विज्ञान भैरव तन्त्र (११२ ध्यान धारणाएँ - हिन्दी व्याख्या सहित)
Vijnana Bhairava Tantra with Hindi Commentary
भगवान भैरव / प्रो. ब्रजवल्लभ द्विवेदी द्वारा
स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास / चौखम्बा · मोतीलाल बनारसीदास / चौखम्बा · 1950 (उद्गम)
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प्राण का उदय न होने पर बिना प्रयत्न के अन्तः कुम्भक की प्राप्ति होती है। यह मध्यदशा
ही परम पद कहलाती है। प्राण-अपान की इस मध्यदशा को योगी ही जान सकते हैं। एक
त्रुटि, लव अथवा क्षण के लिये भी अन्तर्मुख हो जाने पर योगी में इस मध्यदशा का विकास
हो जाता है और तब प्राण और अपान की पुनः प्रत्यावृत्ति नहीं होती, अर्थात् वह मुक्त हो
जाता है। यह प्राणात्मक और अपानात्मक शक्ति हृदय से द्वादशान्त तक न तो जायगी और
न द्वादशान्त से हृदय की ओर वापस ही लौटेगी, जब कि मध्यनाडी का धाम (स्थान) विकल्प
हानि रूप उपाय से विकसित कर दिया जाय। प्राण और अपान की गति के शान्त हो जाने
से, हृदय और द्वादशान्त में प्राण और अपान की अस्पन्द अवस्था में स्थिति हो जाने से
१मध्यदशा का विकास होने पर साधक अपने भैरवीय स्वरूप को पहचान लेता है। वह
साक्षात् भैरव हो जाता है। ६७वें श्लोक की व्याख्या में इस विषय को अधिक विस्तार से
समझाया है। प्रत्यभिज्ञाहृदय के १८वें सूत्र में विकल्पक्षय प्रभृति मध्यविकास के उपाय बताये
गये हैं। स्पन्दकारिका में उन्मेष दशा के नाम से इसका वर्णन किया गया है। ग्रन्थ में अनेक
स्थलों पर इसकी व्याख्या हो चुकी है।
द्वादश आधार
तन्त्रशास्त्र में ऋ ॠ ऌ ॡ ये चार स्वर षण्ढ (नपुंसक) कहे गये हैं, अतः ध्यान आदि
में इनका उपयोग नहीं किया जाता। सोलह स्वरों में से इन चार षण्ढ स्वरों को निकाल देने
पर इनकी संख्या १२ रह जाती है। इन बारह स्वरों की जन्माग्र, मूल, कन्द, नाभि, हृदय,
कण्ठ, तालु, भ्रूमध्य, ललाट, २ब्रह्मरन्ध्र, शक्ति और व्यापिनी—इन बारह चक्रों या आधारों
में भावना करनी चाहिये। इन्हीं बारह स्थानों में अन्य धारणाओं का भी विधान है। किन्तु
इनके नामों में अन्तर मिलता है। जैसे कि पृ० ३७ पर जन्माग्र और मूल शब्द के स्थान पर
गुदाधार और जन्म ये नाम मिलते हैं, किन्तु पृ० ७२ पर जन्माग्र, मूल, कन्द यही क्रम स्वीकृत
है। पृ० ३३ पर हृदय से या जन्माधार से द्वादशान्त पर्यन्त प्राणशक्ति की गति मानी गई है,
पृ० ३३ पर ही कन्द से ब्रह्मरन्ध्र तक, पृ० ३५ पर जन्माग्र से द्वादशान्त तक और पृ० ७२
पर आधार से द्वादशान्त तक प्राण की गति मानी गई है। इनमें जन्माग्र और जन्म तथा मूल
और गुदाधार शब्द पर्यायवाची हैं। नेत्रतन्त्र (७।१-५) की व्याख्या में क्षेमराज ने अंगुष्ठ,
१. मध्यमधाम (सुषुम्णा) में मध्यदशा के विकास के लिये १२, २५-२७ संख्या की धारणाएँ
देखनी चाहिये। मध्यदशा का विकास अन्य स्थितियों में भी होता है। इसके लिये
३७-३८, ५१, ७८, १०० धारणाएँ देखिये।
२. प्रस्तुत ग्रन्थ में द्वादश आधारों में ब्रह्मरन्ध्र को दसवां स्थान दिया गया है और द्वादशान्त
की स्थिति इन सबके ऊपर है। व्याख्या में पृ० ३६ और ४५ पर ब्रह्मरन्ध्र पद को
द्वादशान्त का पर्यायवाची मान लिया गया है। इसकी संगति सम्प्रदाय भेद से बैठाई जा
सकती है।
Courtesy: Shri Tarun Dwivedi, Surviving Son of Late Vraj Vallabh Dwivediji (15 Jul 1926 - 17 Feb 2012)
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( २४ )
गुल्फ, जानु, मेढ्र, पायु, कन्द, 'नाडि, जठर, हृदय, कूर्मनाडी, कण्ठ, तालु, भ्रूमध्य, ललाट,
ब्रह्मरन्ध्र और द्वादशान्त ये सोलह आधार गिनाये हैं। इनके अनुसार जन्माग्र या जन्म मेढ्र
का तथा मूल या गुदाधार पायु का पर्यायवाची है। योगिनीहृदय के टीकाकार अमृतानन्द
(पृ० ५९) और भास्करराय ने कन्द को सुषुम्णा नाडी का मूल स्थान और उसमें रहने वाली
कुण्डलिनी शक्ति का पर्यायवाची माना है। ब्रह्मरन्ध्र के ऊपर यहाँ शक्ति और व्यापिनी का
स्थान माना गया है। योगिनीहृदय (१।२५-३४) में अकुल, विष, वह्नि, शक्ति, नाभि,
अनाहत (हृदय), विशुद्धि, लम्बिकाग्र, भ्रूमध्य (आज्ञा) के ऊपर ललाट में क्रमशः एक दूसरे के
ऊपर बिन्दु, अर्धचन्द्र, रोधिनी, नाद, नादान्त, शक्ति, व्यापिनी, समना और उन्मना की
स्थिति मानी गई है। शिवोपाध्याय ने इस विषय को अधिक स्पष्ट किया है। प्रणव की बारह
कलाओं की स्थिति बताते हुए वे कहते हैं कि अकार की नाभि में, उकार की हृदय में, मकार
की मुख में, बिन्दु की भ्रूमध्य में, अर्धचन्द्र की ललाट में, निरोधिनी की ललाट के ऊर्ध्व भाग
में, नाद को शिर में, नादान्त की ब्रह्मरन्ध्र में, शक्ति की त्वक् में, व्यापिनी की शिखा के
मूल में, समना की शिखा में और उन्मना की स्थिति शिखा के अन्तिम भाग में है। शिवो-
पाध्याय ने यहाँ (पृ० ३७) सोलह भूमियों का उल्लेख किया है। ऊपर गिनाये गये सोलह
आधारों से इनकी कोई संगति नहीं बैठती। कुलागम संमत सोलह आधारों की चर्चा ६७वें
श्लोक में आई है। इनका विस्तृत वर्णन भी नेत्रतन्त्र (७।१-५) की क्षेमराज कृत व्याख्या में
मिलता है। नामों में भिन्नता होते हुए भी इनका क्रम योगिनीहृदय से मिलता है। अधिक
जानकारी के लिये इस विषय को वहीं देखना चाहिये।
द्वादशान्त
प्राण और अपान की गति की जिस स्थान पर उत्पत्ति होती है अथवा जहाँ जाकर
रुक जाती है, उसको हृदय और द्वादशान्त कहते हैं। बाह्य और आन्तर शिव द्वादशान्त और
शक्ति द्वादशान्त के भेद से द्वादशान्त की स्थिति मानी गई है। कभी-कभी शून्यातिशून्य
मध्यधाम, अर्थात् सुषुम्णा नाडी को भी द्वादशान्त कहा जाता है। जैसा कि ४९वें श्लोक की
व्याख्या में किया गया है। तन्त्रालोक (५।७१) की टीका में २सभी नाड़ियों के अग्र भाग में
१. नाडि के स्थान पर नाभि शब्द अधिक संगत प्रतीत होता है। अथवा नाभि सभी नाड़ियों
का केन्द्र स्थल है, अतः इसी अभिप्राय को व्यक्त करने के लिये यहाँ नाभि को नाडि
शब्द से अभिहित किया गया है।
२. "सर्वनाडीनामग्रगोचरे प्रधाने पार्यन्तिके वा विषये द्वादशान्ते।" द्वादशान्त पद की
व्याख्या करते हुए शिवोपाध्याय कहते हैं—"सर्वतो रोमकूपान्तरेष्वपि चैतन्यदेवस्य
प्रवेशेन शरीरे द्वादशान्तो योऽस्ति" (पृ० ४३) इसके अनुसार शरीर के प्रत्येक रोम-
कूप में द्वादशान्त की स्थिति मानी गई है। यहाँ द्वादशान्त पद का प्रयोग लाक्ष-
णिक है। जैसे मुख्य द्वादशान्त की स्थिति द्वादश आधारों के अन्त में है, इसी तरह सभी
नाड़ियों के अन्त (रोमकूप) में भी प्राणशक्ति की स्थिति है। अतः यहाँ विद्यमान प्राण-
शक्ति को भी द्वादशान्त कह दिया जाय तो कोई अनौचित्य नहीं है।
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द्वादशान्त की स्थिति मानी गई है । १हकार की उत्पत्ति हृदय में और सकार की उत्पत्ति
द्वादशान्त में मानी जाती है ।
हृदय स्थित कमलकोश में प्राण का उदय होता है । नासिका मार्ग से बाहर निकल कर
यह बारह अंगुल चल कर अन्त में आकाश में विलीन हो जाता है । इसी लिये बाह्य आकाश
योगशास्त्र में द्वादशान्त के नाम से प्रसिद्ध है । द्विषट्कान्त, मुष्टित्रयान्त या शिखान्त शब्द
द्वादशान्त के पर्यायवाची हैं । नेत्रतन्त्र (८।४१) की टीका में क्षेमराज ने तथा तन्त्रालोक
(५।८९-९१) की टीका में जयरथ ने द्वादशान्त पद का अर्थ ऊर्ध्व द्वादशान्त किया है, जिसकी
कि स्थिति शिखा के अन्त में है । इसमें उन्मना शक्ति का निवास है । इस प्रकार इस शास्त्र में
