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विज्ञान भैरव तन्त्र (११२ ध्यान धारणाएँ - हिन्दी व्याख्या सहित)

Vijnana Bhairava Tantra with Hindi Commentary

भगवान भैरव / प्रो. ब्रजवल्लभ द्विवेदी द्वारा

स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास / चौखम्बा · मोतीलाल बनारसीदास / चौखम्बा · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished256 पृष्ठ

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विज्ञानभैरव : १३
इस परा भट्टारिका का यदि यह सकल स्वरूप माना जायगा तो उस अवस्था में इसमें
परत्व नाम मात्र का (लाक्षणिक) रहेगा, वास्तविक नहीं, क्योंकि परापरा देवी का और अपरा
देवी का जो सकल स्वरूप है, उससे यदि परा का लाक्षणिक तादात्म्य न मान कर वास्तविक
कहा जायगा, तो उसमें परत्व कैसे आवेगा ? परा, परापरा और अपरा में परस्पर भेद ही
मानना पड़ेगा। परा के स्वरूप से वेद्यराशि के रूप में स्वीकृत सकल स्वरूप विरुद्ध पड़ेगा,
क्योंकि परा देवी का यह स्वभाव नहीं है। इस तरह से परा का परापरा या अपरा के साथ
अभेद नहीं सिद्ध किया जा सकता। वर्णों की श्वेत आदि विशेषता के आधार पर अथवा
अक्षरों की विशेषता के आधार पर या शरीर की सुर, नर, तिर्यक् के रूप में आकृति की
विशेषता के कारण अथवा द्वादशान्त प्रभृति शरीर के विशेष स्थानों का सहारा लेने के कारण
परत्व (प्रकृष्टत्व) नहीं होता, किन्तु निष्कलता अर्थात् कलना की शून्यता की अवस्था में ही
वह निष्पन्न होता है। सकल अवस्था में यह प्रकृष्टता किसी भी तरह से नहीं प्राप्त हो
सकती, अतः परावस्था को परापरा और अपरा अवस्था से भिन्न ही मानना उचित होगा।
देवी पूछती है कि क्या यह विचार-सरणि सही है ? ।।५-६।।
प्रसादं कुरु मे नाथ निःशेषं छिन्धि संशयम् ।
हे नाथ, मे मम प्रसादं कुरु प्रसाददृष्टिं ददस्व, निःशेषं समस्तं मम हृदि स्थितं
संशयं छिन्धि शमय ।
इस तरह से समस्त आगम शास्त्रों के हृदय को छूने वाले प्रश्नों के माध्यम से
विचारणीय तत्त्वों को सामने लाने के बाद संविद्¹देवी संपूर्ण विज्ञानभैरव रूप में अपना प्रवेश
पाने की दृष्टि से कहती है कि हे नाथ, मेरे ऊपर आप अनुग्रह कीजिये; वाणी, शरीर और
मन से एक होकर आप मेरे ऊपर कृपादृष्टि डालिये; माया, महामाया आदि के संसर्ग से प्राप्त
कालुष्य को दूर कर अपने निर्मल स्वरूप को मुझे बताइये और मेरे इस आठ खण्ड (कोटि)
वाले संशय को आप मिटा दीजिये। अभिप्राय यह है कि तत्त्व यह है या वह ? तत्त्व वह है
या यह ? अथवा इन सबसे भिन्न है ? इस तरह के अनेक कोटि वाले संशय की सब अवस्थाओं

  1. "प्राक् संवित् प्राणे परिणता" (अनेक स्थलों पर उद्धृत भट्ट कल्लट का वचन), "संविदेव
    भगवती स्वान्तःस्थितं जगद् बहिः प्रकाशयति" (ऋजु० पृ० २७) इत्यादि स्थलों में
    संवित् शब्द पराहन्ता (पूर्णाहन्ता) मयी स्वातन्त्र्य शक्ति का वाचक है। शाक्त मत में
    यही परम तत्त्व के रूप में मान्य है। लक्ष्मीतन्त्र (१४।५) में संवित् को लक्ष्मी का
    स्वच्छ, स्वच्छन्द स्वरूप बताया गया है। प्रस्तुत स्थल में संवित् शब्द का प्रयोग विमर्श
    शक्ति के लिये किया गया है। दार्शनिकों ने इस शब्द का प्रयोग विज्ञान अथवा ज्ञान
    सामान्य के अर्थ में भी किया है। क्रम दर्शन में पंचवाह पद की व्याख्या करते समय
    व्योमवामेश्वरी, खेचरी प्रभृति समष्टि शक्तियों को और अन्तःकरण, बहिःकारण के
    माध्यम से प्रवहमान व्यष्टि शक्तियों को संविद्देवीचक्र के रूप में मान्यता दी गई है।