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विज्ञान भैरव तन्त्र (११२ ध्यान धारणाएँ - हिन्दी व्याख्या सहित)

Vijnana Bhairava Tantra with Hindi Commentary

भगवान भैरव / प्रो. ब्रजवल्लभ द्विवेदी द्वारा

स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास / चौखम्बा · मोतीलाल बनारसीदास / चौखम्बा · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished256 पृष्ठ

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( २५ )
द्वादशान्त की स्थिति मानी गई है । १हकार की उत्पत्ति हृदय में और सकार की उत्पत्ति
द्वादशान्त में मानी जाती है ।
हृदय स्थित कमलकोश में प्राण का उदय होता है । नासिका मार्ग से बाहर निकल कर
यह बारह अंगुल चल कर अन्त में आकाश में विलीन हो जाता है । इसी लिये बाह्य आकाश
योगशास्त्र में द्वादशान्त के नाम से प्रसिद्ध है । द्विषट्कान्त, मुष्टित्रयान्त या शिखान्त शब्द
द्वादशान्त के पर्यायवाची हैं । नेत्रतन्त्र (८।४१) की टीका में क्षेमराज ने तथा तन्त्रालोक
(५।८९-९१) की टीका में जयरथ ने द्वादशान्त पद का अर्थ ऊर्ध्व द्वादशान्त किया है, जिसकी
कि स्थिति शिखा के अन्त में है । इसमें उन्मना शक्ति का निवास है । इस प्रकार इस शास्त्र में
द्वादशान्त की स्थिति ब्रह्मरन्ध्र से पृथक् मानी गई है । इसको द्वादशान्त इस लिये कहते हैं कि
द्वादश आधारों के अन्त में इसकी स्थिति है ।
निर्विकल्प योगी द्वादशान्त के भी ऊपर स्थित परमाकाश में जब पहुँच जाता है, तो
सर्वात्मता का विकास हो जाता है, वह अनुत्तर शून्य में लीन हो जाता है । योगिनीहृदय
(१।२७, ३४) में इसको महाबिन्दु कहा गया है । वहां आज्ञाचक्र तक की स्थिति को सकल,
उन्मना पर्यन्त स्थिति को सकल-निष्कल और महाबिन्दु को निष्कल माना गया है । इस निष्कल
स्वरूप में भगवती त्रिपुरसुन्दरी निवास करती है । यही वह शक्ति तत्त्व है, जिसकी कि सहायता
के बिना शिव निष्प्राण (शव) रहता है । इसी निष्कल स्वरूप को प्रस्तुत ग्रन्थ में पराशक्ति और
शिव का मुख कहा गया है । इस निष्कल (परा) शक्ति की सहायता से ही शिव स्वरूप की
अभिव्यक्ति हो सकती है ।
प्राण और अपान
ऊपर हृदय से बाह्य द्वादशान्त तक जाने वाला प्राण और नीचे बाह्य द्वादशान्त से
हृदय तक आने वाला जीव नामक अपान, यह प्राणशक्ति का उच्चारण है । प्राणशक्ति इनका
निरन्तर उच्चारण करती रहती है, अर्थात् प्राण और अपान के रूप में स्पन्दित होती रहती
है । स्वच्छन्दतन्त्र २ में प्राण और अपान को प्राणशक्ति का विसर्ग और आपूरण व्यापार बताया
गया है । तदनुसार प्राण का अर्थ है श्वास छोड़ना और अपान का अर्थ है श्वास लेना । पालि
बौद्ध वाङ्मय में इनके लिये आनापान (आश्वास-प्रश्वास) शब्द प्रयुक्त है । किन्तु वहां इनके
१. "हकारस्तु स्मृतः प्राणः स्वप्रवृत्तो हलाकृतिः" (४।२५७) स्वच्छन्दतन्त्र के इस वचन
में स्वाभाविक रूप से निरन्तर नदन करने वाले हलाकृति प्राण को ही हकार कहा गया
है । अनच्क हकार की आकृति वाले प्राण का यह नदन व्यापार ही हंसोच्चार कहलाता
है । इसी को अनाहत ध्वनि अथवा नादभट्टारक भी कहा जाता है । यही हृदय का
स्वाभाविक स्पन्दन व्यापार है । ५७ वीं धारणा में इसी का वर्णन किया गया है ।
२. प्राणापानमयः प्राणो विसर्गापूरणं प्रति ।
नित्यमापूरयन्नेव प्राणिनामुरसि स्थितः ॥
प्राणनं कुरुते यस्मात् तस्मात् प्राणः प्रकीर्तितः । (७।२५-२६)