द्वादशान्त की स्थिति ब्रह्मरन्ध्र से पृथक् मानी गई है । इसको द्वादशान्त इस लिये कहते हैं कि
द्वादश आधारों के अन्त में इसकी स्थिति है ।
निर्विकल्प योगी द्वादशान्त के भी ऊपर स्थित परमाकाश में जब पहुँच जाता है, तो
सर्वात्मता का विकास हो जाता है, वह अनुत्तर शून्य में लीन हो जाता है । योगिनीहृदय
(१।२७, ३४) में इसको महाबिन्दु कहा गया है । वहां आज्ञाचक्र तक की स्थिति को सकल,
उन्मना पर्यन्त स्थिति को सकल-निष्कल और महाबिन्दु को निष्कल माना गया है । इस निष्कल
स्वरूप में भगवती त्रिपुरसुन्दरी निवास करती है । यही वह शक्ति तत्त्व है, जिसकी कि सहायता
के बिना शिव निष्प्राण (शव) रहता है । इसी निष्कल स्वरूप को प्रस्तुत ग्रन्थ में पराशक्ति और
शिव का मुख कहा गया है । इस निष्कल (परा) शक्ति की सहायता से ही शिव स्वरूप की
अभिव्यक्ति हो सकती है ।
प्राण और अपान
ऊपर हृदय से बाह्य द्वादशान्त तक जाने वाला प्राण और नीचे बाह्य द्वादशान्त से
हृदय तक आने वाला जीव नामक अपान, यह प्राणशक्ति का उच्चारण है । प्राणशक्ति इनका
निरन्तर उच्चारण करती रहती है, अर्थात् प्राण और अपान के रूप में स्पन्दित होती रहती
है । स्वच्छन्दतन्त्र २ में प्राण और अपान को प्राणशक्ति का विसर्ग और आपूरण व्यापार बताया
गया है । तदनुसार प्राण का अर्थ है श्वास छोड़ना और अपान का अर्थ है श्वास लेना । पालि
बौद्ध वाङ्मय में इनके लिये आनापान (आश्वास-प्रश्वास) शब्द प्रयुक्त है । किन्तु वहां इनके
१. "हकारस्तु स्मृतः प्राणः स्वप्रवृत्तो हलाकृतिः" (४।२५७) स्वच्छन्दतन्त्र के इस वचन
में स्वाभाविक रूप से निरन्तर नदन करने वाले हलाकृति प्राण को ही हकार कहा गया
है । अनच्क हकार की आकृति वाले प्राण का यह नदन व्यापार ही हंसोच्चार कहलाता
है । इसी को अनाहत ध्वनि अथवा नादभट्टारक भी कहा जाता है । यही हृदय का
स्वाभाविक स्पन्दन व्यापार है । ५७ वीं धारणा में इसी का वर्णन किया गया है ।
२. प्राणापानमयः प्राणो विसर्गापूरणं प्रति ।
नित्यमापूरयन्नेव प्राणिनामुरसि स्थितः ॥
प्राणनं कुरुते यस्मात् तस्मात् प्राणः प्रकीर्तितः । (७।२५-२६)
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( २६ )
अर्थ के विषय में विवाद है, जिसको कि चर्चा पृ० २९-३० की टिप्पणी में की गई है। योगभाष्य
में वायु के आचमन (ग्रहण) को श्वास और निःसारण को प्रश्वास बताया गया है। विज्ञान-
भैरव में प्राण और अपान शब्द का योगभाष्य संमत (श्वास-प्रश्वास) अर्थ करने से भ्रम हो
सकता है।
आचार्य बुद्धघोष का कहना है कि बालक माता की कोख से बाहर आता है तो पहले
भीतर की हवा बाहर जाती है और पीछे बाहर की हवा भीतर प्रवेश करती है इसके अनुसार
आश्वास (आन = प्राण) वह वायु है, जिसका कि निःसारण होता है और प्रश्वास वह वायु
है, जिसका कि ग्रहण होता है। विज्ञानभैरव के 'ऊर्ध्वे प्राणः' प्रभृति श्लोक में प्राण और अपान
शब्द का यही अर्थ स्वीकृत है। ऊर्ध्व और अधः शब्द का अर्थ पहले और बाद में किया
जाना चाहिये। पहले प्राण बाहर निकलता है और बाद में अपान का प्रवेश होता है। अपान
को जीव इसलिये कहा जाता है कि प्राण के बाहर निकलने के बाद अपान जब शरीर में पुनः
प्रविष्ट होता है, तभी वह बोध हो सकता है कि शरीर में जीवात्मा विद्यमान है। अपान के
प्रवेश न करने पर शरीर शव कहा जायगा। अपान के कारण ही शरीर में जीवात्मा की
स्थिति बनी रहती है, अतः स्वाभाविक है कि अपान को जीव के नाम से जाना जाय।
ऊपर उद्धृत स्वच्छन्दतन्त्र भी इसी स्थिति को मान्यता देता है। "प्राणापानौ समौ
कृत्वा" इस गीता वचन में भी यही अर्थ स्वीकृत है। इसका उल्लेख हम पृ० ९२ की
टिप्पणी में कर चुके हैं। श्रीधरी टीका में प्राण और अपान के लिये उच्छ्वास और निश्वास
शब्द प्रयुक्त हैं। लोक व्यवहार में संकेत (शक्ति=समय) के अनुसार शब्दों के अर्थ बदलते
रहते हैं। कभी-कभी ये परस्पर विरोधी अर्थों में भी प्रयुक्त होने लगते हैं। जैसा कि प्राण
और अपान और उनके पर्यायवाची श्वास-प्रश्वास शब्दों के सम्बन्ध में यहाँ देखा जाता है।
इन शब्दों का हृदय स्थित प्राण वायु और पायु स्थित अपान वायु से कोई सम्बन्ध नहीं है,
किन्तु प्राणशक्ति की श्वास-प्रश्वास प्रक्रिया से इनका सम्बन्ध है। 'प्राणशक्ति की प्राण,
१. ईश्वरप्रत्यभिज्ञाकार ने 'प्राणापानमयः प्राणः' (३।२।१९) इत्यादि में प्राण प्रभृति पाँच
वायुओं का वर्णन करते हुए प्राण वायु को प्राणापानमय माना है। वस्तुतः यहाँ पर प्राण
वायु के लिये प्राण शब्द का प्रयोग लाक्षणिक है, क्योंकि प्राण वायु की स्थिति केवल
प्राणापानमय प्राण में है, जब कि प्राणशक्ति की स्थिति पूरे शरीर में है। अथवा सामान्य
स्पन्द को प्राणशक्ति का तथा प्राणापान को प्राण वायु का व्यापार मानना उचित
होगा। प्राण वायु में भी प्राणशक्ति का आरोप इस लिये किया जा सकता है कि प्राणा-
पान व्यापार के चलते रहने पर ही सामान्य स्पन्द भी चलता रहता है। किन्तु इतना
ध्यान रखना चाहिये कि प्राणापान व्यापार के आरम्भ होने से पहले और अन्त में भी
मुख्य स्पन्द की ही स्थिति रहती है। स्पन्दनिर्णय (पृ० ४०-४१) में बताया गया है कि
विज्ञानभैरव के ७०, ९९, और ११६ संख्या के श्लोकों में स्पन्द तत्त्व सम्बन्धी धारणाएं
वर्णित हैं।
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( २७ )
अपान प्रभृति पाँच या दस वृत्तियाँ इनसे भिन्न हैं। अतः प्रस्तुत ग्रन्थ में ऊपर उद्धृत प्रमाणों
के अनुसार प्राण और अपान शब्दों का संबन्ध प्राणशक्ति की विसर्ग (त्याग) और आपूरण
(ग्रहण) क्रियाओं से ही मानना चाहिये ।
पृ० ९२ पर बताया गया है कि प्राण की उच्छ्वास दशा में स्वाभाविक रूप से हं
का तथा निश्वास दशा में सः का उच्चारण होता है। इस बात को पुष्ट करने के लिये 'सका-
रेण बहिर्याति' प्रभृति विज्ञानभैरव के श्लोक को उद्धृत किया गया है। तदनुसार यह प्राण
सकार के साथ बाहर निकलता है और हकार के साथ अपान पुनः प्रविष्ट होता है। यहाँ
प्रश्न उठता है कि हंसगायत्री में विद्यमान सकार प्राण और प्रकाश (सूर्य अथवा दिन) का
प्रतिनिधित्व करता है तथा हकार जीव (अपान) तथा क्षपा (रात्रि) का, तो स्वच्छन्दतन्त्र में
प्रतिपादित इस स्थिति से संगति कैसे बैठेगी कि प्राण निरन्तर अनाहतनाद रूप अनच्क हकार
का उच्चारण (हंसोच्चार) करता रहता है। शक्तिसंगम तन्त्र में "हकारेण बहिर्याति सकारेण
विशेत् पुनः" (१ ३.७८) ऐसा पाठ है। इसका उत्तर ८० वें श्लोक की व्याख्या में दे दिया
गया है कि खेचरी मुद्रा की साधना में जिह्वा के तालु प्रदेश में रहने से सकार का बहिर्गमन
नहीं होने पाता, अर्थात् सकार का उच्चारण नहीं हो सकता। अतः उस अवस्था में
केवल स्वर रहित हकार का उच्चारण होता है। इसका अभिप्राय यह है कि नादात्मक अनच्क
हकार का उच्चारण प्राणशक्ति का व्यापार है। इसको स्वच्छन्दतन्त्र में हंसोच्चार कहा
गया है। हंसगायत्री के अंगभूत सकार और हकार का उच्चारण प्राण वायु की प्राण और
अपान शक्तियों का व्यापार है। प्राण के बाहर निकलते समय ही सकार का उच्चारण होता
है। इस व्याख्या के अनुसार शक्तिसंगम के वचन की कोई संगति नहीं बैठती। किन्तु १५१
वें श्लोक की व्याख्या में बताया गया है कि मध्यनाडी सुषुम्णा के सहारे प्राण जब हृदयाकाश
से ऊपर की ओर चढ़ता है, तब 'हं' वर्ण की उत्पत्ति होती है और जब वह द्वादशान्त से
उतरता है, तो उसकी अपान दशा में 'सः' वर्ण उत्पन्न होता है। इस कथन की पृष्ठभूमि में
