विविध तीर्थ कल्प (आचार्य जिनप्रभ सूरि - प्राचीन भारतीय तीर्थ, ऐतिहासिक भूगोल व पुराविहार)
Vividha Tirtha Kalpa of Jinaprabha Suri
आचार्य जिनप्रभ सूरि (सम्पादक: मुनि जिनविजय) द्वारा
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यहाँ सातवें जिनेश्वर श्री सुपार्श्वनाथ ने इक्ष्वाकु-प्रतिष्ठ
नरेश्वर की रानी पृथ्वी देवी की कुक्षी मे अवतरित हो जन्म
लिया। तीन भुवन के लोगो से वादित यश पटह वाले, स्वस्तिक
लाञ्छन विराजित दो सौ धनुष की कचनवर्णी काया वाले प्रभु ने
क्रमश राज्य-सुख अनुभव कर सावत्सरिक दान देकर सहस्राम्रवन
मे दीक्षा लेकर छद्मस्थ अवस्था मे नौमास विचर कर केवलज्ञान
प्राप्त किया और समेत शिखर गिरि पर मुक्त हुए ।
तेईसवे तीर्थंकर पार्श्वनाथ इक्ष्वाकु वश के राजा अश्वसेन के
पुत्र और वामा देवी की कुक्षी से जन्मे । उनका सर्पलाञ्छन व नौ
हाथ का ऊँचा नीलवर्ण वाला शरीर था । उन्होने आश्रमपदोद्यान
मे राजकुमार अवस्था मे ही चारित्र लेकर केवलज्ञान प्रकट कर
उसी सम्मेत शिखर गिरि पर शैलेसीकरण करके सिद्ध हुए । इन्ही
भगवान के कुमारावस्था मे मणिकर्णिका पर पञ्चाग्नि तप करने
वाले कमठ ऋषि की भविष्य मे होने वाली विपत्त को जानते हुए
भी काष्ठ के अन्दर जलती हुई ज्वालाओ से अधजले सर्प को
'दिखाकर माता-पिता के कुपथ का भी निरसन कर दिया ।
यही काश्यप गोत्रवाले चतुर्वेदी षट्कर्म कर्मठ और समृद्ध
युगल भ्राता जयघोष और विजयघोष नामके द्विजश्रेष्ठ थे । एक
वार जयघोष गंगा मे स्नान करने गया वहाँ पर साँप के द्वारा
ग्रसे जाते हुए मेढक को देखा और सर्प को उलल के द्वारा उठाकर
भूमि पर पटका हुआ देखा । उलल सर्प को दवा कर वैठा था और
सर्प वैसी अवस्था मे भी मेढक का आस्वादन कर रहा था । मेढक
चिल्ला रहा था और सर्प भी चीत्कार कर रहा था । इसे देखकर
वह प्रतिबोध को प्राप्त हुआ । दीक्षा लेकर क्रमश एक रात्रि की
प्रतिमा स्वीकार कर विचरते हुए पुन इसी नगरी मे आया । मास-
क्षमण के पारने के दिन यज्ञपाटक मे प्रवेग किया । वहाँ पर भिक्षा