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सर्वकोश
विविध तीर्थ कल्प (आचार्य जिनप्रभ सूरि - प्राचीन भारतीय तीर्थ, ऐतिहासिक भूगोल व पुराविहार)

विविध तीर्थ कल्प (आचार्य जिनप्रभ सूरि - प्राचीन भारतीय तीर्थ, ऐतिहासिक भूगोल व पुराविहार)

Vividha Tirtha Kalpa of Jinaprabha Suri

आचार्य जिनप्रभ सूरि (सम्पादक: मुनि जिनविजय) द्वारा

DevanagariSanskritpublished442 पृष्ठ

पृष्ठ 250, कुल 442 में से

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पृष्ठ 250

वाराणसीनगरी-कल्प १६७
राजा के चित्त मे बडी चिन्ता थी। कुलपति स्वर्णं मांगने आ
गया। राजा ने उसे छ हजार स्वर्ण दिया। “यह तो थोडा है”
कुलपति ने कुपित होकर कहा फिर अगारक ने कहा—पत्नी और
पुत्र को किस लिए बेचा ? यहाँ के राजा चन्द्रशेखर से क्यो नही
लक्ष स्वर्ण-मुद्रा माँग लेते ?
राजा ने कहा—हमारे कुल मे ऐसा नही होता ! डोम के घर
मे भी नौकरी करके तुम्हे लक्ष स्वर्ण मुद्रा दूँगा । तब काम करने
मे प्रवृत्त होने पर चाण्डाल ने उसे स्मशान रक्षा मे नियुक्त किया।
उसके पश्चात् उन देवो ने नगर मे मारि फैला दी। एव राजा
के आदेश से मान्त्रिक लोगो ने राक्षसी प्रवाद का आरोप लगा
कर सुतारा को मण्डल मे ला कर गधे पर चढाया, शुक की भाँति
अग्नि मे कूदने पर अदग्ध रही। स्मशान में वट की शाखा से
लटकते पुरुष को तथा तट पर रोती हुई सुन्दरी को देख कर
विद्याधर के अपहार का वृत्त सुन कर उन्हे छुडाया और उसके
स्थान मे राजा ने स्वय नियुक्त होकर होमकुण्ड मे अपने मास-
खण्ड दिये थे। जैसे कुण्ड मे से मुख निकाल कर श्रृगाल रोया,
तापस ने जैसे राजा का व्रण रोहण किया था। और पुष्प ग्रहण
करते हुए रोहिताश्व को निर्दय सर्प ने डस लिया था, उसका
सस्कार करने जैसे ही रानी लाई उससे कफन माँगा था और
जैसे सत्व-परीक्षा के निर्वाह से प्रमुदित देवताओ ने अपना रूप
प्रकट किया, पुष्पवृष्टि की, जय जय ध्वनि की । सर्वजनो द्वारा
यह सात्विक-शिरोमणि है, ऐसी प्रशसा की गई। और जिस प्रकार
वहिर्मुख के मुख से, वराहादि से लगा कर पुष्पवृष्टि पर्यन्त सारी
बाते दिव्य-माया विलसित जान कर ज्यो ही चित्त मे चमत्कृत
हुआ त्यो ही स्वय को अपनी नगरी अयोध्या की सभा मे सपरि-
वार सिंहासन पर वंठे देखा । यहाँ रानी और कुमार के विक्रय से