शक्तिसंगम के वचन की संगति इस प्रकार बैठाई जा सकती है कि प्राण हकार के उच्चारण
के साथ हृदय से बाहर निकल कर द्वादशान्त में प्रविष्ट होता है और अपान सकार के उच्चा-
रण के साथ पुनः हृदय में प्रविष्ट होता है। हंसगायत्री का आध्यात्मिक स्वरूप भी यही है।
इसका विवेचन यहाँ अनेक श्लोकों की व्याख्या में विशेष कर १५१ वें श्लोक की व्याख्या में
किया जा चुका है।
१५२ वें श्लोक में सकार और हकार के संमिलन से महानन्द की उत्पत्ति की बात कही
गई है। इसका अभिप्राय यह है कि उक्त प्रक्रिया के अभ्यास से "प्राणापानौ समो कृत्वा"
इस भगवद्गीता के वचन के अनुसार प्राण और अपान की गति जब समान हो जाती है, मध्य-
नाडी सुषुम्णा के माध्यम से द्वादशान्त में विलीन हो जाती है, तो सच्चिदानन्दघन स्वात्म-
ज्योति प्रकाशित हो उठती है। साधक स्वात्मस्वरूप में लीन हो जाता है।
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प्राणायाम
प्राण की पूरक, कुम्भक और रेचक अवस्थाएँ स्वाभाविक रूप से बिना प्रयत्न के
निरन्तर गतिशील रहती हैं । हृदय स्थित कमलकोश में प्राण का उदय होता है । नासिका
मार्ग से बाहर निकल कर यह बारह अंगुल चलकर अन्त में आकाश में विलीन हो जाता है ।
यह बाह्य आकाश योगशास्त्र में बाह्य द्वादशान्त के नाम से प्रसिद्ध है । प्राण की इस
स्वाभाविक गति को रेचक कहते हैं । बाह्य द्वादशान्त में अपान का उदय होता है और नासिका
मार्ग से ही चलकर यह हृदय स्थित कमलकोश में विलीन हो जाता है । अपान की यह
स्वाभाविक आन्तर गति पूरक कही जाती है। प्राण द्वादशान्त में और अपान हृदय में क्षण मात्र
के लिये विलीन हो जाता है । यही प्राण की कुंभक अवस्था है । बाहर और भीतर दोनों
स्थलों में निष्पन्न होने से इसके बाह्य और आन्तर ये दो भेद होते हैं । इस तरह से प्राणशक्ति
की ये चार क्रियाएँ बिना प्रयत्न के निरन्तर गतिशील हैं । अर्थात् प्राण और अपान की यह
चतुर्विध गति पुरुष के प्रयत्न के बिना निरन्तर स्वाभाविक रूप से चलती रहती है । पुरुष जब
अपने विशेष प्रयत्न से मध्यदशा के विकास के लिये क्रमशः अथवा एकाएक इसकी गति को
रोकता है, इस पर अपना नियन्त्रण स्थापित करना चाहता है, तो प्राण और अपान की गति
की यह अवरोध प्रक्रिया योगशास्त्र में प्राणायाम के नाम से जानी जाती है । २५, ६६ और
८८ वें श्लोक की व्याख्या में प्राणायाम के सम्बन्ध में विस्तार से विचार किया गया है ।
सहज योग में प्राणायाम के इस आयास साध्य अभ्यास की आवश्यकता नहीं रहती ।
वहाँ तो श्वास-प्रश्वास प्रक्रिया के माध्यम से निरन्तर चल रहे प्राण के आयाम (विस्तार)
का केवल सूक्ष्म निरीक्षण किया जाता है । जैसा कि २५वें श्लोक की व्याख्या में बताया
गया है ।
क्षोभ
मन की चंचलता को क्षोभ कहते हैं । ७३वें श्लोक में मन की किसी भी आह्लादात्मक
स्थिति में धारणा के अभ्यास की विधि बताई गई है । शर्त यह है कि यह आह्लादात्मक
स्थिति क्षोभ से न पैदा हुई हो । शिवोपाध्याय (पृ० ६३) ने क्षोभ दशा का विस्तार से वर्णन
किया है । इस स्थिति को हेय माना गया है । स्पन्दकारिका में कहा गया है कि क्षोभ दशा
का विराम हो जाने पर ही परम पद की प्राप्ति होती है । काम, क्रोध आदि से उत्पन्न होने
वाले सभी आवेग क्षोभ कहलाते हैं । इनके शान्त होने पर ही निर्विकल्प स्वात्मस्वरूप प्रका-
शित होता है । क्षोभ की उत्पत्ति विकल्प दशा में ही होती है । विकल्प व्यापार के शोधन के
प्रसंग में प्रशस्तिभूतिपाद ने कहा है कि इस संसार में अपनी सुन्दर, लुभावनी आकृति के
कारण मन को आह्लादित कर देने वाले जो भी पदार्थ दिखाई पड़ते हैं, उन सब में मेरा
अपना ही स्वरूप तो प्रकाशित हो रहा है, वह सब मैं ही तो हूँ, इस तरह से अपनी स्थिति
को पुष्ट करना ही सज्जनों का पुनीत कर्तव्य है । सभी पदार्थों में इस तरह से स्वात्मस्वरूप
की भावना से मन का क्षोभ (चंचलता) शान्त हो जाता है ।
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६९वें श्लोक की व्याख्या में अभिनवगुप्त के प्रमाण से बताया गया है कि उन्मुक्त
बाह्य शाक्त स्पर्श के अभाव में भी आन्तर शाक्त स्पर्श के कारण वीर्य का क्षोभ, आनन्दोदय
अवस्था की अभिव्यक्ति होती है। इस स्थिति में भी बाह्य क्षोभ की शान्ति अपेक्षित है । तभी
लौकिक आनन्द से विलक्षण आनन्दोदय अवस्था, ब्रह्मानन्द दशा का प्रादुर्भाव हो सकता है ।
७५, ८६-८७, ९०-९१ और १०३ संख्या की धारणाओं में इस बाह्य क्षोभ की शान्ति के
लिये ही उपाय वर्णित है ।
विकल्प
बाह्य नील-पीत (घट-पट) आदि से लेकर शून्य पर्यन्त सभी पदार्थ विकल्प स्वरूप
माने गये हैं। अहं परामर्श दो प्रकार का होता है—शुद्ध और मायीय । इनमें से शुद्ध परामर्श
विश्व से अभिन्न रूप में विद्यमान संविन्मात्र में अथवा विश्व की छाया से असंस्पृष्ट स्वच्छ
आत्मा में होता है। मायीय अथवा अशुद्ध परामर्श वेद्यस्वरूप देह, बुद्धि, प्राण, शून्य आदि
को अपना आलम्बन बनाता है, अर्थात् इन्हीं को अपना स्वरूप मान बैठता है। इनमें से शुद्ध
परामर्श में किसी प्रतियोगी (विरोधी) पदार्थ की सत्ता न रहने से कोई भी अपोहनीय
(त्याज्य) नहीं है । घट प्रभृति बाह्य पदार्थ भी उस प्रकाशस्वरूप परम तत्त्व से ही अपना
अस्तित्व बनाते हैं, अतः वे उससे अभिन्न ही हैं, उसके विरोधी नहीं। इस अवस्था में जब
कोई स्थिति अपोहनीय नहीं है, तो वह विकल्प कैसे हो सकती है ? इसके विपरीत अशुद्ध
(मायीय) परामर्श से वेद्यरूप शरीर प्रभृति में उससे भिन्न देह आदि का और घट प्रभृति
का भी व्यपोहन (व्यवच्छेद = भेद) विद्यमान है । इसी भेद दशा की प्रतीति को विकल्प के
नाम से जाना जाता है ।
अपोहन
परमार्थतः अपोहन व्यापार की कोई स्थिति नहीं है, किन्तु जागतिक व्यवहार का
संचालन ज्ञान, स्मृति और अपोहन नाम की शक्तियों के सहारे चलता है । “मत्तः स्मृतिर्ज्ञान-
मपोहनं१ च” (भ०गी० १५।१५), “स्यादेकश्चिद्रपुर्ज्ञानस्मृत्यपोहनशक्तिमान्” (ई०प्र० १।३।७)
इत्यादि वचनों में इन्हीं व्यापारों की चर्चा की गई है । बौद्ध दर्शन में भी एक पदार्थ से
दूसरे पदार्थ को अलग करने के लिये, एक पदार्थ से दूसरे पदार्थ का भेद बताने के लिये
अपोह की कल्पना की गई है । बौद्ध विज्ञानवाद और शून्यवाद में भी विज्ञान अथवा शून्य के
अतिरिक्त सभी जागतिक पदार्थ विकल्प स्वरूप ही माने गये हैं ।
१. काश्मीरी लेखकों के सिवाय अन्य सभी टीकाकारों ने अपोहन का अर्थ ज्ञान और स्मृति
का प्रमोष किया है। रामानुजाचार्य के मत का उल्लेख षडंग योग के प्रकरण में तर्क पर
विचार करते समय किया जायगा ।
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विज्ञान
विज्ञानभैरव संमत विज्ञान की व्याख्या पहले की जा चुकी है, किन्तु ७४वीं धारणा
बौद्ध संमत विज्ञान को अपना विषय बनाती है। विज्ञानवादी बौद्ध दार्शनिक मानते हैं कि
घट आदि के ज्ञान का कोई आधार नहीं है, क्योंकि वस्तुतः किसी स्थिर आत्मा अथवा घट
आदि वस्तुओं की कोई वास्तविक सत्ता नहीं है। चक्षु, आलोक (प्रकाश) आदि पदार्थों की
भी वास्तविक सत्ता नहीं है। इसलिये यह सब कुछ भ्रमात्मक है, अत एव विकल्पस्वरूप है।
‘यह वही घट है’ इस तरह का ज्ञान ‘यह वही गंगा का प्रवाह है’ इस ज्ञान की तरह भ्रमा-
त्मक ही माना जायगा। अर्थात् गंगा के प्रवाह में जैसे ‘यह वही प्रवाह है’ यह प्रत्यभिज्ञा
भ्रान्ति-कल्पित है, उसी तरह से घट, पट, देवदत्त आदि की प्रत्यभिज्ञा को भी भ्रमात्मक
