विज्ञान भैरव तन्त्र (११२ ध्यान धारणाएँ - हिन्दी व्याख्या सहित)
Vijnana Bhairava Tantra with Hindi Commentary
भगवान भैरव / प्रो. ब्रजवल्लभ द्विवेदी द्वारा
स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास / चौखम्बा · मोतीलाल बनारसीदास / चौखम्बा · 1950 (उद्गम)
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६८ : विज्ञानभैरव
ध्यातृध्याने परित्यज्य क्रमाद् ध्येयैकगोचरम् ।
निवातदीपवच्चित्तं समाधिरभिधीयते ॥ (पञ्चदशी १।५५)
अर्थात् ध्याता और ध्यान को छोड़कर अभ्यास की परिपक्वता के कारण जब चित्त
केवल ध्येय को ही अपना विषय बनाता है, तब वह उसी तरह से स्थिर हो जाता है, जैसे
कि पवनरहित स्थान में दीपक स्थिर रहता है। चित्त की इसी अवस्था को 'समाधि' कहा
जाता है। योगशास्त्र प्रतिपादित इस प्रक्रिया के अनुसार ध्याता और ध्यान को छोड़कर
केवल ध्येय की आलम्बन रहित, शून्य स्वभाव, १मध्यम धाम में विश्रान्ति ही योगी के लिये
उपेय (प्राप्तव्य) है। इसीलिये व्यक्त और अव्यक्त भाव के बीच में, रूपरहित स्वभावरहित
मध्यम धाम में, चित्त की विश्रान्ति हो जाने से भावना (इस मध्य-दशा में विश्रान्ति का
संस्कार) भलीभांति विकसित हो जाती है, उद्बुद्ध हो जाती है। अर्थात् इस संस्कार के उद्बुद्ध
होने से व्यक्त और अव्यक्त इन दोनों भावों के बीच की अवस्था में इन दोनों दशाओं का
एक रूप में अनुसन्धान करने वाली चिन्मात्रस्वरूपा विश्रान्ति की प्राप्ति होती है। उस अवस्था
में किसी अद्भुत वस्तु को देखकर हुई चित्त की उत्फुल्ल दशा के समान साधक का चित्त
हर्षातिरेक से खिल उठता है और उसी में उसको अपने स्वात्मस्वरूप का बोध होता है, वह
स्वयं ब्रह्मस्वरूप हो जाता है।
इस श्लोक को भी अभिनवगुप्त एवं क्षेमराज ने पूर्व श्लोक के साथ उद्धृत किया है।
तन्त्रालोक में—
ईदृक्तादृक्प्रायप्रशमोदयभावविलयपरिकथया ।
अनवच्छिन्नं धाम प्रविशेद् वैसर्गिकं सुभगः ॥ (२९।११८-११९)
• अनवच्छिन्न वैसर्गिक धाम के नाम से चित्त की इसी उत्फुल्ल दशा में प्रवेश की बात
वर्णित है। साथ ही क्षेमराज ने स्पन्दनिर्णय में “एकचिन्ताप्रसक्तस्य” (श्लोक ४१) इस
श्लोक की व्याख्या के प्रसंग में भी उन्मेषावस्था के रूप में चित्त की इसी विकासावस्था को
समझाया है ॥६१॥
[ धारणा-३९]
२सर्वं देहं चिन्मयं हि जगद् वा विभावयेत् ।
युगपन्निर्विकल्पेन मनसा१ परमोदयः२ ॥६२॥
१. °सः-ख० । २. °मा गतिः-ख०, °द्भवः-शि० ।
१. इस शब्द की पहले एकाधिक स्थलों पर व्याख्या की जा चुकी है। मध्यम धाम या मध्य-
दशा को शून्यस्वभाव इस लिये कहा जाता है कि यहां ज्ञाता-ज्ञान-ज्ञेय, प्रमाता-प्रमाण-प्रमेय
प्रभृति त्रिपुटियों की कोई सत्ता नहीं बची रहती। ७२ संख्या की कारिका में भी प्रमेय,
मान आदि की शान्त दशा का वर्णन है।
२. स्वच्छन्दतन्त्र की उद्योत टीका (भा० ३, प० ७, पृ० ३१२) में इस श्लोक की प्रथम
पंक्ति और शिवसूत्रविमर्शिनी (पृ० १७) में पूरा श्लोक मिलता है।
Courtesy: Shri Tarun Dwivedi, Surviving Son of Late Vraj Vallabh Dwivediji (15 Jul 1926 - 17 Feb 2012)