किसी को
क्या आपत्ति है।
यह सुनकर राजा ने अपना अभिप्राय कहा । महागनी के मना
करने पर भी राजा ने उनका सबध घटित कर दिया । दोनो पति-
पत्नी सासारिक भोग करने लगे । रानी ने पति के अपमान से
विरक्त होकर व्रत ग्रहण किया और स्वर्ग मे देव हो गई ।
राजा पुष्पकेतु का जीवन अध्याय शेष होने पर पुष्पचूल राजा
हुआ । देव ने अवधिज्ञान प्रयोग से उसका अकृत्य जान कर पुष्प-
चूला को स्वप्न मे नरक और वहां के दुख दिखलाये । उससे
प्रबुद्ध होकर भय से पति को सारा निवेदन किया, उसने शांति के
उपाय किये । वह देव प्रति रात्रि मे उसे नरक दिखाता था ।
राजा ने समस्त तीर्थिक लोगो को बुलाकर पूछा—नरक कैसे होते
हैं ? किसी ने गर्भावास को, किसी ने कारावास को, किसी ने
दारिद्रय को और किसी ने परतन्त्रता को नरक बतलाया । रानी
उनके विसवादी वचनो को सुनकर मुख मोडकर बैठ गई ।
राजा ने अग्निकापुत्र आचार्य को बुलाकर उन्हे पूछा ।
उन्होने जैसा रानी ने देखा था, वैसा ही नरक स्वरूप बतलाया ।
रानी ने कहा—भगवन् ! आपने भी क्या स्वप्न देखा है, अन्यथा
यह कैसे जानते हैं ? सूरि महाराज ने कहा—भद्रे ! जिनागमो से
सब कुछ मालूम होता है । पुष्पचूला ने कहा—भगवन् ! किस कर्म
से नरक प्राप्त होते हैं ? गुरु महाराज ने कहा—भद्रे ! महा
आरंभ-परिग्रह और गुरुविरोधी होकर पञ्चेन्द्रियवध—मासाहार
से प्राणियोका नरक पतन होता है ।
क्रमश देव ने उसे स्वप्न मे स्वर्ग दिखाये । राजा ने उसी
प्रकार पाखण्डियो से पूछा और उनके परस्पर-विरोधी विरोधी
वचन पाकर उन्हे विसर्जित कर आचार्य महाराज से स्वर्ग का
स्वरूप पूछा । उन्होने यथातथ्य कहा और रानी के पूछने पर
स्वर्ग-प्राप्ति का कारण सम्यक्त्व मूल गृहस्थ और यति धर्म
बतलाया । लघुकर्मा रानी प्रतिबोध पाई । उसने राजा से दीक्षा
के लिए अनुज्ञा माँगी । उसने कहा—मेरे घर से ही भिक्षा ग्रहण
करो तो दीक्षा लो । उसने राजा के वचनो को स्वीकार कर
आचार्य महाराज के पास उत्सवपूर्वक शिष्यत्व स्वीकार किया
और गीतार्थ बनी ।
एक वार आचार्य महाराज ने श्रुतोपयोग से भावी दुर्भिक्ष
ज्ञात कर गच्छवासी साधुओ को, देशान्तर भेज दिया और स्वय
जघा वल क्षीण होने से वही रहे । पुष्पचूला साध्वी अन्त पुर से
आहार-पानी लाकर गुरु महाराज को देती थी ।
गुरु-शुश्रूषा भाव प्रकर्ष से क्रमश उसने क्षपकश्रेणि आरोहण
कर केवलज्ञान उत्पन्न किया, तो भी वह गुरु महाराज के वैयावृत्य
से निवृत्त नही हुई । गुरु महाराज ने भी जहाँ तक उसका केवली
होना नही जाना, वहाँ तक उसका पूर्व प्रयुक्त विनय चलता ही
रहा । गुरु महाराज की जव जैसी रुचि होती, वह उसी प्रकार का
अन्नादि लाकर देती थी । एक वार वर्षा के समय भी वह आहार
ले आई । गुरु महाराज ने कहा—वत्से ! तुम श्रुतज्ञा होकर वर्षा
मे कैसे आहार लाई ? उसने कहा—भगवन् ! जहाँ अचित्त अप्काय
था वही से लाई हूँ, अत. प्रायश्चित्त का कोई प्रश्न नही। गुरु
महाराज ने कहा—छद्मस्थ होकर कैसे जाना ? उसने कहा—मुझे
कैवल्य है । तब मैने केवली की आगातना की, मेरा दुष्कृत्य
मिथ्या हो । ऐसा कहते हुए गच्छाधिप ने पूछा कि—मैं सिद्ध हूँगा
कि नही ? केवली ने कहा—अधृति न करे, आपको गगा पार
होते समय केवलज्ञान होगा । तब गगा पार होने के लिए सूरिजी
नौका मे बैठे। वे जिधर-जिधर बैठते उधर ही नौका डूबने
लगती, फिर बीच में बैठने से सारी नौका डूबने लगी। लोगो ने
