विज्ञान भैरव तन्त्र (११२ ध्यान धारणाएँ - हिन्दी व्याख्या सहित)
Vijnana Bhairava Tantra with Hindi Commentary
भगवान भैरव / प्रो. ब्रजवल्लभ द्विवेदी द्वारा
स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास / चौखम्बा · मोतीलाल बनारसीदास / चौखम्बा · 1950 (उद्गम)
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विज्ञानभैरव : १३५
से भिन्न नहीं हैं, इस लिये सारे विमर्श एक ही हैं, विज्ञानात्मा भैरव से भिन्न और कुछ भी
नहीं है, इस तरह का ज्ञान हो जाने पर अद्वैत ज्ञान की प्राप्ति हो जाती है । इससे यह बात
स्पष्ट होती है कि परमेश्वर अहंस্বরূপ ही है और यह सबको स्पष्ट रूप से ज्ञात है । तब
उसके लिये आणव, शाक्त और शांभव-इन तीन उपायों की क्या आवश्यकता है ? जो वस्तु
स्वयं स्पष्ट प्रतीत हो रही है, उसको खोजने के लिये कोई उपाय नहीं किया जाता । जैसा
कि कहा गया है-
उपायजालं न शिवं प्रकाशयेद् घटेन किं भाति सहस्रदीधितिः ।
विवेचयन्नित्यमुदारदर्शनः स्वयंप्रकाशं शिवमाविशेत् क्षणात् ॥
अर्थात् कोई भी लौकिक उपाय शिव को नहीं प्रकाशित कर सकता । क्या घट सूर्य को प्रका-
शित कर सकता है ? उदार दृष्टि वाला मनुष्य इस तरह विचार करते-करते ही किसी समय
स्वयंप्रकाश शिव स्वरूप में समाविष्ट हो जाता है । संवित्प्रकाश में भी बताया गया है-
अपरोक्षे भवत्तत्त्वे सर्वतः प्रकटे स्थिते ।
यैरूपायाः प्रतन्यन्ते नूनं त्वां न विदन्ति ते ॥
आपका तत्त्व अर्थात् स्वरूप तो स्पष्ट रूप से सबकी आँखों के सामने विद्यमान है । ऐसी
स्थिति में जो व्यक्ति आपको देखने के लिये भाँति-भाँति के उपायों की खोज में लगे रहते हैं,
यह निश्चित है कि वे आपको नहीं जानते । श्रुति ने भी इस बात को स्पष्ट किया है-
उतैनं गोपा अदृशन्नुतैनमुदहार्यः ।
उतैनं विश्वा भूतानि स दृष्टो मृडयाति नः ॥
(वा० सं० १६।७; तै० सं० ४।५।१।३)
अर्थात् इसको ग्वालबाले जानते हैं, पनहारिनें इसको जानती हैं और विश्व के सारे प्राणी
इसको जानते हैं । इसको देख कर कौन आनन्द-विभोर नहीं हो जाता ? इसी बात को
महेश्वरानन्द ने भी "यं जानन्ति" (श्लो० ४) इत्यादि गाथा में निबद्ध किया है । इन सब
प्रमाणों के आधार पर यह स्पष्ट है कि विज्ञानात्मा स्वात्मस्वरूप की प्रतीति सबको होती
है और इसके अतिरिक्त जगत् की कोई सत्ता नहीं है । इस बात को जान लेने पर साधक
स्वात्मस्वरूप में प्रतिष्ठित हो जाता है ।।१२१।।
[ धारणा-९९ ]
1समः शत्रौ च मित्रे च समो मानावमानयोः ।
ब्रह्मणः परिपूर्णत्वादिति ज्ञात्वा सुखी भवेत् ।।१२२।।
१. °प°-ख० ।
- “मानापमानयोस्तुल्यस्तुल्यो मित्रारिपक्षयोः । सर्वारम्भपरित्यागी गुणातीतः स उच्यते ॥”
(१४।२५) भगवद्गीता के इस श्लोक में प्रस्तुत धारणा का ही स्पष्ट विवेचन मिलता
है । दोनों श्लोकों के पूर्वार्ध में अद्भुत समानता है ।