विज्ञान भैरव तन्त्र (११२ ध्यान धारणाएँ - हिन्दी व्याख्या सहित)
Vijnana Bhairava Tantra with Hindi Commentary
भगवान भैरव / प्रो. ब्रजवल्लभ द्विवेदी द्वारा
स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास / चौखम्बा · मोतीलाल बनारसीदास / चौखम्बा · 1950 (उद्गम)
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विज्ञानभैरव : १०१
हो जाता है।
मातृका अर्थात् वर्णमाला का पहला अक्षर अकार है। वह परमेश्वर शिव से
अभिन्न है। यह जब नाद और बिन्दु से संयुक्त हो जाता है, तो वह ईश्वर की शक्ति
कहलाता है। यह शिव और शक्तिमय अकार इस सारे अचर और चर, स्थावर और
जंगम जगत् का बीज माना जाता है, अर्थात् बीज से वृक्ष की तरह शिवशक्तिमय अकार
से सारे विश्व की सृष्टि होती है। स्वर और व्यंजन सभी वर्ण इसी से व्याप्त हैं, अर्थात्
इन सबमें अकार किसी न किसी रूप में विद्यमान है। इसीलिये यथार्थ तत्त्व की खोज में
लगे योगी इसको शब्दब्रह्म के नाम से पुकारते हैं। प्राण और स्वर के रूप में जो अभी
परिणत नहीं हुआ है, उस अकार का निर्विभाग (विभाग रहित) अवस्था में विद्यमान
पश्यन्ती की सहायता से चिन्मात्र स्वरूप में चिन्तन करने वाला योगी परम पद में प्रविष्ट
हो जाता है, स्वात्मस्वरूप में विलीन हो जाता है।
शास्त्रों में आचार्यों ने¹ इस बात को इस तरह से स्पष्ट किया है—नाभि से
एक वितस्ति (बित्ता) ऊपर और कंठ से छः अंगुल नीचे हृदय विद्यमान है। इस हृदय
के बीच के भाग में एक कमल है। इस कमल के बीच में तीन कोनों वाली कर्णिका है।
इस कर्णिका के मध्य भाग में अकार का स्वरूप धारण कर आत्मा रहती है। इस अकार
के भीतर अत्यन्त सूक्ष्म तत्त्व निवास करता है, जिसमें कि चित् तत्त्व का निरन्तर स्फुरण
होता रहता है। विज्ञानभैरव के "अबिन्दुर्माविसर्गं च" इत्यादि श्लोक में इसी चित् तत्त्व
की उपासना का विधान है।
आत्मा के उसी निवास स्थान में ईश्वर की शक्ति भी निवास करती है,
जिसको कि कुण्डलिनी कहते हैं। इसी का संयोग होने पर शिव सृष्टि करने में समर्थ
होते हैं। अतः यह विश्व की जननी है। यह कुण्डलिनी शक्ति सांप की तरह साढ़े तीन
लपेटे खाकर बिना किसी आधार के यहाँ बैठी रहती है। इसी को प्राणशक्ति कहा
जाता है। यह शक्ति शरीर में हकार रूपी नाद के स्वरूप में सदा नदन करती रहती
है। योगी अपने दोनों कानों को बन्द कर इसके नदन व्यापार को सुन सकता है। यह
शक्ति भ्रूमध्य में बिन्दु के रूप में निवास करती है। सारे संसार की यही मंगलमयी
जननी है। अपने तेज से प्रकाशित इस बिन्दु रूप शक्ति का योगी नित्य दर्शन करते
हैं। उस बिन्दु के चन्द्र और सूर्य वाम और दक्षिण नेत्र हैं। इनको आश्रय हीन कर,
अर्थात् विषयों से हटा कर, योगी परम पद अर्थात् ब्रह्म में प्रविष्ट हो जाता है।"
- प्रस्तुत उद्धरण में वामननाथ ने विज्ञानभैरव और सिद्धादिष्ट सिद्धान्तसंग्रह की चर्चा की
है। तान्त्रिक साहित्य (पृ० ७०१) के अनुसार किसी सिद्धान्तसंग्रह का उल्लेख
पुरश्चर्यार्णव में हुआ है। वामननाथ और उनके ग्रन्थ आदि के सम्बन्ध में लुप्तागमसंग्रह
के द्वितीय भाग के उपोद्घात में विचार किया गया है। देखिये पृ० १५, ६५-६६ तथा
अन्यत्र भी।