विज्ञान भैरव तन्त्र (११२ ध्यान धारणाएँ - हिन्दी व्याख्या सहित)
Vijnana Bhairava Tantra with Hindi Commentary
भगवान भैरव / प्रो. ब्रजवल्लभ द्विवेदी द्वारा
स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास / चौखम्बा · मोतीलाल बनारसीदास / चौखम्बा · 1950 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें( २९ )
६९वें श्लोक की व्याख्या में अभिनवगुप्त के प्रमाण से बताया गया है कि उन्मुक्त
बाह्य शाक्त स्पर्श के अभाव में भी आन्तर शाक्त स्पर्श के कारण वीर्य का क्षोभ, आनन्दोदय
अवस्था की अभिव्यक्ति होती है। इस स्थिति में भी बाह्य क्षोभ की शान्ति अपेक्षित है । तभी
लौकिक आनन्द से विलक्षण आनन्दोदय अवस्था, ब्रह्मानन्द दशा का प्रादुर्भाव हो सकता है ।
७५, ८६-८७, ९०-९१ और १०३ संख्या की धारणाओं में इस बाह्य क्षोभ की शान्ति के
लिये ही उपाय वर्णित है ।
विकल्प
बाह्य नील-पीत (घट-पट) आदि से लेकर शून्य पर्यन्त सभी पदार्थ विकल्प स्वरूप
माने गये हैं। अहं परामर्श दो प्रकार का होता है—शुद्ध और मायीय । इनमें से शुद्ध परामर्श
विश्व से अभिन्न रूप में विद्यमान संविन्मात्र में अथवा विश्व की छाया से असंस्पृष्ट स्वच्छ
आत्मा में होता है। मायीय अथवा अशुद्ध परामर्श वेद्यस्वरूप देह, बुद्धि, प्राण, शून्य आदि
को अपना आलम्बन बनाता है, अर्थात् इन्हीं को अपना स्वरूप मान बैठता है। इनमें से शुद्ध
परामर्श में किसी प्रतियोगी (विरोधी) पदार्थ की सत्ता न रहने से कोई भी अपोहनीय
(त्याज्य) नहीं है । घट प्रभृति बाह्य पदार्थ भी उस प्रकाशस्वरूप परम तत्त्व से ही अपना
अस्तित्व बनाते हैं, अतः वे उससे अभिन्न ही हैं, उसके विरोधी नहीं। इस अवस्था में जब
कोई स्थिति अपोहनीय नहीं है, तो वह विकल्प कैसे हो सकती है ? इसके विपरीत अशुद्ध
(मायीय) परामर्श से वेद्यरूप शरीर प्रभृति में उससे भिन्न देह आदि का और घट प्रभृति
का भी व्यपोहन (व्यवच्छेद = भेद) विद्यमान है । इसी भेद दशा की प्रतीति को विकल्प के
नाम से जाना जाता है ।
अपोहन
परमार्थतः अपोहन व्यापार की कोई स्थिति नहीं है, किन्तु जागतिक व्यवहार का
संचालन ज्ञान, स्मृति और अपोहन नाम की शक्तियों के सहारे चलता है । “मत्तः स्मृतिर्ज्ञान-
मपोहनं१ च” (भ०गी० १५।१५), “स्यादेकश्चिद्रपुर्ज्ञानस्मृत्यपोहनशक्तिमान्” (ई०प्र० १।३।७)
इत्यादि वचनों में इन्हीं व्यापारों की चर्चा की गई है । बौद्ध दर्शन में भी एक पदार्थ से
दूसरे पदार्थ को अलग करने के लिये, एक पदार्थ से दूसरे पदार्थ का भेद बताने के लिये
अपोह की कल्पना की गई है । बौद्ध विज्ञानवाद और शून्यवाद में भी विज्ञान अथवा शून्य के
अतिरिक्त सभी जागतिक पदार्थ विकल्प स्वरूप ही माने गये हैं ।
१. काश्मीरी लेखकों के सिवाय अन्य सभी टीकाकारों ने अपोहन का अर्थ ज्ञान और स्मृति
का प्रमोष किया है। रामानुजाचार्य के मत का उल्लेख षडंग योग के प्रकरण में तर्क पर
विचार करते समय किया जायगा ।