विज्ञान भैरव तन्त्र (११२ ध्यान धारणाएँ - हिन्दी व्याख्या सहित)
Vijnana Bhairava Tantra with Hindi Commentary
भगवान भैरव / प्रो. ब्रजवल्लभ द्विवेदी द्वारा
स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास / चौखम्बा · मोतीलाल बनारसीदास / चौखम्बा · 1950 (उद्गम)
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१३२ : विज्ञानभैरव
अपने निर्विकल्प ज्ञान से मन के मैल को धोकर सर्वत्र सुखपूर्वक विचरण करे। मालिनीविजय
तन्त्र में बताया गया है—
नात्र शुद्धिर्न चाशुद्धिर्न भक्ष्यादिविचारणम् ।
न द्वैतं नापि चाद्वैतं लिङ्गपूजादिकं न च ॥
न चापि तत्परित्यागो निष्परिग्रहतापि वा ।
सपरिग्रहता वापि जटाभस्मादिसंग्रहः ॥
तत्यागो न व्रतादीनां चरणाचरणं च यत् ।
क्षेत्रादिसंप्रवेशश्च समयादिप्रपालनम् ॥
परस्वरूपलिङ्गादिनामगोत्रादिकं च यत् ।
नास्मिन् विधीयते किञ्चिन्न चापि प्रतिषिध्यते ॥
विहितं सर्वमेवात्र प्रतिषिद्धमथापि वा ।
किन्त्वेतदत्र देवेशि नियमेन विधीयते ॥
तत्त्वे चेतः स्थिरीकार्यं सुप्रयत्नेन योगिना ।
तच्च यस्य यथैव स्यात् स तथैव समाचरेत् ॥
तत्त्वे निश्चलचित्तस्तु भुञ्जानो विषयानपि ।
न संस्पृशेत् दोषैः स पद्मपत्रमिवाम्भसा ॥
विषापहारिमन्त्रादिसंनद्धो भक्षयन्नपि ।
विषं न मुह्यते तेन तद्वद् योगी महामतिः ॥ (१८।७४-८१)
अर्थात् योगी का आचरण कैसा होना चाहिये, इस विषय का निरूपण करते हुए
परमेश्वर ने इस ग्रन्थ के अठारहवें पटल में बताया है कि इनके लिये शुद्धि और अशुद्धि का
विधान, भक्ष्य और अभक्ष्य का निरूपण, द्वैत या अद्वैत का उपदेश, लिंग-पूजा आदि का विधान
या निषेध, निष्परिग्रह रहने या सपरिग्रह होने का विधान, जटा-भस्म आदि का स्वीकार या
परित्याग, व्रत आदि का आचरण करना या न करना, क्षेत्र-संन्यास आदि लेकर नियमों का
पालन करना न करना, तिलक आदि चिह्न, नाम, गोत्र, आदि को रखना न रखना—जैसी
बातों के बारे में पक्ष या विपक्ष में कुछ भी नहीं कहा जाता है। ये सभी वस्तुएँ विहित भी मानी
जा सकती हैं और निषिद्ध भी। इसमें साधक की इच्छा ही प्रमाण है कि वह इनका आचरण
करे या न करे। वस्तुतः तत्त्वज्ञान में इनकी कोई उपयोगिता नहीं है। नियम के नाम पर
शास्त्र में केवल इतना ही विधान है कि योगी को प्रयत्नपूर्वक परम तत्त्व में अपने चित्त को
स्थिर करना चाहिये। चित्त की यह स्थिरता जैसे भी हो, योगी को तदनुसार ही अपनी चर्या
बना लेनी चाहिये। जिस योगी का चित्त परम तत्त्व में स्थिर हो गया है, वह विषयों का
उपभोग करते हुए भी उनके दोषों से उसी प्रकार लिप्त नहीं होता, जैसे कि जल में रहते हुए
भी कमलपत्र उससे निर्लिप्त रहता है। विष को दूर करने वाला गारुडिक अपने शरीर को
मन्त्रों से जब सुरक्षित कर लेता है, तो उस पर जहर का असर नहीं होता, उसी तरह से यह
महान् मतिशाली योगी विषय रूपी विष को खाकर भी मोहित नहीं होता ।
Courtesy: Shri Tarun Dwivedi, Surviving Son of Late Vraj Vallabh Dwivediji (15 Jul 1926 - 17 Feb 2012)