ही मानना चाहिये। इस तरह से अन्ततः सब कुछ विज्ञानात्मक ही सिद्ध होता है। इस
विज्ञान के अतिरिक्त अन्य किसी की भी सत्ता वास्तविक नहीं है।
शून्य
शून्य और शून्यातिशून्य (महाशून्य) शब्दों का यहाँ अनेक अर्थों में प्रयोग हुआ है।
आणव उपाय और मध्यनाडी सुषुम्णा के प्रसंग में आये इन शब्दों की व्याख्या पहले की जा
चुकी है। स्वच्छन्दतन्त्र (७।५७) की टीका में क्षेमराज ने शून्य को माया का और शून्याति-
शून्य को महामाया का बोधक माना है। समना पर्यन्त ¹अर्धमात्रा की स्थिति शून्य में और
उन्मना की स्थिति शून्यातिशून्य पदवी में मानी गई है। मध्य धाम सुषुम्णा और शिव तत्त्व
के अर्थ में भी क्रमशः शून्य और शून्यातिशून्य शब्दों का प्रयोग मिलता है। ३५वें श्लोक में
मध्यनाडी के भीतर चिदाकाश रूप शून्य का निवास माना गया है। ३९वें श्लोक में शून्याति-
शून्य के उच्चारण का तात्पर्य उन्मना पर्यन्त पिण्ड मन्त्र के उच्चारण के अभ्यास से है।
४२वें श्लोक में उन्मना की स्थिति शून्यावस्था में मानी गई है और उसको ‘शून्या’ कहा गया
है। इसी स्थल पर शिव तत्त्व को शून्यातिशून्य बताया है। ४९वें श्लोक में द्वादशान्त पद
का अर्थ शून्यातिशून्य मध्यधाम, अर्थात् सुषुम्णा नाडी किया है। कुण्डलिनी शक्ति अथवा
प्राणकुण्डलिनी मध्यनाडी सुषुम्णा के सहारे द्वादशान्त नामक शून्यातिशून्य धाम में पहुँचती
है। इसलिये औपचारिक रूप से यहाँ उसको भी शून्यातिशून्य कह दिया गया है। वस्तुतः
इस शब्द का मुख्य प्रयोग द्वादशान्त धाम या उसमें अभिव्यक्त होने वाले शिवस्वरूप के लिये
ही होता है। ६१वें श्लोक में मध्य धाम को शून्य स्वरूप बताया है और १४६वें श्लोक में
महामाया शक्ति को महाशून्य, अर्थात् शून्यातिशून्य पदवी कहा है।
विज्ञानभैरव संमत शून्य तत्त्व परमार्थतः अभावात्मक नहीं है, किन्तु ²सभी आलम्बन
धर्मों से, सभी तत्त्वों से और सभी क्लेशाशयों से शून्य पदार्थ को ही ‘शून्य’ कहा गया है।
१. दुर्गा सप्तशती की टीका में भास्करराय ने भी अर्धचन्द्र प्रभृति आठ ध्वनियों को अर्धमा-
त्रात्मक और अनुच्चार्य माना है।
२. “सर्वालम्बनधर्मैश्च सर्वतत्त्वैरशेषतः। सर्वक्लेशाशयैः शून्यं न शून्यं परमार्थतः ॥” शैवागम
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( ३१ )
इस तरह से किसी अवर्णनीय, अविज्ञेय अवस्था (स्वातन्त्र्य शक्ति) को ही शाक्त और शैव
मत में शून्यता माना गया है । इसका विवरण १२४वें श्लोक की व्याख्या में विमर्शदीपिका१
के और १३१वें श्लोक की व्याख्या में चन्द्रज्ञान२ के प्रमाण पर विस्तार से किया गया है ।
१५१वें श्लोक की व्याख्या में परा देवी को निरावरण भगवती प्रज्ञा पारमिता कहा गया है ।
प्रज्ञा पारमिता स्वरूप शून्यभूमि का ही इस विज्ञानभैरव तन्त्र में परमशिव ने परा शक्ति के
रूप में सर्वत्र उपदेश किया है। ११० धारणाओं के प्रतिपादक प्रत्येक श्लोक के चतुर्थ चरण
में परा देवी का निष्कल स्वरूप आलोकित हो उठता है । बौद्ध दर्शन में इस शून्यभूमि को
ही मोक्ष मान लिया गया है, किन्तु यह स्मरण रखना चाहिये कि इस ग्रन्थ में परा शक्ति को
शिवस्वरूप की प्राप्ति के लिये मुख (द्वार) माना है । इस विषय का विवेचन पहले किया
जा चुका है ।
शून्यषटक
३२वें श्लोक में शून्यषट्क की और ४४वें श्लोक में शून्यत्रय की भावना का विधान
है । स्वच्छन्दतन्त्र (४।२८९-२९६) और योगिनीहृदय (३।१७७-१७८) में शून्यषट्क का
विवरण मिलता है । ३२वें श्लोक की व्याख्या में योगिनीहृदयदीपिका के अनुसार हीं बीज में
छः शून्यों की स्थिति का विवरण दिया जा चुका है । दीपिकाकार ने बताया है कि छः शून्यों
का स्वरूप विज्ञानभैरव के ३२वें श्लोक से जानना चाहिये । स्वच्छन्दतन्त्र में पहले ऊर्ध्व
शून्य, अधः शून्य और मध्य शून्य ये तीन शून्य प्रतिपादित हैं । ४४वें श्लोक की टीका में
उद्धृत वासुदेव के वचन में भी ये ही तीन शून्य गिनाये गये हैं । क्षेमराज ने नादान्त पर्यन्त
समस्त पाशों के क्षय के कारणभूत शक्ति पद को ऊर्ध्व शून्य, हृदय को अधः शून्य और कण्ठ,
तालु, भ्रूमध्य, ललाट, ब्रह्मरन्ध्र को मध्य शून्य माना है । व्यापिनी में चतुर्थ, समना में
संमत शून्य का लक्षण बताने वाला यह श्लोक शिवोपाध्याय द्वारा उद्धृत है (पृ० ११०) ।
नील-पीत, घट-पट प्रभृति बाह्य और सुख-दुःख प्रभृति आन्तर पदार्थों को आलम्बन धर्म
कहा जाता है । योगसूत्र (२।३) में अविद्या, अस्मिता, राग, द्वेष और अभिनिवेश—ये
सब क्लेश माने गये हैं । क्लेशाशय का तात्पर्य इन्हीं के संस्कारों (वासनाओं) से है, जो
कि चित्त में संचित रहते हैं । योगसूत्र (१।२४) में ही ईश्वर को क्लेश, कर्म, विपाक
और आशय से मुक्त माना है ।
१. तान्त्रिक साहित्य (पृ० ५९६) में शिवोपाध्याय कृत विज्ञानभैरव की टीका का नाम
विमर्शदीपिका बताया गया है । शिवोपाध्याय ने विज्ञानभैरव की अपनी टीका (पृ०
११०-१११) में विमर्शदीपिका का नाम लेकर ये श्लोक उद्धृत किये हैं । अतः विमर्श-
दीपिका इससे भिन्न एक स्वतन्त्र ग्रन्थ है ।
२. चन्द्रज्ञान और चन्द्रज्ञानविद्या के परिचय के लिये नित्याषोडशिकार्णव का उपोद्घात
(पृ० २६-२७) तथा तान्त्रिक साहित्य (पृ० २०४-२०५) देखिये ।
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( ३२ )
पंचम और उन्मना में षष्ठ शून्य की स्थिति मानी गई है। ये सभी शून्य सामय (सहेतुक)
माने गये हैं। इनका परित्याग कर सप्तम शून्य में लीन होने का साधक को प्रयत्न करना
चाहिये। यह सप्तम शून्य परम सूक्ष्म है, सभी अवस्थाओं से अतीत है। वस्तुतः यह चिदा-
नन्दघन परमशिव तत्त्व शून्य नहीं है, तो भी इसको शून्य कह दिया जाता है। शून्य
अभावात्मक होता है। इस शिवतत्त्व को शून्य इसलिये कहा जाता है कि यहाँ आकर सभी
जागतिक पदार्थों का क्षय (अभाव) हो जाता है। इस तरह से अभावात्मक शून्यों की संख्या
छः ही है। यह सप्तम शून्य अभावात्मक नहीं है। अतः इसके कारण अभावात्मक शून्यों की
संख्या में वृद्धि न होने से शास्त्रों में छः ही शून्य माने गये हैं। वस्तुतः शिवतत्त्व महासत्ता-
त्मक, प्रकाशात्मक, परम शान्त कोई स्वरूप है। पूर्वोक्त सभी शून्यों में यह व्याप्त है, अर्थात्
यही एक तत्त्व उपाधि के भेद से सभी शून्यों में वर्तमान है।
इस प्रकार हमने यहाँ विज्ञानभैरव में वर्णित धारणाओं के सभी प्रमुख विषयों का
संक्षेप में स्पष्टीकरण किया है। हमने प्रारम्भ में ही बताया है कि यह एक योगशास्त्र का
ग्रन्थ है। अब हम इस विषय पर विचार करते हैं कि यह योगशास्त्र क्या है ?
योगशास्त्र क्या है ?
आस्तिक-नास्तिक, वैदिक-अवैदिक, सभी भारतीय दर्शनों में अपने अन्तिम लक्ष्य तक
पहुँचने में योगशास्त्र की सहायक भूमिका स्वीकार की गई है। प्रत्येक दर्शन में परम तत्त्व
के निरूपण के साथ-साथ उस स्थिति तक पहुँचने के लिये शरीर और मन की शुद्धि आवश्यक
मानी गई है। शरीर और विशेष कर मन की शुद्धि यौगिक प्रक्रिया के आधार पर ही की
जा सकती है। अतः अनिवार्य रूप से प्रत्येक दर्शन में योग का निरूपण पाया जाता है।
प्रत्येक दर्शन की विशेष यौगिक प्रक्रिया भी हो सकती है, किन्तु कुछ सामान्य नियम सर्वत्र
एक स्वर से मान्य हैं, जिनका कि पातंजल योगसूत्र में विस्तार से प्रतिपादन किया गया है।
इस प्रकार योगशास्त्र को हम सर्वसामान्य अथवा आज की भाषा में धर्म-निरपेक्ष शास्त्र कह
सकते हैं, जिसमें कि बिना किसी धार्मिक या लिंग-जाति आदि के भेद-भाव के मानव मात्र
