सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
संग्रह पर लौटें

विज्ञान भैरव तन्त्र (११२ ध्यान धारणाएँ - हिन्दी व्याख्या सहित)

Vijnana Bhairava Tantra with Hindi Commentary

भगवान भैरव / प्रो. ब्रजवल्लभ द्विवेदी द्वारा

स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास / चौखम्बा · मोतीलाल बनारसीदास / चौखम्बा · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished256 पृष्ठ

img111_2R

विज्ञानभैरव : १६१
'ध्यान' पद से कही जाती है । इसका अभिप्राय यह है कि वेद्य अथवा अवेद्य विषयों की उप-
स्थिति में भी समाधि के अभ्यास के कारण पवन रहित स्थान में स्थापित दीपक के समान
जो स्थिर निर्विकार बुद्धि होती है, उसी को इस शास्त्र में 'ध्यान' के नाम से जाना जाता है ।
भगवान् के साकार रूप की कल्पना कर उसके मुंह, आँख आदि अंगों में अपने चित्त को स्थिर
करना यहां ध्यान नहीं कहा जाता । ध्यान की यह कल्पना तो स्थूल दृष्टि वाले पशु-शास्त्रों
की उपज है ॥१४३॥
१पूजा नाम न पुष्पाद्यैर्या मतिः क्रियते दृढा ।
निर्विकल्पे परे १व्योम्नि सा पूजा ह्यादराल्लयः ॥१४४॥
नाम इति प्रसिद्धेऽर्थे । प्रसिद्धमेतद् यदत्र शास्त्रे पुष्पाद्यैः पूजा न निष्पाद्यते,
अपि तु निर्विकल्पे परे व्योम्नि महाव्योमनि परचिदाकाशे, या दृढा मतिः क्रियते,
आदरात् श्रद्धाप्रकर्षात्, यो लयो विश्रान्तिः संपाद्यते, सैव तत्त्वतः पूजा ॥१४४॥
इस शास्त्र में यह बात प्रसिद्ध है कि यहाँ पुष्प, २धूप, गन्ध आदि बाह्य उपकरणों से
पूजा नहीं की जाती, किन्तु निर्विकल्पक महाकाश अर्थात् परचिदाकाश, बोधभैरव के प्रति
दृढ़ आस्था ही पूजा कहलाती है कि इस बोधभैरव से ही यह सारा संसार व्याप्त है । अतः
आदर और श्रद्धा पूर्वक उक्त धारणाओं में से किसी एक धारणा का निरन्तर अभ्यास करते
हुए उस बोधभैरव में, स्वात्मस्वरूप में विश्रान्ति प्राप्त कर लेना, लीन हो जाना ही परमार्थतः
पूजा कहलाती है । जैसा कि संकेतपद्धति के निम्न श्लोक में भी बताया गया है—
३न पूजा बाह्यपुष्पादिद्रव्यैर्या प्रथिताऽनिशम् ।
स्वे महिम्न्यद्वये धाम्नि सा पूजा या परा स्थितिः ।।
योगिनीहृदय ( ३।२-३ ) में पूजा के तीन भेद बताये गये हैं और परा पूजा का यह लक्षण
किया गया है कि सभी जागतिक पदार्थों में अद्वय दृष्टि ही, उन सबकी परम महिमामय स्वात्म-
स्वरूप में परम प्रतिष्ठा ही वस्तुतः परा पूजा है । तन्त्रालोक में पूजा का लक्षण इस प्रकार
दिया गया है—
१. महा°-ने० त० शि० स्त० ।

  1. तन्त्रा० वि० ( भा० १, आ० १, पृ० ५१; भा० ३, आ० ४, पृ १२४ ), स्तवचिन्ता-
    मणिटीका (पृ० १२० ) और नेत्रतन्त्रोद्योत ( भाग २, पृ० ९ ) में यह श्लोक मिलता
    है । शिवस्तोत्रावलीव्याख्या ( पृ० २११ ) पर चतुर्थ पाद और ( पृ० ३७३ ) पर
    उत्तरार्ध मात्र मिलता है ।
  2. धूप, गन्ध, दीप, नैवेद्य प्रभृति की आध्यात्मिक व्याख्या के लिये ऋजुविमर्शिनी ( पृ०
    १३४ ) देखनी चाहिये ।
  3. संकेतपद्धति का यह श्लोक ऋजुविमर्शिनी ( पृ० ८९ ) योगिनीहृदयदीपिका (पृ० १९१)
    प्रभृति ग्रन्थों में उद्धृत है ।
    ११