सूरिजी को नदी में फेंक दिया। दुहागिन बना देने से वैर से पूर्व
भव की पत्नी जो व्यन्तरी हुई थी—ने जल मे शूली पर रख
लिया । शूली पर भी उन्होने “मेरे से अप्काय जीवो की विराधना
हो रही है”—इस आत्म-पोडा से क्षपक श्रेणी आरोहण कर अन्त -
कृत केवली होकर सिद्धि प्राप्त की। निकटवर्त्ती देवो ने उनकी
निर्वाण महिमा की । अतः वह तीर्थ “प्रयाग” नाम से जगत्प्रसिद्ध
हुआ। जहाँ प्रकृष्ट याग-पूजा हो वह प्रयाग, यह अन्वयार्थ है।
शूली पिरोने की गतानुगतिकता से पर दर्शनी लोग आज भी
अपने अंग पर करौत दिलाते हैं। वहाँ के वट वृक्ष को तुर्को द्वारा
काट डालने पर भी बार-बार उग जाता है।
सूरिजी की खोपडी के दो टुकडे होने पर भी जल की लहरें
उन्हे किनारे ले गई । सीप की भाँति इधर-उधर तैरते नदी तट
के किसी गुप्त विषम प्रदेश मे अटक कर रह गई। उस खोपडी
मे कभी पाटल वृक्ष का वीज गिर कर ऊगा । और उसे भेद कर
गर्दन के दक्षिण ओर यह विशाल पाटल वृक्ष हो गया । इस
पाटल वृक्ष का प्रभाव चाष पक्षी पर भी है, अतः यहाँ नगर
वसाइये । शिवा के गव्द पर्यन्त सूत्र दीजिये ! राजा के आदेश से
नैमित्तिको ने पाटल वृक्ष के पूर्व से पश्चिम को, फिर उत्तर को
पाटलिपुत्रनगर-कल्प १५५
फिर पुन पूर्व को और फिर दक्षिण को शिवा शब्दावधि जाने पर
सूत्र डाल दिया ।
इस प्रकार चौकोर नगर का सन्निवेश हो गया । उस अकन
किये हुए प्रदेश मे राजा ने नगर बसाया । वही पाटल वृक्ष के
नाम से पाटलीपुत्र नगर और विविध कुसुम वाहुल्य से कुसुमपुर
नाम भी रूढ हुआ । उसमे राजा ने नेमिनाथ भगवान का चैत्य
बनवाया । गजशाला, अश्वशाला, रथशाला, प्रासाद, सौध,
प्राकार, गोपुर, पण्यशाला, सत्रागार, पौषधगाला से रम्य उस
नगर मे उदयि राजा ने चिरकाल तक जैनधर्म पालन करते हुए
राज्य किया ।
हत्यारे (छद्मवेशी साधु) ने पौषध मे रहे हुए राजा उदयि
को स्वर्ग का अतिथि बना दिया, तब वहाँ नापित-गणिका का
पुत्र नन्द, भगवान महावीर के निर्वाण के साठ वर्ष बीतने पर
राजा हुआ । उसके वंग मे सात नन्द राजा हुए फिर नौवे नन्द-
राज के परमार्हत् कल्पक का वशज शकडाल मन्त्री हुआ । उसके
दो पुत्र स्थूलभद्र और श्रीयक थे एव यक्षा, यक्षदत्ता, भूता,
भूतदत्ता, एणा, रेणा, वेणा नामक सात पुत्रियाँ थी जो क्रमशः
एक से सात बार श्रुतपाठिनी स्मृति वाली हुई ।
उसी नगर मे कोशा वेश्या और उसकी बहिन उपकोशा
भी हुई ।
वही चाणक्य मन्त्री ने नन्द को मूल से उखाड कर मौर्यवंशी
चन्द्रगुप्त को स्थापित किया । उसी के वश मे विन्दुसार अशोकश्री,
कुणाल और उसका पुत्र त्रिखण्ड भरताधिप परमाहित, अनार्य
देशो मे भो श्रमण विहार प्रवर्त्तन करने वाला महाराजा संप्रति
हुआ ।
समस्त कला-कलापज्ञ मूलदेव, महा धनिक सार्थवाह अचल,
गणिकारत्न देवदत्ता भी आगे वही हुए ।
१५६ विविध तीर्थ-कल्प
कौभीषण गोत्र के उमास्वाति वाचक, —जो पाँच सौ संस्कृत
प्रकरणो की रचना से प्रसिद्ध हैं—ने यही तत्त्वार्थाधिगम की सभाष्य
रचना की । विद्वानो के परितोष के लिए वहाँ चौरासी वादशालाएँ
बनी हुई थी ।
वहाँ ऊँची तरंगो से गगनाङ्गणोत्सगित महानदी गंगा प्रवां-
हित है । उसके उत्तर दिशा मे निकट ही विपुल बालुका स्थल है
जहाँ पर चढकर कल्की और प्रातिपदाचार्य प्रमुख संघ का मलिल
प्लवन से निस्तरण हुआ ।
वही कल्की राजा व उसके वंशज धर्मदत्त, जितशत्रु, मेघ-
