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विज्ञान भैरव तन्त्र (११२ ध्यान धारणाएँ - हिन्दी व्याख्या सहित)

Vijnana Bhairava Tantra with Hindi Commentary

भगवान भैरव / प्रो. ब्रजवल्लभ द्विवेदी द्वारा

स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास / चौखम्बा · मोतीलाल बनारसीदास / चौखम्बा · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished256 पृष्ठ

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१४४ : विज्ञानभैरव
अपने चित्त को एकाग्र कर लेता है, वह कृतकृत्य हो जाता है। अर्थात् सर्वज्ञता आदि गुणों
से विशिष्ट शिव ही सर्वत्र व्याप्त है, उससे भिन्न किसी भी वस्तु की कोई सत्ता नहीं है,
वही सब कुछ करता है, इस तरह से ईश्वर के ऐश्वर्यबोधक नामों के अर्थ का चिन्तन करने
वाला योगी धीरे-धीरे यह जान जाता है कि यह सारा ऐश्वर्य मेरा ही है। मुझसे भिन्न
किसी की कोई सत्ता नहीं है, सर्वज्ञता, सर्वकर्तृता आदि गुण भी मेरे ही है। यह स्वाभाविक
बात है कि इस स्थिति पर पहुँच जाने पर वह सभी प्रकार के विकल्पों से मुक्त हो अपने
स्वरूप में प्रतिष्ठित हो जाय। स्पन्दकारिका के ‘गुणादिस्पन्द’ इत्यादि श्लोकों में इसी स्थिति
का वर्णन मिलता है। इन श्लोकों को उद्धृतकर उनकी व्याख्या पहले (पृ० १०७) की जा
चुकी है। नामकीर्तन का माहात्म्य भट्ट नारायण की स्तवचिन्तामणि में अनेक स्थलों पर
(श्लो० १९,७९,८२) वर्णित है। इनका यही अभिप्राय है कि बिना अर्थ का चिन्तन किये
ईश्वर के केवल नाम मात्र के उच्चारण से भी मानव मोक्ष पर्यन्त सिद्धि प्राप्त कर लेता है।
यही प्रस्तुत धारणा का भी प्रतिपाद्य है ॥१२९॥
[ धारणा-१०७ ]
अतत्त्वमिन्द्रजालाभमिदं ¹सर्वमवस्थितम् ।
किं तत्त्वमिन्द्रजालस्य ²इति दाढर्याच्छमं व्रजेत् ॥१३०॥
इदं सर्वं जगत्, अतत्त्वं निस्तत्त्वरूपम्, असारमिति यावत्। अत एव इन्द्रजाला-
भम् इन्द्रजालतुल्यमवस्थितं वर्तते। इन्द्रजालस्य किं तत्त्वम् ? न किञ्चिदित्यर्थः।
अतः सर्वमिदमिन्द्रजालवत् प्रतीयमानं जगन्न वस्तुसदिति भावनादार्थ्यात् साधकः
शमं व्रजेत्। सद्वस्तुव्यपदेश्यं प्रमातृतत्त्वमितो भिन्नमेवेति भावनाबलेन तत्त्वविदो
निर्वाणपदावाप्तिर्भवेदिति भावः ॥१३०॥
यह सारा जगत् निस्तत्त्व है, अर्थात् सारहीन है। इसी लिये इसकी स्थिति इन्द्रजाल
के समान है, जादूगर की बनाई हुई चीजों की भांति है। जादूगर अपने जादू से, हाथ की
सफाई से जिन वस्तुओं को जिस रूप से दिखाता है, क्या उनकी कोई वास्तविक सत्ता है ?
नहीं। जैसे उनकी कोई वास्तविक सत्ता नहीं है। उसी तरह से यह प्रतीयमान जगत् भी
वास्तविक नहीं है। इस परमार्थ दृष्टि में जो साधक अपनी भावना को दृढ़ करता है, वह
शान्त समाधि में लीन हो जाता है। अर्थात् परमार्थसत् नाम से जाना जाने वाला प्रमातृ-
तत्त्व इस इन्द्रजाल तुल्य संसार से सर्वथा पृथक् है; अपनी भावना के आधार पर इस वस्तु-
स्थिति को समझने वाला तत्त्ववेत्ता निर्वाण पदवी को प्राप्त कर लेता है ॥१३०॥
[ धारणा-१०८ ]
आत्मनो निर्विकारस्य क्व ज्ञानं क्व च वा क्रिया ।
ज्ञानायत्ता बहिर्भावा अतः शून्यमिदं जगत् ॥१३१॥
आत्मनो निर्विकारस्य बोधात्मकस्य चिदात्मनो निर्विभागत्वेन निर्विकारत्वात्
१. °वं व्य°—ख०। २. चेति—ख०।