के शारीरिक परिष्कार के साथ-साथ मन के भी परिष्कार का मार्ग दिखाया गया है।
आज कल योग शब्द को पातंजल योग दर्शन तक ही सीमित कर दिया गया है,
किन्तु वास्तव में बात ऐसी नहीं है। भारतवर्ष में विविध योग-सम्प्रदाय समय-समय पर
प्रचलित हुए हैं। उनमें से कुछ अब भी प्रचलित हैं और अनेक नामशेष हो गये हैं। मोहेंजो-
दड़ो और हड़प्पा की खुदाई में सिन्धु-सभ्यता के अवशेष प्राप्त हुए हैं। इनमें प्राचीन भारतीय
योगपद्धति के अनेक चिह्न मिलते हैं। श्वेत से लेकर लकुलीश पर्यन्त २८ पाशुपत योगाचार्यों
की और इनमें से प्रत्येक के चार-चार शिष्यों, अर्थात् ११२ योगियों की नामावली अनेक
पुराणों में उपलब्ध है। पालि त्रिपिटक में, विशेषतः परवर्ती काल के विशुद्धिमग्गो और
अभिधम्मत्थसंगहो जैसे ग्रन्थों में विशिष्ट यौगिक पद्धति के दर्शन होते हैं। तान्त्रिक षडंग
योग का शैव, वैष्णव और बौद्ध तन्त्रों में प्रायः समान रूप से वर्णन मिलता है। मत्स्येन्द्रनाथ
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( ३३ )
के द्वारा आविष्कृत कौलिक योग-विधि में पिण्ड, पद, रूप और रूपातीत—इन चार तत्त्वों
का वर्णन है । यह योग-विधि जैन योगशास्त्र के ग्रन्थों में भी मिलती है । कुण्डलिनी योग का
बौद्ध वज्रयानी साहित्य में भी नामान्तर से वर्णन मिलता है । षोडश नित्याओं की उपासना
और प्राण-चार विधि में कालचक्र यान का और त्रिक दर्शन की अनुपाय प्रक्रिया में सहज यान
का स्वरूप देखा जा सकता है । गोरक्ष प्रभृति नाथ योगियों के सम्प्रदाय में नेति, धौति
प्रभृति यौगिक षट्कर्म विधियों तथा विविध बन्धों का परिचय मिलता है । इन्हीं सब यौगिक
विधियों की शाखा-प्रशाखाएँ भारतवर्ष के विविध भागों में सहज, अवधूत, बाउल, पंचसखी,
सन्त, सिक्ख, दरवेश प्रभृति नामों से आज भी प्रचलित हैं । इस पूरी परम्परा का समावेश
योगशास्त्र में होता है ।
महर्षि पतंजलि के द्वारा प्रतिपादित अष्टांग योग का उपयोग मुख्यतः चित्त की
वृत्तियों को, अर्थात् मन को नियन्त्रित करने के लिए किया जाता है । योग की सर्वोत्तम
परिभाषा भी यही मानो जा सकती है । अष्टांग योग के अभ्यास से मनुष्य न केवल शारीरिक
चेष्टाओं, किन्तु मन की नाना प्रकार की वृत्तियों पर भी अपना नियन्त्रण स्थापित कर लेने
में समर्थ हो जाता है ।
बौद्ध, वैष्णव और शैव तन्त्र ग्रन्थों में अष्टांग योग के स्थान पर षडंग योग का
विधान है । इसमें पातंजल योग के यम, नियम और आसन—इन तीन अंगों को छोड़ दिया
गया है । बौद्ध तन्त्रों में अनुस्मृति को और वैष्णव, शैव तन्त्रों में तर्क को योग के अंग के
रूप में मान्यता मिली है । योग के क्षेत्र में ब्रह्मचर्य, अपरिग्रह आदि उत्कृष्ट मानवीय गुणों
को अपने में समेटे हुए यम-नियम नाम के अंगों का निष्कासन भारतीय इतिहास की एक
शोचनीय घटना रही है । इसीलिए १म० म० पी० वी काणे को लिखना पड़ा कि तान्त्रिक
षडंग योग से यम-नियम को इस लिये छोड़ दिया गया कि ये पंच मकार वाली दृष्टि के विरुद्ध
पड़ते थे । हम आसनों के बिना योग की कल्पना ही नहीं कर सकते । योग के अंग के रूप में
यम, नियम और आसन शारीरिक और मानसिक परिष्कार की पहली सीढ़ी हैं, जब कि षडंग
योग का प्रयोजन मनुष्य की रागात्मक वृत्तियों का परिष्कार करना था ।
षडंग योग
अनुपाय प्रक्रिया में बताया गया है कि यहाँ साधक उपाय के रूप में केवल सत्तर्क का
सहारा लेता है ! षडंग योग में तर्क को भी योग का अंग माना गया है । शैव, वैष्णव, बौद्ध
सभी सम्प्रदायों में षडंग योग की चर्चा मिलती है । गुह्यसमाज तन्त्र (१८।१४०) में प्रत्या-
हार, ध्यान, प्राणायाम, धारणा, २अनुस्मृति और समाधि—ये छः योग के अंग माने गये हैं ।
१. धर्मशास्त्र का इतिहास (हिन्दी संस्करण), पंचम खण्ड उत्तरार्ध, पृ० २९-३० ।
२. अनुस्मृति का अर्थ 'बार बार स्मरण' अथवा अनुरूप स्मृति है । पालि अभिधर्म साहित्य
में इसका विस्तार से वर्णन मिलता है । संक्षिप्त परिचय के लिए आचार्य नरेन्द्रदेव कृत
ग्रन्थ 'बौद्ध-धर्म-दर्शन' का पाँचवाँ अध्याय देखिये ।
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( ३४ )
श्रद्धेय पं० गोपीनाथ कविराज के ग्रन्थ 'भारतीय संस्कृति और साधना' (पृ० ५३७-५४०) में
इस विषय पर अनेक बौद्ध तन्त्र ग्रन्थों की सहायता से अच्छा प्रकाश डाला गया है।
भगवद्गीता के भास्कर भाष्य (पृ० १२७) में प्रत्याहार, ध्यान, प्राणायाम, धारणा, तर्क और
समाधि ये छः अंग गिनाये गये हैं। यहाँ अनुस्मृति के स्थान पर तर्क नाम आया है। तन्त्रा-
लोक के टीकाकार जयरथ ने षडंग योग का उल्लेख किया है। वहाँ का क्रम इस प्रकार
है—प्राणायाम, ध्यान, प्रत्याहार, धारणा, तर्क और समाधि। विष्णुसंहिता में प्राणायाम,
प्रत्याहार, धारणा, तर्क, समाधि और ध्यान—यह क्रम मिलता है। विष्णुसंहिता
(३०।६१-७२) में विस्तार से इनका विवरण भी मिलता है। इनमें तर्क के सिवाय अन्य अंग
पातंजल योग संमत ही हैं। इनके क्रम में भिन्नता मिलती है, किन्तु सर्वत्र तर्क को समाधि के
साथ रखा गया है।
मालिनीविजय (१७।१८) और तन्त्रालोक (४।१५) में योग के सभी अंगों में १तर्क
को श्रेष्ठ बताया गया है। विष्णुसंहिता२ (३०।६९-७०) में कहा गया है कि धारणा में जब
चित्त संलग्न हो, तब अन्वय और व्यतिरेक की सहायता से किया गया निश्चय ही तर्क
कहलाता है। भारतीय वाङ्मय में सत्तर्क को बहुत पहले प्रतिष्ठा प्राप्त हो चुकी थी।
निरुक्त३ में बताया गया है—ऋषियों की परम्परा के समाप्त हो जाने पर मनुष्यों ने देवताओं
से पूछा कि अब हमारे बीच ऋषि का कार्य कौन करेगा ? इसके उत्तर में देवताओं ने मनुष्य
को तर्क शक्ति दी कि अब यही तुम लोगों के लिए ऋषि का कार्य करेगी। धर्मशास्त्रकारों४
ने भी शास्त्रों के अविरोधी सत्तर्क को मान्यता दी है। उपर्युक्त स्थल पर (पृ० १५-२०)
तन्त्रालोक के टीकाकार ने अनेक शास्त्रीय प्रमाणों के आधार पर शास्त्रानुरोधी सत्तर्क की
प्रतिष्ठा की है। उनका कहना है कि तर्क को अप्रतिष्ठित तभी माना जाता है, जब कि यह
शास्त्रविरुद्ध हो।
जयरथ ने ऊह को तर्क का ही पर्याय माना है। मृगेन्द्रागम के योगपाद५ में योग
१. योगाङ्गत्वे समानेऽपि तर्को योगाङ्गमुत्तमम् ।
२. अन्वयव्यतिरेकाभ्यां यस्माद् यदुपलभ्यते ।
धारणादिषु कालेषु स तर्कः संप्रकीर्तितः ॥
३. "मनुष्या वा ऋषिषूत्क्रामत्सु देवानब्रुवन् को न ऋषिर्भविष्यतीति । तेभ्य एनं तर्कमृषिं
प्रायच्छन्" (१३।१२) ।
४. आर्षं धर्मोपदेशं च वेदशास्त्राविरोधिना ।
यस्तर्केणानुसन्धत्ते स धर्मं वेद नेतरः ॥ (मनु० १२।१०६)
५. प्राणायामः प्रत्याहारो धारणा ध्यानवीक्षणे ।
जपः समाधिरित्यङ्गान्यङ्गी योगोऽष्टमः स्वयम् ॥३॥
Courtesy: Shri Tarun Dwivedi, Surviving Son of Late Vraj Vallabh Dwivediji (15 Jul 1926 - 17 Feb 2012)
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( ३५ )
के अंग के रूप में वीक्षण (अभिवीक्षण) परिगणित है। उसी को १ऊह भी कहा गया है और
उसका प्रयोजन भी बताया गया है। बौद्ध पालि-वाङ्मय तथा तन्त्रों में वर्णित अनुस्मृति और
अभिवीक्षण में पर्याप्त समानता है। वृत्तिकार नारायण कण्ठ ने यहाँ ऊह की पुष्टि में
स्वायम्भुवागम को भी उद्धृत किया है। भगवद्गीता (१५।१५) के भाष्य में रामानुजाचार्य
ने २अपोहन शब्द को ऊह का पर्यायवाची भी माना है और इसकी परिभाषा यह की है—
ऊह का कार्य यह देखना है कि किसी भी प्रमाण की प्रवृत्ति सही ढंग से हो रही है या नहीं ?
