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विज्ञान भैरव तन्त्र (११२ ध्यान धारणाएँ - हिन्दी व्याख्या सहित)

Vijnana Bhairava Tantra with Hindi Commentary

भगवान भैरव / प्रो. ब्रजवल्लभ द्विवेदी द्वारा

स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास / चौखम्बा · मोतीलाल बनारसीदास / चौखम्बा · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished256 पृष्ठ

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( ३४ )
श्रद्धेय पं० गोपीनाथ कविराज के ग्रन्थ 'भारतीय संस्कृति और साधना' (पृ० ५३७-५४०) में
इस विषय पर अनेक बौद्ध तन्त्र ग्रन्थों की सहायता से अच्छा प्रकाश डाला गया है।
भगवद्गीता के भास्कर भाष्य (पृ० १२७) में प्रत्याहार, ध्यान, प्राणायाम, धारणा, तर्क और
समाधि ये छः अंग गिनाये गये हैं। यहाँ अनुस्मृति के स्थान पर तर्क नाम आया है। तन्त्रा-
लोक के टीकाकार जयरथ ने षडंग योग का उल्लेख किया है। वहाँ का क्रम इस प्रकार
है—प्राणायाम, ध्यान, प्रत्याहार, धारणा, तर्क और समाधि। विष्णुसंहिता में प्राणायाम,
प्रत्याहार, धारणा, तर्क, समाधि और ध्यान—यह क्रम मिलता है। विष्णुसंहिता
(३०।६१-७२) में विस्तार से इनका विवरण भी मिलता है। इनमें तर्क के सिवाय अन्य अंग
पातंजल योग संमत ही हैं। इनके क्रम में भिन्नता मिलती है, किन्तु सर्वत्र तर्क को समाधि के
साथ रखा गया है।
मालिनीविजय (१७।१८) और तन्त्रालोक (४।१५) में योग के सभी अंगों में १तर्क
को श्रेष्ठ बताया गया है। विष्णुसंहिता२ (३०।६९-७०) में कहा गया है कि धारणा में जब
चित्त संलग्न हो, तब अन्वय और व्यतिरेक की सहायता से किया गया निश्चय ही तर्क
कहलाता है। भारतीय वाङ्मय में सत्तर्क को बहुत पहले प्रतिष्ठा प्राप्त हो चुकी थी।
निरुक्त३ में बताया गया है—ऋषियों की परम्परा के समाप्त हो जाने पर मनुष्यों ने देवताओं
से पूछा कि अब हमारे बीच ऋषि का कार्य कौन करेगा ? इसके उत्तर में देवताओं ने मनुष्य
को तर्क शक्ति दी कि अब यही तुम लोगों के लिए ऋषि का कार्य करेगी। धर्मशास्त्रकारों४
ने भी शास्त्रों के अविरोधी सत्तर्क को मान्यता दी है। उपर्युक्त स्थल पर (पृ० १५-२०)
तन्त्रालोक के टीकाकार ने अनेक शास्त्रीय प्रमाणों के आधार पर शास्त्रानुरोधी सत्तर्क की
प्रतिष्ठा की है। उनका कहना है कि तर्क को अप्रतिष्ठित तभी माना जाता है, जब कि यह
शास्त्रविरुद्ध हो।
जयरथ ने ऊह को तर्क का ही पर्याय माना है। मृगेन्द्रागम के योगपाद५ में योग
१. योगाङ्गत्वे समानेऽपि तर्को योगाङ्गमुत्तमम् ।
२. अन्वयव्यतिरेकाभ्यां यस्माद् यदुपलभ्यते ।
धारणादिषु कालेषु स तर्कः संप्रकीर्तितः ॥
३. "मनुष्या वा ऋषिषूत्क्रामत्सु देवानब्रुवन् को न ऋषिर्भविष्यतीति । तेभ्य एनं तर्कमृषिं
प्रायच्छन्" (१३।१२) ।
४. आर्षं धर्मोपदेशं च वेदशास्त्राविरोधिना ।
यस्तर्केणानुसन्धत्ते स धर्मं वेद नेतरः ॥ (मनु० १२।१०६)
५. प्राणायामः प्रत्याहारो धारणा ध्यानवीक्षणे ।
जपः समाधिरित्यङ्गान्यङ्गी योगोऽष्टमः स्वयम् ॥३॥
Courtesy: Shri Tarun Dwivedi, Surviving Son of Late Vraj Vallabh Dwivediji (15 Jul 1926 - 17 Feb 2012)