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विविध तीर्थ कल्प (आचार्य जिनप्रभ सूरि - प्राचीन भारतीय तीर्थ, ऐतिहासिक भूगोल व पुराविहार)

विविध तीर्थ कल्प (आचार्य जिनप्रभ सूरि - प्राचीन भारतीय तीर्थ, ऐतिहासिक भूगोल व पुराविहार)

Vividha Tirtha Kalpa of Jinaprabha Suri

आचार्य जिनप्रभ सूरि (सम्पादक: मुनि जिनविजय) द्वारा

DevanagariSanskritpublished442 पृष्ठ

पृष्ठ 245, कुल 442 में से

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पृष्ठ 245

१६४ विविध तीर्थ-कल्प

यहाँ पर वल नामक मातंग ऋषि अमृतगंगा के तीर पर
जन्मे और तिन्दुक उद्यान मे रहे। उन्होने गण्डी तिन्दुक यक्ष को
अपने गुण गणो से आकृष्टहृदय बनाया। कौगलिक राजा की
पुत्री भद्रा ने मलक्लिन्न ऋषि को देख कर उन पर थूक दिया।
तदनन्तर उसी यक्ष ने मुनि के शरीर मे प्रविष्ट होकर उसके साथ
विवाह किया। मुनि ने उसे छोड दिया तब रुद्रदेव ने उसे यज्ञ-
पत्नी बनाया। मासक्षमण के पारणे के दिन भिक्षार्थ आये हुए
मुनि की ब्राह्मणो ने हँसी उडाई और कदर्थना भी की। यह देख
कर भद्रा ने उन्हे पहचान लिया और ब्राह्मणो को बोध दिया।
ब्राह्मणो ने क्षमायाचना कर भोजनादि प्रदान किया। देवताओ
ने गन्धोदकवृष्टि, पुष्पवृष्टि, दुन्दुभिवादन और वसुधारा वृष्टि की।
यहाँ पर—
वाणारसी पकोट्ठए पासे गोवाल भद्दसेणेय ।
णंदसिरी पउमदह रायगिहे सेणिए वीरे ॥१॥
वाराणसीय नगरी अणगार धम्मघोस-धम्मजसे;
मासस्सय पारणए गोउल गगाय अणुकम्पा ॥२॥
[भावार्थ—वाराणसी के कोष्टक चैत्य मे पार्श्वनाथ भगवान
और गोपाली आर्या के पास भद्रसेन की पुत्री नन्दश्री दीक्षित हो
पद्मद्रह मे उत्पन्न हुई, राजगृह मे वीर प्रभु ने श्रेणिक को कहा।
वाराणसी नगरी मे अणगार धर्मघोष-धर्मयश को मासक्षमण
के पारणे मे देव ने अनुकम्पा से गगापार गोकुल दिखाया।]
आवश्यक-नियुक्ति मे इसके दो सविधान है। यत —
१—इसी नगरी मे भद्रसेन नामक जीर्ण सेठ था। उसकी
भार्या नन्दा थी। उनकी पुत्री नन्दश्री विधवा थी। एक बार यहाँ
के कोष्टक चैत्य मे पार्श्वनाथ स्वामी समवसरे। नन्दश्री ने