प्रमाण-प्रवर्तक सामग्री की परीक्षा करना भी इसी का कार्य है। इस तरह से ऊह प्रमाणों का
अनुग्राहक ज्ञान है। स्पष्ट है कि आगम और तन्त्रशास्त्र में ही नहीं, पूरे भारतीय वाङ्मय
में तर्क या ऊह की प्राचीन काल से प्रतिष्ठा चली आ रही है। विज्ञानभैरव में ‘सम्बन्धे
सावधानता’ (श्लोक १०४) कह कर इस स्थिति की ओर इंगित किया गया है। योगवासिष्ठ
(नि० पू० ४३।८) में भी यह स्थिति चर्चित है।
अतः हम विज्ञानभैरव की अनुपाय प्रक्रिया (सहज समाधि) से पूर्णतः प्रभावित ग्रन्थ
योगवासिष्ठ के सम्बन्ध में कुछ कहना चाहते हैं।
योगवासिष्ठ
भारतीय वाङ्मय में योगवासिष्ठ का विशिष्ट स्थान है। इस ग्रन्थ पर डॉ० भीखन-
लाल आत्रेय ने प्रशंसनीय परिश्रम किया है। उसका कहना है कि ई० सप्तम शताब्दी के
आरम्भ से पूर्व योगवासिष्ठ अवश्य ही वर्तमान रहा होगा। डॉ० एस० एन० दास-गुप्त ने
भी अपने भारतीय दर्शन के इतिहास के द्वितीय खण्ड में योगवासिष्ठ के सम्बन्ध में अपने
विचार प्रकट किये हैं। उनका लिखना है कि योगवासिष्ठ के लेखक सम्भवतः गौडपाद अथवा
शंकर के समकालीन, सम्भवतः ८०० ई० के आस-पास अथवा उनके एक शतक पूर्व विद्यमान
थे। प्रायः सभी आधुनिक और प्राचीन विद्वानों ने योगवासिष्ठ को वेदान्त का ग्रन्थ माना
है। डॉ० दासगुप्त इस पर बौद्ध विज्ञानवाद का प्रभाव तो मानते हैं, किन्तु शैव दर्शन की
स्पन्द या प्रत्यभिज्ञा शाखा से इसके सम्बन्ध की कोई चर्चा नहीं करते। प्राण के प्रसंग में
शिवसूत्रविमर्शिनी और विज्ञानभैरवविवृति को अवश्य उन्होंने उद्धृत किया है।
योगवासिष्ठ का दूसरा नाम मोक्षोपाय है। विज्ञानभैरव के समान ही योगवासिष्ठ में
भी बन्ध और मोक्ष की परमार्थ सत्ता नहीं मानी गई है। वस्तुतः इस ग्रन्थ पर मालिनीविजय
(जो कि अभिनवगुप्त के अनुसार त्रिक या प्रत्यभिज्ञा दर्शन का आधार ग्रन्थ है), विज्ञानभैरव,
स्पन्दकारिका प्रभृति ग्रन्थों का स्पष्ट प्रभाव है। स्पन्दकारिका के प्रथम श्लोक की प्रथम पंक्ति
१. ऊहोऽभिवीक्षणं वस्तुविकल्पानन्तरोदितः ॥८॥
यदा वेत्ति पदं हेयमुपादेयं च तत्स्थितः ।
तत्पोषकं विपक्षं च यच्च तत्पोषकं वरम् ॥९॥
२. अपोहनम् ऊहनं वा। ऊहनमूहः। ऊहो नामेदं प्रमाणमित्थं प्रवर्तितुमर्हतीति प्रमाण-
प्रवृत्त्यर्हताविषयं सामग्र्यादिनिरूपणजन्यं प्रमाणानुग्राहकं ज्ञानम्।
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( ३६ )
की इस ग्रन्थ में अनेक बार आवृत्ति हुई है । इस ग्रन्थ के उपशम१ प्रकरण पर विज्ञानभैरव का
सर्वाधिक प्रभाव है। स्पन्द, समता, पौरुष प्रयत्न (ज्ञान या शक्ति), बन्ध-मोक्ष, प्रबुद्ध, संप्रबुद्ध,
अप्रतिबुद्ध, कलङ्काङ्क, सत्तासामान्य, उच्छून, चिदग्नि, महासत्ता, चिदर्क, भरितात्मता, शक्ति-
पात, ब्रह्मसत्ता, जीवन्मुक्ति, पुर्यष्टक प्रभृति शब्दों की व्याख्या पूरी तरह से उक्त शास्त्रों की
परिभाषाओं का ही अनुसरण करती है । इस तरह से इस पूरे ग्रन्थ का विनियोग २अनुपाय
प्रक्रिया (सहज योग) के प्रतिपादन में ही है । तन्त्रशास्त्र में३ शास्त्र, गुरु और स्वयं अपनी
प्रतिभा से ज्ञान की प्राप्ति की बात कही गई है । किन्तु योगवासिष्ठ का कहना है कि ४शास्त्र
या गुरु के वचन से आत्मा का बोध (ज्ञान) नहीं होता, इसका ज्ञान तो स्वयं अपने बोध से ही
होता है । इस तरह से सत्तर्क को ही यहाँ सर्वोपरि स्थान दिया गया है ।
योगवासिष्ठ के विषय में एक बात और ध्यान देने योग्य है । अभिनन्द पण्डित ने अपने
लघुयोगवासिष्ठ में निर्वाण प्रकरण के पूर्वार्ध पर्यन्त ग्रन्थ का ही संक्षेप प्रस्तुत किया है । मूल
ग्रन्थ में भी पूर्वार्ध प्रकरण के अन्त में ग्रन्थ समाप्ति के सभी चिह्न उपलब्ध हैं । अतः ऐसा
प्रतीत होता है कि इस ग्रन्थ में निर्वाण प्रकरण का उत्तरार्ध बाद में जोड़ा गया है ।
विज्ञानभैरव का मुख्य तात्पर्य
हमने बताया है कि विज्ञानभैरव में पूर्ववर्ती सभी तान्त्रिक योगविधियों का संग्रह किया
गया है, किन्तु अन्ततः इसका विनियोग अनुपाय प्रक्रिया (सहज समाधि) के प्रतिपादन में है ।
१. “न बहिर्नान्तरे नाधो नोर्ध्वमर्थे न शून्यके” (५।५।१६), “सावस्था भरिताकारा” (६।४।४७),
“न सक्तमिह चेष्टासु न चिन्तासु न वस्तुषु । नाकाशे नाप्यधो नोर्ध्वं न दिक्षु वित-
तासु च ॥ न बहिर्विपुलाभागे न चैवेन्द्रियवृत्तिषु । नाभ्यन्तरे न च प्राणे न मूर्धनि न
तालुनि ॥ न भ्रूमध्ये न नासान्ते न मुखे न च तारके । नान्धकारे न चाभासे न चास्मिन्
हृदयान्तरे ॥ न जाग्रति न च स्वप्ने न सुप्ते न च निर्मले । नासिते न च वा पीतरक्तादौ
शबले न च ॥ न चले न स्थिरे नादौ न मध्ये नेतरत्र च । न दूरे नान्तिके नाग्ने न पदार्थे
न चात्मनि ॥ न शब्दस्पर्शरूपेषु न मोहमदवृत्तिषु । न गमागमचेष्टासु न कालकलनासु
च ॥” (६।९।२-७) । इन वचनों में से द्वितीय विज्ञानभैरव के १५ वें श्लोक का तृतीय
चरण है। इसकी यहाँ अनेक स्थलों पर आवृत्ति हुई है । अन्य दो उद्धरणों में विज्ञानभैरव
में वर्णित अनेक धारणाओं का उल्लेख है ।
२. “वर्णधर्माश्रमाचारशास्त्रयन्त्रणयोज्झितः । निर्गच्छति गतज्जालात् पञ्जरादिव केसरी ॥”
(नि० पू० १२२।२), “तनुं त्यजतु वा तीर्थे श्वपचस्य गृहेऽथवा” (नि० पू० १२२।११)
इत्यादि वचनों में सिद्धों की सहज प्रक्रिया के स्पष्ट दर्शन होते हैं ।
३. “त्रिप्रत्ययमिदं ज्ञानम्”, “गुरुतः शास्त्रतः स्वतः” इत्यादि वचन ग्रन्थ की पृ० २ की
३री टिप्पणी में उद्धृत हैं ।
४. शास्त्राथैर्बुध्यते नात्मा गुरोर्वचनतो न च ।
बुध्यते स्वयमेवैष स्वबोधवशतः स्वतः ॥ (नि० पू० ४१।१५)
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( ३७ )
उपक्रम, उपसंहार आदि षड्विध लिंग से ग्रन्थ के तात्पर्य का निर्णय किया जाता है। इस
ग्रन्थ के उपक्रम में "एवंविधे परे तत्त्वे कः पूज्यः कश्च तृप्यति" ऐसा कह कर इस सहज
समाधि की ओर इंगित किया गया है और बाद की ११२ धारणाओं के प्रतिपादक प्रत्येक
श्लोक के चतुर्थ चरण में इसी सर्वात्मक स्थिति को प्रकाशित किया गया है। अन्त में पूजा,
जप आदि की आध्यात्मिक व्याख्या प्रस्तुत करते हुए इस ग्रन्थ का उपसंहार सहज समाधि
स्थिति की स्थापना में ही किया गया है। इस प्रकार योगवासिष्ठ के समान यह ग्रन्थ भी
मुख्यतः अनुपाय प्रक्रिया या सहज योग का प्रतिपादक है। सहज समाधि या अनुपाय प्रक्रिया
का संक्षिप्ततम अर्थ यह है कि मन की स्वाभाविक प्रवृत्तियों पर बिना जोर-जबरदस्ती के सहज
रूप में नियन्त्रण स्थापित कर स्वरूप-साक्षात्कार का प्रयत्न किया जाय। रागात्मिका वृत्ति
का परिष्कार इसका उद्देश्य था। यह दुःख की बात है कि इस उत्कृष्ट प्रक्रिया की भी परि-
णति उच्छृंखलता में हो गयी थी।
योगशास्त्र का भविष्य
तन्त्रशास्त्र और योगशास्त्र की आजकल पूरे विश्व में बड़ी चर्चा है। किन्तु इससे
आने वाले खतरे की ओर हमें अभी से सावधान हो जाना चाहिये। ब्रह्मचारी योगियों और
तान्त्रिकों की पहुँच देश के बड़े-बड़े राजनीतिज्ञों तक है। इसको उलट कर भी कह सकते हैं कि
ये राजनीतिज्ञ इनको बड़ी श्रद्धा और आदर की दृष्टि से देखते हैं। विदेशों में भारतीय योग-
शास्त्र का डंका बजाने वाले योगियों की भी कोई कमी नहीं है। यह बात सही है कि तन्त्र-