घोषादि होगे । वही नद राजा के ९९ द्रव्य कोटि, पाँच स्तूप
अन्तर्निहित विद्यमान हैं । जिन्हे लक्षणावती का सुलतान धन प्राप्त
करने की इच्छा से उन-उन उपक्रमो को कर लडकर नष्ट हो गया
ऐसा जाना गया है ।
यही श्री भद्रबाहु, महागिरि, सुहस्ति, वज्रस्वामी आदि युग-
प्रधान विचरे और प्रातिपदाचार्यादि विचरेगे ।
यही महाधनिक धन सेठ की पुत्री रुक्मिणी श्री वज्रस्वामी
को वरण करना चाहती थी जिसे निर्लोभ-चूडामणि उन आचार्य
भगवान ने प्रतिबोध दे प्रव्रजित किया ।
यही महर्षि सुदर्शन सेठ की अभया रानी ने व्यन्तरी होकर
उपसर्ग किये, पर वे अक्षुब्ध रहे ।
यही स्थूलिभद्र महामुनि ने षड्रसयुक्त आहार करते हुए
कोशा की चित्रशाला मे मदन का मद-मर्दन कर वर्षा काल
चातुर्मास किया । सिंहगुफावासी मुनि भी उनकी स्पर्द्धा से वही
आया और कोशा ने उससे लायी गई रत्नकम्बल को नाले मे
फेक कर प्रतिबोध दे पुन उसे चारित्र लक्ष्मी अङ्गीकार कराई ।
वही बारहवर्षी दुष्काल पडने पर गच्छ को देशान्तर भेजने
[Header]
पाटलिपुत्रनगर-कल्प १५७
पर श्री सुस्थिताचार्य के दो क्षुल्लक शिष्यो ने आँखो मे अदृश्या-
ञ्जन लगा कर चन्द्रगुप्त राजा के साथ कितने ही दिनो तक
भोजन किया। उसके बाद गुरु के प्रत्युपलभादि से विष्णुगुप्त की
भाँति उनका निर्वाह किया।
वहाँ श्री वज्रस्वामी ने नगर के नर-नारियो के सक्षोभ से
रक्षणार्थ पहिले दिन साधारण रूप बनाया। दूसरे दिन देगना-
रस-मुग्ध लोगो से—अहो भगवन् का रूप गुणानुरूप नही है—ऐसा
सुनकर उन अनेक लब्धि-सम्पन्न आचार्यमहाराज ने अपना सहज
अद्वितीय रूप बनाकर स्वर्णमय सहस्र दल पर बैठकर देगना दी
जिससे राजा आदि जनता को प्रमुदित किया।
उसो नगर मे सप्रभावातिशय वाली मातृदेवता थी, जिसके
प्रभाव से उस नगर को दूसरो के लिए हठ करके भी लेना अगक्य
था। चाणक्य के वचन से उसे उखाड देने पर फिर जनता ने
मातृमण्डल मे चन्द्रगुप्त और पर्वतक को पकड लिया।
इस प्रकार अनेक संविधान निधान उस नगर मे अठारह
विद्या, स्मृति-पुराण, भरत वात्स्यायन और चाणक्य रूप त्रिरत्न
मन्त्र, यंत्र-तंत्र विद्या मे, रसवाद, धातु-निधिवाद, अञ्जन-गुटिका,
पाद प्रलेप, रत्नपरीक्षा, वास्तुविद्या, पुरुप-स्त्री, गज, अश्व,
वृषभादि लक्षण, इन्द्रजालादि ग्रन्थो मे, काव्यो मे निपुणता
वाले और सुबह उठते ही नाम कीर्त्तन करने योग्य पुरुप रहते थे।
आर्यरक्षित भी इसी स्थान पर चौदह विद्याओ का अध्ययन
कर के दशपुर आये।
यहाँ ऐसे धनाढ्य निवास करते थे कि जो हजार योजन
जाने मे जितने हाथी के पद-चिह्न हो उन्हे प्रत्येक को हजार
सोर्नयो से परिपूर्ण कर सकते थे। और तिलो के आढक (माप)
बोने पर उगने से जितने तिल फले उतनी हजार स्वर्ण-मुद्राएँ घर
१५८ विविध तीर्थ-कल्प
मे थी। दूसरे धनाढ्य ऐसे थे जिन के घर एक दिन के उत्पन्न
गाय के मक्खन से मेघ वृष्टि प्रवहित पहाडो नदी के जल पूर को
बाँध सकते थे।
एक दिन मे जन्मे हुए नव किशोरो के स्कन्ध केशो द्वारा
पाटलिपुत्र नगर को चारो ओर से वींटा जा सकता था।
किसी की हवेली मे दो प्रकार के शालि रत्न भरे रहते थे जो
एक शालि वीज को वोने पर भिन्न-भिन्न शालिवीज उत्पन्न होते
थे। दूसरा गर्दभिका नामक शालि-धान्य था जो वार-वार काटने
पर पुन पुन उगता था।
गौड देश के भूषण पाटलिपुत्र-कल्प की रचना आगम मे श्री
जिनप्रभ सूरि ने की।
इसकी ग्रन्थ-संख्या १२५ और १९ अक्षर ऊपर है।
