विविध तीर्थ कल्प (आचार्य जिनप्रभ सूरि - प्राचीन भारतीय तीर्थ, ऐतिहासिक भूगोल व पुराविहार)
Vividha Tirtha Kalpa of Jinaprabha Suri
आचार्य जिनप्रभ सूरि (सम्पादक: मुनि जिनविजय) द्वारा
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स्थित राजा हरिश्चन्द्र शूकर के किए हुए उपद्रव को सुनकर
वहाँ गया और वाण के प्रहार से उसे मार डाला। उसके सशरीर
अन्तर्हित हो जाने पर अनिन्द्य चरित्र वाला राजा ज्यो ही उस प्रदेश
मे आया त्यो ही अपने वाण से प्रहत हरिणी को और उसके गलित
गर्भ को काँपते हुए देख कर कर्पिंजल और कुन्तल नामक मित्रो
के साथ इसका विचार किया। राजा अपने को गर्भहन्ता सोचता
हुआ प्रायश्चित लेने के लिए कुलपति के पास आया और नमस्कार
कर आशिष ग्रहण कर बैठा। त्यो ही वचना नामक कुलपति-कन्या
ने जोर से शोर मचाया और बोली—पिता जी ! इस पापी ने मेरी
मृगी को मार दिया है। उसके मरने से मेरा और मेरी माता का
भी मरण होगा। ऐसा सुनकर कुलपति राजा पर कुपित हो गए।
राजा कुलपति के चरणो मे गिरकर बोले-प्रभो ! मेरी सारी पृथ्वी
ग्रहण करके मुझे इस पाप से मुक्त करे। वचना को भी मरने से
निवारणार्थ मे एक लक्ष स्वर्ण मुद्रा दूँगा। उसके मानने पर
कौटिल्य ऋषि को साथ लेकर राजा अपने नगर आया फिर वसु-
भूति मंत्री और मित्र कुन्तल को सारा स्वरूप बतलाकर कोश से
लक्ष निष्क मँगाये। तब अंगारक-तापस ने स्मितपूर्वक कहा—
हमे समुद्र-मेखलापर्यन्त सारी पृथ्वी दे दी तो फिर हमारी वस्तु
ही हमे देते हो, यह कौन सा न्याय है? वसुभुति मंत्री कुछ भी
बोलने लगा तो कुलपति ने उसे शुक और कुन्तल को शाप देकर
शृगाल कर दिया, वे वन मे रहने लगे। राजा ने महीने की
अवधि माँग कर रोहिताश्व की अगुली पकड कर सुतारा के साथ
काशी की ओर चल पडा। क्रमश इस नगर मे पहुँच कर संस्था
मे रहा। वहाँ मस्तक पर तृण रखकर वज्रहृदय विप्र के हाथ देवी
सुतारा रानी और कुमार को छ हजार स्वर्ण मे बेच दिया। वह
खाडना-पीसना आदि गृहकार्य करने लगी। पुत्र भी समिधा, पत्र,
पुष्प, फलादि लाने लगा।