शास्त्र ने और उससे अनुप्राणित योगशास्त्र ने वर्ण, लिंग, जाति, संप्रदाय, देश आदि की सीमा
को लांघकर मानव मात्र को इसका अधिकारी बताया है, किन्तु ऐसा करते समय उसमें कुछ
दोष भी आ गये हैं। प्राचीन भारत में गृहस्थ ऋषि को सर्वाधिक प्रतिष्ठा प्राप्त थी, किन्तु
बाद में स्थिति बदल गई। गृहस्थ ऋषि का स्थान भिक्षु, मुनि और संन्यासी ने ले लिया। ऋषि
गृहस्थ रहते हुए भी सभी एषणाओं से मुक्त था, किन्तु भिक्षुओं, मुनियों और संन्यासियों के
इर्द-गिर्द मठों और मन्दिरों के रूप में सभी एषणाओं का एक रहस्यात्मक ताना-बाना बुने जाने
लगा और इसी पृष्ठभूमि में रहस्यात्मक शास्त्रों का भी आविर्भाव हो गया। उपनिषदों को
रहस्य शास्त्र कहा जाता था, किन्तु औपनिषदिक रहस्य एक अलौकिक तत्त्व था। तान्त्रिक
योगियों ने इस अलौकिक तत्त्व को तो सततर्क और स्वात्मप्रत्यभिज्ञा द्वारा रहस्य के आवरण से
मुक्त कर स्वात्मस्वरूप अथवा जीवन्मुक्त अवस्था के रूप में प्रतिष्ठित किया, लेकिन उसके
स्थान पर उन्होंने लौकिक जीवन को ही रहस्यों में ढक दिया। मनुष्य की रागात्मिका वृत्ति का
प्रशमन तान्त्रिक अवधारणाओं का एक लक्ष्य माना जा सकता है, किन्तु विगत सहस्राधिक
वर्षों से तन्त्रशास्त्र का रहस्यवाद महज अपनी कुंठाओं को छिपाने का एक बीभत्स प्रयास रहा
है। तन्त्रशास्त्र के रहस्यवाद को औपनिषदिक रहस्यवाद से भी ऊँचा दर्जा दिलाने का प्रयास
किया जाता रहा है और आज भी यह प्रयास रुका नहीं है।
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( ३८ )
इस अनोखे रहस्यवाद ने 'ब्रह्मचारी'१ शब्द का अर्थ ही बदल दिया । मारविजयी
बुद्ध और कामदेव को भस्म कर देने वाले योगिराज शिव के द्वारा प्रवर्तित धर्मों में काम के
इस अनोखे प्रवेश ने कृष्णभक्ति धारा में ही नहीं, रामभक्ति धारा में भी रसिक संप्रदाय को
जन्म दे दिया । मर्यादापुरुषोत्तम राम के लोकमंगलकारी स्वरूप की रक्षा का श्रेय गोस्वामी
तुलसीदास को दिया जाना चाहिये । अन्यथा राम का यह चरित्र भी उसी तरह से पीछे
ढकेल दिया गया होता, जैसा कि भगवान् श्रीकृष्ण का महाभारत और भगवद्गीता में वर्णित
स्वरूप हमारी आँखों से ओझल सा हो गया है । विश्व के उत्कृष्टतम ग्रन्थ महाभारत को
घर में रखना अथवा पढ़ना आज महान् अमंगलकारी कार्य मान लिया गया है और गीता का
अध्ययन गृहस्थ के लिये निषिद्ध है । इसके स्थान पर भागवत की, भागवत के दशम स्कन्ध
की और रासलीला की उत्तरोत्तर प्रतिष्ठा बढ़ गई है और रासलीला के रहस्य को औपनिष-
दिक रहस्यवाद से भी ऊँचा स्थान दिया गया है । हम कहाँ पहुँच गये हैं ।
स्वर्ग देखने के लोभ में नाक कटा लेना कोई बुद्धिमानी नहीं है । आज हमें एक
जगह खड़े होकर देखना है कि आगे किस तरफ जाना है । किसी समय तान्त्रिक धर्म ने
भारतीय संस्कृति के विस्तार के लिये स्तुत्य प्रयास किया था, किन्तु आज हम उसकी
अच्छाइयों को भुला चुके हैं । समाज ऊँच-नीच, छोटे-बड़े, के घेरे में बंटा हुआ है, सन्तों
की वाणी का, जिनका कि प्रेरणा-स्रोत मुख्यतः २तान्त्रिक वाङ्मय ही रहा है, समाज पर
केवल मौखिक प्रभाव है, अर्थात् उसका उपयोग केवल एक दूसरे को उपदेश देने तक सीमित
है । अपनी दैनिक दिनचर्या में उसको उतारने का प्रयास नहीं किया जाता । इसका भी एक
मौलिक कारण है। उपनिषद्, गीता या अन्य आध्यात्मिक ग्रन्थों के उत्कृष्ट उपदेशों का अधिकारी
सामान्य मनुष्य को नहीं माना जाता । उनके लिये इन उत्कृष्ट आध्यात्मिक मूल्यों का अनुसरण
कर पाना कठिन है, ऐसा मान कर नाना प्रकार के कर्मकाण्डों की सृष्टि कर दी गई है, जैसा
कि इस ग्रन्थ के १० वें श्लोक में बताया गया है। ऐहलौकिक जीवन की अपेक्षा पारलौकिक
जीवन पर ध्यान अधिक केन्द्रित कर दिया गया है । फलतः सामान्य मनुष्य निकृष्टतम जीवन
बिताते हुए भी कुछ कर्मकाण्डों का नियमित आचरण कर धार्मिक बन बैठता है । इस स्थिति
को दूर किया जाना चाहिये । विज्ञानभैरव जैसे ग्रन्थ इनमें सहायक हो सकते हैं ।
भारतीय दर्शनों में ऐहलौकिक अभ्युदय को हेय दृष्टि से देखा जाता है और पार-
लौकिक अभ्युदय को उपादेय । फलतः इनमें ऐहलौकिक अभ्युदय संबन्धी विचारों को बहुत
१. “ओष्ठचान्त्यत्रितयासेवी ब्रह्मचारी स उच्यते" (तन्त्रा० २९।९८) । ओष्ठचान्त्यत्रितया-
सेवी का तात्पर्य तीन मकारों के सेवन से है ।
२. डॉ० राममूर्ति त्रिपाठी ने 'तन्त्र और सन्त' नामक ग्रन्थ में इस विषय पर अच्छा प्रकाश
डाला है, किन्तु 'तन्त्र' शब्द का प्रयोग उन्होंने सीमित अर्थ में किया है । वस्तुतः प्राचीन
शैव और वैष्णव आगम भी इसी श्रेणी में आते हैं और सन्तों की वाणी पर इन सबका
प्रभाव है ।
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कम स्थान मिला है। भारतीय वाङ्मय की एक शाखा आगमशास्त्र या तन्त्रशास्त्र ने एक ही
जन्म में भोग और मोक्ष, अभ्युदय और निःश्रेयस को प्राप्त कराने की बात की है, किन्तु
इसमें भी व्यक्तिगत भावना ही प्रधान रही है। कहा जा सकता है कि भारतीय दर्शन और
आध्यात्मिकता में वैयक्तिक उन्नति का तो चूड़ान्त उत्कर्ष है, किन्तु साथ ही सामूहिक उन्नति
का पक्ष अत्यन्त दुर्बल है। इसी तरह से इसमें ऐहलौकिक दृष्टि की अपेक्षा पारलौकिक दृष्टि
का प्राबल्य हो गया है। साधारण भारतीय की यह दृढ़ धारणा है कि संसार अवनति की
ओर तेजी से बढ़ रहा है, इसको रोका नहीं जा सकता। कर्मवाद और भाग्यवाद उसको इसी
ओर ढकेलते हैं। उसका सारा पुरुषार्थ कलिकाल की अर्गला से अवरुद्ध है।
इसके विपरीत “स्वात्मैव देवता प्रोक्ता ललिता विश्वविग्रहा” सरीखे आगमिक एवं
तान्त्रिक दर्शन के प्रतिपादक वाक्यों के सहारे अपने में विश्वाहन्ता¹ का विकास कर अरविन्द
जैसे महायोगी इसी धरती पर दिव्य मानवता के अवतार की बात करते हैं और महामनीषी
श्रद्धेयचरण श्रीगोपीनाथ कविराज अखण्ड महायोग के माध्यम से इस स्थिति को लाना चाहते
है। पुरुषार्थ की महत्ता के प्रतिष्ठापक योगवासिष्ठ सरीखे और विश्वाहन्ता का उपदेश देने
वाले विरूपाक्षपंचाशिका, विज्ञानभैरव सरीखे योगशास्त्र के ग्रन्थ उनके इस कार्य में
सहायक हैं।
आधुनिक विश्व स्वत्व के संकोच के कारण दुःखी है। यह स्वत्व धर्म, राष्ट्र, राज्य,
भाषा, जाति, कुटुम्ब-कबीले आदि के नाना विभ्रमों में पड़ कर बँटा हुआ है। अखण्ड संस्कृति
के माध्यम से इन विभ्रमों को तोड़ पाने के उपरान्त ही अखण्ड स्वत्व का बोध हो सकता
है। सहिष्णुता और समन्वय भारतीय इतिहास की विशेषता रही है। यह प्रक्रिया अब भी
निरन्तर क्रियाशील है। त्याग और तपस्या के उच्च आदर्शों से अनुप्राणित साधु-सन्तों की
परम्परा परस्पर के स्थूल भेदों को मिटाने में निरन्तर सचेष्ट रही है। आधुनिक विश्व के
वर्तमान धर्मों और विभिन्न वादों के विरोधी दृष्टिकोणों में सहिष्णुतापूर्वक समन्वय स्थापित
कर अखण्ड संस्कृति के निर्माण का पथ प्रशस्त किया जा सकता है, जिससे कि विश्व-समष्टि
में इस अखण्ड संस्कृति के आविर्भाव से स्वत्व का संकोच दूर हो और “वसुधैव कुटुम्बकम्”
की उदात्त भावना का विकास हो। जहाँ प्रत्येक वस्तु के अभेद के प्रतिष्ठित होने पर भी
अपने स्वरूप के नष्ट होने का कोई प्रसंग नहीं है, वहाँ विश्व के किसी वाद, धर्म अथवा
संस्कृति के स्वत्व के लोप का भय क्यों उपस्थित होगा ?