३७. श्रावस्तीनगरी-कल्प
श्री सम्भवनाथ जिनेश्वर को नमस्कार कर के दु खरूपी
सरिता को तरने मे नौका के सदृश सकल सुखो को उत्पन्न करने
वाली श्रावस्ती नगरी का संक्षिप्त कल्प कीर्त्तन करता हूँ।
अगण्य गुणगण वाले इसी दक्षिणार्द्ध भारतवर्ष मे कुणाला
(जनपद) मे श्रावस्ती नामक नगरी वर्त्तमान काल मे 'महेठ' नाम
से प्रसिद्ध-रूढ है। वहाँ आज भी गहन घन वन के मध्य स्थित श्री
श्रावस्तीनगरी-कल्प १५९
सम्भवनाथ प्रतिमा विभूषित गगनचुम्बी शिखर और पार्श्व स्थित
जिनबिम्बमण्डित देवकुलिका से अलंकृत, प्राकारपरिवृत जिनालय
विद्यमान है। उस चैत्य के द्वार के अनतिदूर वल्लि उल्लसित
अतुल्य पल्लवो की स्निग्ध छाया वाले बडी-बडी शाखाओ से
अभिराम रक्त अशोक के वृक्ष दिखाई देते हैं। उस जिनालय की
प्रतोली के कपाट संपुट मणिभद्र यक्ष के प्रभाव से सूर्यास्त होते
ही स्वयमेव बन्द हो जाते थे और सूर्योदय होते ही अपने आप
खुल जाते थे।
एक बार दुर्ललित काल के प्रभाव से अलाउद्दीन सुलतान के
हव्वस नामक मल्लिक ने वहराइच नगर से आ कर प्राकार-
दीवालें, कपाट और कतिपय प्रतिमाओ को भी भग्न कर डाला।
दूषम काल मे अधिष्ठायक देव भी मन्द प्रभाव वाले हो जाते हैं।
तथा यात्री-संघ के आने पर न्हवण-महोत्सव के समय उसी चैत्य
के शिखर पर एक चित्रक—चीता आ कर बैठ जाता है जो किसी
को भी भय नही करता। मंगल प्रदीप होने पर स्वस्थान चला
जाता है।
इस नगरी मे बौद्धायतन है जहाँ समुद्रवंशीय करावल्ल
नरेन्द्र के कुलोत्पन्न राजा लोग बौद्ध भक्त हैं। वे आज भी अपने
देव के समक्ष अलंकृत और विभूषित पलाण किया हुआ महातुरग
चढाते हैं। स्वसम्पदा से भगवान बुद्ध ने यही महाप्रभावी जागुली
विद्या प्रकाशित की थी।
यहाँ नाना प्रकार के चावल उत्पन्न होते है। उन सब चावलों
की जाति के एक-एक कण यदि एक बडे कटोरे मे डाले जाँय तो
वह शिखा पर्यन्त भर जाता है।
यहाँ भगवान सम्भवनाथ स्वामी के च्यवन-जन्म-दीक्षा और
केवलज्ञान कल्याणक हुए, जिन्हे सुरासुर नर भुवन मन रंजन
करने वाले मनाये गये।
कौशाम्बीपुरी मे उत्पन्न जितशत्रु नृपसचिव काश्यप पुत्र
यक्षा कुक्षी सम्भूत कपिल महर्षि हुए । पिता के वियोग होने पर
इसी नगरी मे पिता के मित्र इन्द्रदत्त उपाध्याय के पास विद्या-
ध्ययनार्थ आये और गालिभद्र सेट की दासी के वचनो से दो मासा
सोने के लिए याचना करते क्रमशः स्वयं बुद्ध हुए । एव पाच सौ
चोरो को प्रतिबोध दे कर सिद्ध हुए ।
यही पाँच सौ श्रमण और एक हजार आर्याओ से परिवृत
प्रथम निह्नव जमालि तिन्दुक उद्यान मे रहे। कुम्भकार ढँक ने
पहले अपनी शालामे स्थित भगवान की पुत्री प्रियदर्शना साध्वी को
साडी के एक प्रदेश मे अगार छुआ कर भगवान महावीर के वाक्य
“कयमाणे कडे” को मान्य कराया । उसी ने सब साधु-साध्वियो को
प्रतिबोध दे कर स्वामी के पास भेजा, एक जमालि ही विप्रतिपन्न
रहा ।
यही तिन्दुक उद्यान मे केशीकुमार श्रमण के पास गणधर
भगवान गौतम स्वामी ने कोष्टक उद्यान से आ कर परस्पर
सवाद किया और पचयाम धर्म स्वीकार कराया ।
भगवान महावीर यही एक वर्षाकाल विविध खण्ड-प्रतिमा
धारण कर रहे । शक्रेन्द्र ने पूजा की, विचित्र प्रकार के तप किये ।
यहाँ जितशत्रु-धारिणी के पुत्र स्कन्दकाचार्य उत्पन्न हुए जिन्हे
कुम्भकारकड नगर मे पालक ने पाँच सौ शिष्यो सहित घाणी मे
पिला दिया था ।
यही जितशत्रु राजा का पुत्र भद्र प्रव्रजित हो कर प्रतिमा
