विविध तीर्थ कल्प (आचार्य जिनप्रभ सूरि - प्राचीन भारतीय तीर्थ, ऐतिहासिक भूगोल व पुराविहार)
Vividha Tirtha Kalpa of Jinaprabha Suri
आचार्य जिनप्रभ सूरि (सम्पादक: मुनि जिनविजय) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंप्रव्रज्या ली। गोपाली आर्या को शिष्या रूपमे समर्पित की। वह
पहले तो उग्र विहार करती थी, पीछे गिथिल होकर हाथ-पाँव
धोने लगी। साध्वियो के मना करने पर अलग वसति मे रहने
लगी। वह साध्वी बिना आलोयणा के मर के क्षुल्ल हिमवत के
पद्मद्रह मे देवगणिका श्रीदेवी हुई। वह भगवान महावीर के
राजगृह आने पर समवशरण मे नाट्य विधि प्रदर्शित करने गई।
अन्यत्र ऐसा भी कहा है कि उसने हथिणी रूप मे वात-निसर्ग
किया, श्रेणिक ने उसका स्वरूप पूछा, भगवान ने उसकी पूर्व भव
की अवसन्नता का वृत्तान्त बतलाया।
२—इसी नगरी मे धर्मघोष—धर्मयश नामक दो अणगार
वर्षाकाल-चातुर्मास रहे। वे मासक्षमण करते थे। एक बार चौथे
पारणे में तीसरे प्रहर मे विहार के लिए प्रस्थान कर सूर्यताप से
आर्त प्यासे गंगा पार होते हुए मन से भी जल पीने की अनेषणीय
होने से इच्छा नही की। देवता ने उनके गुणो से आकृष्ट हो गोकुल
की विकुर्वणा की और गंगा पार होने पर दही आदि के लिए
निमन्त्रित किया। उन ज्ञानियो ने उपयोग देकर यथार्थतः देवमाया
जान कर प्रतिषेध कर दिया। देव ने उनके नगर की ओर जाते
समय वादल विकुर्वण किये। उन्होने आर्द्रभूमि मे शीतल वायु
बहते चल कर गाँव पहुँच कर शुद्ध आहार लिया।
श्री अयोध्या मे इक्ष्वाकुवंशी महानरेन्द्र त्रिशंकु का पुत्र
हरिश्चन्द्र, उशीनर राजा की पुत्री रानी सुतारादेवी और पुत्र
रोहिताश्व के साथ चिरकाल सुख अनुभव करते थे। एक वार
सौधर्मेन्द्र ने देवसभा मे उनके सत्व की प्रशसा की। उसे अश्रद्धा
करते हुए चन्द्रचूड-मणिचूड नामक देव पृथ्बी पर आये। उनमे से
एक वनवाराह रूप बनाकर अयोध्या के बाहर शक्रावतार
चैत्याश्रम को संरम्भपूर्वक भग्न करने मे प्रवृत्त हो गया। सिंहासन-