अद्वैतवादी आगमिकों की मान्यता है कि नट अपने मन से राम-कृष्ण, रावण-कंस
प्रभृति की भूमिका में प्रविष्ट होकर नाना प्रकार के सुख-दुःखों की अनुभूति स्वयं तटस्थ
भाव से करता हुआ भी जैसे दर्शकों में साधारणीकरण प्रक्रिया के आधार पर सचमुच की सी
अनुभूति पैदा करा देता है, उसी तरह से ईश्वर भी तटस्थ भाव से लीला करता है। लीला
१. धारणा संख्या ६५ और ७९ के विवरण के प्रसंग में इस शब्द की व्याख्या की गई है।
९८,१०३, १०७-१०८ श्लोक में भी यही विषय प्रतिपादित है।
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करते-करते वह बौद्ध और पौरुष अज्ञान से आवृत हो जाता है और इस तरह से उसकी
शक्तियाँ और स्वरूप संकुचित हो जाते हैं । संकुचित प्रमाता के रूप में वह अपने स्वरूप को
भूल बैठता है। यह स्वरूप की विस्मृति ही इनके यहाँ बन्ध है और स्वरूप की स्मृति ही मोक्ष
कहलाती है । इस तरह से इनके मत में बन्ध और मोक्ष की कोई वास्तविक सत्ता नहीं है ।
इनकी दृष्टि में यह सारा विश्व 'अहम्' का ही विलास है । चित्रकार कागज, कपड़ा या
दीवाल पर अपनी कल्पना का चित्र बनाता है। यह शिव ऐसा अनोखा चित्रकार है कि
बिना आधार के अपने आप में इस विश्व के उन्मीलन और निमीलन की लीला करता रहता
है । अपनी अहन्ता को वह परिमित प्रमाता के रूप में भौतिक शरीर तक सीमित कर देता
है और फिर वही पर प्रमाता के रूप में इस पूरे विश्व में विश्वाहन्ता के रूप में इसका विस्तार
कर लेता है । इस स्थिति में वह इस पूरे विश्व को अपना कुटुम्ब नहीं, किन्तु स्वयं अपना ही
स्वरूप मानता है ।
शक्तिसंगम तन्त्र में समताष्टक मार्ग का उल्लेख है । इसका परिचय हमने पृ० ७१
पर दिया है । सन्तों और भक्तों की परम्परा से और योगवासिष्ठ जैसे ग्रन्थों के माध्यम से
यह समता दृष्टि भारतीय जनमानस में सामान्य रूप से अपना स्थान बनाये हुए हैं। महात्मा
गाँधी में इसी दृष्टि का उन्मेष हुआ था । किन्तु आज इस समता दृष्टि के मूल स्रोत को
हमने भुला दिया है । आज का प्रबुद्ध भारतीय इस साम्यवाद की खोज में उस कस्तूरी मृग
की भाँति भटक रहा है, जिसको इसका ज्ञान नहीं है कि उस मनोमोहक गन्ध का स्वामी वह
स्वयं ही है। आज इस बात की आवश्यकता है कि जैसे तत्कालीन सभी धर्मों की उदात्त
भावनाओं में समन्वय स्थापित कर मानव मात्र के कल्याण के लिये तान्त्रिक धर्म की प्रतिष्ठा
की गई थी, उसी तरह से विश्व के सभी धर्मों की उदात्त भावनाओं में समरसता, समन्वय
स्थापित कर एक विश्व-धर्म और विश्व-संस्कृति की प्रतिष्ठा की जाय ।
भारतीय समाजवाद के प्रवर्तक आचार्य नरेन्द्रदेव ने भारतीय संस्कृति और समाज-
वाद में सुन्दर समन्वय स्थापित किया था। उनका१ कहना था कि संस्कृति २चित्तभूमि की
खेती है । व्यक्तियों के चित्त के साथ-साथ लोकचित्त के कार्यक्षेत्र का विस्तार आवश्यक है ।
लोकचित्त का राष्ट्रचित्त में और विश्वचित्त का विश्वसंस्कृति के रूप में विकास अभिप्रेत
है । जीवन और संस्कृति दोनों परिवर्तनशील हैं । कालप्रवाह से जीर्ण और अनुपयोगी
पुराने विचारों के परित्याग के साथ श्रैणिक नैतिकता के नाम पर सभी पुराने आदर्शों और
सिद्धान्तों का बहिष्कार तथा समाज के दीर्घकालीन अनुभव तथा संचित ज्ञान का अनादर
अनुचित होगा । हमारा कर्तव्य है कि हम अपनी संस्कृति का सतर्क और वैज्ञानिक अध्ययन
१. प्रोफेसर श्रीमुकुटबिहारीलाल के ग्रन्थ “आचार्य नरेन्द्रदेव : युग और नेतृत्व" से साभार
संकलित ।
२. “योगश्चित्तवृत्तिनिरोधः" (१।२) इस योगसूत्र के अनुसार योगशास्त्र भी एक प्रकार से
चित्तभूमि की खेती ही है ।
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प्रस्तुत करें, उसके जीवनपूर्ण तत्त्वों की रक्षा करें और आधुनिक विचारों से उनका सामंजस्य
स्थापित कर नव संस्कृति का निर्माण करें। आदान-प्रदान से ही संस्कृतियाँ संपुष्ट और
ऐश्वर्यमय हो सकती हैं।
भारतीय संस्कृति का सबसे बड़ा तत्त्व विभिन्न जीवन प्रणालियों में एकता और जीवन
के हर क्षेत्र में समन्वय स्थापित करना है। इसकी दूसरी विशेषता नैतिक व्यवस्था की
स्थापना तथा आचरण की शुद्धता है। अपना ध्यान रखते हुए दूसरे का भी ध्यान रखना
इसका मूल मन्त्र है—"आत्मनः प्रतिकूलानि परेषां न समाचरेत्"। इसका तीसरा महत्त्वपूर्ण
तत्त्व विश्वभावना है। "आत्मोपम्येन सर्वत्र समं पश्यति", "वसुधैव कुटुम्बकम्" इसकी
शिक्षा है। भारतीय संस्कृति के दो पहलू रहे हैं। एक व्यक्तिवादी तो दूसरा समष्टिवादी,
अर्थात् विश्वजनीन । इन्हीं को हम व्यक्तिगत मानस और लोकमानस कह सकते हैं।
व्यष्टि और समष्टि में सामंजस्य युग की माँग है । मानव की उन्नति के लिये
व्यक्ति-स्वातन्त्र्य और समष्टि-भावना दोनों आवश्यक है। भारतीय विद्वानों द्वारा प्रतिपादित
समत्व, कर्मयोग, विश्वभावना, लोकहित तथा शील के विचारों का अर्वाचीन विद्वानों द्वारा
प्रतिपादित राष्ट्रीयता, अन्तरराष्ट्रीयता, लोकतन्त्र, समाजवाद और इतिहास की वैज्ञानिक
व्यवस्था से समयोग अपेक्षित है। इसके लिये अपने शास्त्रों के साथ अर्वाचीन विद्वानों के
लोकतन्त्र, देशबन्धुत्व, विश्वसहयोग तथा समताराज्य सम्बन्धी विचारों का भी विवेचनात्मक
अध्ययन होना चाहिये। अपनी संस्कृति के कालविपरीत तत्त्वों का परित्याग कर उसके
युगानुरूप कल्याणकारी तत्त्वों का संरक्षण और परिवर्धन करना और साथ ही अर्वाचीन
विचारों के हानिकारक सिद्धान्तों और परिपाटियों की यथोचित समीक्षा करते हुए उनके
लाभप्रद प्रगतिशील विचारों का परिग्रहण करना युग की माँग है।
जात्या च सदृशाः सर्वे कुलेन सदृशास्तथा ।
न चोद्योगेन बुद्ध्याऽथ रूपद्रव्येण वा पुनः ॥
महाभारत शान्तिपर्व में गणराज्य के प्रकरण में कही गई ये दोनों बातें अर्वाचीन
विद्वानों को स्वीकार हैं। वे प्रत्येक जाति, कुल और व्यक्ति की समानता को स्वीकार करते
हुए उद्योग और बुद्धि की क्षमता की विभिन्नता को स्वीकार करते हैं और चाहते हैं कि
क्षमता, कर्तव्यपरायणता और सद्व्यवहार ही जनविश्वास तथा पदों पर नियुक्तियों का
आधार हो । हमारे पूर्वजों ने कहा है कि ज्ञान के समान पवित्र कुछ भी नहीं है (नहि ज्ञानेन
सदृशं पवित्रमिह विद्यते ।) और उसे सब किसी से ग्रहण किया जा सकता है।
हमारे पूर्वजों ने हमारे सामने "वसुधैव कुटुम्बकम्" का आदर्श प्रस्तुत किया है।
इस आदर्श को जीवन में आत्मसात् करना हमारा कर्तव्य है। यदि हम विभिन्न सम्प्रदायों,
प्रजातियों तथा जातियों में विभाजित मानव समाज में भ्रातृत्व का अनुभव कर सकते हैं,
तो कोई कारण नहीं कि हम सम्पूर्ण हिन्दू समाज तथा भारतीय समाज में बन्धुत्व और
आत्मीयता का अनुभव न करें। महात्मा गाँधी ने ठीक ही कहा है कि देशबन्धुत्व को आत्म-
सात् किये बिना विश्वबन्धुत्व की उपलब्धि असम्भव है। देशबन्धुत्व और समता पर आश्रित
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राष्ट्रीयता ही भारतीय गणतन्त्र को संघबद्ध तथा सबल कर सकती है, विभिन्न जातियों,
उपजातियों और सम्प्रदायों से सम्बद्ध सज्जनों में सौजन्य की वृद्धि कर सकती है तथा
विश्वबन्धुत्व का मार्ग प्रशस्त कर सकती है ।
समता पर आधृत संस्कृति ही श्रेष्ठ मानी जा सकती है। तभी विश्वबन्धुत्व, मान-
वता और विश्वकल्याण की भावना को बढ़ावा मिल सकता है । निराग्रही समीक्षा तथा
सर्जनात्मक समन्वय द्वारा ही यह सम्भव है । विचार-वैचित्र्य से घबराने की कोई बात नहीं
है। विचार-स्वातन्त्र्य चिर काल से भारतीय संस्कृति का सद्गुण रहा है। भारतीय संस्कृति
के विकास में विचार-स्वातन्त्र्य और विचार-विमर्श का महत्त्वपूर्ण योगदान रहा है और इनके
द्वारा ही इस समय भी जड़ता और संकीर्णता का परित्याग तथा सर्जनात्मक चिन्तन हमारे
लिये सम्भव हो सकते हैं ।
राष्ट्रीयता, अन्तरराष्ट्रीयता, लोकतन्त्र और समाजवाद इस युग की मुख्य मान्यताएँ
हैं। इन्हें अपनाना, भारतीय संस्कृति में इनका समावेश करना नितान्त आवश्यक है । इस
तरह समाजवाद भारतीय संस्कृति के दीर्घकालीन, सर्वजनीन, सजीव मूल्यों तथा तथ्यों का
पाश्चात्य संस्कृति के सजीव, प्रगतिशील तत्त्वों तथा वैज्ञानिक उपलब्धियों से समन्वय करता
है। आचार्य नरेन्द्रदेव के शब्दों में समाजवाद पर आस्था रखने वाले विचारक एक ऐसी नई
संस्कृति का निर्माण करना चाहते हैं, जिसका मूल प्राचीन सभ्यता में होगा, जिसका रूप-रंग
देशी होगा, जिसमें पुरातन सभ्यता के उत्कृष्ट अङ्ग सुरक्षित रहेंगे और साथ-साथ उसमें
ऐसे नवीन अंशों का भी समावेश होगा, जो आज जगत् में प्रगतिशील हैं और संसार के
सामने एक नवीन आदर्श उपस्थित करना चाहते हैं । तभी उस विश्व-संस्कृति का निर्माण
हो सकेगा, जिसमें कि सभो मनुष्य आर्थिक, सामाजिक और राजनीतिक दासता से मुक्त हों,
सभी को मौलिक मानवाधिकार प्राप्त हों तथा सबको स्वतन्त्रता और सम्मान के साथ अपने
आर्थिक अभ्युदय और सांस्कृतिक उन्नति की सुविधा प्राप्त हो, जिसमें प्रत्येक राष्ट्र को
बराबर की जनतान्त्रिक आजादी हासिल हो, सब अन्तरराष्ट्रीय झगड़े शान्तिमय ढंग से
निपटाये जा सकें और सब राष्ट्र पारस्परिक सहयोग के जरिये मानव-कल्याण में वृद्धि करें।
यह खेद की बात है कि भारतीय समाजवादी आन्दोलन आचार्य नरेन्द्रदेव सरीखे
मानवतावादी मनीषी के उक्त विचारों का अनुवर्तन न कर सका। उनके कुछ अन्तरंग
साथियों ने ही उनका अन्तिम जीवन दूभर बना दिया था। उनके कुछ दूसरे साथियों ने
राजनीति से संन्यास ले लिया। किन्तु आचार्यजी अपने जीवन के अन्तिम क्षण तक इन सब
विपरीत परिस्थितियों से जूझते रहे और अपने सिद्धान्तों के मूल्य पर कभी भी किसी के
सामने आत्मसमर्पण नहीं किया। आज उनके कुछ अनुयायी तान्त्रिकों और बाबाओं की
देहली ढोकने लगे हैं और कुछ धम्म की शरण में चले गये हैं। महात्मा गाँधी और आचार्य
नरेन्द्रदेव के द्वारा स्थापित मूल्यों का अनुवर्तन न कर पाने के कारण ही भारतीय गणतन्त्र ने
दलतन्त्र का रूप ले लिया है। आज भारतीय राजनीतिज्ञों की देश की अपेक्षा अपने दल के