धारण कर विचरते हुए शत्रु-राज्य मे गया और उसे चोर समझ
कर राज-पुरुषो ने पकड कर उसके अग-छेदन कर क्षार देने के
लिए कठोर दर्भ से वीट दिया । वे मुक्त और सिद्ध हुए ।
राजगृहादि की भाँति इस नगरी मे भी ब्रह्मदत्त का परिभ्रमण
हुआ था ।
वाराणसीनगरी-कल्प १६१
यही अजितसेनाचार्य का शिष्य क्षुल्लककुमार जननी-
महत्तरा, आचार्य और उपाध्याय के कथन से बारह-बारह वर्ष
द्रव्य श्रमणत्व मे रहा । नाटक देखते हुए “सुट्ठु गाइय सुट्ठु
वाइय” इत्यादि गीतिका सुन कर युवराज, सार्थवाह पत्नी और
मंत्री के साथ प्रतिबोधप्राप्त हुआ ।
इस प्रकार अनेक सविधानक रत्नो की उत्पत्तिरूप यह भूमि
रोहणाचल जैसी है । जिनप्रवचन की भक्ति से जिनप्रभसूरि जी
ऐसा कहते है कि श्रावस्ती महातीर्थ का यह कल्प विद्वान लोग
पढे ।
श्रावस्ती नगरी का कल्प समाप्त हुआ । इसकी ग्रथ-सख्या
४२ है ।
३८. वाराणसीनगरी-कल्प
तत्त्व बतलाने वाले और सम्पूर्ण विघ्नो को दूर करने वाले
श्री सुपार्श्व और श्री पार्श्वनाथ भगवान को नमस्कार करके उत्तम
कल्पनाओ से भरा हुआ वाराणसी तीर्थ-रत्न का कल्प कहता हू ।
इसी दक्षिणार्द्ध भरत के मध्य खण्ड मे काशी जनपद के
अलङ्कारस्वरूप उत्तरवाहिनी त्रिदशवाहिनी—गगा से अलंकृत
धन-कनक-रत्नो से समृद्ध वाराणसी नामक नगरी अद्भुत गौरव
की निधान है । वरुणा और असि नाम की दोनो ही नदियाँ यहाँ
गगा मे आकर मिलने से वाराणसी नाम निरुक्ति से प्रसिद्ध है ।
११
१६४ विविध तीर्थ-कल्प
यहाँ पर वल नामक मातंग ऋषि अमृतगंगा के तीर पर
जन्मे और तिन्दुक उद्यान मे रहे। उन्होने गण्डी तिन्दुक यक्ष को
अपने गुण गणो से आकृष्टहृदय बनाया। कौगलिक राजा की
पुत्री भद्रा ने मलक्लिन्न ऋषि को देख कर उन पर थूक दिया।
तदनन्तर उसी यक्ष ने मुनि के शरीर मे प्रविष्ट होकर उसके साथ
विवाह किया। मुनि ने उसे छोड दिया तब रुद्रदेव ने उसे यज्ञ-
पत्नी बनाया। मासक्षमण के पारणे के दिन भिक्षार्थ आये हुए
मुनि की ब्राह्मणो ने हँसी उडाई और कदर्थना भी की। यह देख
कर भद्रा ने उन्हे पहचान लिया और ब्राह्मणो को बोध दिया।
ब्राह्मणो ने क्षमायाचना कर भोजनादि प्रदान किया। देवताओ
ने गन्धोदकवृष्टि, पुष्पवृष्टि, दुन्दुभिवादन और वसुधारा वृष्टि की।
यहाँ पर—
वाणारसी पकोट्ठए पासे गोवाल भद्दसेणेय ।
णंदसिरी पउमदह रायगिहे सेणिए वीरे ॥१॥
वाराणसीय नगरी अणगार धम्मघोस-धम्मजसे;
मासस्सय पारणए गोउल गगाय अणुकम्पा ॥२॥
[भावार्थ—वाराणसी के कोष्टक चैत्य मे पार्श्वनाथ भगवान
और गोपाली आर्या के पास भद्रसेन की पुत्री नन्दश्री दीक्षित हो
पद्मद्रह मे उत्पन्न हुई, राजगृह मे वीर प्रभु ने श्रेणिक को कहा।
वाराणसी नगरी मे अणगार धर्मघोष-धर्मयश को मासक्षमण
के पारणे मे देव ने अनुकम्पा से गगापार गोकुल दिखाया।]
आवश्यक-नियुक्ति मे इसके दो सविधान है। यत —
१—इसी नगरी मे भद्रसेन नामक जीर्ण सेठ था। उसकी
भार्या नन्दा थी। उनकी पुत्री नन्दश्री विधवा थी। एक बार यहाँ
के कोष्टक चैत्य मे पार्श्वनाथ स्वामी समवसरे। नन्दश्री ने
प्रव्रज्या ली। गोपाली आर्या को शिष्या रूपमे समर्पित की। वह
पहले तो उग्र विहार करती थी, पीछे गिथिल होकर हाथ-पाँव
धोने लगी। साध्वियो के मना करने पर अलग वसति मे रहने
लगी। वह साध्वी बिना आलोयणा के मर के क्षुल्ल हिमवत के
पद्मद्रह मे देवगणिका श्रीदेवी हुई। वह भगवान महावीर के
