विज्ञान भैरव तन्त्र (११२ ध्यान धारणाएँ - हिन्दी व्याख्या सहित)
Vijnana Bhairava Tantra with Hindi Commentary
भगवान भैरव / प्रो. ब्रजवल्लभ द्विवेदी द्वारा
स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास / चौखम्बा · मोतीलाल बनारसीदास / चौखम्बा · 1950 (उद्गम)
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इस अनोखे रहस्यवाद ने 'ब्रह्मचारी'१ शब्द का अर्थ ही बदल दिया । मारविजयी
बुद्ध और कामदेव को भस्म कर देने वाले योगिराज शिव के द्वारा प्रवर्तित धर्मों में काम के
इस अनोखे प्रवेश ने कृष्णभक्ति धारा में ही नहीं, रामभक्ति धारा में भी रसिक संप्रदाय को
जन्म दे दिया । मर्यादापुरुषोत्तम राम के लोकमंगलकारी स्वरूप की रक्षा का श्रेय गोस्वामी
तुलसीदास को दिया जाना चाहिये । अन्यथा राम का यह चरित्र भी उसी तरह से पीछे
ढकेल दिया गया होता, जैसा कि भगवान् श्रीकृष्ण का महाभारत और भगवद्गीता में वर्णित
स्वरूप हमारी आँखों से ओझल सा हो गया है । विश्व के उत्कृष्टतम ग्रन्थ महाभारत को
घर में रखना अथवा पढ़ना आज महान् अमंगलकारी कार्य मान लिया गया है और गीता का
अध्ययन गृहस्थ के लिये निषिद्ध है । इसके स्थान पर भागवत की, भागवत के दशम स्कन्ध
की और रासलीला की उत्तरोत्तर प्रतिष्ठा बढ़ गई है और रासलीला के रहस्य को औपनिष-
दिक रहस्यवाद से भी ऊँचा स्थान दिया गया है । हम कहाँ पहुँच गये हैं ।
स्वर्ग देखने के लोभ में नाक कटा लेना कोई बुद्धिमानी नहीं है । आज हमें एक
जगह खड़े होकर देखना है कि आगे किस तरफ जाना है । किसी समय तान्त्रिक धर्म ने
भारतीय संस्कृति के विस्तार के लिये स्तुत्य प्रयास किया था, किन्तु आज हम उसकी
अच्छाइयों को भुला चुके हैं । समाज ऊँच-नीच, छोटे-बड़े, के घेरे में बंटा हुआ है, सन्तों
की वाणी का, जिनका कि प्रेरणा-स्रोत मुख्यतः २तान्त्रिक वाङ्मय ही रहा है, समाज पर
केवल मौखिक प्रभाव है, अर्थात् उसका उपयोग केवल एक दूसरे को उपदेश देने तक सीमित
है । अपनी दैनिक दिनचर्या में उसको उतारने का प्रयास नहीं किया जाता । इसका भी एक
मौलिक कारण है। उपनिषद्, गीता या अन्य आध्यात्मिक ग्रन्थों के उत्कृष्ट उपदेशों का अधिकारी
सामान्य मनुष्य को नहीं माना जाता । उनके लिये इन उत्कृष्ट आध्यात्मिक मूल्यों का अनुसरण
कर पाना कठिन है, ऐसा मान कर नाना प्रकार के कर्मकाण्डों की सृष्टि कर दी गई है, जैसा
कि इस ग्रन्थ के १० वें श्लोक में बताया गया है। ऐहलौकिक जीवन की अपेक्षा पारलौकिक
जीवन पर ध्यान अधिक केन्द्रित कर दिया गया है । फलतः सामान्य मनुष्य निकृष्टतम जीवन
बिताते हुए भी कुछ कर्मकाण्डों का नियमित आचरण कर धार्मिक बन बैठता है । इस स्थिति
को दूर किया जाना चाहिये । विज्ञानभैरव जैसे ग्रन्थ इनमें सहायक हो सकते हैं ।
भारतीय दर्शनों में ऐहलौकिक अभ्युदय को हेय दृष्टि से देखा जाता है और पार-
लौकिक अभ्युदय को उपादेय । फलतः इनमें ऐहलौकिक अभ्युदय संबन्धी विचारों को बहुत
१. “ओष्ठचान्त्यत्रितयासेवी ब्रह्मचारी स उच्यते" (तन्त्रा० २९।९८) । ओष्ठचान्त्यत्रितया-
सेवी का तात्पर्य तीन मकारों के सेवन से है ।
२. डॉ० राममूर्ति त्रिपाठी ने 'तन्त्र और सन्त' नामक ग्रन्थ में इस विषय पर अच्छा प्रकाश
डाला है, किन्तु 'तन्त्र' शब्द का प्रयोग उन्होंने सीमित अर्थ में किया है । वस्तुतः प्राचीन
शैव और वैष्णव आगम भी इसी श्रेणी में आते हैं और सन्तों की वाणी पर इन सबका
प्रभाव है ।