राजगृह आने पर समवशरण मे नाट्य विधि प्रदर्शित करने गई।
अन्यत्र ऐसा भी कहा है कि उसने हथिणी रूप मे वात-निसर्ग
किया, श्रेणिक ने उसका स्वरूप पूछा, भगवान ने उसकी पूर्व भव
की अवसन्नता का वृत्तान्त बतलाया।
२—इसी नगरी मे धर्मघोष—धर्मयश नामक दो अणगार
वर्षाकाल-चातुर्मास रहे। वे मासक्षमण करते थे। एक बार चौथे
पारणे में तीसरे प्रहर मे विहार के लिए प्रस्थान कर सूर्यताप से
आर्त प्यासे गंगा पार होते हुए मन से भी जल पीने की अनेषणीय
होने से इच्छा नही की। देवता ने उनके गुणो से आकृष्ट हो गोकुल
की विकुर्वणा की और गंगा पार होने पर दही आदि के लिए
निमन्त्रित किया। उन ज्ञानियो ने उपयोग देकर यथार्थतः देवमाया
जान कर प्रतिषेध कर दिया। देव ने उनके नगर की ओर जाते
समय वादल विकुर्वण किये। उन्होने आर्द्रभूमि मे शीतल वायु
बहते चल कर गाँव पहुँच कर शुद्ध आहार लिया।
श्री अयोध्या मे इक्ष्वाकुवंशी महानरेन्द्र त्रिशंकु का पुत्र
हरिश्चन्द्र, उशीनर राजा की पुत्री रानी सुतारादेवी और पुत्र
रोहिताश्व के साथ चिरकाल सुख अनुभव करते थे। एक वार
सौधर्मेन्द्र ने देवसभा मे उनके सत्व की प्रशसा की। उसे अश्रद्धा
करते हुए चन्द्रचूड-मणिचूड नामक देव पृथ्बी पर आये। उनमे से
एक वनवाराह रूप बनाकर अयोध्या के बाहर शक्रावतार
चैत्याश्रम को संरम्भपूर्वक भग्न करने मे प्रवृत्त हो गया। सिंहासन-
१६२ विविध तीर्थ-कल्प
यहाँ सातवें जिनेश्वर श्री सुपार्श्वनाथ ने इक्ष्वाकु-प्रतिष्ठ
नरेश्वर की रानी पृथ्वी देवी की कुक्षी मे अवतरित हो जन्म
लिया। तीन भुवन के लोगो से वादित यश पटह वाले, स्वस्तिक
लाञ्छन विराजित दो सौ धनुष की कचनवर्णी काया वाले प्रभु ने
क्रमश राज्य-सुख अनुभव कर सावत्सरिक दान देकर सहस्राम्रवन
मे दीक्षा लेकर छद्मस्थ अवस्था मे नौमास विचर कर केवलज्ञान
प्राप्त किया और समेत शिखर गिरि पर मुक्त हुए ।
तेईसवे तीर्थंकर पार्श्वनाथ इक्ष्वाकु वश के राजा अश्वसेन के
पुत्र और वामा देवी की कुक्षी से जन्मे । उनका सर्पलाञ्छन व नौ
हाथ का ऊँचा नीलवर्ण वाला शरीर था । उन्होने आश्रमपदोद्यान
मे राजकुमार अवस्था मे ही चारित्र लेकर केवलज्ञान प्रकट कर
उसी सम्मेत शिखर गिरि पर शैलेसीकरण करके सिद्ध हुए । इन्ही
भगवान के कुमारावस्था मे मणिकर्णिका पर पञ्चाग्नि तप करने
वाले कमठ ऋषि की भविष्य मे होने वाली विपत्त को जानते हुए
भी काष्ठ के अन्दर जलती हुई ज्वालाओ से अधजले सर्प को
'दिखाकर माता-पिता के कुपथ का भी निरसन कर दिया ।
यही काश्यप गोत्रवाले चतुर्वेदी षट्कर्म कर्मठ और समृद्ध
युगल भ्राता जयघोष और विजयघोष नामके द्विजश्रेष्ठ थे । एक
वार जयघोष गंगा मे स्नान करने गया वहाँ पर साँप के द्वारा
ग्रसे जाते हुए मेढक को देखा और सर्प को उलल के द्वारा उठाकर
भूमि पर पटका हुआ देखा । उलल सर्प को दवा कर वैठा था और
सर्प वैसी अवस्था मे भी मेढक का आस्वादन कर रहा था । मेढक
चिल्ला रहा था और सर्प भी चीत्कार कर रहा था । इसे देखकर
वह प्रतिबोध को प्राप्त हुआ । दीक्षा लेकर क्रमश एक रात्रि की
प्रतिमा स्वीकार कर विचरते हुए पुन इसी नगरी मे आया । मास-
क्षमण के पारने के दिन यज्ञपाटक मे प्रवेग किया । वहाँ पर भिक्षा
वाराणसीनगरी-कल्प १६३
न देने की इच्छा वाले विप्रो ने उन्हे प्रतिषेध किया। तब श्रुत मे
कही हुई अभिचर्या का उपदेश देकर भाई और अन्य विप्रो को
प्रतिबोध दिया। वैराग्यवान् भाई विजयघोष ने दीक्षा ली, दोनो
मोक्ष गए।
यहाँ नन्द नामक नाविक ने तर्पण ग्रहण करने की इच्छा से
मुमुक्षु धर्मरुचि की विराधना की। उनके हुकार से भस्म होकर
क्रमशः सभा मे गृहकोकिला, अमृतगगा के तीर पर हस और
अंजनगिरि पर सिंह के भव पाये। और उन्ही अनगार की तेजो-
लेश्या से मर कर इसी नगरी मे ब्राह्मण हुआ, वही मर के फिर
राजा हुआ। जातिस्मरण ज्ञान हुआ तब आधा श्लोक बनाया।
इसी दिन वही आये हुए उन मुनि के समस्या पूर्ण करने से उन्हे
पहचान कर अभय याचना पूर्वक क्षमा माँगी और परम श्रावक हो
गया। धर्मरुचि क्रमश सिद्धि को प्राप्त हुए।
वह समस्या यह थी—
गगाए नाविओ नन्दो सभाए घरकोइलो।
हसो मयग तीराए सोहो अजण पव्वए ॥ १ ॥
वाराणसी ए वडुओ राया तत्थेव आयओ।
ए एर्सि घायगो जोउ सो इत्थेव समागओ ॥ २ ॥
[गगा मे नाविक नद, सभागृह मे गृहकोकिला, मयग तीर
पर हंस तथा अंजन पर्वत पर सिंह फिर वाराणसी मे ब्राह्मणपुत्र
और वही पर राजा बना। इनका जो घातक बना वह भी यहाँ
आ गया]।
इसी नगरी के शत्रु राजा की सेना द्वारा वेष्टित होने पर
सवाहन राजा के एक हजार कन्याओ से अधिक होने पर भी
रानी के गर्भ मे रहे हुए अंगवीर ने नगरी की रक्षा की।
१६६ विविध तीर्थ-कल्प
स्थित राजा हरिश्चन्द्र शूकर के किए हुए उपद्रव को सुनकर
वहाँ गया और वाण के प्रहार से उसे मार डाला। उसके सशरीर
अन्तर्हित हो जाने पर अनिन्द्य चरित्र वाला राजा ज्यो ही उस प्रदेश
मे आया त्यो ही अपने वाण से प्रहत हरिणी को और उसके गलित
गर्भ को काँपते हुए देख कर कर्पिंजल और कुन्तल नामक मित्रो
के साथ इसका विचार किया। राजा अपने को गर्भहन्ता सोचता
हुआ प्रायश्चित लेने के लिए कुलपति के पास आया और नमस्कार
कर आशिष ग्रहण कर बैठा। त्यो ही वचना नामक कुलपति-कन्या
ने जोर से शोर मचाया और बोली—पिता जी ! इस पापी ने मेरी
मृगी को मार दिया है। उसके मरने से मेरा और मेरी माता का
भी मरण होगा। ऐसा सुनकर कुलपति राजा पर कुपित हो गए।
राजा कुलपति के चरणो मे गिरकर बोले-प्रभो ! मेरी सारी पृथ्वी
ग्रहण करके मुझे इस पाप से मुक्त करे। वचना को भी मरने से
निवारणार्थ मे एक लक्ष स्वर्ण मुद्रा दूँगा। उसके मानने पर
कौटिल्य ऋषि को साथ लेकर राजा अपने नगर आया फिर वसु-
भूति मंत्री और मित्र कुन्तल को सारा स्वरूप बतलाकर कोश से
लक्ष निष्क मँगाये। तब अंगारक-तापस ने स्मितपूर्वक कहा—
हमे समुद्र-मेखलापर्यन्त सारी पृथ्वी दे दी तो फिर हमारी वस्तु
ही हमे देते हो, यह कौन सा न्याय है? वसुभुति मंत्री कुछ भी
बोलने लगा तो कुलपति ने उसे शुक और कुन्तल को शाप देकर
शृगाल कर दिया, वे वन मे रहने लगे। राजा ने महीने की
अवधि माँग कर रोहिताश्व की अगुली पकड कर सुतारा के साथ
काशी की ओर चल पडा। क्रमश इस नगर मे पहुँच कर संस्था
मे रहा। वहाँ मस्तक पर तृण रखकर वज्रहृदय विप्र के हाथ देवी
सुतारा रानी और कुमार को छ हजार स्वर्ण मे बेच दिया। वह
खाडना-पीसना आदि गृहकार्य करने लगी। पुत्र भी समिधा, पत्र,
पुष्प, फलादि लाने लगा।
वाराणसीनगरी-कल्प १६७
राजा के चित्त मे बडी चिन्ता थी। कुलपति स्वर्णं मांगने आ
गया। राजा ने उसे छ हजार स्वर्ण दिया। “यह तो थोडा है”
कुलपति ने कुपित होकर कहा फिर अगारक ने कहा—पत्नी और
पुत्र को किस लिए बेचा ? यहाँ के राजा चन्द्रशेखर से क्यो नही
लक्ष स्वर्ण-मुद्रा माँग लेते ?
राजा ने कहा—हमारे कुल मे ऐसा नही होता ! डोम के घर
मे भी नौकरी करके तुम्हे लक्ष स्वर्ण मुद्रा दूँगा । तब काम करने
मे प्रवृत्त होने पर चाण्डाल ने उसे स्मशान रक्षा मे नियुक्त किया।
उसके पश्चात् उन देवो ने नगर मे मारि फैला दी। एव राजा
के आदेश से मान्त्रिक लोगो ने राक्षसी प्रवाद का आरोप लगा
कर सुतारा को मण्डल मे ला कर गधे पर चढाया, शुक की भाँति
अग्नि मे कूदने पर अदग्ध रही। स्मशान में वट की शाखा से
लटकते पुरुष को तथा तट पर रोती हुई सुन्दरी को देख कर
विद्याधर के अपहार का वृत्त सुन कर उन्हे छुडाया और उसके
स्थान मे राजा ने स्वय नियुक्त होकर होमकुण्ड मे अपने मास-
खण्ड दिये थे। जैसे कुण्ड मे से मुख निकाल कर श्रृगाल रोया,
तापस ने जैसे राजा का व्रण रोहण किया था। और पुष्प ग्रहण
करते हुए रोहिताश्व को निर्दय सर्प ने डस लिया था, उसका
सस्कार करने जैसे ही रानी लाई उससे कफन माँगा था और
जैसे सत्व-परीक्षा के निर्वाह से प्रमुदित देवताओ ने अपना रूप
प्रकट किया, पुष्पवृष्टि की, जय जय ध्वनि की । सर्वजनो द्वारा
यह सात्विक-शिरोमणि है, ऐसी प्रशसा की गई। और जिस प्रकार
वहिर्मुख के मुख से, वराहादि से लगा कर पुष्पवृष्टि पर्यन्त सारी
बाते दिव्य-माया विलसित जान कर ज्यो ही चित्त मे चमत्कृत
हुआ त्यो ही स्वय को अपनी नगरी अयोध्या की सभा मे सपरि-
वार सिंहासन पर वंठे देखा । यहाँ रानी और कुमार के विक्रय से
लेकर दिव्यपुष्पवृष्टि पर्यन्त श्री हरिश्चन्द्र राजा का सत्व-
कसौटी रूप चरित्र इसी नगरी के अन्दर मनुष्यो को विस्मय
करने वाला घटित हुआ ।
और जो काशी-माहात्म्य में प्रथम गुणस्थानियो द्वारा कहा है
कि— वाराणसी में कलि का प्रवेश नही होता और यहाँ मरने
वाले कीट-पतग-भ्रमर आदि तथा चतुर्विघ हत्या करने वाले अनेक
पापी मनुष्य भी शिव को प्राप्त करते हैं । ऐसी युक्तिहीन बातो
पर हमारे लिए श्रद्धा करना मानना दु शक्य है, फिर कल्प मे कहने
के लिए तो उपेक्षणीय ही है ।
इस नगरी में परिव्राजको, जटाधरो, योगियो तथा ब्राह्म-
णादि चारो ही वर्ण मे धातुवादि, रसवाद, खन्यवाद, मन्त्रविशारद,
शब्दानुगासन-तर्क-अलकार-ज्योतिषचूडामणि निमित्तशास्त्र-साहि-
त्यादि विद्यानिपुण ऐसे अनेक पुरुष हैं जो रसिक मन वालो को
प्रसन्न करते हैं । यहाँ सकल कला परिकलन कौतूहल वाले चारो
दिशाओ के देशान्तरवासी लोग दिखाई पडते हैं ।
वर्त्तमान मे वाराणसी चार भागो मे बँटी हुई देखी जाती है
जैसे—देव वाराणसी, जहाँ विश्वनाथ का मन्दिर है जिसमे आज
भी जैन चतुर्विंशति तीर्थङ्कर पाषाणमय पट्ट पूजा मे रखा हुआ
विद्यमान है । दूसरी राजधानी वाराणसी है जहाँ आज कल यवन
लोग रहते हैं । तीसरी मदन वाराणसी और चौथी विजय वारा-
णसी है । लौकिक तीर्थ तो इतने अधिक हैं कि उनकी सख्या भी
कौन कर सकता है ? अन्तर्वन में दन्तखात तालाब के निकट श्री
पार्श्वनाथ का चैत्य अनेक प्रतिमाओ से विभूषित है । यहाँ
तालाबो में निर्मल परिमल से भरे हुए नाना जाति के सुगन्धित
कमल भ्रमरसमूहसयुक्त है । और इस नगरी में निर्भय विचरने
वाले वानर और मृगधूर्त लोग एकत्र हैं । यहाँ से तीन कोश पर
वाराणसीनगरी-कल्प १६९
धर्मेक्षा नामका सन्निवेश है जहाँ अपने ऊँचे शिखरो से गगन को
चूमने वाला गौतम बुद्ध का आयतन है। यहाँ से ढाई योजन आगे
चन्द्रावती नगरी है, जहाँ पर अखिल भुवनजनो को तुष्ट करने
वाले चन्द्रप्रभ भगवान के गर्भावतारादि चार कल्याणक हुए हैं।
दो भगवान के जन्म और गंगोदक से गौरववती काशी
नगरी किसके द्वारा प्रकाशित नही है ? अर्थात् सभी ने इसका
वर्णन किया है। इस अनल्प समृद्धि वाली वाराणसी का कल्प
श्रीमान् जिनप्रभसूरि मुनीन्द्र ने बनाया है।
श्री वाराणसी नगरी का कल्प समाप्त हुआ। इसकी ग्रन्थसंख्या
११३ व २३ अक्षर ऊपर है।
३१. महावीर-गणधर-कल्प
श्री वीर प्रभु के ब्राह्मण-वंशोत्पन्न ग्यारह गणधरो को
नमस्कार करके शास्त्रो के अनुसार उनका कल्प सक्षेप से कहता
हूँ। उनके (१) नाम, (२) स्थान, (३) पिता, (४) माता, (५) जन्म-
नक्षत्र, (६) गोत्रादि, (७) गृहपर्याय, (८) सशय, (९) व्रतदिवस,
(१०) नगर, (११) देश, (१२) काल, (१३) व्रतपरिवार, (१४)
छद्मस्थ, (१५) केवलित्व वर्षसंख्या, (१६) रूप, (१७) लब्धि
(१८) आयुष्य, (१९) मोक्ष स्थान, (२०) तप आदि द्वार वर्णन
करता हूँ।
(१) गणधरो के नाम—१ इन्द्रभूति, (२) अग्निभूति, (३)